यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शनिवार, 24 जून 2017

होठों पे प्यार का तूँ पैगाम लिख दे














 होठों पे प्यार का तूँ पैगाम लिख दे 
मेरे होंठो पे आ अपना नाम लिख दे||

सुनता हूँ तूं कवितायें बहुत लिखती है
मेरे दिल पे भी  कोई  कलाम लिख दे||

तूं बहुत चाहती मुझको देना अगर
बस मेरे नाम अपनी इक शाम लिख दे||

मुझको लिखना नहीं तूँ कोई लंबा ख़त
लिखना है तो बस दिल मेरे नाम लिख दे||

बड़े अदब से तूँ करती सलाम बहुत है
प्यार के भी नाम इक सलाम लिख दे ||


प्यार करने की फुर्सत न दे काम जो  
तो मेरे नाम अपने सब काम लिख दे ||

जब दस्तावेज़ प्यार  का है सामने पड़ा
ऐसे में ‘पवन’ नाम सरेआम लिख दे ||

पवन तिवारी
सम्पर्क- 7718080978
poetpawan50@gmail.com

शुक्रवार, 23 जून 2017

ओह मैंने क्या देखा है



ओह मैंने क्या देखा है

जो देखा है पहली बार देखा है
एक खूबसूरती में अनेक खूबसूरती है
इस खूबसूरती से उसकी बाकी
सभी खूबसूरतियाँ उससे खूबसूरत हैं
वो सीने का उभार जहां
 नजर गई पहली बार ठहर सी गई
देखा जैसे सुंदर पठार इतना सुंदर पठार कि
मेरी नज़र शरमा आ गई
उस खूबसूरत पठार से नीचे
जो मेरी नजरें लुढ़की तो
पठार से लुढ़ककर खूबसूरत झरने और फिर

खूबसूरत छोटे से कुंड पर
ठहर गई मेरी नजरें
जो पठार से कम खूबसूरत नहीं थे
मैंने अपनी ठहरी नजरों को झिंझोड़ा
तो अचकचाकर वहां से जाकर
चेहरे पर गड़ गई

वो तो एक पूरी दुनिया था उसका चेहरा
मेरी नजरें मदहोश हो गई
उसके दोनों कानों में जैसे झूला पड़ा हो
और पास की जुल्फें पेंग मार रही हों
थोड़ी पलक झपकी तो
आंखों पर आंखे आकर टिक गई
उसमें मुझे मेरा चेहरा हिलता हुआ दिखा
जैसे झील में हिलता हुआ दर्पण
सब कुछ गजब था
एक से बढ़कर एक...

उसके ठीक नीचे एक मैदानी दालान
और फिर एक गुलाबी टापू
जिस पर ठहरने और
सोने का दिल करने लगा
उसी के बगल में नजर पड़ी तो
अजंता एलोरा सी सुंदर गुफाएं थी

गुफा के द्वार पर सोने का चक्र घूम रहा था
अद्भुत.. जी चाहा कि.. बस देखता रहूं पर
मुझे उसे देखना था पूरा का पूरा
दिन ढलता जा रहा था
उसके ठीक नीचे एक सुंदर सी
छोटी सी ढलान वाली दालान थी

उसके बाद तो एक मनमोहक
सुगंध से भरा द्वार दिखा
उसके दरवाजे के दोनों पल्ले
हरसिंगार के फूलों से दमक रहे थे
उन्हें देखते ही उन्हें चूमने का मन हुआ
कि फिर ख्याल आया कि

दरवाजा जब इतना खूबसूरत है तो
घर कितना सुंदर होगा
मैं वहीं रुक गया,
दरवाजा खुलने के इंतजार में
अब शाम हो गई है और मैं
अभी भी दरवाजा खुलने के इंतजार में हूं


एक खूबसूरती में बसी है इतनी खूबसूरती कि
इसे देखूँ कि महसूस करूं, कि समझूँ
ये सब चाहूं तो शायद
पूरी जिंदगी कम पड़ जाए
हाय ऐसी गजब की खूबसूरती
दुनिया में है कि यह खूबसूरती में इतनी खूबसूरतियाँ

हाय..ये दरवाजा खुल जाए
कोई दुआ करो... कोई दुआ करो...
शाम भी थक गई है, पांव भी थक गए हैं
और मैं प्यास के सागर में डूबता जा रहा हूं

 हाय ये दरवाजा खुल जाए कोई दुआ करो

पवन तिवारी 
poetpawan50@gmail.com
सम्पर्क- 7718080978

आते जाते यूं ही मिला कीजिए






































आते जाते यूं ही मिला कीजिए
प्यार हो जाएगा सिलसिला कीजिए

चाहते हैं बुरेपन से बचना अगर
आईनों से बराबर मिला कीजिये

चाहते दोस्ती गर सलामत रहे
आमने सामने फिर गिला कीजिए

वक्त का क्या पता कब चटक जाए वो
अच्छे वक्त में झुककर मिला कीजिए

खिलते फूलों पर ही सबके रहती नजर
फूलों सा खिलखिलाकर मिला कीजिए

यूं उदासी से कुछ बात बनती नहीं
जब भी मिलिए हँस कर मिला कीजिए

यूँ जो जड़ होंगे तो काट देगा कोई
जान है आप में तो हिला कीजिए

कौन क्या है,कहाँ काम किससे पड़े
जो मिलता है अच्छा सिला कीजिये

जिंदगी का है क्या कल रहे ना रहें
आते जाते ‘पवन’ बस मिला कीजिए


पवन तिवारी 
poetpawan50@gmail.com
सम्पर्क- 7718080978

आज-कल उनकी यादें















आज-कल उनकी यादें
उतने सीधे रास्ते से नहीं आती
मगर ऐसा भी नहीं कि नहीं आती
अब सीधे रास्ते से कम आती हैं
बहुत घुमा फिरा कर आती हैं
वाया-वाया बहुत आती हैं

और वो भी ऐसा कि आँखें नहीं
दिल को गीला कर जाती हैं
आंखों का क्या... कभी कभी...
आने वाली तुम्हारी यादें
आंखों को गिला नहीं करती
डुबो देती है गीलेपन के बीचो-बीच

सब धुंधला दिखने लगता है
तुम्हारी यादों के सिवा
क्योंकि तब मैं आंखों से नहीं
दिल से देखता और महसूस करता हूं
तुम्हें पता है... आज तुम्हारी याद...
एक फिल्म देखते हुए आई..

जब एक शादीशुदा प्रेमी जोड़ा
किसी बात पर एक दूसरे को
डबडबाई आंखों से तसल्ली दे रहे थे
उनकी तो बस आंखें डबडबा आई थी
पर तब मुझे तुम्हारा नाजुक मजबूत कंधा
और तुम्हारे गले की खुशबू याद आई
मेरी पीठ पर तुम्हारी ढाढस की मासूम
आहिस्ता पड़नें वाली थपकी याद आई
तब मेरी आंखे सिर्फ डबडबाई नहीं
बल्कि भरकर गालों पर छलक पड़ी
मेरी धड़कनें पूरी रफ्तार से दौड़नें लगी
ठीक वैसे ही जैसे मैंने पहली बार तुम्हें बाहों में भरा था

क्योंकि हमें तो प्यार शादी के बाद हुआ था
तुम्हें पता है... पर पता कैसे होगा...?
तुम तो पास हो ही नहीं...
पर पाइथागोरस की प्रमेय की तरह मान लो...
हां,तो पता है, कल जब मैं
मंदिर के रास्ते से गुजर रहा था

एक आदमी या शायद पति
को माथे पर टीका लगाई और
फिर पल्लू से पोंछने लगी
वो पल्लू से उसका पोंछना
फिर तुम्हारी यादों में
खींच कर ले गया

जब मैं घर से किसी नए काम के लिए
निकलता था तुम भी यूँ ही टीका लगाती थी
और ठीक से न लगने पर
पल्लू से पोंछकर फिर से लगाती थी
तुम्हारी तरह तुम्हारी यादें भी नटखट हैं
पर प्यारी भी हैं, आती है, मगर

घूम फिर कर बहाने से
दूसरों की ओट में छुपते छुपाते
पर जानती हो आजकल
मैं तुम्हारी तरह सजता हूं
जैसे तुम दर्पण के सामने
मांग में सिंदूर भरती थी बड़े ख्याल से

अब मैं भी बड़े ख्याल से
दर्पण के सामने खड़ा होकर
टीका लगाता हूं कहीं
टेढ़ा तो नहीं लगा और
तुम्हारे पल्लू से तो नहीं
पर तुम्हारे छूटे हुए दुपट्टे से पोंछ लेता हूं

पहले तुम्हारी यादें सपनों में आती थीं
अचानक हिचकी में भी आ जाती थीं
पर आजकल तुम
दूसरों के बहाने से याद आती हो
यह बहाने याद दिलाते हैं कि
हम शादी के बाद वाले ही सच्चे प्रेमी हैं

यह खुलेआम मंदिर पर
पल्लू से माथा रगड़ना
एक पत्नी जितनी सरलता से कर सकती है
शायद ही कोई और...
खैर.. इतनी सारी अदाएं साथ गुजार कर
और छोड़ कर जाती हो कि यूं ही
बहाने से याद आती रहेंगी तुम्हारी यादें

और सोचता हूं तुम भी जल्दी आओगी

पवन तिवारी 
poetpawan50@gmail.com
सम्पर्क- 7718080978

गुरुवार, 22 जून 2017

गांव नहीं अब गांव रह गया























गांव नहीं अब गांव रह गया
गांव का केवल नाम रह गया
पेट की खातिर लौंडे भागे
बूढ़ों का आवास रह गया

 गांव में जाकर गांव ढूंढना
नादानी का काम रह गया
गांव को तो शहर खा गए
गांव में अपमान रह गया

जिसको शहर की राह न सूझी
मजबूरी में ही गांव रह गया
गांव में जाकर गांव को देखो
गांव तो बस बेजान रह गया

 हल जुवाठा बैल गया
कोल्हू, छप्पर कुआँ गया
भाई भी अब गैर हो गया
बगल में ही पटीदार हो गया

सब मतलब का यार हो गया
रिश्तों का व्यापार हो गया
कभी तो देखो गांव में जाकर
गांव भी अब परेशान हो गया

 बैल बेंचकर ट्रैक्टर लाया
नाच गई आर्केस्ट्रा लाया
बाजे को कोई पूछे ना
सब पूछे हैं डीजे लाया

गांव शहर के क्लोन हो गए
अधकचरे अरमान हो गए
गांव में जाकर गांव से मिलना
ठाले बैठे काम हो गए

गाय भैंस की हुई विदाई
गोबर कहां से होगा भाई
गोबर का कुछ काम नहीं है
डाई यूरिया से होय बुवाई

 कविता में बड़ा सुंदर गांव
गाँव में जाकर देखो गाँव
कुछ दिन रह कर मजा भी ले लो
फिर पूछूंगा कैसा गांव

यह मत सोचो बहुत हैं सीधे
होती है हर जगह लड़ाई
पेड़ की खातिर मेड़ की खातिर
हिस्सा बखरा खेत की खातिर

माई के गहना के खातिर
गोयड़ वाले खेत के खातिर
बंटवारा जब होवे लागे
हंडा लोटा बटुली की खातिर

 लाठी छोड़ सब भये आधुनिक
करते हैं बंदूक से खातिर
कहीं न ससुराल हमका ठग ले
होय लड़ाई ढेर की खातिर

शहर में रहकर गांव जो लिखते
वे हर दिन और शाम हैं बिकते
बेइज्जत होकर गांव से भागे
वही अब सुंदर गांव है लिखते

गांव तो अब वीरान हो गए
घर जो थे मकान हो गए
कविता वाले भोले गांव
वहां भी अब शैतान हो गए

 सब सीधे सच्चे ही नहीं हैं
बहुत से अब बेईमान हो गए
ठेकेदार को कोसने वाले
ही अब ठेकेदार हो गए

सड़क किनारे खेत थे जितने
सब के सब बाजार हो गए
खादों वाला अनाज खाकर
गांव भी अब बीमार हो गए

खूब हो रही पैदावार
डाई यूरिया का है प्यार
बीमारों की बड़ी तादाद
बढ़ गया डॉक्टर का व्यापार

शहर में आकर गांव की बातें खूब करते हैं
ऐसा लगता है जैसे यह गांव पे मरते हैं
मां का जब भी फोन है आता अगले महीने आते हैं
10 दिन और रुक जाओ सुनकर कुढ़ जाते हैं

सच तो यह है गांव नहीं अब प्यारा है
गांव भी देखो हालातों का मारा है
चाहता है घर गांव गांव ही बना रहे

दे दो फिर रोजगार गांव रोजगार का मारा है

पवन तिवारी 
सम्पर्क -7718080978
poetpawan50@gmail.com