यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

सोमवार, 21 सितंबर 2026

राम राम राम राम राम सीता राम


राम  राम  राम  राम  राम  सीता राम

राम जी के नाम से बनेंगे बिगड़े काम

 

आंजनेय जपते हैं जिनको सुबह शाम

आंजनेय  होते  वहाँ  जहाँ  राम  नाम

जहाँ   राम   होते  हैं  वहीं  सारे  धाम

राम जी का नाम गूँजे उर में आठो याम

 

राम  राम  राम राम  राम  सीता  राम

राम जी के नाम से बनेंगे बिगड़े काम

 

आओ मिल के गायें सभी राम सीता राम

राम जी से बढ़ के है  राम  जी  का नाम

शबरी   अहल्या   को    तार   गये  राम

तुलसी  भी  तारे  गाके  राम   राम  राम

 

राम  राम   राम  राम  राम  सीता  राम

राम  जी के नाम से  बनेंगे बिगड़े काम

 

राम  नाम  सुन के हैं  आते  हनुमान

दुखियों  का  कष्ट   मिटाते   हनुमान

आओ मिल के गाते हैं राम नाम गान

राम जी में बसती है हनुमत की जान

 

राम राम  राम  राम राम  सीता  राम

राम जी के नाम से बनेंगे बिगड़े काम

 

दुष्टों को मारे राम  अपनों  को तारे

भारद्वाज   शरभंग   कुटिया  पधारे  

राम  नाम  जपने से होते वारे न्यारे

राम नाम  लेते  ही  तीनों  ताप हारे

 

राम  राम  राम  राम  राम  सीता राम

राम जी के नाम से बनेंगे बिगड़े काम

 

पवन तिवारी

२१ /०९/ २०२६

 

  

 


गुरुवार, 3 सितंबर 2026

हाय क्यों ये विदाई के दिन आते हैं



जिसको पाला दुलारा नयन में रखा

जिसको हर हाँक अपने बयन में रखा

 

पापा कहती तो फूले समाता न था 

बेटी कह कह के जिसको अघाता न था

 

उसके जाने से घर खंडहर हो गया

खाने का स्वाद जैसे ज़हर हो गया

 

सारे बेसुध हैं कितने पहर हो गया

लग रहा सारे घर पर क़हर हो गया

 

बिटिया जिस दिन विदा घर से होने लगी

गाय कपिला औ म्याऊँ भी रोने लगी

 

रो रहा भाई था सारे ग़मगीन थे

मिट्ठू मोती भी दुःख से बने मीन थे

 

बिटिया का अह्कना माँ का भी सिसकना

पूरा वातावरण हो गया अनमना  


बाबा दीवार से सट के ढहने लगे

बिटिया कहके फफक आँसू बहने लगे

 

देखने वालों की छाती फटने लगी

नीम अपनी ही जड़ से थी कटने लगी

 

भेंट कर बुआ मौसी भी रोने लगी

बिटिया जैसे विदा घर से होने लगी

 

रोते रोते गला बैठ माँ का गया

बाप बेसुध सा जैसे कि उर फट गया

 

याद आते ही दृग डबडबा जाते हैं

हाय क्यों ये विदाई के दिन आते हैं

 

पवन तिवारी

३/०९/२०२६