यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

बुधवार, 19 मार्च 2025

जग ने ठुकराया है प्रभु जी


जग ने ठुकराया है प्रभु जी

तुम  भी  क्या  ठुकराओगे

जैसा  भी  हूँ  शरणागत हूँ

तरस   अब भी खाओगे

 

अधम रहा हूँ बड़ पापी हूँ

दोष   सभी  स्वीकार  है

क्षमा करो प्रभु शरण में ले लो

आप  का  बस आधार है

विपदा से अब धैर्य चूकता

बोलो  ना   कब  आओगे

तरस न  अब भी खाओगे

 

प्रारब्धों  का  फल  पाया हूँ

छल ही छल औ दुःख पाया हूँ

अंतिम  आस  तुम्हारे  द्वारे

नाम  तुम्हारा  ही  गाया हूँ

दुःख के बादल  घेर लिए हैं

सुख  के  दिन कब लाओगे

तरस   अब  भी खाओगे

 

जगत खेवइया तुम बड़ भइया

पिता   तुम्हीं   सर्वेश्वर  हो

एक अभिलषित कृपा तुम्हारी

इष्ट  तुम्हीं  मेरे  ईश्वर हो

धाय  गरुड  को ले आये थे

मेरे   लिए   कब  धाओगे

तरस   अब भी खाओगे

 

अमंगल को  मंगल कर दो

पीड़ा हर दुःख सुख कर दो

हे महावीर  भुजा को थामों

अपनी कृपा  से तर कर दो

जब भी आओगे प्रभु मुझको

निज   चरणों  में  पाओगे

तरस   अब भी  खाओगे

 

पवन तिवारी

१९/०३/२०२५

  


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