यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

तुम्हें जब से देखा यही सोचता हूँ!



तुम्हें जब से देखा यही सोचता हूँ!

तुम्हें अपना जीवन कलत्र चुनूँगा,

अगर शब्दों ने साथ मेरा दिया तो

तुम्हारी कहानी का काथिक बनूँगा

 

मेरा स्वप्न साकार जब से हुआ है

भला तुमसे  आभार  कैसे कहूँगा

मेरे दोषों की आवरा बन गयी हो

कहोगी  रुकुंगा,  कहोगी  बहूँगा

 

बड़े दोष पाये,  बड़े   छल  हैं  खायें

मगर अब है प्रत्यय कि सुख से रहूँगा

किसी से नहीं कह सका ऐसी बातें

कि उर कह रहा है तुम्हीं से कहूँगा

 

कि जबसे मिली हो मगन मन है रहता

कि हर सांस  कहती  तुम्हारी करूँगा

रहा अंक  में  तुम्हरे  सर यदि मेरा तो

जो यम आये तो हंसते - हंसते मरूँगा

 

पवन तिवारी ११/०२/२०२६  

 

  


शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

भूल नहीं पाता हूँ



भूल नहीं पाता हूँ

लौट लौट आता हूँ

दूर - दूर जा करके

गाँव तुझे गाता हूँ

 

तू भी नहीं वैसा है

वो न तेरे जैसा है

नहीं एक सा कोई  

प्यार एक जैसा है

 

गाँव तू न गाँव रहा

मिटटी में न पाँव रहा

तू भी हुआ शातिर ना

सच्चों का ठाँव रहा

 

वहां थोड़ा पैसा है

सब जानें कैसा है

तुझसे ठीक है अब तो

शहर शहर जैसा है

 

फिर भी कुछ बचा तुझमें

और कुछ बचा मुझमें

जोड़ हमें देता है

तू मुझमें मैं तुझमें

 

मिट्टी का नाता है

तू मुझमें गाता है

भूल जाऊं दिन में जो

सपने में आता है

 

पवन तिवारी

५/०२/२०२६