किसी
वाटिका में सुमन खिल रहा है
कहीं
दर्द से कोई दिल हिल रहा है
यहीं
पर है खिलना यहीं पर झुलसना
इसी
जग में सुख दुःख सभी पल रहा है
खिलौने
की ख़ातिर कोई रो रहा है
कोई
जो खिलौनों को सर ढो रहा है
कोई माल पूए में कमियाँ गिनाये
कोई
भूख से ज़िंदगी
खो रहा है
कहीं
कोई संगीत धुन बज रही है
वहीं
पर कहीं कोई सिर धुन रही है
वहीं
पास में कोई लड़ता - झगड़ता
वहीं
कोई दुल्हन विदा
हो रही है
बिगड़ते
- बिगड़ते कोई बन रहा है
कोई
थोड़ा चढ़ के अधिक ढल रहा है
ग़रीबों
ने भी पाल रखे हैं सपने
उन्हीं
सपनों पर कोई चढ़ बढ़ रहा है
तुम्हीं
से तुम्हें छीनता जा रहा है
कोई
महुए सा बीनता जा रहा है
तुम्हें
कुछ पता कुछ नहीं भी पता है
कि
गिर गिर के उठ उठ बढ़ा जा रहा है
कि
अपने पराये का भ्रम चल रहा है
किसी
और का लेके गम चल रहा है
दुखी
दूसरों में खुशी
ढूंढ़ते हैं
कहाँ
हर किसी को ही सुख मिल रहा है
पवन
तिवारी
२४/०३/२०२६
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