आज
कल दुःख बड़ा सुहाता है
पास
होकर के दिल दुखाता है
मुझको
बेफिक्र देख करके दुःख
लटके
– झटके दिखा डराता है
सुख
भी दूरी बना के चलता है
दुःख
से हूँ खुश, देख जलता है
दुःख
सुख दोनों ही परेशान बहुत
ऐसे
में कैसे, हँस के चलता है
दोनों
को मेरा जीना खलता है
हाय
दुःख से नहीं क्यों गलता है
खड़ा
हो दूर सुख भी सोच रहा
बिन
हमारे ये
कैसे पलता है
दोनों
माया के पक्के चमचे हैं
सोचते सारे
लोग हमसे हैं
धर्म
अध्यात्म को नहीं माने
इसी
से उलझे और गम में है
धर्म
हैं राम, धर्म आत्मा हैं
राम
ही सृष्टि, सृष्टि आत्मा हैं
हम
भी उनकी ही छाँव में बैठे
जिनको
हनुमत कहें परमात्मा हैं.
पवन
तिवारी
२९/०५/२०२६
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