दिल
दुखाते हुए जा रही
ज़िंदगी
- ज़िंदगी ना रही
रोज़
ताने दिये जा रही
दुःख
भरा बीतता रात दिन
ज़िंदगी
जा रही आस बिन
कोशिशें
हारती जा रहीं
ज़िंदगी
– ज़िंदगी ना रही
उन
दिनों झेले दुःख हँस के भी
बोझ
थामें रहे धँस के भी
पर
उमर वैसी अब ना रही
ज़िंदगी
– ज़िंदगी ना रही
हमसे
सीखे सिखाने लगे
दुनियादारी
बताने लगे
बेबसी
पर हँसी आ रही
ज़िंदगी
– ज़िंदगी ना रही
बोलना
हम सिखाये जिन्हें
चुप
कराने लगे वे हमें
उलटी
गंगा बही जा रही
ज़िंदगी
– ज़िंदगी ना रही
बिगड़ा
बिगड़ा हो प्रारब्ध जब
ऐसा
जीवन में होता है तब
बात
ऐसी समझ आ रही
ज़िंदगी
– ज़िंदगी ना रही
पवन
तिवारी
५ /
०६/ २०२६
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