यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 5 जून 2026

दिल दुखाते हुए जा रही



दिल दुखाते हुए जा रही

ज़िंदगी - ज़िंदगी ना रही

रोज़ ताने दिये जा रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

दुःख भरा बीतता रात दिन

ज़िंदगी जा रही आस बिन

कोशिशें हारती जा रहीं

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

उन दिनों झेले दुःख हँस के भी

बोझ थामें रहे धँस के भी

पर उमर वैसी अब ना रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

हमसे सीखे सिखाने लगे

दुनियादारी बताने लगे

बेबसी पर हँसी आ रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

बोलना हम सिखाये जिन्हें

चुप कराने लगे वे हमें

उलटी गंगा बही जा रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

बिगड़ा बिगड़ा हो प्रारब्ध जब

ऐसा जीवन में होता है तब

बात ऐसी समझ आ रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

पवन तिवारी

५ / ०६/ २०२६

 

 

  


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