बरखा
झरर - झर बरस रही
है
मन की सूखी बगिया तरस रही है
काश
ऐसा हो कि गीला मन हो जाए
मन
कचोटे सारी दुनिया हरस रही है
दिन
महीने साल नहीं युग बीता है
खुशियों
के सावन का जग रीता है
सावन
पपिहरा बोले झूले
पड़े
रो - रो के बरखा में मन जीता है
हरियाली
चारो ओर हरस रही है
बरखा
झरर – झर बरस रही
है
याद आये पहली बारिश में नहाना
उनके
साथ बैठ के पकौड़ी गर्म खाना
छोटी-छोटी
खुशियों से भरा था खजाना
हाथ
पकड़े भीग भीग सावन में गाना
रह
रह के बीती बात याद आ रही है
बरखा
झरर
– झर बरस रही है
जोड़े
को देखूँ तो जिया बैठ जाये
इक
छतरी में जोड़ा संभल संभल जाए
देख
- देख नैना भी सावन बन जाए
हूक
उठे हिय में बदन सिहर जाये
हाय
कैसे बिजली कड़क रही है
बरखा
झरर – झर बरस रही है
पवन
तिवारी
5/07/2026
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