बिगड़ी
बिगड़ी कहानी है
चार
आँखों में पानी है
धोखा
छल है मिला दोनों को
मैं
न राजा तू रानी है
एक
जैसी कहानी है
तेरी
मेरी कहानी है.
रौंदी
अपनी जवानी है
दुःख
भरी ज़िंदगानी है
दर्द
किसका कहें गहरा है
दोनों
ने ख़ाक छानी है
एक
जैसी कहानी है
तेरी
मेरी कहानी है
दुःख
की लम्बी रवानी है
फिर
भी जीने की ठानी है
ज़ालिमों
के न आगे झुके
हार
हमने न मानी है
तेरी मेरी कहानी है
जानी
जानी कहानी है
रंग
दोनों का धानी है
हँसना
रोना तो अब साथ है
हाय
कैसी दिवानी है
एक
जैसी कहानी है
तेरी
मेरी कहानी है
आख़िरी
सच यही यार है
मौत
सबको ही आनी है
एक
दूजे के जैसे हैं हम
पानी
के जैसी छानी है
एक
जैसी कहानी है
तेरी
मेरी कहानी है
ज़िंदगी
अपनी लानी है
इस
जनम में ही गानी है
मरते
मरते हँसी ज़िंदगी
चादर
सच की तानी है
एक
जैसी कहानी है
तेरी
मेरी कहानी है
पवन
तिवारी
२१/८/२०२६
इस
रचना का भाव उपन्यास ‘पतिव्रता वेश्या’ के नायक और नायिका के आत्मकथ्य सुनाने के
भावनात्मक दृश्य से उपजा और फिर रचा गया. यह रचना कतिपय कारणों से उपन्यास का
हिस्सा नहीं है.