चवन्नी का मेला

यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

मंगलवार, 24 मार्च 2026

किसी वाटिका में सुमन खिल रहा है



किसी वाटिका  में  सुमन खिल रहा है

कहीं दर्द से कोई   दिल   हिल रहा है

यहीं पर है खिलना यहीं पर झुलसना

इसी जग में सुख दुःख सभी पल रहा है

 

खिलौने की  ख़ातिर  कोई रो रहा है

कोई जो  खिलौनों को सर ढो रहा है

कोई  माल  पूए  में  कमियाँ गिनाये

कोई  भूख  से   ज़िंदगी  खो  रहा है

 

कहीं  कोई  संगीत  धुन बज रही है

वहीं पर कहीं कोई सिर धुन रही है

वहीं पास में कोई लड़ता - झगड़ता

वहीं  कोई  दुल्हन   विदा हो रही है

 

बिगड़ते - बिगड़ते  कोई बन रहा है

कोई थोड़ा चढ़ के अधिक ढल रहा है

ग़रीबों  ने  भी  पाल  रखे हैं सपने

उन्हीं सपनों पर कोई चढ़ बढ़ रहा है

 

तुम्हीं  से  तुम्हें छीनता  जा  रहा है

कोई  महुए सा  बीनता जा  रहा है

तुम्हें कुछ पता कुछ नहीं भी पता है

कि गिर गिर के उठ उठ बढ़ा जा रहा है

 

कि अपने पराये का भ्रम चल रहा है

किसी और का लेके गम चल रहा है

दुखी   दूसरों   में   खुशी  ढूंढ़ते   हैं

कहाँ हर किसी को ही सुख मिल रहा है

 

पवन तिवारी

२४/०३/२०२६  

  


मंगलवार, 3 मार्च 2026

मैदानों से चलकर पर्वत चढ़ते हैं



मैदानों से चलकर पर्वत चढ़ते हैं

वर्षा चाहें पर,  पानी  से  डरते हैं

उहापोह जीवन में ऐसे चलती है

करना चाहें और, और कुछ करते हैं.

 

झूठ के मटके रोज़ रोज़ हम भरते हैं

सच के खाली मटकों से भी चिढ़ते हैं

बढ़ने की कोशिश तो मात्र दिखावा है.

सच तो यह कि रोज़ ही थोड़ा ढहते हैं.

 

अवसरवादी धारा के संग बहते हैं

कहने वाले चाहे जो उन्हें कहते हैं

सच सोचे न लाभ हानि का गुणा गणित

सच वाले बस सच सच कहते रहते हैं.

 

जो सच्चे हैं जाने क्या क्या सहते हैं

तह तक जाने तक वे महते रहते हैं

यह जिद ही सच को सच सच कह पाती है

झूठे तो सच को भी झूठा कहते हैं

 

 पवन तिवारी    

२/०३/२०२६

  


बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

तुम्हें जब से देखा यही सोचता हूँ!



तुम्हें जब से देखा यही सोचता हूँ!

तुम्हें अपना जीवन कलत्र चुनूँगा,

अगर शब्दों ने साथ मेरा दिया तो

तुम्हारी कहानी का काथिक बनूँगा

 

मेरा स्वप्न साकार जब से हुआ है

भला तुमसे  आभार  कैसे कहूँगा

मेरे दोषों की आवरा बन गयी हो

कहोगी  रुकुंगा,  कहोगी  बहूँगा

 

बड़े दोष पाये,  बड़े   छल  हैं  खायें

मगर अब है प्रत्यय कि सुख से रहूँगा

किसी से नहीं कह सका ऐसी बातें

कि उर कह रहा है तुम्हीं से कहूँगा

 

कि जबसे मिली हो मगन मन है रहता

कि हर सांस  कहती  तुम्हारी करूँगा

रहा अंक  में  तुम्हरे  सर यदि मेरा तो

जो यम आये तो हंसते - हंसते मरूँगा

 

पवन तिवारी ११/०२/२०२६  

 

  


शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

भूल नहीं पाता हूँ



भूल नहीं पाता हूँ

लौट लौट आता हूँ

दूर - दूर जा करके

गाँव तुझे गाता हूँ

 

तू भी नहीं वैसा है

वो न तेरे जैसा है

नहीं एक सा कोई  

प्यार एक जैसा है

 

गाँव तू न गाँव रहा

मिटटी में न पाँव रहा

तू भी हुआ शातिर ना

सच्चों का ठाँव रहा

 

वहां थोड़ा पैसा है

सब जानें कैसा है

तुझसे ठीक है अब तो

शहर शहर जैसा है

 

फिर भी कुछ बचा तुझमें

और कुछ बचा मुझमें

जोड़ हमें देता है

तू मुझमें मैं तुझमें

 

मिट्टी का नाता है

तू मुझमें गाता है

भूल जाऊं दिन में जो

सपने में आता है

 

पवन तिवारी

५/०२/२०२६

 


शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

कैसे - कैसे लोग आये



कैसे - कैसे लोग आये

ज़िन्दगी में जोग आये

पकड़  करके हाथ मेरा

दूर  जाकर छोड़ आये

 

रास्ते में जल्दी जल्दी

बड़े - छोटे मोड़ आये

कितने ही राही मिले औ

कितने रिश्ते जोड़ आये

 

इन्हीं  रिश्तों  के  सहारे

कष्ट  कितने  भोग आये

उस डगर से बच तो आये

किन्तु  कितने  रोग लाये

 

जिंदगी  को  ओढ़ना था

और दुःख को ओढ़ आये

रिश्ते जो भी खून के थे

सारे हमको  छोड़  आये

 

ज़िन्दगी  जाने लगी जो

पास  उसके  दौड़  आये

मृत्यु से उसका मिलन था

साथ खुद को  जोड़ आये

 

पवन तिवारी

०८/१२/२०२५   

 

    


हनुमत दुखवा हरो हमार


 

 अंजनि मइया करें दुलार

सीता मइया करें हैं प्यार

रघुनंदन  है तात तुम्हार

सूर्य पुत्र  के   तारणहार

संकट मोचन नाम तुम्हार

सबका  बेड़ा  करते  पार   

तुम्हें   पुकारूँ  बारम्बार

हनुमत दुखवा  हरो हमार

 

जो जग भर के रहे उबारक

नागपाश   से  उन्हें उबारे

जो छल छंद का रहा पुजारी

ऐसे  कालिनेमि  को  मारे

तारन  हारो  को  भी तारे

हम आये हैं द्वार  तुम्हारे

दुःख  से  मिलता नहीं है पार

हनुमत दुखवा हरो हमार

 

मैनाक को  तुम्हीं हो तारे

तुम्हीं  लंकिनी को हो मारे

तुम्ही अक्ष कुमार को मारे

कितने ही  निशचर  संहारे

अहिरावन को तुम्हीं हो मारे

सुर नर मुनि को तुम्हीं उबारे

अपना  भी  दुःख  अपरम्पार

हनुमत  दुखवा  हरो   हमार

 

तुम्हरे  नाम  पुकारें राम

उर में  बसें  जानकी राम

तुम्हीं बनाओ बिगड़े काम

संकट मोचन तुम्हरा नाम  

तुलसी तुमसे  पाए  धाम

हमें सहारा  तुम्हरा  नाम

उलटी है जीवन  की  धार

हनुमत दुखवा हरो  हमार   

            

पवन तिवारी

२/०१/२०२६ दोपहर दो बजकर ५ मिनट पर रचित


रविवार, 7 दिसंबर 2025

आज कल ऐसा हाल होता है



आज कल ऐसा हाल होता है

दिल अकेले में हो तो रोता है

यूँ तो महफ़िल में हँसता गाता है

दूसरों के भी गम को ढोता है.

 

आज कल ऐसा हाल होता है

रात जगता है दिन में सोता है

साथी बढ़ते ही जा रहे दिन दिन

और ए ज़िन्दगी को खोता है.

 

आज कल ऐसा हाल होता है

रात भर जग के सपने बोता है

एक ही बात कहता रहता है

आदमी है कि रट्टू तोता है

 

पवन तिवारी

०६/१२/२०२५  

 

 

 

 

 


सोमवार, 1 दिसंबर 2025

पवन तिवारी के दोहे


 

कलयुग निज हित देखता, पाप पुण्य बेकार!

जो यह सब है देखता,  उसपे  पड़ती  मार!!

 

जो जीवन में सत्य का, लिए पताका हाथ!

सबसे पहले आपने,  छोड़ें  उसका  साथ!!

 

पोथी महती चीज है, पर  व्यवहारिक ज्ञान!

बिन अनुभव के हो नहीं,सफल कोई विज्ञान!!

 

जिसके उर में डाह हो, मुख छाए संतोष!

उसके जीवन में सदा, फलता रहता दोष!!

 

अपने श्रम की आये से,मिले भले इक कौर!

किन्तु पाप की आय से, फले वंश ना बौर!!

 

जिसका पति कोइ ओर हो,प्रेमी हो कोइ ओर!

उसके जीवन में सदा, रहता  दुःख  का ठोर!!     

 


रविवार, 23 नवंबर 2025

कैसे कहूं अम्मा की याद नहीं आती



अम्मा राजा बाबू बेटा कहकर खिलाती

कैसे कहूं अम्मा  की  याद नहीं आती ?

 

गर्मी  में  आंचल  का   पंखा  बनाती

जाड़े  में  आंचल  से हमको छुपाती

छुटपन में आंचल से ढँककर सुलाती

आंचल से ढँककर ही दुधवा पिलाती

कैसे कहूं अम्मा  की  याद नहीं आती ?

 

आँचल से मुँह पोंछ काजल लगाती

कटोरे में दूध भात रखकर खिलाती

रोता तो थपकी  दे  हमको सुलाती

हमको तो ताज़ा वो खुद बासी खाती

कैसे कहूं अम्मा की याद नहीं आती ?

 

बाहर को निकलूँ तो दही गुड़ खिलाती

नज़र  न लगे  काला  टीका  लगाती

आंचल से  पैसा खोल हमको  थमाती

दुर्गा माई रक्षा  करें  कहके बुदबुदाती

कैसे कहूं अम्मा  की  याद नहीं आती

 

बेटा  तो   सोना  है   सबको   बताती

कोई  आता  हमरा ही गुणगान गाती

जाने कैसे बाबू  होंगे बड़ी याद आती

कहते कहते अम्मा की आँख भर आती

कैसे कहूं अम्मा  की  याद नहीं आती ?

 

 

शाम होते चौखट पे करती दिया बाती

बाहर  जो आती  तो  घूँघट में आती

सारे लोग खा लेते  बचा  खुचा खाती

गीले में  खुद  मुझको  सूखे  सुलाती

कैसे कहूं अम्मा  की  याद नहीं आती

 

 

जाकर भी अम्मा कभी हैं नहीं जाती

थोड़ा थोड़ा अम्मा सभी में बस जाती

पहला शब्द जीवन का अम्मा सिखाती

अले लेले बाबू  सोना  कहके दुलराती

उनके ही रक्त से बनी है अपनी काठी

 

अम्मा राजा बाबू बेटा कहकर खिलाती

कैसे कहूं अम्मा  की  याद नहीं आती ?

 

  

      

   

 

 


मंगलवार, 18 नवंबर 2025

ज्यादातर की ज़िंदगी


 


पुस्तकों को करीने से सजा के जो रखता था

वही अब ज़िन्दगी में तिनकों जैसा बिखरा है

आपसी संबंधों को ज़मा करके जो रखता था

आज वही हर जगह से पूरा - पूरा उखड़ा है

 

जो अक्सर लोगों को, दिलों को जोड़ता था

उसी  का  दिल  आज  टुकड़ा – टुकड़ा है

जो बातों से उदास चेहरों पर लाता था मुस्कान

उसी  का  चेहरा  आज उतरा - उतरा है

 

जो सबको जोडकर महफ़िलें सजाता था

आज उसी  पर  सबसे  ज्यादा पहरा है

जिसे वह खुद से अधिक प्रेम करता था

उसने ही उसे दिया घाव सबसे गहरा है

 

जो दूसरों के लिए दौड़ता रहता था दिन रात

आज उसके दुःख में कोई नहीं ठहरा है

जो लोगों में भरता रहता था सतत उत्साह

आज उसका ही दिल दुःख से भरा कमरा है

 

ज्यादातर की ज़िन्दगी में ज़िन्दगी ऐसी ही है

आँखों में काजल  नहीं  बहता हुआ कजरा है  

 

पवन तिवारी

१८/११/२०२५