सुना था !
फलाने शेर की औलाद
बने फिरते हैं!
मग़र जब मिला तो,
लगा कि ये तो पट्ठे हैं !
और पता किया तो,
मालूम हुआ कि
सचमुच पट्ठे हैं मग़र,
अफ़सोस हुआ कि
उल्लू के पट्ठे हैं !
फिर भी विश्वास नहीं हुआ
उल्लू के पट्ठे हैं तो,
कैसे इतने हट्टे कट्टे हैं ?
फिर पता किया तो,
मालूम चला
रात में चोरी करते हैं!
हराम का माल हड़पते हैं,
तभी इतने हट्टे कट्टे हैं !
फिर ध्यान आया कि
उल्लू तो रात में ही
सारा कर्म करते हैं;
फिर शक हुआ कि
उल्लू आदमी के जैसे
कैसे दिखते हैं ?
फिर किसी ने
वह कहावत सुनाई
अस्सी कोस पर मेरा गांव
तुम कैसे जाने उल्लू नाँव ?
फिर उत्तर मिला
तुम्हारे करम से !
तब जाकर
मुझे विश्वास हुआ कि
यह सचमुच पट्ठा है
और उल्लू का ही है !
पवन तिवारी
११/१०/२०२६