तुम्हें
जब से देखा यही सोचता हूँ!
तुम्हें
अपना जीवन कलत्र चुनूँगा,
अगर
शब्दों ने साथ मेरा दिया तो
तुम्हारी
कहानी का काथिक बनूँगा
मेरा
स्वप्न साकार जब से हुआ है
भला
तुमसे आभार कैसे कहूँगा
मेरे
दोषों की आवरा बन गयी हो
कहोगी
रुकुंगा, कहोगी बहूँगा
बड़े
दोष पाये, बड़े छल हैं खायें
मगर
अब है प्रत्यय कि सुख से रहूँगा
किसी
से नहीं कह सका ऐसी बातें
कि
उर कह रहा है तुम्हीं से कहूँगा
कि
जबसे मिली हो मगन मन है रहता
कि
हर सांस कहती तुम्हारी करूँगा
रहा
अंक में तुम्हरे सर यदि मेरा तो
जो यम
आये तो हंसते - हंसते मरूँगा
पवन
तिवारी ११/०२/२०२६