मुझको
सुनती तो और कुछ लिखती
उम्र
तुम्हारी कसम से बस हँसती
इससे
अच्छा बनाती बातें तुम
जैसी
दिखती हो और कुछ दिखती
तुमको
कुछ याद कुछ तो भूला था
फिर
से देखा तो याद फिर आयी
हँस
के अपनी ही बात में फँसती
और
फिर शर्म से खुदी गड़ती
थोड़ी
वैसी थी, थोड़ी अच्छी थी
थी
तो सुन्दर थोड़ी सी बुद्धू भी
मुझसे
तुम दूर - दूर ही रहती
आँखें
कहती थी तुम नहीं कहती
अब सुना
जो कि तुम भी लिखती हो
मन
हुआ सो तुम्हें पढ़ा थोड़ा
सच
कहूँ मुझको पहले तुम मिलती
लिखती
अच्छा अगर मुझे सुनती
वैसे
कोई बुरा नहीं लिखती
हाँ
मगर दिल को भी नहीं लगती
दिल
लगाती तो समझती दिल की
ज़िंदगी
और ज़िंदगी लगती
पवन
तिवारी ( आज सो.वि. को अचानक सुनकर )
१२/०६/२०२६