चवन्नी का मेला

यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

सोमवार, 6 जुलाई 2026

बरखा झरर - झर बरस रही है



बरखा  झरर - झर  बरस  रही है

मन  की सूखी बगिया तरस रही है

काश ऐसा हो कि गीला मन हो जाए

मन कचोटे सारी दुनिया हरस रही है

 

दिन महीने साल नहीं युग बीता है

खुशियों के सावन का जग रीता है

सावन  पपिहरा  बोले   झूले  पड़े

रो - रो के बरखा में  मन  जीता है

 

हरियाली  चारो  ओर हरस रही है

बरखा  झरर – झर  बरस  रही है

 

याद  आये  पहली बारिश  में  नहाना

उनके साथ बैठ के पकौड़ी गर्म खाना

छोटी-छोटी खुशियों से भरा था खजाना

हाथ पकड़े भीग भीग सावन में गाना

 

रह रह के बीती बात याद आ रही है

बरखा   झरर – झर   बरस  रही  है

 

जोड़े को देखूँ तो  जिया  बैठ जाये

इक छतरी में जोड़ा संभल संभल जाए

देख - देख नैना भी सावन बन जाए

हूक  उठे  हिय में बदन सिहर जाये

 

हाय  कैसे  बिजली कड़क रही है

बरखा  झरर – झर  बरस रही है

 

पवन तिवारी

5/07/2026

 

 

 


शनिवार, 4 जुलाई 2026

#मौसम



वक़्त बदला बदल गया मौसम

खोजता हूँ, कहाँ  गया मौसम

दुःख की आंधी सी अचानक आयी

सुख का तिनका भी ले गया मौसम

 

क्या कहूँ, कैसा हुआ है मौसम

दर्द है, आह  से  भरा  मौसम

इक रुलाई गले में अटकी है

आँसुओं से भरा हुआ मौसम

 

इक उदासी से भरा है मौसम

क्या कहूँ कितना बुरा है मौसम

उमस फैली है गंध घावों की

उनका उपहास कर रहा मौसम

 

बड़े दिनों से एक सा मौसम

हाय क्यों यूँ ठहर गया मौसम

बुरा समय दुखों का गट्ठर है

खुल गया वो बुरा - बुरा मौसम

 

हो बुरा वक़्त तो बुरा मौसम

वर्षा गर्मी सभी बुरा मौसम

सारे मौसम हैं एक से लगते

आये जाए कि या रहे मौसम

 

पवन तिवारी

१५/०६/२०२६   

 


शुक्रवार, 12 जून 2026

मुझको सुनती तो और कुछ लिखती



मुझको सुनती तो और कुछ लिखती

उम्र तुम्हारी कसम से बस हँसती

इससे अच्छा बनाती बातें तुम

जैसी दिखती हो और कुछ दिखती

 

तुमको कुछ याद कुछ तो भूला था

फिर से देखा तो याद फिर आयी

हँस के अपनी ही बात में फँसती

और फिर शर्म से खुदी गड़ती

 

थोड़ी वैसी थी, थोड़ी अच्छी थी

थी तो सुन्दर थोड़ी सी बुद्धू भी

मुझसे तुम दूर - दूर ही रहती

आँखें कहती थी तुम नहीं कहती

 

अब सुना जो कि तुम भी लिखती हो

मन हुआ सो तुम्हें पढ़ा थोड़ा

सच कहूँ मुझको पहले तुम मिलती

लिखती अच्छा अगर मुझे सुनती

 

वैसे कोई बुरा नहीं लिखती

हाँ मगर दिल को भी नहीं लगती

दिल लगाती तो समझती दिल की

ज़िंदगी और ज़िंदगी लगती

 

पवन तिवारी  ( आज सो.वि. को अचानक सुनकर )

१२/०६/२०२६

  


शुक्रवार, 5 जून 2026

दिल दुखाते हुए जा रही



दिल दुखाते हुए जा रही

ज़िंदगी - ज़िंदगी ना रही

रोज़ ताने दिये जा रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

दुःख भरा बीतता रात दिन

ज़िंदगी जा रही आस बिन

कोशिशें हारती जा रहीं

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

उन दिनों झेले दुःख हँस के भी

बोझ थामें रहे धँस के भी

पर उमर वैसी अब ना रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

हमसे सीखे सिखाने लगे

दुनियादारी बताने लगे

बेबसी पर हँसी आ रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

बोलना हम सिखाये जिन्हें

चुप कराने लगे वे हमें

उलटी गंगा बही जा रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

बिगड़ा बिगड़ा हो प्रारब्ध जब

ऐसा जीवन में होता है तब

बात ऐसी समझ आ रही

ज़िंदगी – ज़िंदगी ना रही

 

पवन तिवारी

५ / ०६/ २०२६

 

 

  


आज कल दुःख बड़ा सुहाता है



आज कल दुःख बड़ा सुहाता है

पास होकर के दिल दुखाता है

मुझको बेफिक्र देख करके दुःख

लटके – झटके दिखा डराता है

 

सुख भी दूरी बना के चलता है

दुःख से हूँ खुश, देख जलता है

दुःख सुख दोनों ही परेशान बहुत

ऐसे में कैसे,  हँस के चलता है

 

दोनों को मेरा जीना खलता है

हाय दुःख से नहीं क्यों गलता है

खड़ा हो दूर सुख भी सोच रहा

बिन हमारे  ये  कैसे पलता है

 

दोनों माया के पक्के चमचे हैं

सोचते  सारे  लोग  हमसे हैं

धर्म अध्यात्म को नहीं माने

इसी से उलझे और गम में है

 

धर्म हैं राम, धर्म आत्मा हैं

राम ही सृष्टि, सृष्टि आत्मा हैं

हम भी उनकी ही छाँव में बैठे

जिनको हनुमत कहें परमात्मा हैं.

 

पवन तिवारी  

२९/०५/२०२६   


शुक्रवार, 29 मई 2026

उदास मृत्यु

                         


मृत्यु को चिढ़ा रहा हूँ,

मृत्यु के ही पास बैठ !

और विस्मय से भरी

मुझे ज़िंदगी है देखती !

 

आस के बिन जी रहा है,

और यूँ ही हँस रहा हैं !

हैं चकित कुछ इन्द्रियाँ भी,

और वान्छा रो रही है !

 

ढह गये हैं आकलन

करता रहा जो भी जगत,

और संबंधों के सब ,

अधिकार यूँ ही ढह गये !

 

श्रेष्ठता का बोध भी

लज्जा के वश हो मर गया !

हीनता का बोध भी,

आवारा सा कहीं बह गया !


दुःख का कोई दुःख नहीं,

न हर्ष का ही प्रलाप है !

मृत्यु भी सहमी हुई,

यह देख करके उदास है !

 

पवन तिवारी

२७/०५/२०२६

 

 


मंगलवार, 26 मई 2026

दूध भात खाओ बेटा आओ हनुमान



दूध भात खाओ बेटा आओ हनुमान

राम राम गायें  बेटा  आओ हनुमान

खालो बेटा लायी लाल ताजे ताजे फल

आओ पिला दूँ बेटा सरयू जी का जल


अपनी माँ का भी बेटा रख लो थोड़ा मान

दूध भात खाओ  बेटा  आओ हनुमान


लोग तुम्हें कहते हैं बड़े हो महान

रात दिन गाते हो राम जी की शान

आज जनम दिन तुम्हरा माँ की है आन

दूध भात खाओ बेटा आओ हनुमान


तुम्हरी  नज़र  उतारें  लेके  राम नाम

तुम्हरे पे किरपा करें रघुकुल के राम

मइया तुझे याद करे रोज़ सुबह-शाम

दूध भात खाओ  बेटा आओ हनुमान


सुना तुम्हरे नाम पे अयोध्या में धाम

कहते हनुमान  गढ़ी  तुम्हरा है धाम

दुखियों के बिगड़े बनाओ बेटा काम

सुन  के  गर्व  होता  है आंजनेय नाम


तुमसे ही मिला  बेटा  माँ को सम्मान

दूध भात खाओ बेटा आओ  हनुमान


तुम्हरा जनम  दिन है पूनम का चान

सारा जगत गाये बेटा तुम्हरा ही गान

तुम गाते रहना  बेटा सीता राम नाम

खुश रहो फूलो  फलो  जियो हनुमान


दूध भात खाओ बेटा आओ हनुमान

राम - राम गायें  बेटा आओ हनुमान

पवन तिवारी

२/०४/२०२६

गुरुदेव महाराज हनुमान जी के प्रकटोत्सव पर चैत्र पूर्णिमा

 

 

 


शुक्रवार, 22 मई 2026

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी


बचपन में दीदी संग कैसी थी बीती

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

पूरे गाँव गोद ले घुमाती थी दीदी

अपने फ़्राक से मेरी नाक पोछ देती

मेरे लिए औरों से लड़ जाती दीदी

भइया भइया कहके दुलराती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

आरती उतार के लगाती टीका दीदी

राखी बाँध अक्षत छिड़कती थी दीदी

दूध जला पेड़ा बनाती थी दीदी

राखी पर हमको खिलाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

खाना छोड़ रूठ जाऊं दौड़ी आती दीदी

अपनी टॉफी देकर मनाती थी दीदी

घाव लगे मुझको तो रोती थी दीदी

हल्दी - प्याज पीसकर लगाती थी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी


घट जाए खाना समझाती थी दीदी

अपना हिस्सा हमको खिलाती थी दीदी  

गरम गरम फूंक कर खिलाती थी दीदी

बाबू भइया कहके बहलाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

पाठशाला हमको पहुँचाती थी दीदी

बस्ता भी साथ में उठाती थी दीदी

सर पे तेल, काजल लगाती थी दीदी

कभी कभी अम्मा बन जाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

हाथ पकड़ मेला घुमाती थी दीदी

मूंगफली चाट खिलाती थी दीदी

तीखा लगे आँसू गिरे डर जाती दीदी

अँजुरी से पानी पिलाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

झगड़ा होता मुझसे मार खा लेती दीदी

उल्टा आकर मुझको मनाती थी दीदी

अम्मा नहीं पर अम्मा जैसी थी दीदी

बाऊ अम्मा सबकी दुलारी थी दीदी

अब समझे बचपन में थी कैसी दीदी

 

पवन तिवारी

२२/०५/२०२६

( बड़की दीदी को समर्पित कविता )

 


रविवार, 12 अप्रैल 2026

शुभ विवाह ऐसा न करना

 



जो विवाह की रस्में होंगी

उसमें हमको दुगुना देना

लड़के वाले बोल बोल के

कहते हक़ है गहने लेना

६ अंकों में वेतन चहिए

उस पर रहन सहन भी आला

काम नहीं करना है घर का

जपनी है आराम की माला

ऐसी बहू का क्या ही करना

शुभ विवाह ऐसा न करना

 

जो सुमंगला बन के आयी

आकर सारे घर पर छायी

उनकी वाली ही सब करना

केवल उनका बन के रहना

जिनने जन्मा जिनने पाला

संस्कार में  जिनने  ढाला

है आदेश न उनका सुनना

इनकी तो हर बात है सुनना

उल्टा सीधा सब कुछ सहना  

शुभ विवाह ऐसा न करना

 

बहू रूप ससुराल में आयी

पर बेटी सा खुलकर रहना

बात - बात में बहस करेंगी

सास ससुर की एक न सुनना

चमचों सी औकात है मेरी

मेरी तो तिल भर न सुनना

ऊपर से दहेज़ की धमकी

घर भर को है जेल में करना

ऐसा शुभ विवाह न करना

 

पढ़ा लिखा जो योग्य बनाये

उनके साथ  नहीं  है रहना

वेतन का हिसाब भी चाहिए

धीरे – धीरे  मायका भरना

घर गाड़ी सब नाम पे उनके

हमको केवल बैल सा खटना

बात - बात पे मैके फोन

देख  लूँगी  वाला  टोन

ऐसी स्त्री के संग रहना

ऐसा शुभ विवाह न करना

 

चले न मनमर्जी तलाक़ फिर

आधा वेतन हड़प  है  करना

खून पसीने की कमाई पर

डलहौजी सी नीति है रखना

बात नहीं यदि बन पाए तो

आत्महत्या को प्रेरित करना

ऐसा शुभ विवाह न करना

 

तुम्हरे लिए एटीएम होंगे

माँ के लिए  दुलारे बेटे

घर में बहू की इज्ज़त ख़ातिर

बाबू  बरामदे  में  लेटें

तुमको कुछ परवाह नहीं तो

हमें भी न  टंकी में सड़ना

न ही हमको फ्रिज में सड़ना

न ही है  मिटटी में गड़ना

हमको  ड्रम में भी न मरना

शुभ विवाह ऐसा न करना


पवन तिवारी

११/०४/२०२६