यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

प्यार में हाय कैसे बहके थे



प्यार  में  हाय  कैसे बहके थे

भोर की चिड़ियों जैसे चहके थे

जाल  में  ऐसे  फँसे चुगते ही

हाय  फँसते  ही जैसे दहके थे

 

प्यार में दर्द मिलने वाला है

दर्द  भी  आह भरने वाला है

हाय क्या सोचा हो रहा क्या है

तड़प के  प्यार मरने वाला है

 

प्यार मधुमेह  सी  बीमारी है

इसमें तो दोनों तरफ आरी है

उसी ने चीर दिया है दिल को

जिसको कहते थे बड़ी प्यारी है

 

सलाह है कि प्यार मत करना

सबसे घातक है प्यार से डरना

दवा से घाव बाक़ी भर जाते

प्यार का घाव नहीं है भरना

 

खुद को बर्बाद कर लिया मैंने

हाय मीठा ज़हर पिया मैंने

इसका इलाज नहीं है कोई

भोग कर मशवरा दिया मैंने

 

पवन तिवारी

२७/०३/२०२६

 


मंगलवार, 24 मार्च 2026

किसी वाटिका में सुमन खिल रहा है



किसी वाटिका  में  सुमन खिल रहा है

कहीं दर्द से कोई   दिल   हिल रहा है

यहीं पर है खिलना यहीं पर झुलसना

इसी जग में सुख दुःख सभी पल रहा है

 

खिलौने की  ख़ातिर  कोई रो रहा है

कोई जो  खिलौनों को सर ढो रहा है

कोई  माल  पूए  में  कमियाँ गिनाये

कोई  भूख  से   ज़िंदगी  खो  रहा है

 

कहीं  कोई  संगीत  धुन बज रही है

वहीं पर कहीं कोई सिर धुन रही है

वहीं पास में कोई लड़ता - झगड़ता

वहीं  कोई  दुल्हन   विदा हो रही है

 

बिगड़ते - बिगड़ते  कोई बन रहा है

कोई थोड़ा चढ़ के अधिक ढल रहा है

ग़रीबों  ने  भी  पाल  रखे हैं सपने

उन्हीं सपनों पर कोई चढ़ बढ़ रहा है

 

तुम्हीं  से  तुम्हें छीनता  जा  रहा है

कोई  महुए सा  बीनता जा  रहा है

तुम्हें कुछ पता कुछ नहीं भी पता है

कि गिर गिर के उठ उठ बढ़ा जा रहा है

 

कि अपने पराये का भ्रम चल रहा है

किसी और का लेके गम चल रहा है

दुखी   दूसरों   में   खुशी  ढूंढ़ते   हैं

कहाँ हर किसी को ही सुख मिल रहा है

 

पवन तिवारी

२४/०३/२०२६  

  


मंगलवार, 3 मार्च 2026

मैदानों से चलकर पर्वत चढ़ते हैं



मैदानों से चलकर पर्वत चढ़ते हैं

वर्षा चाहें पर,  पानी  से  डरते हैं

उहापोह जीवन में ऐसे चलती है

करना चाहें और, और कुछ करते हैं.

 

झूठ के मटके रोज़ रोज़ हम भरते हैं

सच के खाली मटकों से भी चिढ़ते हैं

बढ़ने की कोशिश तो मात्र दिखावा है.

सच तो यह कि रोज़ ही थोड़ा ढहते हैं.

 

अवसरवादी धारा के संग बहते हैं

कहने वाले चाहे जो उन्हें कहते हैं

सच सोचे न लाभ हानि का गुणा गणित

सच वाले बस सच सच कहते रहते हैं.

 

जो सच्चे हैं जाने क्या क्या सहते हैं

तह तक जाने तक वे महते रहते हैं

यह जिद ही सच को सच सच कह पाती है

झूठे तो सच को भी झूठा कहते हैं

 

 पवन तिवारी    

२/०३/२०२६