यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 29 मई 2026

उदास मृत्यु

                         


मृत्यु को चिढ़ा रहा हूँ,

मृत्यु के ही पास बैठ !

और विस्मय से भरी

मुझे ज़िंदगी है देखती !

 

आस के बिन जी रहा है,

और यूँ ही हँस रहा हैं !

हैं चकित कुछ इन्द्रियाँ भी,

और वान्छा रो रही है !

 

ढह गये हैं आकलन

करता रहा जो भी जगत,

और संबंधों के सब ,

अधिकार यूँ ही ढह गये !

 

श्रेष्ठता का बोध भी

लज्जा के वश हो मर गया !

हीनता का बोध भी,

आवारा सा कहीं बह गया !


दुःख का कोई दुःख नहीं,

न हर्ष का ही प्रलाप है !

मृत्यु भी सहमी हुई,

यह देख करके उदास है !

 

पवन तिवारी

२७/०५/२०२६

 

 


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