मृत्यु
को चिढ़ा रहा हूँ,
मृत्यु
के ही पास बैठ !
और
विस्मय से भरी
मुझे
ज़िंदगी है देखती !
आस
के बिन जी रहा है,
और
यूँ ही हँस रहा हैं !
हैं
चकित कुछ इन्द्रियाँ भी,
और
वान्छा रो रही है !
ढह
गये हैं आकलन
करता
रहा जो भी जगत,
और संबंधों के सब ,
अधिकार यूँ ही ढह गये !
श्रेष्ठता
का बोध भी
लज्जा
के वश हो मर गया !
हीनता
का बोध भी,
आवारा
सा कहीं बह गया !
दुःख
का कोई दुःख नहीं,
न
हर्ष का ही प्रलाप है !
मृत्यु
भी सहमी हुई,
यह
देख करके उदास है !
पवन
तिवारी
२७/०५/२०२६
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