यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

बुधवार, 7 सितंबर 2016

हिन्दी का वैश्विक आकाश



हिन्दी आज भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के विराट फलक पर अपने अस्तित्व को आकार दे रही है। आज हिन्दी विश्व भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। अब तक भारत में 3 और भारत के बाहर सात विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं। पिछले दस सम्मेलन क्रमश: नागपुर (1975), मॉरीशस (1976), नई दिल्ली (1983), मॉरीशस (1993),त्रिनिडाड एंड टोबेगो (1996), लंदन (1999), सूरीनाम (2003)  संयुक्त राज्य अमेरिका [2007]  दक्षिण अफ्रीका [2012] भोपाल [2015] में सम्पन्न हुए.अगला हिन्दी विश्व सम्मेलन वर्ष 2018 में मारीशस में होगा.

वर्तमान में आर्थिक उदारीकरण के युग में बहुराष्ट्रीय देशों की कंपनियों ने अपने देशों (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन आदि) के शासकों पर दबाव बढाना शुरू कर दिया है ताकि वहां हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार तेजी से बढे और हिन्दी जानने वाले एशियाई देशों में वे अपना व्यापार उनकी भाषा में सुगमता से कर सकें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की प्रगति यदि इसी प्रकार होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ में एक अधिकारिक भाषा का रूप हासिल कर लेगी.
वर्तमान में मातृभाषियों की संख्या के दृष्टिकोण से विश्व की भाषाओं में मंदारिन [चीनी] भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा के बोलने वालों से अधिक है. परन्तु मंदारिन भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की तुलना में सीमित है और अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु हिन्दी के मातृभाषियों की संख्या अंग्रेज़ी भाषियों से अधिक है।
अंग्रेजी के मूल क्षेत्र माने जाने वाले देशों की वर्तमान जनसँख्या देखें तो अमरीका की जनसंख्या 31 करोड़ , ग्रेट-ब्रिटेन की जनसंख्या 6.50 करोड़, कनाडा की जनसंख्या 3.6 करोड़, आस्ट्रेलिया की जनसंख्या सवा दो करोड़), आयरलैंड की जनसंख्या 65 लाख, और न्यूजीलैंड की जनसंख्या 50 लाख. इनकी कुल जनसंख्या वर्तमान में 44.25 करोड़ के आस-पास है।जबकि इसी वर्ष भारत की जनसंख्या 131करोड़ से अधिक है। भारत के लगभाग70 प्रतिशत लोग राजकाज, जनसंचार, शिक्षा, व्यापार या घर के बाहर संपर्क के लिए हिन्दी का उपयोग करते हैं। इस आधार पर हिन्दी का व्यवहार करने वालों की संख्या 90 करोड़ हो जाती है। जो विश्व भर में अंग्रेजी के गढ़ वाले देशों की  देशों की कुल जनसंख्या के लगभग दो गुना से भी अधिक है। यदि भारत में आधे लोगों को भी हिन्दी व्यवहार करने वालों में गिना जाए तब भी अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी का ही पलड़ा भारी पड़ता है और हिन्दी विश्व की दूसरी प्रमुख भाषा बन जाती है ।किन्तु अगर इसमें मारीशस, फिजी , सूरीनाम, गुयाना, पड़ोसी नेपाल , पाकिस्तान,बांग्लादेश  विश्व के अन्य देशों में बसे हिन्दी बोलने ,जानने वालों की संख्या भारतवंशियों जोड़ दें. तो हिन्दी मंदारिन को पछाड़कर विश्व की सबसे बड़ी भाषा है.
आज वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध हो चुका है कि हिन्दी भाषा अपनी लिपि और ध्वन्यात्मकता (उच्चारण) के लिहाज से सबसे शुद्ध और विज्ञान सम्मत भाषा है। हमारे यहां एक अक्षर से एक ही ध्वनि निकलती है और एक बिंदु (अनुस्वार) का भी अपना महत्व है। दूसरी भाषाओं में यह वैज्ञानिकता नहीं पाई जाती। 
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ग्राह्य भाषा अंग्रेज़ी को ही देखें, वहां एक ही ध्वनि के लिए कितनी तरह के अक्षर उपयोग में लाए जाते हैं जैसे ई की ध्वनि के लिए ee(see) i (sin) ea (tea) ey (key) eo (people) इतने अक्षर हैं कि एक बच्चे के लिए उन्हें याद रखना मुश्किल हैं, इसी तरह क के उच्चारण के लिए तो कभी c (cat) तो कभी k (king) ch का उच्चारण किसी शब्द में क होता है तो किसी में च। ऐसे सैंकड़ों उदाहरण आश्चर्य की बात है कि ऐसी अनियमित और अव्यवस्थित, मुश्किल अंग्रेजी हमारे बच्चे चार साल की उम्र में सीख जाते हैं बल्कि अब तो विदेशों में भी हिंदुस्तानी बच्चों ने स्पेलिंग्स में विश्व स्तर पर रिकॉर्ड कायम किए हैं, जब कि इंग्लैंड में स्कूली शिक्षिकाएं भी अंग्रेज़ी की सही स्पेलिंग्स लिख नहीं पाती। 
हमारे यही अंग्रेजी भाषा के धुरंधर बच्चे कॉलेज में पहुंचकर भी हिन्दी में मात्राओं और हिज्जों की गलतियां करते हैं और उन्हें सही हिन्दी नहीं आती जबकि हिन्दी सीखना दूसरी अन्य भाषाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान है। ऐसे में हिन्दी की उपेक्षा और उसके राष्ट्रभाषा न बन पाने के कारणों का त्वरित और गम्भीरता पूर्वक अध्ययन कर समाप्त कर हिन्दी को हिन्दुस्तान के मस्तक पर सजाना होगा .
है।
वेब, विज्ञापन , सिनेमा और बाजार के क्षेत्र में हिंदी की मांग जिस तेजी से बढ़ी है. वैसी किसी और भाषा में नहीं। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैकड़ों छोटे-बड़े केंद्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध स्तर तक हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हुई है। विदेशों में 35 से अधिक पत्र-पत्रिकाएं लगभग नियमित रूप से हिंदी में प्रकाशित हो रही हैं। यूएई में 'हम एफ-एम' हिन्दी रेडियो  प्रसारण सेवा है.  इसी प्रकार बीबीसी, जर्मनी के डायचे वेले,जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय है.विदेशों में चालीस से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढाई जा रही हैं ।
दो हिन्दी अंतर्जाल पत्रिकाएं जो विश्व में प्रतिमाह 6,000 से अधिक लोगों द्वारा 120 देशों में पढी ज़ाती हैं। अभिव्यक्ति व अनुभूति www.abhivykti-hindi.org तथा www.anubhuti-hindi.org के पते पर विश्वजाल (इंटरनेट) पर मुफ्त उपलब्ध हैं। ब्रिटेनवासियों ने हिन्दी के प्रति बहुत पहले से रुचि लेनी आरंभ कर दी थी । गिलक्राइस्ट, फोवर्स-प्लेट्स, मोनियर विलियम्स, केलाग होर्ली, शोलबर्ग ग्राहमवेली तथा ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिन्दीकोष व्याकरण और भाषिक विवेचन के ग्रंथ लिखे हैं। लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क विश्वविद्यालयों में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है। यहां से प्रवासिनी, अमरदीप तथा भारत भवन जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। बीबीसी से हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित होते हैं । फिज़ी में रेडियो नवरंगएकमात्र ऐसा रेडियो स्टेशन है, जो 24 घण्टों तक हिंदी कार्यक्रम पेश कर रहा है। फिज़ी सरकार सूचना मंत्रालय के माध्यम से ‘नव ज्योंति’ नामक त्रैमासिक पत्रिका भी निकालती है
आइये देखते हैं विश्व में हिन्दी के पठन-पाठन से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी :
 विश्व के मानचित्र में फ्रांस का एक विशेष स्थान है.
 फ्रांस: फ्रांस के पेरिस शहर में सौरबेन विश्वविद्यालय में 3 वर्ष के पाठ्यक्रम के अलावा पीएचडी के लिए शोध की भी व्यवस्था है. ‘’पेरिस के प्राच्य भाषाओं एवं सभ्यताओं के राष्ट्रीय संस्थान’’ में हिंदी में 2 वर्ष का सर्टिफिकेट कोर्स, 3 साल का डिप्लोमा, 4 साल में उच्च डिप्लोमा, 5 साल और 6 साल के उच्च अध्ययन के शिक्षण की भी व्यवस्था है.
जापान: जापान के टोक्यो और ओसाका विश्व विद्यालयों में हिंदी का छह वर्षीय कोर्स है. इसके अलावा अन्य विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों में हिंदी वैकल्पिक विषय के रूप में द्वितीय एवं तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है. सन 1992 के करीब जापान का एक हिंदी स्कॉलर काफी समय तक भारत में रहने के उपरांत शिकागो गया और वहां पर हिंदी का एक बृहत् पुस्तकालय देखकर उस जापानी विद्वान ने भारत में अपने एक मित्र प्रोफ़ेसर को पत्र लिखा था कि यहां के हिंदी पुस्तकालय को देखकर दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को शर्मिंदा होना पड़ेगा. तो ऐसी है हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी.
कनाडा: कनाडा की यूनिवर्सिटी आफ ब्रिटिश कोलंबिया में हिंदी का 2 वर्ष का पाठ्यक्रम है. मॉन्ट्रियल विश्वविद्यालय में प्रारंभिक स्तर पर और अटावा शहर में बने मुकुल हिंदी हाई स्कूल में 1971 से सभी कक्षाओं में और टोरंटो शहर के कुछ स्कूलों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है.
संयुक्त राज्य अमेरिका: संयुक्त राज्य अमेरिका के 30 विश्वविद्यालयों में उच्च, इंटरमीडिएट एवं प्रारंभिक स्तर पर एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है. संयुक्त राज्य अमेरिका में येन विश्वविद्यालय में 1815 से ही हिन्दी की व्यवस्था है। 1875 में कैलाग ने हिन्दी भाषा का व्याकरण तैयार किया था। अमरीका से हिन्दी जगत प्रकाशित होती है ।
कैलिफोर्निया, कोलंबिया, विस्कॉन्सिन, पेनसिलवेनिया, वर्जीनिया, टेक्सास, वाशिंगटन और शिकागो आदि विश्व विद्यालयों में हिंदी का भाषा केंद्रित अध्यन होता है.
नार्वे: नार्वे के ओसलो विश्वविद्यालय में मास्टर डिग्री के लिए हिंदी का पठन-पाठन किया जाता है तथा कुछ अन्य शहरों में भी प्राथमिक स्तर के स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है. स्वीडन  के स्काटहोम विश्वविद्यालय में हिंदी का आधारभूत पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है. उप्पसला विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाई जाती है.
 दक्षिण अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका के यूनिवर्सिटी आफ डरबन में [डरबन शहर] में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री के लिए हिन्दी पठान की व्यवस्था है. 50 विद्यालयों में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा की परीक्षाओं के लिए हिंदी पढ़ाई जाती है।
चीन: चीन के बीजिंग विश्वविद्यालय में ‘’पूर्वी भाषाएं और साहित्य विभाग’’ में स्नातक डिग्री के लिए हिंदी की पढ़ाई होती है   

  ब्रिटेन: ब्रिटेन के लंदन विश्वविद्यालय एवम कैंब्रिज विश्वविद्यालय में बीए एम्ए. के स्तर पर ‘’भाषा विज्ञान’’ विषय के रुप में हिंदी के अध्यापन की व्यवस्था है.
 जर्मनी: जर्मनी के हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय, बर्लिन स्थित फ्री विश्वविद्यालय, बर्लिन स्थित ही लीपजिंग विश्वविद्यालय, मार्टिनलूथर विश्वविद्यालय, बान विश्वविद्यालय, हाईडेलबर्ग विश्वविद्यालय, और हैम्बर्ग विश्वविद्यालय में नियमित रुप से हिंदी पढ़ाई जाती है. यहां के अन्य कई विश्वविद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है.

रूस : रूस में मास्को स्थित ‘’प्राच्य अध्ययन संस्थान’’ और पेतेरबर्ग स्थित ‘’प्राच्य भाषा संस्थान’’ में 1920 से हिंदी पढ़ाई जा रही है. व्लादिवोस्तोक स्टेट यूनिवर्सिटी में भी हिंदी पढ़ाई जाती है.
 स्विट्ज़रलैंड : स्विट्ज़रलैंड में लवसाने और ज्यूरिख के विश्वविद्यालयों में हिंदी के प्रारंभिक पाठ्यक्रम पढ़ाये जाते हैं.
 इटली : इटली के नेपल्स और वेनिस विश्वविद्यालयों में इन्डोलाजी एंड फॉरईस्ट विभागों में हिंदी के उच्च स्तरीय पठन की व्यवस्था है. मिलान इंस्टिट्यूट फॉर मिडिल ईस्ट, मिलान विश्वविद्यालय और ट्यूरिन विश्वविद्यालय के ‘’आधुनिक आर्य परिवार की भाषाओं का विभाग’’ में हिंदी की शिक्षा दी जाती है.

हालैंड : हालैंड के लायडन विश्वविद्यालय में हिंदी का 4 वर्षीय शिक्षण पाठ्यक्रम है. इसके अलावा निजी संगठन भी हिंदी सिखाते हैं.
 ऑस्ट्रेलिया : ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा स्थित विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर ऐच्छिक विषय के रूप में हिंदी का अध्ययन होता है. लात्रोवे, मोनाश तथा क्वींसलैंड के विद्यापीठों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है, अन्य देशो जैसे डेनमार्क, पोलैंड, चेक गणराज्य,हंगरी, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, क्यूबा, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, फिनलैंड, रोमानिया, क्रोशिया गणराज्य, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्की, थाईलैंड, रीयूनियम, अर्जेंटीना, सऊदी अरेबिया, ओमान, बहरीन, मलेशिया, ताइवान, सिंगापुर, केन्या, कुवैत, इराक, ईरान, तंजानिया, जांबिया, बहरीन, बोत्सवाना और इंडोनेशिया के स्कूलों में हिंदी का अध्यापन होता है.
 हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के कराची लाहौर विश्वविद्यालय तथा इस्लामाबाद की स्कूल ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेस में सर्टिफिकेट और डिप्लोमा स्तर पर हिंदी पढ़ाई जाती है. श्रीलंका में डिग्री कोर्स तक हिंदी पढ़ाई जाती है. हमारे पड़ोसी नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर और पीएचडी तक की हिंदी सुविधा है. बांग्लादेश में हिंदी का 4 वर्षीय कोर्स है .भूटान के 8 स्कूलों तथा बर्मा के मंदिरों, धर्मशालाओं व गैर सरकारी स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है. तो यह है हमारे पड़ोसी देशों में हिंदी की स्थिति. कुछ ऐसे भी देश है, जहां बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं और वहां भाषा के साथ साथ भारतीय संस्कृत को भी आगे बढ़ा रहे हैं. वहाँ हिंदी में पत्र पत्रिकाएं भी निकलती हैं. जैसे मारीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो.
मारीशस : मारीशस के लगभग 350 गैर सरकारी स्कूलों में सांध्यकालीन पढ़ाई होती है. माध्यमिक पढ़ाई के करीब 30 सरकारी और 100 गैर सरकारी विद्यालयों में 25000 विद्यार्थी प्रतिवर्ष हिंदी पढ़ते हैं. यह आंकड़ा बढ़ गया है. महात्मा गांधी संस्थान में डिप्लोमा कोर्स, अध्यापकों के लिए पीजी डिप्लोमा कोर्स 3 वर्ष का, हिंदी में बीए ऑनर्स कोर्स, फिजी में पहली व दूसरी कक्षा में हिंदी शिक्षा का माध्यम है तीसरी कक्षा से हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है. विश्वविद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है. सूरीनाम में सबसे ज्यादा विश्व विद्यालयों में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है. सन 1977 से हिंदी परिषद द्वारा आयोजित पाठ्यक्रमों में तकरीबन एक हजार से ज्यादा छात्र हिंदी की परीक्षाएं देते हैं. भारतीय संस्कृति के केंद्र में भी हिंदी पढ़ाई जाती है त्रिनिदाद एवं टोबैगो यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टइंडीज और नीहस्ट में दो प्रोफेसर हिंदी पढ़ाते हैं. वेस्टइंडीज विश्वविद्यालय में हिंदी पीठ की स्थापना की गई है. यहां के अनेक विद्यालयों में हिंदी का पठन - पाठन होता है तथा हिंदी के अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाता है. गुयाना में ‘’हिंदी प्रचार’’ सभा द्वारा यहां के मंदिरों में लगभग सब पाठशालाएं हिंदी की प्राथमिक और माध्यमिक परीक्षा की व्यवस्था करती हैं. कुछ माध्यमिक स्कूलों में 6:00 से 8:00 तक हिंदी पढ़ाने का बंदोबस्त है गुयाना विश्वविद्यालय में बैचलर ऑफ आर्ट के स्तर पर हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है ‘’भारतीय सांस्कृतिक केंद्र’’ ने जार्जटाउन में हिंदी पढ़ाने के लिए एक अध्यापक नियुक्त किया है. 1907 में भारत से मॉरीशस गए डॉक्टर मणिलाल 2 वर्ष बाद 15 मार्च 1909 में ‘’हिंदुस्तान’’ नाम से एक पत्रिका प्रकाशित की. शुरु -शुरू में यह पत्रिका अंग्रेजी और गुजराती में निकलती थी, परंतु बाद में गुजराती की जगह हिंदी हो गई. 1910 में डॉ. मणिलाल ने वहां आर्य समाज की स्थापना की और अपना प्रेस आर्य समाज को सौंप दिया. बाद में आर्य समाज ने ‘’आर्य’’ नाम की  साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया और एक स्कूल खोला और वहां हिंदी की पढ़ाई की व्यवस्था भी की. सन 1912 में ‘’ओरियन्टल गजट’’ के नाम से हिंदी और अंग्रेजी भाषा में एक मासिक पत्र निकलना शुरू हुआ.
  1912 में  महाराष्ट्र से आये तथा  हिंदी के अच्छे  लेखक आत्मा राम ने  ‘’हिंदुस्तानी पत्रिका’’ के संपादन का कार्य भार सम्भाला.1913 ई. में डॉ . चिरंजीवी भारद्वाज  व उनकी पत्नी मारीशस आये और ‘’आर्य परोपकारिणी सभा’’ पंजीकृत कराई.इन्होने आर्य समाज के साथ हिन्दी की भी खूब सेवा की .आर्य समाज के प्रचारक स्वामी स्वतंत्रानन्द [1914] मारीशस आये और कई जगह प्रवचन किये .कई जगह पाठशालायें खुलीं .जिससे हिन्दी का खूब प्रचार हुआ .1918 इसवी में धनपत लाला आर्य वैदिक विद्यालय की स्थापना किये और इसके लिए सरकार से अनुदान भी प्राप्त किये .इस तरह बीसवीं सताब्दी के दुसरे दशक तक जगह –जगह पर स्थापित हिन्दी स्कूलों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हो गयी और 1920 तक हिन्दी विद्यालयों की संख्या 75 तक जा पहुँची .
  1925 में राजकुमार गजाधर ने ‘’मारीशस मित्र’’ नाम से अखबार निकालाऔर इसी वर्ष हिन्दू महासभा की स्थापना भी हुई .1926में हिन्दी प्रचारिणी सभा ने तिलक विद्यालय की स्थापना की .1935 में हिन्दी प्रचारिणी सभा पंजीकृत भी हो गई .1936 में यहाँ पर [मारीशस ] ‘’इन्डियन कल्चरल एशोसियेशन’’ की स्थापना की गई . इस संस्था ने ‘’ इन्डियन कल्चरल रिव्यू ‘’ नाम से एक अखबार का प्रकाशन शुरू किया . इस अखबार के सम्पादक का कार्यभार संभाला डॉ . हजारी सिंह ने तथा इसके अध्यक्ष थे – डॉ. शिवसागर रामगुलाम.इन्होंने हिन्दी के लिए मारीशस में अद्वितीय काम किया.1947 में भारत आज़ाद होने के बाद मारीशस में हिन्दी के प्रति लोगों में और उत्साह बढ़ा.
डॉ. शिव सागर रामगुलाम के कहने पर मारीशस में हिन्दी तथा भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिए  भारत सरकार ने भारत से राम प्रकाश जी को  मारीशस भेजा .राम प्रकाश जी ने हिन्दी के विकास के लिए हिन्दी अध्यापकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की तथा उच्च स्तर की पठन योग्य पुस्तकें भी तैयार करवाई.1954 में विद्यालयों में अंशकालिक की जगह पूर्णकालिक हिन्दी अध्यापकों की नियुक्ति हुई.1961 में यहाँ हिन्दी लेखक संघ की स्थापना हुई.संघ ने अनेक किताबें प्रकाशित करवाई.1963 में ‘’हिन्दी परिषद्’’ की नींव पडी. परिषद् ने संघ को प्रोत्साहन दिया.परिषद् ने ‘’अनुराग पत्रिका’’[ त्रैमासिक ] का सम्पादन शुरू किया.1960-70 के बीच में हिन्दी में सृजनकार्य संतोषजनक रहा.1965 में टेलीविजन पर हिन्दी प्रोग्राम का प्रसारण भी शुरू हो गया. 1970 में 3 जून को हमारे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मारीशस में भारत – मारीशस मित्रता के रूप में महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट का शिलान्यास की.इस संस्थान के संचालक मंडल के प्रधान डॉ शिवसागर राम गुलाम थे . इस संस्थान की स्थापना के बाद सरकारी कॉलेजों में हिंदी व उर्दू की पढ़ाई की व्यवस्था हो गई. इस संस्थान ने भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति के प्रचार-प्रसार में प्रशंसनीय कार्य किया. 1920 में इंडियन मारीशस टाइम्स का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था. इस अखबार में एक लेख छपा ‘’दो बंगाली चिड़ियों का वार्तालाप’’ कुछ आलोचक इसी लेख को वहां की हिंदी कहानी की शुरुआत बताते हैं. 15 दिसंबर 1935 को वहां सनातनधर्मार्क अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ और इस अखबार में ‘’इन्दो’’ शीर्षक से कहानी छपी थी.  [प्रथम किस्त] बाद में इसी समाचार पत्र ने ‘अविनाश’, ‘नागिन’ और ‘वह चला गया’ आदि शीर्षक से कहानियां प्रकाशित की. 1976 में ‘हिंदी विश्व सम्मेलन’ मारीशस में ही आयोजित किया गया था. भारतीय भाषा व संस्कृति के रुप से मारिशस हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण देश है. और उससे हमारे देश के संबंध बहुत ही दोस्ताना हैं. हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है अगर हिंदी के विकास में कोई बाधा है, तो स्वयं हम भारतीय. जो अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ पाते. हम स्वयं हिंदी की उपेक्षा करते हैं. हमारे घर में हमारी ही मां उपेक्षित है और दूसरे की मां अंग्रेजी को हम माँ- माँ कहकर चिल्लाते हैं. जो हमें मौसी जैसा भी भाव नहीं देती. किसी विद्वान ने कहा था कि – ‘अगर किसी को गुलाम बनाना है तो पहले उसकी भाषा व संस्कृति को नष्ट कर दो’ वह खुद गुलाम हो जाएगा. वही अंग्रेजों ने किया. हमारी भाषा व संस्कृत को विकृत कर दिया. वह जाते-जाते अपना क चुके थे. अंग्रेजी अपना पैर पसार चुकी थी और आज अंग्रेजी की क्या स्थिति है सब जानते हैं. सबसे ज्यादा अप्रवासी भारतीयों का हिंदी के विकास में योगदान है. हमारे देश में मध्यवर्गीय परिवारों के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाते हैं हिंदी माध्यम से पढ़ाने में खुद को हीन महसूस करते हैं. इसमें भारत सरकार की कमजोरी है. हर सरकारी कार्यालयों में ज्यादातर कार्य अंग्रेजी में ही किए जाते हैं. जहां भी नौकरी के लिए जाइये पहला सवाल यही होता है ! अंग्रेजी आती है कि नहीं. अगर नहीं, तो समझो नौकरी नहीं मिलेगी. इसलिए हिंदी वालों के मन में हीन भावना घर कर गई. आज हर गरीब - अमीर आदमी अपने बच्चे को कान्वेंट स्कूल में भेजना चाहता है. यही कारण है कि आजादी के 70 सालों बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई. इस मामले में हमें चीन से सबक लेने की जरूरत है जो अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति कटिबद्ध है. अंग्रेजो ने जैसे अंग्रेजी को अंतराष्ट्रीय भाषा बनाई. उसी तरह अगर हम हिंदी का प्रयोग खुलकर हर जगह करें ,पढ़े- पढ़ाएं, हिंदी के प्रति समर्पण, प्रेरणा लें और दें. फिर वह दिन दूर नहीं, जब दुनिया वाले हिंदी के पीछे भागेंगे और हिंदी एक स्थापित अंतर्राष्ट्रीय भाषा होगी. जरूरत है तो अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति दृढ़निश्चयी होना, प्रेम होना,हिन्दी को लेकर निराश नहीं होना, उत्साही होना होगा.
जय हिन्दी       


रविवार, 4 सितंबर 2016

जिन्दा होके भी नहीं जिन्दा हूँ !

जिन्दा होके भी नहीं जिन्दा हूँ.
 पर कटा जिसका वो परिंदा हूँ .
 सच जो कहने की मुझे आदत थी.
 इसलिए ही नहीं शर्मिंदा हूँ.

मैं नहीं चाहता मशहूर होना .

मेरी ख्वाहिश नहीं खुर्शीद होना.
मेरी इतनी है राम से विनती
मेरी पहचान हो आदमी होना


जो गीत गाता गुनगुनाता हूँ.


















जो गीत गाता गुनगुनाता हूँ.
वो नगमा आप को सुनाता हूँ.


ख़्वाब देखे जो खुली आखों से,
वो किस्सा आप को सुनाता हूँ.


सामने दुश्मन हुआ है हाज़िर,
गोलियाँ उसपे मैं बरसाता हूँ.


मेरे सीने में लगी है गोली,
और रंग दे बसंती गाता हूँ.


सीने के बल लेटकर गोलियां चलाता हूँ.
दुश्मन के फौज की मैं धज्जियाँ उड़ाता हूँ.


आख़िरी साँस मुँह को आई है.
और वन्देमातरम गाता हूँ . 

सम्पर्क -7718080978
poetpawan50@mail.com

शनिवार, 3 सितंबर 2016

भारत का हूँ, भारत को मैं सलाम करूँगा .

देश को समर्पित मेरे ताज़ा दो मुक्तक .....




मैं कवि हूँ लिखूँगा तो स्वाभिमान लिखूंगा .
गौतम,निराला, बिस्मिल और राम लिखूँगा.
ब्राम्हण,दलित न हिन्दू मुसलमान लिखूँगा.
परिचय जो पूछेगा तो हिन्दुस्तान लिखूँगा.
         

           2
भारत का हूँ, भारत को मैं सलाम करूँगा .
बचपन,जवानी,जिंदगानी नाम करूँगा .
ख़तरे का कोई वक्त जो आएगा वतन पर .

अपने लहू का कतरा- कतरा नाम करूँगा .

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

बात दूसरी है.....




बात करना, बात दूसरी है.
बात पे कायम रहना,बात दूसरी है.

किसी हंसते को हँसाना,बात दूसरी है.
किसी रोते को हँसाना,बात दूसरी है.

बच्चा होके,बच्चा रहना,बात दूसरी है.
बड़ा होके,बच्चा रहना बात दूसरी है .

किसी से दिल्लगी करना,बात दूसरी है.
किसी के रूह में उतरना,बात दूसरी है.

नेकी और दान की बातें करना, बात दूसरी है.
किसी भूखे को भोजन कराना, बात दूसरी है.

किसी से प्यार करके,शादी करना बात दूसरी है.
किसी से शादी करके,प्यार करना बात दूसरी है.

कुछ कदम साथ चलना,हाथ पकड़ना,बात दूसरी है.
जिन्दगी भर हाथ पकड़ के साथ निभाना,बात दूसरी है.

वतन पे मरने,कुरबां होने की कसमें खाना, बात दूसरी है,
वतन पे कुरबां होना, मर जाना, बात दूसरी है
.
poetpawan50@gmail.com

सम्पर्क-7718080978

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

गणेश जी हैं गंगा जी के पुत्र और शुभ-लाभ हैं गणेश पुत्र

पाठकों ,मित्रों गणेश चतुर्थी अर्थात गणेशजी की वर्षगाँठ आने वाली है.गणेश जी की वर्षगाँठ प्रतिवर्ष भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है. हमारी मुंबई तो गणेशोत्सव के लिए जग विख्यात है. तो आइये जाने मेरे शब्दों में गणेश जी के जन्म की अनोखी कहानी....


  

आज तक अधिसंख्य लोग या आम जनमानस में यही धारणा रही है कि गणेश जी माता पार्वती के पुत्र हैं परन्तु एक सच ये भी है कि गणेश जी गंगा माता के पुत्र हैं. एक बार पार्वती जी अपने शरीर का मैल छुड़ाकर उसका पिंड फिर मूर्ति बनाई. पर उसमें प्राण नहीं डाल सकी. गंगा जी यह देख रही थी.वे पार्वती जी से बहुत स्नेह रखती थी.उन्हें अपनी सहेली या बहन मानती थी.ऐसे में पार्वती जी ने वह मूर्ति गंगा में डाल दी.पतित पावनी जीवनदाई माँ गंगा के जल में डूबते ही उस निर्जीव मूर्ति में जीवन का संचार हो गया और वह उसी क्षण  गणेश जी का विशालकाय शरीर हो गया. इस विशाल रूप में देखकर पार्वती जी ने गणेश जी को पुत्र कहकर बुलाया. गंगा जी ने भी गणेश जी को पुत्र कहकर पुकारा. इसलिए गणेश जी का एक नाम गांगेय है और इसीलिये उन्हें द्विमात्रि भी कहा जाता है. गणेश जी का विवाह प्रजापति विश्वकर्मा की दोनों बेटियों रिद्धि और सिद्धि से हुआ.जिनसे गणेश जी को दो पुत्र पैदा हुए, शुभ और लाभ. अक्सर शुभ कर्मों के प्रारम्भ में शुभ-लाभ लिखते हैं.ये शुभ और लाभ गणेश जी के पुत्र हैं.

वैसे गंगा का पुत्र होने के कारण भीष्म को भी गांगेय कहा जाता है. गंगा जी कार्तिकेयजी की भी माता हैं.

बुधवार, 31 अगस्त 2016

महादानी ऋषि दधीचि से जब भगवान् विष्णु भी हार गये और चक्र निष्क्रिय हो गया

  दधीचि से जब भगवान् विष्णु भी हार गये और चक्र निष्क्रिय हो गया
 मित्रों,पाठकों आज हम महादानी के रूप में विख्यात ऋषि दधीचि की कुछ अनकही कहानियाँ आप को बताऊंगा.  आइये उन अनसुनी कहानियों को मेरे साथ मेरे शब्दों में आत्मसात करें ...


# दधीचि जी का एक बार इंद्र ने सिर काट कर वध कर दिया था. किन्तु अश्विनीकुमारों ने पुनः दधीचि ऋषि का सिर जोड़ दिया.

# दक्ष के यज्ञ में शिव जी को नहीं बुलाने पर सबसे पहले दधीचि ने ही प्रजापति दक्ष की आलोचना की थी और यज्ञ का त्याग कर अपने आश्रम लौट आये थे.

# ऋषि दधीचि के समय समस्त विश्व में सिर्फ दधीचि को ही ब्रम्ह विद्या का ज्ञान था. जिसे इंद्र सीखना चाहते थे,किन्तु दधीचि ने इंद्र को ब्रम्ह विद्या सिखाने से मना कर दिया.क्योंकि उनकी दृष्टि में इंद्र उस विद्या को सीखने योग्य नहीं थे. तभी इंद्र ने प्रण किया कि अगर आप ने किसी को ब्रम्ह विद्या सिखाई तो मै आप का वध कर दूँगा. बाद में अश्विनीकुमार को ब्रम्ह विद्या का ज्ञान दधीचि ने दिया और प्रतिशोध स्वरूप इंद्र ने दधीचि का सर काट लिया.
राजा क्षुप से अपमानित होने पर शुक्राचार्य ने दधीचि को भगवान् शंकर की आराधना करने को कहा. जिसके फलस्वरूप भगवान् शंकर ने दधीचि की तपस्या से प्रसन्न होकर तीन वरदान दिए. जिनमें एक वरदान उनका किसी के भी द्वारा अवध्य होना भी था.

# दधीच ऋषि भगवान् शिव के परमभक्त थे. उनके आशीर्वाद के कारन उनका शरीर वज्र था .

# वज्र और ब्रम्हशिर नामक बाण दधीचि की रीढ़ हड्डियों से बना था.

# राजा क्षुप ने भारी तप करके भगवान् विष्णु को प्रसन्न कर दधीचि को नीचा दिखने के लिए भगवान् विष्णु से कहा- किन्तु विष्णु जी ऐसा कर न सके. युद्ध करके थक गये. दधीचि पर सुदर्शन चक्र से प्रहार किये किन्तु चक्र दधीचि को लगने से पहले ही कुण्ठित हो गया और विष्णु जी को हारकर वापस जाना पड़ा.

दधीचि के पिता का नाम अथर्वा और माता का नाम चित्ति था.

# दधीचि ने उस व्यक्ति [इंद्र] को अपना शरीर दान कर दिया. जिसने कभी उनका सर काट लिया था. क्या कोई ऐसा दानी कभी हुआ है.

# दधीचि ने जब अपना शरीर दान किया, उस समय उनकी पत्नी सुवर्चा गर्भवती थी. उन्होंने अपना पेट फाड़कर अपने बेटे को निकाल पीपल के पेड़ को सौंप सती हो गयी.

# दधीचि के पुत्र को पीपल ने पाला और पीपल के पत्ते खाकर बड़े हुए.  इसलिए उनका नाम पिप्लादि पड़ा.

# पिप्लादि भगवान् शंकर के अवतार माने जाते थे.जो उनके नाम का स्मरण करता है शनि उसे परेशान नहीं करता. पिप्लादि ने एकबार आकाश में शनि को घूर कर देख लिया था जिसके तेजोमय प्रभाव से शनि आकाश से सीधे पृथ्वी पर आकर गिर पड़े और उनका पैर टूट गया था .

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

चवन्नी का मेला: ध्रुव की कुछ अचर्चित और रोचक अनसुनी कहानियाँ....

पढ़ें भक्त ध्रुव की अनकहीं अनसुनी कहानियाँ ......
ध्रुव पूर्व जन्म में एक ब्राह्मण पुत्र थे.उनका मित्र राजा का पुत्र था. इस लिए उनके मन में भी राजपुत्र होने की इच्छा हुई और अगले जन्म में ध्रुव राजा उत्तानपाद के पुत्र हुए.चवन्नी का मेला: ध्रुव की कुछ अचर्चित और रोचक अनसुनी कहानियाँ....: मित्रों,पाठकों भक्त ध्रुव की कथा तो सबने सुनी है.... कि सौतेली माँ द्वारा अपमानित होकर उन्होंने भगवान् विष्णु की घोर तपस्या की और बदले...

ध्रुव की कुछ अचर्चित और रोचक अनसुनी कहानियाँ....


मित्रों,पाठकों भक्त ध्रुव की कथा तो सबने सुनी है.... कि सौतेली माँ द्वारा अपमानित होकर उन्होंने भगवान् विष्णु की घोर तपस्या की और बदले में उन्हें प्रभु ने पिता उत्तानपाद के सिंहासन से ऊँचा स्थान दिया. सप्तऋषियों से भी ऊँचा स्थान ध्रुव को प्राप्त हुआ. आइये अब कुछ अनसुनी या कम चर्चित कहानियाँ ध्रुव के बारे में जानें......

# क्या आप जानते हैं ध्रुव के पिता 3 भाई थे ? ज्यादातर लोग जानते हैं कि ध्रुव के पिता 2 भाई थे. प्रियव्रत और उत्तानपाद  जबकि तीसरे भाई का नाम वीर था.ध्रुव के पिता उत्तानपाद से बड़े प्रियव्रत थे. प्रियव्रत साधारण जीवन जीना चाहते थे,उन्हें राजपाट में रूचि नहीं थी. उनके इनकार के बाद उत्तानपाद को राजा बनाया गया.

# ध्रुव की तीन बुवा थीं..............आकूति, देवहुति और प्रसूति
अक्सर दो बुवा के बारे में ही कहा जाता है.

# ध्रुव के नाना का नाम प्रजापति धर्म था.

# ध्रुव ने भगवान् को प्रसन्न करने के बाद तुरंत स्वर्ग नहीं गये ,बल्की वापस आकर नारदजी के कहने और उत्तानपाद के क्षमा मांगने के बाद अपने पिता उत्तानपाद का सिंहासन सम्भाला. ध्रुव चक्रवर्ती राजा बने और 36 हजार वर्ष राज किये.
  

# भक्त की उपाधि इस लिए मिली कि वैसी कठिन भक्ति किसी ने किसी भी काल में नहीं की . मात्र साढ़े 4 वर्ष की उम्र में निर्जन वन में ध्रुव ने तप आरम्भ किया.

# ध्रुव ने अनन्य चित्त होकर तप किया. जिस कारण भगवान् विष्णु ध्रुव के ह्रदय में स्थित हो गए. जिस कारण ध्रुव का भार पृथ्वी को सम्भालना मुश्किल हो गया.   

# ध्रुव ने एक पैर पर खड़े होकर तप किया. कुछ दिनों तक बाएं पैर पर खड़े होकर और कुछ दिनों तक दायें पैर पर . ध्रुव जिस पैर पर खड़े होकर तप करते पृथ्वी उस ओर आधा दब जाती या झुक जाती थी.
    
# ध्रुव ने कुछ दिनों तक मात्र पैर के अंगूठे के बल पर खड़े होकर तप किया जिसके दबाव के कारण पहाड़ों सहित धरती हिलने लगी.
  
# इंद्र ने धुव की तपस्या भंग करने की काफी कोशिश की पर असफल रहे .

# इंद्र की माया से अनेक राक्षस डराने आये . ध्रुव की मया रूपी माँ भी रोते हुए आयी पर ध्रुव पर कोई असर नहीं हुआ .

# हारकर इंद्र आदि देव स्वयं भगवान् विष्णु की पास गये और ध्रुव को दर्शन दे उसकी तपस्या समाप्त करवाने की विनती की.
# ध्रुव के कठोर तप के तेज के कारण देवलोक तपने लगा था. ध्रुव ने कई महीनों तक सिर्फ हवा पीकर तप किया. इसलिए ध्रुव ‘’भक्त ध्रुव’’ कहलाये.

# ध्रुव जब घर से तप के लिए से निकले तो सर्व प्रथम उन्हें नारद ने नहीं सप्तऋषियों ने मार्गदर्शन दिया. वे सप्तर्षि थे ....मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ .

# ध्रुव ने मधुवन में यमुना के तट पर तप किया था.

# ध्रुव पूर्व जन्म में एक ब्राह्मण पुत्र थे.उनका मित्र राजा का पुत्र था. इस लिए उनके मन में भी राजपुत्र होने की इच्छा हुई और अगले जन्म में ध्रुव राजा उत्तानपाद के पुत्र हुए.
  
# विष्णु भगवान् ने ध्रुव को देवों और सप्तर्षि से भी ऊँचा स्थान दिया.सप्तर्षि ध्रुव की परिक्रमा करते हैं.

# देवताओं की आयु 4 युगों या अधिकतम एक मन्वन्तर होती है, किन्तु भगवान् विष्णु ने ध्रुव को और साथ में उनकी माता सुनीति को भी एक कल्प की आयु दी. [एक कल्प में 14 मन्वन्तर होते हैं]

#  ध्रुव के सौतेले भाई उत्तम जो सुरुचि के गर्भ से पैदा हुआ था. उसको यक्षों ने जंगल में मार डाला था.

# ध्रुव ने अपने भाई उत्तम की मृत्यु का बदला लेने के लिए यक्षों से भीषण युद्ध किया और उनका संहार करना शुरू किया. यक्षों के राजा कुबेर ने महाराज ध्रुव से युद्ध बंद करने की प्रार्थना की. तब जाकर ध्रुव ने युद्ध बंद किया.

# ध्रुव की सौतेली माँ सुरुचि दावानल में फंसकर भस्म हुई.

# ध्रुव ने अपने पुत्र वत्सर को राज्य सौंप बदरिकाश्रम गये और वहीं शरीर त्याग कर परमधाम को गये .

# ध्रुव के बड़े पुत्र का नाम उत्कल था, जो तत्वज्ञानीएवं दार्शनिक थे.

# ध्रुव के चाचा प्रियव्रत के प्रपौत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा. इससे पहले इसे जम्बूद्वीप कहते थे.जिसके राजा ध्रुव के चचेरे भाई आग्रीध थे.   





रविवार, 28 अगस्त 2016

चवन्नी का मेला: कश्मीर और उसके जख्म

चवन्नी का मेला: कश्मीर और उसके जख्म: कश्मीर का प्राचीन विस्तृत लिखित इतिहास मिलता है कल्हण द्वारा 12वीं शताब्दी ई. में लिखी गई  ‘’राजतरंगिणी’’ में  ।  तब तक यहां पूर्ण हिन्दू ...