यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

हाय क्यों ये विदाई के दिन आते हैं



जिसको पाला दुलारा नयन में रखा

जिसको हर हाँक अपने बयन में रखा

 

पापा कहती तो फूले समाता न था 

बेटी कह कह के जिसको अघाता न था

 

उसके जाने से घर खंडहर हो गया

खाने का स्वाद जैसे ज़हर हो गया

 

सारे बेसुध हैं कितने पहर हो गया

लग रहा सारे घर पर क़हर हो गया

 

बिटिया जिस दिन विदा घर से होने लगी

गाय कपिला औ म्याऊँ भी रोने लगी

 

रो रहा भाई था सारे ग़मगीन थे

मिट्ठू मोती भी दुःख से बने मीन थे

 

बिटिया का अह्कना माँ का भी सिसकना

पूरा वातावरण हो गया अनमना  


बाबा दीवार से सट के ढहने लगे

बिटिया कहके फफक आँसू बहने लगे

 

देखने वालों की छाती फटने लगी

नीम अपनी ही जड़ से थी कटने लगी

 

भेंट कर बुआ मौसी भी रोने लगी

बिटिया जैसे विदा घर से होने लगी

 

रोते रोते गला बैठ माँ का गया

बाप बेसुध सा जैसे कि उर फट गया

 

याद आते ही दृग डबडबा जाते हैं

हाय क्यों ये विदाई के दिन आते हैं

 

पवन तिवारी

३/०९/२०२६        


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