यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

प्यार से बाँह धर सकोगे क्या



प्यार से  बाँह धर  सकोगे क्या

तुम मुझे प्यार कर सकोगे क्या

 

बदन से प्यार  सभी  हैं करते

रूह में तुम उतर  सकोगे क्या

 

प्यार में जीना  चाहते  सब हैं

प्यार में यार मर सकोगे क्या

 

दावा  आरम्भ  में  सभी करते

प्यार में माँग भर सकोगे क्या

 

मेरे सुख की है कामना तुम में

मेरे लिए दुःख को वर सकोगे क्या

 

तुम  मुझे  दुःख  कभी  नहीं दोगे

पर मेरे दुःख को हर सकोगे क्या

 

पवन तिवारी

१९/०५/२०२२

समय हर चाल

समय  हर  चाल  है  चल रहा

उसका  हर  दाव  है खल रहा

फिर भी प्रतिरोध ऐसा गज़ब

समय  का  हौंसला  ढल  रहा

 

मरते - मरते  भी  मन जी रहा

सुख की आशा से दुःख पी रहा

फटता जीवन  सतत  जा  रहा

जिद्दी उर सिलता  ही जा रहा

 

आदमी   की   यही   खूबी  है

गिर के फिर से उठा जा  रहा

काल   प्रतिकूल   है   रहा

आदमी  फिर  भी  है छा रहा

 

दौर  ही  कुछ  दुखों  का रहा

फिर भी हिय काफ़िला सा रहा

हम  भी  हैं  ऐसे  ही  आदमी

साथ  में  सो   जहाँ   रहा

 

साथ में  पहले  कुछ ना रहा

  थपेड़े   सतत  खा  रहा

किन्तु  मन से  था हारा नहीं

इसलिए  हमको जग गा रहा

 

पवन तिवारी

१८/०५/२०२२   

लोग पूछते हैं मुझसे

लोग  पूछते  हैं   मुझसे   मेरी   भी  कहानी    

कैसी  चल  रही  है  ज़िंदगी   में  ज़िंदगानी

 

हो  चुके  जवान   जरा  ये  भी  तो  बताओ

इस  जवानी  को  जवानी  है  जरा  जताओ

कविता में लिखोगे कब तलक ये झील पानी

पहले ही कदम पे छल था फिसल गये जानी

लोग पूछते हैं मुझसे मेरी भी  कहानी

 

 

है बड़ा ख़िलाड़ी ये तो मिलते ही लगा मुझे

पहली  बार  में  जरूर   रूप  ने  ठगा  मुझे

पीड़ा  त्रास   की   मेरे  अंदर  में  है रवानी

प्रेम  दे  सके   मिला   ऐसा   कोई  दानी

मोहिनी  सी  भाषा  भी थी सुना दूँ जुबानी

अब तो कट रही  है  मात्र बातें बस तूफानी

लोग पूछते हैं मुझसे मेरी भी  कहानी

 

 

शुरू  -   शुरू   में  जरुर   थोड़ी   छूट   देती

रूप   के  जमाल  में   फँसा   के   लूट   लेती

प्रेम  की  कहानियों  में  दुःख  से  भरी बानी

रूप वाली जितनी भी हैं सब की सब सयानी

फिर भी उनपे ही फ़िदा कि जैसे हों वो रानी

लागे   शुरू  शुरू में  चीज  आसमानी 

लोग पूछते हैं मुझसे मेरी भी  कहानी

 

बचना रूप से शुरू में सभी बड़ों ने कहा

असली रूप, रूप का, शब्द में है आ रहा

अब तो मेरी कविता में चुनर नहीं धानी

कविता  से  दूर  इन्हें   रखना   है  ठानी

ये कहानी  ही  मुझे कविता में है सुनानी

बच  के  रहो  प्रेम  जाल से कथा बतानी

लोग पूछते हैं मुझसे मेरी भी  कहानी

 

शब्द  मेरे  साथी  भी   दुविधा में पड़के

थक गये थे रोज प्रेम जाल से जी लड़के

दर्द  दिल  के अंदर है क्या दवा करानी

समझ नहीं  पाता  हूँ  कैसे  है दिखानी

प्रेम  पर  लिखूँ   कैसे   करते  हैं  रानी

प्रेम की कहानी नहीं  फिर है आजमानी

लोग पूछते हैं मुझसे मेरी भी कहानी

 

पवन तिवारी

१३/०५/२०२२  

 


गुरुवार, 28 जुलाई 2022

कैसे – कैसे दुःख आते हैं


कैसे   कैसे  दुःख  आते  हैं

घर में ही  हम छल पाते  हैं

रोयेंगे    तो    मर   जायेंगे

सो दुःख में भी हम गाते हैं

 

कल्पनाओं  से  परे हैं  होते

थोड़े  में  सब  आपा  खोते

दाग़ आचरण के ना मिटते

कपड़े  पर  होते  तो धोते

 

उस  पर  भी  ऐंठे रहते हैं

घुट घुट कर सहते रहते हैं

ऊपर – ऊपर  मुस्काते  हैं

अंदर  से  मरते   रहते  हैं

 

बिन सोचे ही काम किये थे

अपनों का सम्मान लिये थे

क्षणिक स्वार्थ और सुख की ख़ातिर

कुल भर को अपमान दिये थे

 

अब जब सब कुछ बिखर गया है

दिखलाते   कुछ   झूठी  दया है  

यूँ  गिरते  जो   हैं   स्वारथ  में

जीवन  उनका   नरक  भया  है

 

 

पवन तिवारी

११/०५/२०२२

जीवन कुछ ऐसे भी

जीवन  कुछ  ऐसे  भी  रोज  बिताता हूँ

सो  के  चटाई  पे  छत  से बतियाता हूँ

कोई   सुनने   वाला    मेरे   गीत  नहीं

खुद ही  गाकर  खुद  को रोज सुनाता हूँ

 

बंद किवाड़ को रह - रह के खटकाता हूँ

कभी-कभी खिड़की को प्यार जताता हूँ

मन जब  थोड़ा - थोड़ा बोझिल होता है

चाय की ख़ातिर चूल्हा  तभी जलाता हूँ

 

भाव जो  आयें  कापी कलम बुलाता हूँ

बड़े ध्यान से जांघ पे रख लिखवाता हूँ

कई  शब्द  जब  हिय सहलाने लगते हैं

लिखते - लिखते भी तब थोड़ा गाता हूँ

 

कभी कभी मैं  खुद के पास  भी आता हूँ

साहस   देता  हूँ    धीरे   समझाता   हूँ

समय कहाँ कब रुकता या कि टिकता है

थपकी  दे  दे  कर  खुद को बतलाता हूँ

 

परेशान मन  को  थोड़ा  भटकाता हूँ  

बहुरेंगे  दिन शपथ तुम्हारी खाता हूँ

इक दिन उच्च शिखर पर यश के बैठोगे

ऐसा कह करके  मन को बहलाता हूँ

 

अब दिन आया बिन माँगे सब पाता हूँ

सबके  हिय पर बस यूँ ही छा जाता हूँ

यह सिद्धि का खेल समय का खेल हुआ

प्रतिद्वंदी  से  दुश्मन  तक  को भाता हूँ

 

पवन तिवारी

०८/०५/२०२२

 

ज़िंदगी से रही

ज़िंदगी से रही एक अभिलाषा बस

प्रेम  सच्चा  मिले  बात  इतनी  कही

ये   घुमाती  रही  इतने भर के लिए

कितना अपमान और बतकही भी सही

एक अभिलाषा  का दंड इतना बड़ा

प्रेम सच्छा  मिले  बात  इतनी कही

 

तू  घुमाती रही  इस नगर उस नगर

तुझपे  विश्वास  कर  बाँह  तेरी गही

हर नगर ठोकरें हर  नगर छल मिले

प्रेम  की जम सकी  ना कहीं ना दही

हाय  पूरी  जवानी  मेरी  छीन  ली

प्रेम  सच्चा  मिले  बात  इतनी  कही

 

मौत  से भी  भयानक  तू है ज़िन्दगी

तेरे  चक्कर  में  भटके  हैं  सारी मही

रोज तिल-तिल  मुझे मारती तू रही

सच  यही  था बता देती पहले यही

ज़िन्दगी इसमें ही ज़िन्दगी खा गयी

प्रेम  सच्चा  मिले  बात  इतनी कही

 

मृत्यु   ही  सत्य  है ज़िन्दगी  बस  भरम

प्रेम  सुंदर  सा छल कर लो जो बतकही

एक  सच  के   लिए  है   घुमाया  बहुत

बात सब खुल गयी कुछ भी ना अनकही

मृत्यु  ही  ध्येय   है   ज़िंदगी  का  परम

प्रेम    सच्चा   मिले   बात  इतनी   कही

 

 

पवन तिवारी

०६/०५/२०२२