यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


कागज़ की नाव
मिट्टियों वाला गाँव
बेर के पेड़
कपड़े के शेर
गोबर के गणेश
राजू और महेश
जोड़ी थी कमाल
गुल्ली डंडा में बवाल
बाग़ में लगता मेला
चाट का सजता ठेला
भीड़ का रेलम - रेला
बच्चों का ठेलम – ठेला
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


चवन्नी का दोना
अठन्नी का खिलौना
बुलावे का आना
न्योते का खाना
कुम्हड़ा मना करना
आलू गोभी धरना
खाने में शर्त लगाना
सबसे ज्यादा पूड़ी खाना
फिर शेखी बघारना
जोर से डकारना
खेत – खलिहानों के रास्ते से आना
गली में पहुँच कर जोर से चिल्लाना
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


चाय में दूध की मलाई डलवाना
झूठ मूठ रोकर के बात मनवाना
बातों - बातों में दोस्ती हो जाना
बातों – बातों में कट्टी हो जाना
छोटी – छोटी बातों में लफड़ा हो जाना
छोटी ही बातों में झगड़ा हो जाना
अगले ही दिन सब भूल जाना
अरे सुन रिंकू जरा इधर आना
एक जगह आम तोड़ने आज जाना
तोडूंगा मैं तुम बीन कर लाना
पोखर पर भी शाम को है जाना
चुपके से तोड़ सिंघाड़ा है लाना
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


रमई काका बहुत हैं ढीठ
पर उनका अमरुद है मीठ
कोई युक्ति बताओ भाई
रमई के अमरुद चुरायी
लग्गन का है पका पपीता
देख के ही लगता है मीठा
बेंचू से जो होय मिताई
तोड़ पपीता घर ले आयी
मटर साम की है गदराई
तोड़ के लाओ होय भुनायी
चेतई के बरात में जाना
दो-दो बार मिठाई खाना
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


बारिश में भी ख़ूब भीगना
घर आकर फिर खूब छींकना
अम्मा का फिर खूब डाँटना
अदरक का रस मधु चाटना
अम्मा सुनाएँ बुढ़िया की कहानी
रानी करे उसमें बड़ी मनमानी
बुआ सुनाएँ छोटी परी की कहानी
परी फिर बन जाये राजा की रानी
शादी में होती खूब मनमानी
लड़के के मामा की गजब कहानी
बात – बात पर मामा का रूठ जाना
पीछे फिर फूफा जी का गरमाना
कौन है लड़की का बाप तो बुलाना
पीछे से लडकी के मौसा का आना
भाई साहब कहके धीरे से समझाना
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


गुस्सा होने पर किताब फेंक देना
देखते ही देखते मिठाई छीन देना
नदी से जाकर मिट्टी ले आना
दीदी के हाथों फिर घर बनवाना
घर बन जाने पर अपना बताना
गुस्से में लात मार कर भाग जाना
दीदी के हिस्से का गट्टा चुराना
मुँह ढँक के कोने में चुपचाप खाना
स्याही से पाँच – पाँच पैसे बचाना
अठन्नी के जुटने पर बाज़ार जाना
मोनू के संग जाना चाट खाना
तीखा लगे नाक बहे सिसियाना
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


इतवार को सुबह राम घाट जाना
रहता हमेशा नहाने का बहाना
सब समझें धरम करम पुन्य है कमाना
अपना तो लक्ष्य एक मेले में जाना
उस दिन दीदी की हाँ में हाँ मिलाना
असली इरादा था मूँगफली खाना
उँगली पकड़ करके मेला घुमाना
गोल-गप्पे प्यार से दीदी का खिलाना
रूठ जाने पर गुब्बारा दिलाना
भीड़ ज्यादा होने पर गोद में उठाना
थक जाऊँ,बाबू - बाबू कहके दुलराना
रास्ते भर जोर – जोर सीटी बजाना
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


सुबह – सुबह रोज पाठशाला में जाना
पहाड़ा जो भूले मुंशीजी का चिल्लाना
मुंशी जी का गोल - गोल छड़ी का घुमाना
इधर-उधर झाँक कर बस्ता उठाना
मुंशी जो को “पू” कह करके भाग जाना
शाम को घर पर शिकायत का आना
बाबू जी का कान ऐंठ थप्पड़ लगाना
बिद्या माई की कसम उठवाना
दस बार उट्ठक – बैठक करवाना
हाथ जोड़ मुंशी जी से माफ़ी मँगवाना
फिर प्यार से बाबूजी का समझाना
सम्मान से मुंशी जी से पेश आना
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


शाम को जंगल में नंगे पाँव जाना
घूम - घूम बीन कर मोर पंख लाना
अगले दिन विद्यालय में सबको दिखाना
बिद्या माई आयेंगी बता के रिझाना
रखोगे किताब में तो सब याद होगा
परीक्षा में देख लेना अव्वल नम्बर होगा
दो पुड़िया स्याही में दे दूँगा भाई
दस – बीस पैसे की होती कमाई
हर हप्ते झगड़ा बटन की तुड़ाई
माई झुंझला के करती सिलाई
दाल रोटी देख मन जाता गुस्साई
जोर से चिल्लाता – अचार दे दे माई
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है


खुशी – खुशी गाय चराने ले जाना
धीरे – धीरे हाँक कर नदी ले जाना
मार – मार उसे फिर नदी में घुसाना
पूँछ पकड़ उसकी फिर नदी पार जाना
नदी पार जाकर खरबूजा चुराना
उसी तरह गाय संग फिर लौट आना
दोस्तों के साथ खरबूजे का खाना
खरबूजे के दम पर तारीफ करवाना
झूठ मूठ बुद्धी का लोहा मनवाना
कितना मजेदार बचपन का ज़माना
गलती हमारी शिकायत माँ - बाप से
बच्चा है माफ़ करिए कह रहा हूँ आप से
सब याद आ रहा है
दिल मेरा बचपन हुआ जा रहा है





पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com











  








     


गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

शीत


सरसों फूली मटर  फूली
मूली औ गाजर भी फूली
गेहूँ अलसी चना के संग
कृषि की  हर गली फूली

शीत की चढ़ उमर आयी
गांव  ने   ओढ़ी  रजाई
मोती बनकर पातों पर फिर
ओस  सुंदर  मुस्कुरायी

कान पर गमछे बंधे
रात में कंबल सजे
हो गई चाँदी अलाव की
प्रेमी आपस में नधे

मुँह से निकले भाप है
सबकी  आशा ताप है
सूर्य  दिखते ही  नहीं
जैसे  कोई  शाप  है

जो भी  खायें सब  पचे
जो भी  पहने सब जँचे
कोट,स्वेटर और मफलर
बदन पर  सब ही फबे

झुक गई हैं  जवानियाँ
धुंधली सी हैं कहानियाँ
काँप - काँप अधर बोले
चाय की  दो प्यालियाँ

गरीब की दुश्वारियाँ
ठिठुरती किलकारियाँ
मुँह ढके काँपे कलावती
शीत की मनमानियाँ

शीत को ठेंगा दिखायें
शीत को बच्चे चिढ़ायें
फर्क उन पर कुछ नहीं है
खेलते खाते  ही  जायें

बच्चों से है शीत डरती
बूढ़ों पर है बहुत मरती
है बहुत  ही घाघ सर्दी
चलती है उसकी ही मर्जी

शीत, जाड़ा, ठंड,  सर्दी
तू रहे तो कम हो गर्दी
क्या कहें तेरी अदा को
बुरी, अच्छी, प्यारी, सर्दी


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक - Poetpawan50@gmail.com

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

जिनकी बातों में विरोधाभास है



जिनकी  बातों  में  विरोधाभास  है
उन पर  ना करना कभी विश्वास है
फिर भी जो तुम साथ उनके चल दिए
समझो फिर होना सहज ही नाश है


जिंदगी  में तुम को जब तक आस है
समझ  लो सब  कुछ तुम्हारे पास है
बिन हुए  विचलित सतत चलते रहे
फिर  तुम्हारा  सारा  ही आकाश है


जब तलक जीवित तुम्हारी  चेतना
झेल   जाओगे    भी   कैसी  वेदना
तुम मनुज  हो और आगे भी रहोगे
तुम  में  जब तक जिंदा है संवेदना


काल  और  जीवन में हरदम से ठना
पर  किसी  को  जीने से है कब मना
है  जिजीविषा  जब तलक इंसान में
मृत्यु  से  भी  जिंदगी   को  है  जना



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

मेरा दिल गाँव जा रहा है




खेत और खलिहान
ऊसर और मकान
मंदिर, कुआँ, जुआठा
जाँत में पिसता आटा
सरसों के फूल
बच्चे उड़ाते धूल
टायर का खेल
गुल्ली डंडा का मेल
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है


बंदरिया की नाच
अलाव की आँच
गुड़ का चाटना
मेड़ का पाटना
बैलों को हाँकना
बारात में नाचना
नदी में कूदना
रस्सी से फाँदना
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है


चोरी से बेर तोड़ना
बात बात पर बाँह मोड़ना
ढेले से मारना
गाली से तारना
कल्लू के खेत से गाजर चुराना
छुपकर के कोने में बताशा खाना
शाम को बाबूजी का लेमनचूस लाना
अम्मा का जाँते पर लोकगीत गाना
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है



आठ आने का पलटू से चाट मँगाना
दोस्तों के पैसे से समोसे खाना
दोस्त की कोट पहन शादी में जाना
गुमटी से पान अम्मा के लिए लाना
पढ़ाई के लिए बाबूजी का चिल्लाना
घूमने के लिए पिछवारे दोस्तों का आना
हारने पर खेल छोड़ कर भाग जाना
अपनी पारी खेलकर जरूरी काम बताना
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


मकर संक्रांति पर डुबकी लगाना
सरयू जी में जाकर खिचड़ी चढ़ाना
बाबूजी का गरम गरम जलेबी खिलाना
हाथ पसारे पीछे से माली का आना
पंडित जी ज्यादा नहीं दे दो चार आना
कहाँ रोज-रोज है संक्रांति का आना
पंडा  की कंघी से बाल घुमाना
पंडा जी का प्यार से टीका लगाना
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है


दूसरे के खेतों से गन्ना चुराना
खेत में खोज-खोज टमाटर का खाना
तरबूजे वाले को जोर से चिल्लाना
तरबूजे वाले चाचा जरा इधर आना
गेहूँ के बदले में दे दो तरबूजा
बोलो तो दे दूँ अनाज कोई दूजा
बाइस्कोप वाले का तमाशा दिखाना
गली गली में घूम के आवाज लगाना
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


ढलान पर साइकिल दौड़कर चढ़ना
गलती करके दोष सारा दीदी पर मढ़ना
मलाई सहित दही की खातिर अम्मा से जिद करना
गुस्सा होने जाने पर पेड़ पर चढ़ना
अम्मा का मनाना
कहना दूध भात खाना
आ जाओ नीचे मामा के यहाँ जाना
मेरा खुश हो के पेड़ से नीचे उतर आना
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


क्या क्या बताऊँ
कहाँ- कहाँ जाऊँ
एक एक दृश्य सब नाच रहा है
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

रविवार, 23 दिसंबर 2018

वो हमें देखे तो प्यार होने लगा


वो  हमें  देखे  तो   प्यार   होने  लगा
समझे   हमको  तो   बाज़ार  होने लगा

एक  दिन  फायदा  हो  गया  रिश्ते  से
फिर तो रिश्तों  का कारोबार  होने  लगा

सजा होनी थी पर  तालियाँ  मिल गयी
वही फिर  उनसे  बार - बार होने लगा

घर की  ख़ुशबू जो बाहर गली तक गया
घर  की  चौखट  पे  दरबार  होने लगा

बा   कमाल  ही  है  ये  रईसी  रकम
वो  जो जलती थी  इजहार  होने  लगे

ये  मोहब्बत  बीमारी  ग़जब   साहिबों
दुश्मनों  से  उन्हें  प्यार   होने  लगा

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

अपनों की चर्चा


अपनों  की चर्चा जब की जाने लगी
मुझको बस आप की याद आने लगी

क्या बताऊँ मोहब्बत में होता है क्या
बिछड़े जब से सनम जान जाने लगी

जब  से  है  ये कहा प्रेम उनसे नहीं
रात  दिन  याद  उनकी सताने लगी

जब  से  मैंने  कहा प्रेम तुमसे प्रिये
हर  घड़ी  मुझको वो आजमाने लगी

दोस्तों  की  वफ़ा पर जो चर्चा उठी
दोस्ती  सुन कर ये कंपकंपाने लगी

जब से खुद से कहा पवन मगरूर हूँ
मेरी  तस्वीर  मुझको  डराने  लगी


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com