यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

माना कि ख़तरा यहीं है













माना कि ख़तरा यहीं है
मगर ख़ुदा भी तो यहीं है

माना कि झूठ बहुत है यहाँ
मगर सच भी तो यहीं है

नफरत की ही चर्चा क्यों
मोहब्बत भी तो यहीं हैं

जहाँ में गद्दारी पर बातें बहुत
थोड़ी सही वफादारी भी तो यहीं हैं

जिनके करम उजाले से अच्छे हैं
उनके लिए खुदाई भी तो यहीं है

क्यों परेशा हो परायों के जिक्र से
करो दिल्लगी अपने भी तो यहीं हैं

पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

गरीबी में दोस्त समरथ बाज़ार हो गये


गरीबी में दोस्त समरथ बाज़ार हो गये
हम  उधारी  की  तरह  बेकार हो गये

प्यार के लहजे सभी इतिहास हो गये
लहजा न होके  तेवर  रौबदार हो गये

उनकी ही बात सच्ची उनकी कही सुनें
लब जो खोलें हम तो गुनहगार हो गये

निर्धन के लिए तो , कोई नहीं अपना
ऐसे में सारे  रिश्ते  कारोबार हो गये

गरीबी में हो सके तो रिश्तों से दूर रहिये
जाने  कौन  कह  दे  मक्कार  हो  गये

जब तक न वक़्त लौटे गुम होइए खुद में
आयेगा मज़ा  जिस दिन  सरदार हो गये

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com   

अधूरी बात, अधूरा प्यार बहुत तड़पाते हैं


अधूरी  बात , अधूरा  प्यार  बहुत   तड़पाते  हैं

जिन्हें मनाओ जितना ही उतना तरसाते हैं

उनके प्रेम में पागल हैं आभास उन्हें हो जाय
ऐसे  में  वे  हर  मौके  पर  बड़ा  सताते हैं

खुद से ज्यादा और किसी से प्यार नहीं करना
किया तो ऐसे लोग प्यार  में  बहुत  रुलाते हैं

जो तुम्हें चाहे ,प्यार करे उसे नहीं सताना तुम
रूठ भी जाओ अगर कभी तुम बहुत  मनाते हैं

सच्चा प्रेम समर्पण है बिन माँगे सब मिलता
सच्चे प्रेमी  बात - बात  हक़ नहीं जताते हैं

प्यार किसी बलिदान, त्याग से कम नहीं होता
प्यार  में  कुर्बानी  वाले  इतिहास  बनाते  हैं

प्यार में कुर्बानी के किस्से कम ही आते हैं
आते हैं तो  लैला – मजनूँ , हीर बनाते  हैं


पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com    

रविवार, 24 दिसंबर 2017

तुम्हें चाहता हूं ,तुम आओ, सुबह की धूप जैसी






तुम्हें चाहता हूं ,तुम आओ, सुबह की धूप जैसी
मगर गर दोपहर की धूप हो तो, मत आना
थोड़ा ठहरना, सुस्ताना छांव में, थोड़ा शीतल होना
और शाम की मनोहर किरणों सी हो फिर आना

तुम्हें चाहता हूं, तुम आओ, अल-सुबह ताजे खिले गुलों सी
थोड़ी-थोड़ी शबनमी बूंदों के गहनो में सजकर
पर गर ढलती दोपहर के मुरझाए फूलों सी हो तो मत आना
थोड़ा ठहरकर,थोड़ी रात सँवरना और फिर रात रानी बन
मह-मह महकते हुए आना

मैं तुम्हें चाहता हूं, तुम आओ, मुस्कुराते हुए,
मैं बेकरार हूं बेसाख्ता, पर उदास हो, तो मत आना
पहले उन्हें अपनी खूबसूरत मुस्कान से डराना, नजरों से गिराना,
अदाओं से फटकारना और अल्हड़ता के जादू से भगा देना
और फिर पाक खुशबू बिखेरते हुए बेसाख्ता मेरी बाहों में आना

तुम आना तो अकेले अपने बदन के साथ मत आना
आना तो अपनी रूह को भी साथ लाना क्योंकि
मैं अकेले नहीं अपनी रूह के साथ बेसाख्ता,
बेकरार, बेइंतहा, बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं
जाने कब से कि तारीख तक याद नहीं

मेरे प्यार, मेरे इश्क, मेरी अनुरक्ति, मेरी मोहब्बत,
तुम आना, जरूर आना, बस, पूरा का पूरा आना
हम चाहते हैं एक-दूसरे में पूरा का पूरा समाना
तुम आना, जरुर आना, बस याद रहे, पूरा आना


पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com


गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

तेरे कदमों में गिरुं और उठूँ नज़रों में











मेरी  चाहत  नहीं  पूरी  दुनिया  मैं  पाऊँ
उतना  ही  दे  प्रभू  जितना  समेट  पाऊँ

देखकर   दुनिया   ये   हसरत   जागी
अब  मैं  खुद  को  खुद  ही  देख  पाऊँ

बहुत से लोग और रिश्तों की दरकार  नहीं
लोग  सच्चे हों , भले थोड़े , मैं सहेज पाऊँ

मेरी चाहत रही है रिश्तों को लेकर  अक्सर
मिलें जब भी मिलें तो सच्चे और नेक पाऊँ

तेरे  कदमों  में गिरुं  और  उठूँ  नज़रों में
इतनी ख्वाहिश तू मुस्कराए तो माँ देख पाऊँ

जब  कभी  दर्द  मिले  इतना  कि रो जाऊँ
तेरे  आंचल  में माँ  खुद को  मैं समेट पाऊँ


पवन तिवारी
सम्पर्क –  7718080978

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बुधवार, 20 दिसंबर 2017

लोग कहते हैं अब गुस्सा नहीं होते हैं हम


























लोग कहते हैं अब गुस्सा नहीं होते हैं हम
अब मेरी औलादें हैं पहले वाले नहीं हैं हम

पीठ पर हरदम लदी रहती थी ज्यों खुद्दारियाँ
अब लदे रहते हैं बच्चे खुद्दार नहीं हैं हम

वो जमाना और था जब हम हमी हम थे
अब तो बेबस बाप हैं अब हम नहीं हैं हम

दे सकते थे उसकी गुस्ताखी का जवाब
मगर फिर वो हो जाते जो नहीं हैं हम

अब मेरे दरवाज़े पर आते नहीं मशहूर लोग
सत्ता अपनी हैं मगर सरकार नहीं है हम  

जो दोस्त कहते थे मगर अब दूर जो हुए
बात इतनी निकली कि अमीर नहीं हैं हम

पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978


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रविवार, 17 दिसंबर 2017

बड़ा फरेब की, वादों में भी भरमायी दुनिया


बड़ा फरेब की, वादों में भी भरमायी  दुनिया

मगर इन हरकतों ने ही सही दिखायी दुनिया
  
समझ  आयी  मुझे  इक  उम्र से पहले  दुनिया
खता यही थी बस मुझको न समझ पायी दुनिया

जो  भी  कहता  हूँ  बड़बोला  उसे  लगता  है
उम्र है कम मेरी बस इतना समझ पायी दुनिया

मगर जब उम्र से पहले बुलंदी पर हुआ दाखिल
होके  मजबूर  मेरे  हुनर  पर  आयी  दुनिया

किसी भी और खित्ते में नजरिया तंग ना इतना
मगर  अदबी – अदीबों पर करे  बेहयाई  दुनिया

बहुत सी ठोकरें , जिल्लत, कसा है तंज दुनिया ने
सलामत रहे सदा इन्होंने ही मेरी चमकायी दुनिया

जो  देखकर  भी  देखना ना  चाहते  हुनर
वक्त ने ही ऐसे को ‘पवन’ समझायी दुनिया

पवन तिवारी
सम्पर्क – ७७१८०८०९७८
poetpawan50@gmail.com



शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

जाने किस बात से आती उसे हँसी होगी





















जाने किस बात से आती उसे हँसी होगी
ज़ख्म गहरा होगा जिसमें वो धँसी होगी

जिसमें न कोई खुशियाँ रंगत न कोई हो
ऐसी भी जिन्दगी क्या कोई जिन्दगी होगी

दर्द दिल का उछलकर चेहरे पर चढ़ ही जाता है
फिर न क्यों शक्ल कोई कितनी ही रँगी होगी

कितनी मज़बूर होकर वो उधर गयी होगी
बहुत तड़पी होगी जब जाल में फँसी होगी

बदजुबानी वो कभी सहती नहीं किसकी
किसी एहसान की वो डोर से बंधी होगी

जरूरी नहीं जो खिला है पुष्प ही होगा
क्या पता वो खियाबाँ हो जो ढँकी होगी


पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978


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कोई भी हो किसी का घर आसमां नहीं - ग़ज़ल


कोई भी हो किसी का घर आसमां नहीं
हो सकता गुज़ारा मगर बिन जमी नहीं

माना कि इस शहर में नये आदमी हैं हम
लेकिन ये सच नहीं कि यहाँ आदमी नहीं

यूँ महफिलों में तो मिलते हैं कई लोग
सबसे हो जाए दोस्ती ये लाजमी नहीं

मिलते हैं जिन्दगी में अलीम बहुत से
होते मगर व्यवहार सबके काजमी नहीं

कुछ लोग जिन्दगी में टूटे हैं इस कदर
गम होके भी दृग में आती नहीं नमी

देखेंगे जो इतिहास तो शर्मिन्दा होएंगे
बहुतेरे अना वाले हम ही हमी नहीं  

जो लोग करें नेकी ‘पवन’ बेहिसाब के
ऐसों की बरकतों में आती कमी नहीं


पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978


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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

मैंने भविष्य देखा



इधर कई दिनों से भविष्य के बारे में
सोच रहा था गंभीरता से कि
तभी सामने से आता दिखा विशालकाय भविष्य
मैं कर गया उसमें प्रवेश, मैंने देखा
आज से बिल्कुल ,पूरी तरह अलग
पर वर्तमान को भोगते हुए
भविष्य के बदलाव को देखकर
नहीं हुआ अधिक आश्चर्य
हाँ, मन चिंतित अवश्य हो गया
भविष्य में मेरी उत्सुकता
मनुष्य से मिलने की हुई
पर मनुष्य कहीं नहीं दिखा
बस रोबोट ही रोबोट नजर आये
बड़े यत्नों, प्रयत्नों के बाद जान पाया
उन रोबोटों के अंदर कुछ मनुष्य भी थे
पर हाँ सिर्फ तस्सली को


वे मनुष्य भी रोबोटों जैसे किये थे धारण वस्त्र
ताकि प्रदूषित जलवायु,घातक किरणें
नष्ट न कर दें उनकी त्वचा को
जल न जाएँ विकिरण से  
इस लिए धारण किये हैं कवच
हाँ अब वे हंसते नहीं, बोलते भी नहीं
अन्यथा शरीर में प्रवेश कर सकते हैं
जानलेना विषाणु इसलिए
शरीर में लगे यंत्र साधते हैं संवाद
रोते हुए भी किसी को नहीं देखा
मेरा प्रिय शब्द ‘मित्र’
हो गया है अर्थ हीन


यहाँ चौपाल,मजमा,अड्डाबाज़ी,महफिल
सब निरर्थक शब्द हो गये हैं
यंत्रों के माध्यम से संचरित होते है विचार
समझिये जैसे गोपनीय कूट शब्द
विज्ञान की प्रगति के दुष्प्रभाव का परिणाम है
या कमाल भी कह सकते हैं
मनुष्यता और संवेदना भविष्य में मर चुके हैं.
शोध करने पर इतिहास में शायद मिलें


यहाँ मैंने देखा ,
आदमी मशीन की तरह
दिखता और व्यवहार करता है
मैंने देखा जगह-जगह छोटी-छोटी
अद्भुत प्रयोगशालाएं बनी हैं
पता किया तो ज्ञात हुआ
यहाँ होते हैं निर्मित आदमी के भ्रूण
जिन्हें होती है आवश्यकता
बनवाकर ले जाते हैं


यहाँ माता पिता नहीं होते
खरीददार और गुलाम होते है
यहाँ अब पति – पत्नी नहीं होते
विवाह शब्द भविष्य के लोग नहीं जानते
स्त्रियों एवं पुरुषों कोई भेद नहीं
वे माँ नहीं बनती, बच्चे नहीं जनती
वे पूछने पर मेरा मजाक उड़ाने लगीं
आश्चर्य जताने के साथ,
बोली किस ग्रह से आये हो
ये काम प्रयोशालाओं में होता है
और उन्ही का काम है .


मैं बोध शून्य हो गया
यहाँ न अब कोई पिता होता है
न पुत्र, न बहन, न जन्मभूमि
जैसी अवधारणा में विश्वास
शेष रिश्ते मामा,मौसी,चाची,
यहाँ दूसरे लोक के शब्द हैं
एक सज्जन ने कहा,
आर्काइव में जाकर खोजिये
शायद मिल जाएँ.


यहाँ यौन क्रीड़ा या बलात्कार
जैसे शब्द भी लुप्त हो गये हैं
इसका क्या मतलब होता है
भविष्य के लोग नहीं जानते
ये भी आर्काइव में शायद मिले
कभी- कभी रोबोट करते हैं
आपस में यौनिक क्रिया जैसा
पर पता लगाना मुश्किल
इसमें रोबोट कौन और आदमी कौन
या दोनों रोबोट
ऐसा ही स्त्री और रोबोट में भी
हाँ आदमी की अपेक्षा
रोबोट में कहीं-कहीं मैंने
देखी है हल्की सी संवेदना
मनुष्य हो गया है रोबोट
और रोबोट मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है
मनुष्य, मनुष्य से आदमी
और आदमी से रोबोट हो गया
यही मुझे हदप्रद कर गया


और भी बहुत कुछ था भविष्य में
पर मैंने न देखने का निश्चय किया
मैं भविष्य से भाग खड़ा हुआ,
हांफने लगा,कुछ दूर जाकर रुका
थोड़ी देर तक लेता रहा लम्बी साँस
और याद आने लगा
एक गोल चक्कर की तरह
मनुष्यता,मित्रता,अड्डेबाजी,माता-पिता,
ढेर से रिश्ते,प्रेम,पत्नी,बच्चे और
मैं फफक कर रो पड़ा


मैंने संकल्प किया .
अब मैं सिर्फ वर्तमान में जियूँगा
और सोचूंगा .
इन्हीं विचारों के मध्य किसी ने झिंझोड़ा
उठिए कार्यालय नहीं जाना है
निद्रा भंग हुई
सामने शालू जी मुस्कराते हुए खड़ी थी
ऐसे क्या देख रहे हैं ,क्या हुआ ?????

पवन तिवारी
सम्पर्क- 7718080978
poetpawan50@gmail.com