यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

प्रेम में जिन्हें छल मिले हैं



प्रेम में जिन्हें छल मिले हैं

आज  वाले  कल  मिले हैं

बासी  रोटी  भूख  में  

जूठे जिनको  जल मिले हैं

ऐसों  को  मत  त्रास देना

प्रश्न    भी     करना   नहीं

 

विरह   में  जो  रो  रहे  हों

अपनापन  जो खो रहे हों

विवश  होकर  ज़िंदगी से

आधा   जिंदा  जो  रहे हों

ऐसों  को मत  त्रास  देना

प्रश्न   भी     करना   नहीं

 

अपनों  के  मारे  हुए जो

अपनों  के  चारे  हुए जो

है परिस्थिति मृत्यु की पर

साँस  को  धारे  हुए  जो

ऐसों को मत  त्रास  देना

प्रश्न    भी    करना  नहीं

 

रात  जो  बे-घर  हुए  हैं

बारिशों  में  तर  हुए  हैं

जो अभी अपमान सहकर

नैन  से   निर्झर  हुए  हैं

ऐसों  को  मत त्रास देना

प्रश्न   भी   करना   नहीं

 

पवन तिवारी

१२/०२/२०२४  

 

 

 

रविवार, 11 फ़रवरी 2024

बिन मांगे ही पाने वाले


बिन  मांगे   ही  पाने  वाले

क्या जाने श्रम  वाला ठेला

कातर दुःख को गाने वाले

क्या जाने खुशियों का रेला

जिनसे दुनिया  ही रूठी है

क्या जाने  अपनों का मेला

 

सर्द का मौसम फटी बिवाई

वो   ही    जाने   पीर   पराई

पहने   कोट  अलाव  तापते

वो  क्या जाने ठिठुरन भाई

सावन   में   पूछा    भैंसे  से  

बोला  जी  हरियाली  छायी

 

साहब   बोले   तेज   हवा   है

उनको क्या कि आँधी आयी

झुनिया की तो छप्पर उड़ गयी

रोये    कह   के   माई – माई

पूरा    गाँव    घूम    आई   है

मिला  नहीं  एक  भी हिताई

 

जो जैसा  उसे वैसा दिखता

अच्छा   बुरा  दृष्टि  पे   भाई

अब तो और ज़माना बदतर

खा करके  भी  करें  बुराई

नेकी  कर   बदनामी  पाते

ख़ुशी  को तरसें पाई–पाई

 

पवन तिवारी

११/०२/२०२४      

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

वसीयत: अंतिम इच्छा !


 


मेरी अंतिम इच्छा है, मृत्यु!

जब मेरे रक्त संबंधियों ने

मुझे मान लिया था ‘अस्तित्त्व’हीन

परिवार ने कह दिया था

निकम्मा, नकारा, कामचोर और भी

इसी पक्ष के शब्द!

मेरा लिखना ‘काम, की श्रेणी से

खारिज रहा और मुझे  

घोषित किया गया विक्षिप्त!

तब मैंने मरने की इच्छा को

बलवती होते देखा था अपने अंदर!

 अब जब! तब से

बीत गये पूरे चार साल,

वह इच्छा उतनी ही बलवती है.

तारीख़ बता रही है

अब मुझे वर्ष ४२ !

सोचता हूँ,  

१६ साल में विदा हुए ज्ञानेश्वर,  

विवेकानंद शरीर छूटा वर्ष ३९ में,

शंकराचार्य का २९ में,

हमारे ही कवि कुल अग्रज

शिव कुमार बटालवी, धूमिल,

रांगेय राघव!

इन सबसे बूढ़ा हो चुका है

मेरा यह शरीर!

इधर के चार सालों में

कई - कई पन्ने किये काले;

कुछ पाठकों ने

उन्हें पढ़कर किये पीले!

वही पीले करने वाले

मेरे अपने हैं.

मेरी अंतिम इच्छा पूरी होने पर

मेरे अपनों दुखी मत होना !

मनाना खुशियाँ!

बच्चों को खिलाना रसगुल्ले,

क्योंकि मुझे बचपन में

किसी ने नहीं खिलाये रसगुल्ले!

मैं खुश होता तो

निश्चित ही रसगुल्ले खाता,

तुम बच्चों को देना

मेला जाने के लिए पैसे!

तुम नंगे पैरों वाले बच्चों को

पहनाना जूते!

तुम खुले बदन बच्चों को

पहनाना पैंट और बू-शर्ट.

मेरी अंतिम इच्छा पूरी होने पर

मेरे अपनों! इस तरह मनाना ख़ुशी,

क्योंकि यही है मेरी अंतिम इच्छा !

मेरे इस लिखे को

मत समझना कविता;

समझना मेरी वसीयत !

 

पवन तिवारी

०७/०२/२०२४        

तोड़ कर अवरोध सारे




तोड़  कर  अवरोध सारे

तुम मुझे अधिकार दे दो

कर सकूँ  संवाद उर का

थोड़ा सा तुम प्यार दे दो

 

मुस्कुराएँ अधर  कह दो

छोड़कर  सारी  व्यथाएं

त्रास सारा  हर ही लूँगा

पग तो  मेरी और आएं

 

प्रेम  का  उपहास करना

जग का पहला आचरण है

निम्न क्या समझेंगे इसको

उच्च  इसका व्याकरण है

 

लोक में यह ही परम है

इससे आगे कुछ नहीं है

इससे आगे परम ईश्वर

इससे  आगे  कुछ नहीं

  

पवन तिवारी

०६/०२/२०२४

एक लेखक या कवि

 




एक लेखक या कवि

रोज थोड़ा-थोड़ा मरता है.

और भरता है थोड़ा थोड़ा जीवन

अपनी कहानी और कविता में !

वो साहित्य भरता है- समाज में,

मनुष्यता में थोड़ा - थोड़ा जीवन

एक दिन साहित्यकार थोड़ा - थोड़ा

मरते - मरते मर जाता है !

मर जाती है उसकी काया किंतु,

वह अपने साहित्य से

समाज में थोड़ा - थोड़ा

जीवित होते – होते पूरी तरह

जी उठता है और फिर वह

हमेशा के लिए न केवल

जीवित रहता है बल्कि

रहता है सदा प्रसन्न और जीवंत

और कहाता है महान,

बिना किसी काया के !


पवन तिवारी

३०/०१/२०२४     

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

खाली जेब ने


 


खाली जेब ने सिखाया था

रेल की पटरियों पर चलना.

रेल की पटरियों ने सिखाया

अनसुनी ध्वनियों को सुनना.

और चीखती ध्वनियों से

रहना सजग और दूर!

उन पटरियों ने सिखाया

ठहर कर भी दूर की यात्रा करना!

लोहे की कठोर पटरियों ने

जिंदगी में जीने का,

एक ऐसा भी तरीका बताया;

इन्हीं पटरियों के बीच चलता हुआ

आगे-पीछे, अगल- बगल झाँकता हुआ,

मृत्यु से आँख मिचोली खेलता हुआ;

कालवा से चलकर मुलुंड

पहुँच जाता था मेरे साथ मेरा बस्ता!

पाठशाला ने बस्ते की शिक्षा दी,

पटरियों ने जिंदगी की!

लौटते समय देर रात हो जाने पर

सहपाठियों से इतर डिब्बे में

चढ़ जाता भीड़ में बेटिकट

अवैध रेल यात्री के रूप में

करता यात्रा!

कलवा स्टेशन उतरने पर

किसी को काले कोट में

टहलते देख, बढ़ जाती थी धड़कन

और सूखने लगते थे होंठ!

केवल तीन रूपये का अभाव

मुझे करता था इतना भयभीत!

आज भी काम आती है

उस तीन रूपये और

लोहे की पटरियों की सीख!

इसीलिये शायद,

जब कभी किसी के साथ

करता हूँ किसी गंतव्य की यात्रा

तो सबसे पहले खरीदता हूँ टिकट

खुद से पहले अपने सहयात्री का!

अब तक बच सका हूँ

थोड़ा सा मनुष्य !

 

पवन तिवारी

२५/०१/२०२४         

   

 

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

भात और लात


 

कभी थोड़े चुपके से

दीदी ने प्यार से खिलाया था

अपने हिस्से का भात !

और बदले में पड़ी थी

पीछे से एक जोरदार लात !

आ गया था मुँह से बाहर

सारा का सारा भात ! और

टूट गया था आगे का आधा दांत,

होंठ हो गये थे चटख लाल !

देखकर यह दृश्य भर आयी थी

दीदी की आँखें !

उतर आया था आँखों में आघात !

जाने कितने वर्षों बाद या कहूँ

जीवन के ढलते वर्षों में

नसीब हुआ है बिना डर के

भर पेट खाने को भात,

तब वैद्य ने प्रेम से

समझाते हुए कहा-

जैसे कहते हों तात,

बिलकुल मत खाना भात !

यदि नहीं माने तो...

लगा जैसे आगे के शब्द कहेंगे,

लात से भी भारी पड़ेगा भात !

मन झुंझला कर बोला- हाय रे भात!

 

पवन तिवारी

२३/०१/२०२४