कुसुमित
वय में हो जाता है
अभिरूप
देख खो जाता है
मेरी
भी दशा सहज
वैसी
मन
उसी नगर को जाता है
तुम
प्रतिभा में लोकोत्तर हो
तुम
प्रति प्रश्नों का उत्तर हो
मैं
साथ तुम्हारा पा न सका
इसलिए
कहूँ तुम पत्थर हो
यह कथा कोई
रामायण ना
मैं
हूँ कोई नारायण ना
अन्तः
खीझा दुःख भी था पर
इतना
भी स्वार्थपरायण ना
अब देखा वर्षों बाद तुम्हें
संतानों
संग आबाद तुम्हें
मेरी
भी दुनिया कुछ ऐसी
दिल
कहे मुबारकबाद तुम्हें
ये शोक प्रेम की
स्मृतियाँ
उर
में भटकें कितनी बतियाँ
इनसे ही
जीवन है अद्भुत
जीवन
की हैं कितनी जतियाँ
पवन
तिवारी
२५/०८/२०२२