यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

मंगलवार, 7 जून 2022

तुम्हें चाहा हमने

तुम्हें चाहा हमने तुम्हें प्यार किया

तुमने  हमें  ऐसे  कैसे  मार  दिया

अपनी  ज़िंदगी  दे दी हमने तुम्हें

तुमने हमें ये सिला कैसे यार दिया

 

किस बात  का  कैसा बदला लिया

सावन  के  मौसम  में पगला दिया

दिल के मामले में किया घपला तुमने

लोग कैसे आज-कल के बतला दिया

 

मासूमियत   का   ठिकाना   नहीं

दिल खोल  करके  दिखाना  नहीं

बहुत मोल भारी मोहब्बत का है

हरगिज  अकेले    चुकाना   नहीं

 

देखो सजग  रहना  प्यार  में भी

देखो  नज़र  रखना  यार  पे भी

कोई दगा का है निश्चित न दिन

पीने  पड़े  आँसू    खार  के  भी

 

पवन तिवारी

०७/०८/२०२१

तेरा हिय ही

तेरा हिय ही मेरा  आवास रहा

तू  सदा  मेरे  लिए  ख़ास  रहा

नयन पे एक छवि का कब्जा है

मेरे सपनों  में  तेरा वास  रहा

 

ये बदन  चाहे  जितना दूर रहे

मन तेरे दिल के आसपास रहा

तेरी पलकों का मैं सितारा रहूँ

हर घड़ी बस यही प्रयास रहा

 

तू मिले तुझसे प्यार है कह दूँ

सामने आयी तो ये काश रहा

जब भी कहने को हौंसला बाँधा

  गया कोई और त्रास रहा

 

इस तरह उम्र बीतती ही रही

यूँ मेरे प्रेम को वनवास रहा

तुझको अवकाश कभी था ही नहीं

कितनी ही बार तेरे पास रहा

 

पवन तिवारी

०५/०८/२०२१   

सोमवार, 6 जून 2022

तुम मेरे प्रेम में

तुम मेरे प्रेम में शामिल रहना

मेरी खुशियों में भी दाखिल रहना

ज़िंदगी में कभी मुड़कर देखूँ

ज़िंदगी में मेरी हासिल रहना

 

बिन लपेटे हुए ही तुम कहना

जैसे लगता हो वैसे ही रहना

सारे बोझे नहीं उठाने तुम्हें

जितना हो सहज उतना ही सहना

 

ज़िन्दगी दो है जो हमारी है

ज़िन्दगी तेरी मेरी यारी है

दोनों समझेंगे एक दूजे को

फिर तो ये और और प्यारी है

 

अब जो अतिरिक्त साथी का साया

लगता है वाह ख़ूब क्या पाया

एक साथी जो खुद से प्यारा है

उसको पाया तो प्रेम को गाया

 

 

सोचता हूँ कमाल कर डाला

कुछ नहीं करके प्यार कर डाला

सब जगह हार के भी खुश हूँ अब

प्यार पा जीत गीत कर डाला

 

पवन तिवारी

०४/०८/२०२१

अबकी पीड़ित मैं नहीं हूँ

अबकी पीड़ित मैं  नहीं  हूँ  समय है

अबकी हर्षित तात  पीड़ित तनय है

समय ही  उलझा  समय के खेल में

भाग्य खुद ही बंद  अपनी  जेल में

 

प्रकृति अपनी माया में ही भ्रमित है

अपने ही शस्त्रों से विघटित दमित है

कल के   शासक   आज  बेचारे  हुए

जो  विजेता  थे  हैं  अब  हारे  हुए

 

काल को महाकाल शिव सा मिल गया

पुष्प से कुछ अधिक कंटक खिल गया

सूर्य  को  भी  दे  दिया  अवकाश  है

इक  उजाला  आज  सबके  पास  है

 

इसलिए अब सहज ही व्यवहार हो

सब  बराबर  हैं  ये  कारोबार  हो

जिन्दगी केवल तभी तक ज़िन्दगी

जब तलक इक दूजे के प्रति बंदगी

 

पवन तिवारी

०४/०८/ २०२१

किसका दिल किसका

किसका दिल किसका घर है

अनजाना  सा  इक   डर  है

अपनी सुध में हैं बेसुध सब

कुछ न पता किसका दर है

 

तन  लगता  जैसे  खर  है

अंदर   से    जैसे  तर  है

बेमन से बस चल रहे हैं

कोई चिंता न  फिकर है

 

बेबसी से झुका सब सर है

लगता  नहीं  कोई  नर है

चेहरे से  कुंठा  है  झरती

जिन्दगी बस जिन्दगी भर है

 

जिन्दगी  जाती  किधर है

कभी इधर या कभी उधर है

जाल हैं  स्वारथ  के  फैले

ज़िंदगी भी  हुई  जर्जर है

 

 

नेह का केवल बचा नगर है

अपनाता वह भी  अगर है

इसलिए आदमीयत बचा लो

खुद को जीना यदि जी भर है

 

पवन तिवारी

०३/०८/२०२१

मेरी अपनी कहानी

मेरी अपनी कहानी खो गयी है

मैं औरों की कहानी पढ़ रहा हूँ

अभी कुछ दिन ही पहले मैं ढहा हूँ

मैं खुद को थोड़ा-थोड़ा गढ़ रहा हूँ

 

झूठ में इतनी शक्ति भान ना था

सो अब बचते बचाते चल रहा हूँ

वो तूफानों का साथी है तो वो जाने

मैं हूँ दीपक सो मध्यम जल रहा हूँ 

 

वो आलीशान जीता है तो अच्छा है

समय के साथ मैं भी पल रहा हूँ

ज़िंदा होना मेरा दे दर्द उनको

गज़ब है उनको इतना खल रहा हूँ

 

तो निश्चित है कि कोई बात होगी

कि आँखों में मैं सबके आ रहा हूँ

मुझे रचना है कुछ इतिहास शायद

तवज्जो  इस क़दर मैं पा रहा हूँ

 

 

जो पहले है तय होगा वही अब

और गति को बढ़ाता जा रहा हूँ

तुम्हें डर रौशनी से है समझ आया मेरे

लो मैं सूरज सुबह का ला रहा हूँ

 

पवन तिवारी

२९/०७२०२१     

 

किसकी खातिर किसे

किसकी खातिर किसे कितना अवकाश है

सत्य का दोनों पक्षों को आभास है

कुछ अनायास होता नहीं आज - कल

जो हुआ दिख रहा है वो सायास है

 

ये जो फैला हुआ इतना आकाश है

बादलों को भी आता न ये रास है

कोशिशें उसको ढकने की सदियों से हैं

फिर भी डरता नहीं उनके ही पास है

 

चाँद तारे हैं हिय में समाये हुए

मेघ ने भी कई घर बनाये हुए

फिर भी नीली से निर्लिप्त मुस्कान दे

सबका स्वागत करे भुज उठाए हुए

 

एक हम दम्भ से हैं निहारा किये

सत्य को जानकार भी किनारा किये

झूठ को साथ लेकर चलें हर घड़ी

जीतते - जीतते सो भी हारा किये 

 

पवन तिवारी

२५/०७/२०२१

 

वही सच्चा वही अच्छा

वही सच्चा वही अच्छा

तुम्हें जो ठीक लगता है

वही साथी है अच्छा जो

तुम्हारे साथ भगता है

 

कि तुमसे दूर रहकर भी

कहीं एक प्रेम पगता है

प्रतीक्षा में तुम्हारे एक

छत पर चाँद जगता है

 

तुम्हारा रूप तुमको क्या पता

कितनों को ठगता है

तुम्हारा देखने नखरा

कि  दिल से प्यार उगता है

 

प्यार सबको झुकाता है

अकड़ में कौन झुकता है

कभी औरों को भी समझो

तुम्हारा दिल भी दुखता है

 

पवन तिवारी  

०२/०८/२०२१

 

शनिवार, 4 जून 2022

है जो शिद्दत तो

है जो शिद्दत तो उसको भी पा लीजिये

जिंदगी  के   लिए   भी   दुआ  कीजिये

 

हवस ऐसी भी ना  हो कि मर जाइये

थोड़ा दम लीजिये थोड़ा खा लीजिये

 

रोते रहते हैं अक्सर ये अवसर मिला

आज अपनों में थोड़ा सा गा लीजिये

 

आप अवरोधों पर ख़ूब अच्छा कहे

पाँव अब तो डगर से हटा लीजिये

 

आप  कहते   प्रशंसक   हजारों  में  हैं

आज महफ़िल है खाली बुला लीजिये

 

इतनी पीकर भी  हैं आप प्यासे पड़े

आख़िरी चाह  है  सो बुझा लीजिये

 

पवन तिवारी

२८/०७/२०२१