यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

सोमवार, 4 अप्रैल 2022

साहित्यिक भवन

कुछ दिनों पहले

एक दूसरे नगर

प्रवास पर था

एक दिन  सुबह

टहलते हुए एक पुराने

भव्य भवन पर

दृष्टि पड़ी तो

हुआ आश्चर्य,

दीवार पर उभर रहे थे ते

जी से क्रमानुसार शब्द !

ध्यान से देखा

ज्ञात हुआ वे शब्द

एक कहानी कहने लगे थे।

मैं उत्सुकतावश भवन की

दूसरी दीवार की ओर गया।

वहां भी उभरने लगे

सुंदर शब्द,

पढ़ने का प्रयास किया तो

आने लगी कविता की गन्ध ।

अब मैं,

तीसरी दीवार की तरफ गया

वहां और सुंदर,

 गढ़े गढ़े से शब्द उभर आये।

पढ़ा तो वे गीत थे,

मेरी उत्सुकता बढ़ी ।

भवन के द्वार पर

आकर खड़ा हो गया तो

उभर आई मेरी ही तस्वीर

मैं हतप्रभ!

मैं लगभग भागा था

कुछ दूर आकर

एक व्यक्ति से पूछा- उ

सने बताया

वर्षों पहले इसमें

एक साहित्यकार रहता था

इस घर को

कहानियों, शब्दों, कविताओं,

गीतों की आदत हो गई है!

नशा भी कह सकते हैं

निश्चित ही आप साहित्यकार होंगे!  

आपको बुला रहा है क्योंकि

यह दूर से

साहित्यकार को पहचान लेता है।

 

 

पवन तिवारी

२५/०३/२०२१

सुंदर मनुज

 

जिस पर बीत रही हो जाने

बाकी तो केवल बस माने

दुख स्थाई साथी फिर भी 

व्याकुल हैं सब सुख को पाने

 

 

ढंग ढंग के दुख बीते हैं

रोज रोज मर कर जीते हैं

वैसे तो इंकार ही करते

मुफ्त की तो सब ही पीते हैं

 

 

इंद्रधनुष से अधिक रंगीले

मानुष सबसे अधिक सजीले

जो कठोर हिय के लगते हैं

अंदर से हैं गीले - गीले

 

 

कितनी कला मनुज के अंदर

लगता सच वंशज हैं बंदर

तिकड़म उछल कूद में आगे

फिर भी मनुज सभी से सुंदर

 

 

पवन तिवारी

२५/०३२०२१

 

रविवार, 3 अप्रैल 2022

हत्या से बड़ा शब्द है जीवन

वह मेरी हत्या करना चाहता था

मगर युक्ति से

ताकि मुक्त रह सके

बाहरी दुनिया के आरोपों से

वह मेरी प्रतिभा, कौशल,साहस

और धैर्य पर चला रहा था

छोटे- छोटे हथौड़े

चुभाता था बारीक सुइयाँ

उसे पूरी उम्मीद थी

मैं स्वयं की कर दूँगा

स्वयं हत्या !

किन्तु उसकी आशा के विपरीत

मैं और, और ज्यादा

मज़बूत हो रहा था ;

वह झुँझला गया था

उसकी झुँझलाहटें वास्तव में

मुझे ज़िंदा देखने वालों की

आशीष व मंगलकामनाएं  थीं .

हजारों उम्मीदें मेरे साथ थीं

बस ! उसकी एक उम्मीद के विरुद्ध

मुझे लगता है

बस, इसीलिये ईश्वर ने

मेरे ज़िंदा रहने के पक्ष में

सुनाया है निर्णय ! ताकि

उन हजारों उम्मीदों  को

दे सकूँ शब्द!

हत्या से बड़ा शब्द है जीवन !

 

 

पवन तिवारी

१६/०२/२०२१

वसंत पंचमी

हमारी कहानी

दुनिया  की सबसे दिलचस्प

सबसे दुखद और आकर्षक कहानी

हमारी है !

क्या यह सुखद नहीं ?

तुम पुस्तक (कहानी) की प्रथम पृष्ठ

और मैं अंतिम, सोचो

तुम्हारे बिना कहानी

आरम्भ नहीं होगी और

मेरे बिना ख़त्म नहीं!

पहले तुम्हारा उल्लेख

फिर मेरा !

हम कभी नहीं मिल सकेंगे.

परन्तु हम सदा साथ रहेंगे .

कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण

दुःख ही तो होता है.

दुःख ही कालजयी है !

तुम खुश रहना क्योंकि

तुम कालजयी कहानी हो !

ऐसा सौभाग्य

सबको नहीं मिलता !

 

पवन तिवारी

०७/०२/२०२१

 

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

पीड़ा की गति

पीड़ा की गति ऐसे बढ़ गयी

ज्वर की आभा बदन में बढ़ गयी

पीड़ा ठहर के तन गयी हिय में

अधर में कई दरार बढ़ गयी

 

ऐसी पीड़ा को सह जाना

मौन में चुप रहकर कह जाना

सिद्धि पाना यूँ पीड़ा पर

अंदर – अंदर ही दह जाना

 

दुष्कर है यूँ मारकर जीना

घूँट - घूँट में गरल को पीना

इच्छा हो पर कह ना पाना

अपने दुःख को अपने सीना

 

रोम - रोम से आह निकलती

फिर भी जीवन से हँस मिलती

ऐसे त्रास सहन करके भी

जीवन के संग पग पग चलती

 

सपनों को आकाश में रखता

दिन में सोता रात में जगता

काँख में पीड़ा को रख करके

सपनों से बातें कर हँसता

 

ऐसे जीकर वो आया है

तब अपनी आभा पाया है

गया है रोने के दिन में

तब उसको अब जग गाया है

 

पवन तिवारी

२७/०३/२०२१   

जिसके लिए ही सजते धजते

जिसके लिए ही सजते धजते

जिसके लिए ही सब कुछ तजते

वे ही जब तजते हैं तुमको

तब हिय के बारह हैं बजते  

 

इसलिए समन्वय सदा रखो

हित और अनहित सब सोच भखो

सम्बंध न त्याजो इक के लिए

सबमें थोड़ा सा स्नेह चखो

 

कब कौन कहाँ काम आ जाये

किसका स्वर किसको भा जाये

है भाग्य बहुत ही मायावी

निर्धन नरेश सा छा जाये

 

मित्रता की खिड़की खुली रखो

नीयत की आँखें धुली रखो

बिगड़ी बातें बन जायेंगी

भाषा भी नपी तुली रखो

 

पवन तिवारी

०६/०२/२०२१  

 

 

 

मंगलवार, 22 मार्च 2022

यादों में जवानी है

यादों में जवानी है

तेरी उसमें कहानी है

जब भी उसमें डूबूँ

पानी सी रवानी है

 

 

यादों में  मिले हँसता

जैसे  सुंदर  सा बस्ता

वो प्यारा सी डिम्पल

था गालों  में  धँसता

 

जब भी दिल दुखता है

दिल  मुझसे  कहता है

मैं  प्यार  करूँ तुझको

तू  दवा  सा  रहता है

 

जब प्यार की बातें हों

कुछ  धुन  में गाते हों

तू बरबस याद आये

जब सर्द सी रातें हों

 

तू ना होकर  भी है

पाया खोकर भी है

तेरे प्रेम की स्मृति में

हँसना रोकर भी है

 

पवन तिवारी

०५/०२/२०२१

 

नयी चुनौती रोज है आती

नयी चुनौती रोज है आती

नये – नये  किस्से बतलाती

हम उसमें उलझे रहते हैं

तब तक नयी कहानी लाती

 

ठोकर  देकर  है  समझाती

क्षणिक ख़ुशी देकर इठलाती

अक्सर चक्रव्यूह  रचती है

फँस जाने पर मगन हो जाती

 

बुनते  रोज  नये  सपने   हैं

उन्हें  तोड़ते  जो  अपने  हैं

फिर भी होनी  होकर रहती

छप ही जाते  जो छपने हैं

 

जीवन रोज अचम्भित  करता

नये – नये  वो  रंग  है भरता

उसे देख मोहित  हो जाते

यहीं से जीवन में दुःख झरता

 

फिर भी हर कोई जीना चाहे

यहाँ न कोई मरना चाहे   

सबको खाली हाथ है जाना

फिर भी सब कुछ भरना चाहे

 

पवन तिवारी

२५/०३/२०२१