यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

संशोधन

मुँह पर कहते अच्छा–अच्छा

पीछे बदनामी भी करते

घूमा करते साथ में वैसे

बस मौके पर गुल रहते

 

कहने को वर्षों की यारी

यारी कभी निभाई ना

दुःख में द्वार कभी ना आये

मिलने पर बस हाँ में हाँ

 

मित्र मित्र से भी जलते क्या

वर्षों संशय था इस पर

आँखों देखि पर क्या कहता

मित्र की आग से जला था घर

 

सच तो ये था मित्र नहीं वो

मित्र का बस सम्बोधन था

मित्र से परिचित में ले आया

ये विशेष संशोधन था

 

आप के अनुभव भी ऐसे क्या

जिन्हें मित्र वर्षों से कहते

तो उसमें बदलाव कीजिये

जो हिय से ना साथ में रहते

 

पवन तिवारी

१९/२१/१२/२०२०

गेहूँ की पाती पर

गेहूँ की पाती पर  चढ़ के ठुमकती है ओस देखो

और सर्दी की तपन से मुँह से निकले भाप देखो

बाँस गीला सा लगे है भीगी-भीगी दूब देखो

लकड़ियों में है उदासी ठिठुरी ठिठुरी धूप देखो

 

शीत में पानी गरम है जल से उठती भाप देखो

आग चूल्हे की न सुनती  धुंएँ का  परताप देखो

हर तरफ रानी  रजाई  चद्दरों  का  भाव देखो

छोटी टोपी भी गरम है  स्वेटरों का ताव देखो  

 

मारे - मारे सूर्य फिरते कुहरों का है राज देखो

हर घड़ी संध्या सी लागे  पूस का अंदाज देखो

कोई सुनवाई नहीं है सर्दी का बस रूप देखो

इसका भी स्वागत करो ना जाड़ा ऋतु का भूप देखो

 

पवन तिवारी

२१/१२/२०२० 

वह तो हिंदी के फूल बोता है

गीत गम  को  उतार देता है

पवन को सुन निखार देता है

रोग  संगत  के कई लगते हैं

प्यार का  वो बुखार देता है

 

द्वार पर जब भी गीत आते हैं

किवाड़ तक भी गुनगुनाते हैं

पवन को देख गीत हँस पड़ते

मिले तो साथ मिल के गाते हैं

 

गीत और वो भी दोनों जज़्बाती

लगता सदियों से दोनों हैं साथी

उसका हर भाव जैसे फूल खिले

उसके शब्दों से भी ख़ुशबू आती

 

वो तो  हिंदी  के  फूल बोता है

वो  तो गीतों को लेके सोता है

कहानी कविता से मैत्री उसकी

इनके बिन होता है तो रोता है

 

 

इक   जमाना   उसे   भुलाता  है

इक  जमाना  जो  उसे   गाता है

हो कुछ भी जिक्र उसका आता ही

कितने दिल में वो घर बनाता है

 

पवन तिवारी

२४/१२/२०२०  

दिन की आहट

सारा जहाँ खोया खोया है लगता है सोया सोया है

भोर मचलती है  चाँद भी रोया – रोया है

ओस तो चमक रही हवा भी प्यार से बही

सुमन लगे खिलने हँसने लगी मही

 

प्रात की सब माया निखरी हर काया

दिन का बन गया दिन जग स्वर में गाया

भोर सुहानी है बड़ी मस्तानी है

रात में सोते सब इसको जगानी है

 

 तृण भी गाते हैं सूरज आते हैं

रात है छुप जाती दिन मुस्काते हैं

भोर जी स्वागत है जग तुम्हें चाहत है

तुम्हरे पग पड़ना दिन की आहट है

 

पवन तिवारी

संवाद – ७७१८०८०९७८

०८/१२/२०२०

 

पुस्तक

काफी दिनों से मुझे नींद नहीं आती,

मतलब कम आती है!

दिमाग पर जोर देकर सोचता हूँ तो,

पता चलता है, जब से पुस्तकें

पढ़ना शुरू किया,

उन पुस्तकों में विचार थे ;

वे विचार, मेरे मस्तिष्क को सोने नहीं देते!

सुना हूँ, जब तक मस्तिष्क जागता है

आदमी भी जागता है.

कुछ मुझे विद्रोही कहते हैं.

क्योंकि पुस्तकें विद्रोही होती हैं.

वे ग़लत सहन नहीं कर पाती.

इसलिए कई सरकारें, पुस्तकों को

डाल देती हैं कारागृह में .

लगा देती हैं पाबंदी का ताला.

अब जो मैं, थोड़ा सा सोता हूँ

उसका मतलब है कि

अब मैं अपने विचारों को

लिख देता हूँ पुस्तकों में!

ताकि दूसरों को भी जगा सकूँ !

पाया हुआ लौटाना ही तो ज़िन्दगी है .

सो एक पाठक से लेखक हुआ

ताकि, फिर पाठक जन्म ले सके.

हो सकता है –

मेरी बात फालतू लगे

क्योंकि, एक वर्ग लेखक को

यही समझता है !

इसीलिये कुछ लोग, पुस्तकों को (विचारों को )

आलमारी से रद्दी में

फेंक रहे हैं और

खाली हो रहे हैं विचारों से

सुनता हूँ भेड़ें

विचार से खाली होती हैं .

 

 

पवन तिवारी

१७/१२/२०२०  

 

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

सवेरे - सवेरे हवा आ रही है

सवेरे - सवेरे हवा   रही  है

उसे देख करके सुबह गा रही है

मुंडेरे का मुर्गा मगन हो रहा है

यह देख भू भी ख़ुशी पा रही है

 

ये  चहचहाना  चिड़ियों  का  गाना

भोरे-भोरे छत पर  चुग आना दाना

लिए लालिमा उगते रवि देखना जी

लगे प्रात में ज्यों  खजाने  का पाना

 

सर्दी में पीली-पीली धूप का खाना

रजाई  में रहने का, प्यारा बहाना

सर्दी की भोर बड़ी अल्हड़ है होती

भोरे-भोरे कोहरे का होता जमाना

 

ओ भोर, सुनना, तुझसे है मिलना

तू सबसे प्यारी है तुझसे है कहना

तेरा रंग रूप तेरी पावन कहानी

सुन भोर हँसती सी ऐसी ही रहना

 

पवन तिवारी

संवाद- ७७१८०८०९७८

०७/१२/२०२० गोरखपुर

 

ज़िन्दगी और भी तो गाती है

ज़िन्दगी और  भी  तो  गाती है

कौन कहता कि  बस, सताती है

दुःख तो स्थायी साथी है उसका

किन्तु सुख को भी लेके आती है

 

यही जो दुःख में  गुनगुनाती है

रोती  खुद  ग़ैर  को  हँसाती है

लोग  यूँ  ही  नहीं मरते  इसपे

ख़ुशी में भी  गज़ब  रुलाती है

 

ज़िन्दगी के  लिए मरते  कितने

ज़िन्दगी के  लिए गिरते कितने

ज़िन्दगी को कहे जग जाने क्या

ज़िन्दगी  पा के निखरते कितने

 

क्या कहूँ तुझको लाजवाब है तू

नहीं  हिसाब   बेहिसाब  है  तू

तेरे बिन  शून्य  है  जगत सारा

प्रकृति का  श्रेष्ठतम जवाब है तू

 

पवन तिवारी

संवाद- ७७१८०८०९७८

१६/१२/२०२०

हे खेत मेरे तुझको प्रणाम

हे खेत मेरे तुझको प्रणाम,तू ही है  मेरा  काम  धाम

तुझसे मेरी हैसियत बनी,तेरे कारण है किसान नाम

हे खेत मेरे तुझको प्रणाम !

 

तेरी मिट्टी सर माथे पर, तुझसे ही है मेरी घर - घर

तेरी मेंड़े सुख देती हैं, जब  बैठ  के  देखूँ  हरी  डगर

तेरे कारण मज़बूत चाम, हे खेत मेरे तुझको प्रणाम !

 

तेरे फैले ये भुज विशाल, तू है धरती का  प्रथम लाल

तू अनन्य दूबों  का पालक, मिट्टी दमकाये  तेरा भाल

तू है प्रकृति का पुण्य वाम, हे खेत मेरे तुझको प्रणाम !

 

तेरे  कारण  गन्ना  मिलता, तेरे कारण है हल चलता

तेरे कारण सरसों  लहरे, तेरे कारण ही हिय खिलता

तेरे कारण सब तामझाम, हे खेत मेरे तुझको प्रणाम !

 

तू है तो गेहूँ  धान  चना, तू  है  किसान  तो  महामना

तेरे कारण सर  पगड़ी है, तू है किसान सो तना - तना

तूने ही उदर को रखा थाम, हे खेत मेरे तुझको प्रणाम !

 

हँसिया,फावड़ा, कुदाल सभी,रस्सी, खुरपा,खुर्पियाँ कभी

हाथे  का  भी  अस्तित्व  बचा ,तेरे  कारण  ये  बचे अभी

अब तक न हुई है इनकी शाम, हे खेत मेरे तुझको प्रणाम !

 

तू सबकी दृष्टि में खटक रहा है कृषक तुझे ले भटक  रहा

हड़पना तुझे सब चाह रहे, तुझे देख के नेता  मटक रहा

तेरे कारण करे राम राम, हे  खेत  मेरे  तुझको प्रणाम !

 

पवन तिवारी

संवाद- ७७१८०८०९७८

१४/१२/२०२०

 

 

पहले नहीं मिला था

पहले  नहीं  मिला  था  तो  सोचता  हर  रोज

जब मिल गया तो कहने लगा है गज़ब का रोग

 

कहने को लोग कहते  हैं  भोगों में राज भोज

पर  प्यार   भोग   पाना  है  सर्वश्रेष्ठ   भोग

 

वैसे तो जोग  ज़िन्दगी  में  होते  तरह  के

परिणय जगत में किन्तु होता है श्रेष्ठ जोग 

 

अस्त्रों  से  लगी  चोट  लोग  भूल  जाते  हैं

ज़िन्दगी भर रहती है बस बात वाली चोट

 

निंदा को जो  अपना  समझते रहे हैं धर्म

सज्जनों में  भी  वो  हैं  खोज  लेते  खोट

 

पवन तिवारी

संवाद – ७७१८०८०९७८८

१३/१२/२०२०