यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 8 मई 2020

चिंता


कभी-कभी मेरे साथ जब केवल मैं होता हूँ.
तो एक जुमला आता है और मेरे गाल पर
एक तमाचा मारकर हँसते हुए भाग जाता है.
उसका नाम है – ‘चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा’
पता है- वो जुमला खुद चिंता में रहता है और
अपनी चिंता से उपजी खीझ मुझे मारकर
तुष्ट करने का असफल प्रयास करता है.
कभी सोचा है जिसकी छत छिन गयी हो,
जो अपनी जवान बेटी की शादी के लिए
वर्षों से हो प्रयासरत
जिसका पेट हो कई दिनों से भूखा
जिसका बेटा अस्पताल में जिंदगी और
मौत के बीच झूल रहा हो !
जिसकी वर्षों की नौकरी अचानक चली गयी हो,
जिसका बाढ़ में अचानक सब कुछ बह गया हो,
जिसे सोते से पुलिस उठाकर ले गयी हो और
उसे पता ही न हो कि पुलिस क्यों उठा ले आयी ?
फीस समय से न भरने के कारण
जिसकी बेटी को निकाल दिया गया हो विद्यालय से,
जिसको सिर्फ गरीब होने के कारण
खोनी पड़ी हो अपनी प्रेमिका.
 जिसे  सिर्फ सच बोलने के कारण
खानी पड़ी हो मार,
उससे कहना- ‘चिंता मत करो’
क्या उसके गाल पर तमाचा मार कर
हँसना नहीं है !
क्या ‘चिंता’ योजनाबद्ध तरीके या
प्रयास के द्वारा करने की चीज है.
‘चिंता’ हो जाती है.
समस्या के समाधान न होने का
नाम ‘चिंता’ है. कोई समस्या में होकर
कैसे सुखी रह सकता है ?
कई बार सांत्वना का यह जुमला
ज्यादा बड़ा थप्पड़ लगता है और
मैं अकेले में सोचते हुए
सुन्न हो जाता हूँ.


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८     
  

मनुष्य और वृक्ष


क्या सब कुछ अनदेखा कर
अपने लिए जीना ही जीवन है या
जीवन का सत्य है.
या, है सबसे बड़ी कायरता !
या फिर निचले दर्जे का स्वार्थ,
समाज की परेशानियों, दुखों
अवरोधों और उलझनों  को
कम करने में योगदान
करने के बजाय भागना
क्या जीवन से भागना नहीं है ?
फिर तो मनुष्य होने से अच्छा वृक्ष होना है.
 कम से कम वह भागता तो नहीं.
एक जगह रहता है स्थिर.
दौड़ता नहीं किसी की सहायता के लिए
किन्तु जो आता है उसके पास
उसके आतिथ्य में नहीं रहता पीछे.
देता है छाया, फल और शुद्ध हवा ;
इन सबके बाद भी कुछ लोग
काट देते हैं उसके अंग !
फिर भी वह अपनी प्रतिबद्धता से
होता नहीं विचलित.
तो क्या अब सदा के लिए
तय हो गया है कि
बस ! अपने लिए जीने वालों से
सदा के लिए श्रेष्ठ हो गया है वृक्ष !
या पहले से ही है! तभी
कुछ लोग पूजते हैं उसे या
अपने ऐसे वंशजों के कृत्य पर जताते हैं शोक

पवन तिवारी
संवाद- ७७१८०८०९७८         

काम



जिसे तुम प्यार करते हो,
अगर वह तुम्हारे काम को गरीब समझे !
और उसकी लगातार करे अनदेखी,
दूसरों के सामने उड़ाए उसका उपहास ;
तो तुम उसे छोड़ देना, इससे पहले कि वो
तुम्हें छोड़ने की बनाये योजना.
अगर तुम नहीं कर पाये ऐसा,
तो हो सकता है तुम और तुम्हारा काम
सचमुच में हो जाये ग़रीब.
गरीब होना अमीर बनने की सबसे
अच्छी संभावना है.
इसलिए अपने काम को सम्मान दो.
और संभावनाओं की ओर बढ़ो, बेख़ौफ़ !
तुम्हारे काम को गरीब समझने वाली  
प्रेमिका को ठोकर मार कर !
तुम्हारा काम एक दिन सराहा जाएगा,
और उसकी सराहना एक दिन तुम्हें
ले जायेगी महानता के मार्ग पर और
जाने कितनी प्रेमिकायें आयेंगी,
तुम्हारे रास्ते में जान-बूझकर !
किन्तु तुम्हें धोखा नहीं खाना होगा .
वैसे अब तक तुम्हें प्रेम को
परखने की कला आ गयी होगी.

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८     

गुरुवार, 7 मई 2020

प्रतिबद्धता


प्रतिबद्धता

आरम्भ में मिल सकती है प्रशंसा
या मिले समर्थन
समय के साथ मिल सकती हैं कठिनाइयाँ
और उत्तरोत्तर बढ़ सकती हैं.
विरोध भी होता है कभी-कभी
घर में भी विरोध सम्भव है.
अनचाहे अपमानों से होगी भेंट !
अकेले पड़ सकते हैं !
कई बार बेघर होने के खतरे
भी बनते रहते है.
आँख छलकने की संभावना का
आकलन गलत हो सकता है.
आप मर सकते हैं या
मारे भी जा सकते हैं.
बहुत कुछ या सब कुछ
लुट जाने के बाद भी
अपने अंदर एक प्रकार का
संतोष होता है.
उभर आता है गर्व का भाव
अपनी प्रतिबद्धता को
निभा ले जाने का. इसने रचा है
कई बार इतिहास या
रचवा देती है कुछ ऐसा
जो सदा आप के नाम से जाना जाता है.

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com  

बुधवार, 6 मई 2020

टुकड़ा ही ज़िंदगी है.



यदि कोई तुम्हें रोटी का टुकड़ा दे
या कुछ भी थोड़ा या थोड़ा-थोड़ा दे
तो दुखी मत होना, बल्कि होना ख़ुश
देना धन्यवाद, क्योंकि
यही सच्ची ज़िंदगी है !
शायद तुमने कभी ज़िन्दगी को
ध्यान से देखने या समझने की
कोशिश ही नहीं की, इसीलिये
टुकड़े ‘शब्द’ या ‘थोड़े’ से
हो जाते हो दुखी या फिर नाराज़ !
इस पर बने हैं मुहावरे भी,
जैसे- ‘फेंके हुए टुकड़े’ किन्तु
हमारी ज़िन्दगी
इन्हीं टुकड़ों से जुड़कर बनी है.
चलो तुम्हें जिंदगी के पास ले चलता हूँ.
मेरी बातों पर देना ध्यान !
जब हम पैदा होते हैं
हमें दूध टुकड़ों में मिलता है.
पहले माता – पिता फिर भाई – बहन
फिर भतीजे, पत्नी, साले
और फिर बनते हैं दादा, नाना आदि
यह सब रिश्ते
टुकड़ों में ही तो मिलते हैं.
पहले एक आया, फिर दो, फिर तीन
चलना भी तो टुकड़ों में मिला.
पहले खड़े हुए, फिर एक पग चले
फिर पड़े, फिर दो पग चले,
फिर तीन क्रमशः
दांत भी थोड़े-थोड़े आते हैं.
इसी तरह स्वाद,शिक्षा, बचपन
किशोर, युवा, सुन्दरता, सफलता
परिवार,धन सब थोड़ा – थोड़ा
टुकड़ों में मिला और फिर
टुकड़ों में चला भी गया.
धीरे-धीरे टुकड़ों में जवानी जाती है.
दांत जाते हैं. बाल जाते हैं
सौन्दर्य और स्वास्थ्य जाता है.
शक्ति जाती है और
थोड़ा-थोड़ा हम जाते हैं.
फिर एक दिन हम
टुकड़ों में खर्च होते-होते
पूरा खर्च हो जाते हैं.
मतलब चले जाते हैं.
यहीं टुकड़े मिलकर
बनाते हैं पूरी जिन्दगी !
ऐसे में यदि टुकड़े मिलें तो,
दुखी या निराश मत होना ;
क्योंकि ये टुकड़े ही जिंदगी हैं.

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com  


धीरे - धीरे




वह सुनता है मीठा और धीमा संगीत
जैसे धीरे-धीरे ह्रदय में उतरता है प्रेम
जैसे पहाड़ों से मैदानी क्षेत्रों में
बहती है आराम से नदी
वह होता है, साँसों से बजने वाली
बांसुरी की तरह सुरीला.
वह हमेशा मिलता है धीमे-धीमे
फिर चाहे खुशियाँ हों या प्रकृति
वह कभी जल्दी में नहीं रहता,
वह निहारता भी है तो आराम से,
वह पढ़ता भी है तो आराम से धीरे-धीरे
रचता भी है तो धीरे-धीरे,
वह धीरे-धीरे उतरता है शब्दों के हृदय में
जैसी न कोई सोते हुए जल में
उतरता है चुपचाप !
वह दुखों से मिलता है आहिस्ता-आहिस्ता
और उतरता है उसी गति से उनके संसार में
वह प्रेम भी करता है दबे पाँव और
प्रवेश करता है उसके देह से
होते हुए उसके आत्मा के मन्दिर तक
वह मुट्ठियाँ भी धीरे-धीरे ही भींचता है और
खोलता भी है धीरे-धीरे,
इसी से एक वर्ग हमेशा
उसे देखता है सशंकित दृष्टि से
वह चुपचाप प्रश्न करता रहता है कि
यह मुट्ठियाँ क्यों भींचता है ?
और खोलता भी धीरे-धीरे क्यों है ?
उसे उसका धीमा संगीत सुनना
लिखना, पढ़ना और प्रेम करना नहीं अखरता
बस ! मुट्ठियाँ भींचना अखरता है.
और एक वो है जो इस अखरन को
समझते हुए भी अपनी मस्ती में
सबसे बेपरवाह वो सब करता है जो
उसे करने का मन करता है
वह भी अपनी शर्तों पर
बन्धनों को आराम से धकियाते हुए
आहिस्ता आहिस्ता
अपनी स्वतंत्रता का झोला
लटकाए चलता रहता है.
क्या इसीलिये वो लेखक कहलाता है ?



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

मंगलवार, 5 मई 2020

दर्द के स्वर गीत में आने लगे


पीर  हद  से  बढ़ी  तो  ये  हुआ
दर्द के स्वर गीत  में  आने  लगे

कुछ दिनों तक प्रेम का सम्बंध था
कुछ दिनों तक बाद में अनुबंध था
प्रेम का  भी  साथ  थोड़ा सा रहा
कहने को खुशियों का जोड़ा सा रहा

प्रेम के काँटे  जो  उग  आने लगे
दर्द के स्वर  गीत में  आने  लगे

साथ  होकर  भी कहीं  वो और थे
प्यार था जब वो अलग ही  दौर था
घूमते  थे  हाथ   डाले   हाथ  में
अब तो चलने को हैं चलते साथ में

बेवफाई   सामने    थी   देखकर
दर्द के स्वर  गीत  में  आने लगे

निभ गया कैसे ये याद आता नहीं
साथ भी तो  अब चला जाता नहीं
वो छुड़ाकर हाथ  आगे  बढ़  गये
सामने मंजिल नयी  थी  चढ़ गये

कहना चाहूँ  पर  नहीं  कहते बने
दर्द के स्वर  गीत  में  आने लगे

प्रेम  के  वादे  भी  रोके रह गये
आँखों आँखों में ही धोखे सह गये
सारी खुशियों दर्द बन बहने  लगी
प्रेम  की  अट्टालिका  ढहने  लगी

वेदना  की  पोटली   कंधे  लिए
दर्द के स्वर गीत  में  आने लगे


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८