यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

मंगलवार, 5 मई 2020

पैरों की आभा




इन कच्ची मेड़ों पर चलना,
इन दूबों पर लेटना ;
इन ढेलों से खाना ठोकर
इन काँटों का पैरों में चुभना
इन पगडंडियों पर चलते हुए
पैरों में शीत लगना,
कभी तपती धूप में जलना,
पड़ जाना तलवों में छाले !
जाड़ों में फटना बिवाइयाँ,
द्वार पर बारिश में पांवों का फिसलना
और मिटटी से होना लथपथ !
टीले पर चढ़ते हुए
पैरों का होना घायल,
ये सब कृपा थी मेरी माटी की !
तभी इस अंतिम दौर में भी
दौड़ रहा हूँ लगातार !
इन्हीं से मेरे पैरों की आभा है !  


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८     

वे कदम- दर -कदम दूर जाते रहे


वे कदम- दर -कदम  दूर  जाते रहे
हम कदम दर कदम पर मनाते रहे
क्रम ये वर्षों चला और फिर ये हुआ
बेवफाई  के  ख़ुद  गीत   गाते रहे

आयी जब भी  खुशी याद  आते रहे
प्रेम सपनों में  भी हम  जताते  रहे
दुःख ने ताने मुझे उनके जब-जब दिये
आँखें भर आयी  पर  मुस्कराते  रहे

हम थे उनके सदा अब भी उनके रहे
बात उनकी है वो चाहे  जिनके  रहे
एक ही था ह्रदय उनको अर्पण किया
उनकी दृष्टि  में  ये चाहे तिनके रहे

मेरे गालों पे  उनके थे  चुम्बन  प्रथम
प्रेम को उनके माध्यम से समझे थे हम
प्रेम की शक्ति का पहला  आभास  था
प्रेम क्षण भर में दुःख कैसे कर देता कम

प्रेम का स्वाद हमने तो चख ही लिया
ये अलग  बात है  उसने  धोखा दिया
शुक्रिया शुक्रिया दिल से  निकले अभी
प्रेम के  सारे  पक्षों को   मैंने  जिया


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८     


  

रविवार, 3 मई 2020

सबका था अधिकार मुझ पर


सबका था अधिकार मुझ पर
मैं  तो  बस  कर्तव्य  था
खून मेरा पी करके तरल वे
सबके लिए  मैं  द्रव्य  था

बड़ा था सो कर्तव्य मेरा था
ना  उनका  कोई  कर्म था
स्वारथ सबसे बड़ा है रिश्ता
इतना  सा  बस  मर्म  था

इतना मर्म समझने में बस
उम्र  गयी  अच्छी  ख़ासी
चखने को तब चला जिंदगी
स्वाद  मिला बासी – बासी

बासी खा के भी चलना था
जीवन  की   मज़बूरी  थी
थोड़े – थोड़े गले  जा  रहे
ख़ुद से बढ़ रही  दूरी  थी

मुझसे मेरे मित्र सबका लो
अपने लिये  प्रथम  जीना
कहीं भरोसे किसी के रहना
अपने  कपड़े  खुद  सीना

करना पहला  प्रेम खुदी से
डरना तो  ख़ुद  से  डरना
अपनी शर्तों  पर जिए तो
होगा ख़ुशी - ख़ुशी  मरना


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

कुछ जीते हैं दुविधा में


कुछ जीते हैं दुविधा में
कुछ जीते हैं सुविधा में
हम शब्दों के सहचर हैं
हम जीते हैं अविधा में

कुछ जीते  सम्बंधों में
कुछ जीते अनुबंधों  में
हम गीतों के साधक हैं
जीते  हैं  तटबंधों  में

कुछ जीते हैं अपनों में
कुछ जीते हैं सपनों में
हम तो अक्षर के अनुगामी 
जीते शब्दों के मपनों में

कुछ जीते हैं  अहंकार में
कुछ जीते हैं अलंकार में
वागेश्वरी के अनुचर हैं हम
जीते  उनकी  टंकार में 


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com


शनिवार, 2 मई 2020

उम्मीदों का कवि


कल मेरे मित्र का फोन  आया
उसने लगभग सुबकते हुए कहा
तुम तो कवि हो !
हमेशा उम्मीदों और
प्यार की बात लिखते हो !
पता है इस विकट समय में
मेरी प्रेमिका ने मुझे धोखा दे दिया
वह मेरे ही एक परिचित पास चली गयी.
क्योंकि अब मेरे पास पैसे नहीं हैं.
मैं अकेले टूट रहा हूँ !
क्या तुम कोई उम्मीद के शब्द दे सकते हो !
मेरी आँखें भी डबडबाने को आ गईं.
क्योंकि मेरे पास भी पैसे नहीं थे.
और मेरी कविताओं को
सुनने वाली भी चली गयी थी.
पर अब वह मेरे साथ था.
अब न मैं अकेला था, न वो अकेला ;
दोनों टूटे जुड़ गये तो
उम्मीद के स्वर फूट पड़े.
मैंने कहा – तुम्हें वफा मिली ?
तुम्हें प्रेमिका मिली ?
नहीं ठहरी, चली गयी.
तो ये धोखा भी चला जायेगा.
फिर वफ़ा आयेगी, पैसा भी तो लौटता है.
पतझड़ की तरह बहार भी आती रहती है.
अबकी बार कोई ऐसी आयेगी,
जो तुमसे यूं ही मिलेगी !
उसे तुमसे प्यार होगा,
तुम्हारे लिए ही जियेगी और
तुम्हें इतना चाहेगी कि तुम
सब धोखे भूल जाओगे और
तुम्हारे लिए ही मर जायेगी.
तुम्हारे बीच तब कोई न आ सकेगा और
तुम मुझे भी भूल जाओगे और
मेरा दोस्त रोते-रोते हँस पड़ा और बोला-
तुम सचमुच उम्मीद के कवि हो !
और मैं खाली जेब में हाथ डालकर
मुस्कराते हुए बोला- अभी भी,
मेरे पास श्रोता है, तो प्रेम होगा ही !



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

शुक्रवार, 1 मई 2020

काले अक्षर,कविता और कवि


जब छोटा था, काले अक्षर अच्छे लगते थे !
किताबों में, श्यामपट पर, हमारी पाटियों पर,
काले अक्षरों से रोज–रोज मिलकर मोह हो गया.
अब और भी अच्छे लगते हैं काले अक्षर
श्यामपट और किताबों से उन्हें लेकर आया
अपनी उंगली की सहायता से गली की
धुल भरी माटी में, वहाँ से पलिहर खेत में
और चाक के सहारे अपने घर की दीवारों पर
और फिर बुला लाया अपनी हथेली पर
अपना नाम लिखने के बहाने  

इस तरह ले आया उन्हें अपने पास,
उनसे बतियाता और उनको बताता,
अपने बारे में-
जिन्हें जानता गया,
उनसे भी मिलवाता गया !
दूध, बछड़ा, मिठाई, घास
पत्ते, पेड़, बाग़, फूल, तितली, सरसों, बाऊ
अम्मा, कुर्ता, अंगोछा, काजल, लेमनचूस, तुलसीमाई
चाट, चोखा, भात, भगवान,घंटी नीम आदि से.
जो देखता वह हँसकर कहता- इसकी तरह
इसकी कवितायेँ भी मासूम हैं.

थोड़ी उमर बढ़ी तो दुनिया के साथ,
मैं भी शब्दों का तिकड़म करने लगा.
लोग देखते तो कहते-
अच्छी तुकबन्दी करने लगे हो !
मेरा परिचय इधर के सालों में बढ़ा था.
अब मैं मेला, बाज़ार, गुब्बारा, मूँगफली
गंगा जी, दीवाली, बाज़ार, साईकिल, समोसा
जूता, चश्मा, हिंदी, इतिहास, भूगोल, गणित, गेहूँ
गाय, बैल, रेडियों, टेलीविजन, गाना, गुल्ली डंडा, पड़ोसी, रिश्तेदार
मौसी, मामा, बुआ, और मित्र आदि को
शब्दों में लाने लगा था.
लोग देखते तो कहते- अब तुम्हें कुछ और लिखना चाहिए.

कुछ साल और बीते !
अब मैं लड़कियाँ, चाँद – चाँदनी, सूर्य, तारे, मौसम, सावन
प्रेम, आकर्षण, जवानी, मोटर साईकल,गोलगप्पे, जिलेबी, चाय
ओढ़नी, सिंचाई, खेत, मेड़, खाद, क्यारी, नहर, जिम्मेदारी,
बिजली, भाई-बहन, पैसा शौक, जरूरत, अपना-पराया, खलिहान,
कटाई, बुवाई, फावड़ा, हल, हँसिया, हरियाली, सूखा आदि
शब्दों के साथ चलने लगा था.
अब लोग कहने लगे थे – रास्ते पर आ रहे हो !

और फिर कुछ ही साल बाद मैं, सौन्दर्य, सिनेमा, मुस्कान, हँसी,
आकर्षण, मिलाप, नयन, अल्हड़, लोच, हिरनी, उड़ान, गुलाब
अधर, यौवन, बहकना, प्रेमिका, केश, घूमना, मटरगस्ती, आवारा
दुल्हन,बरात, बिदाई, सुहाग, गहना, समर्पण आदि शब्दों से
अक्सर भेंट करने लगा था.
लोग कहते अरे तुम तो ग़ज़ल जैसा लिखने लगे हो,
कोई कोई जानकार कहते अच्छा ख़याल लिखते हो,
कोई – कोई मुक्तक बताते, कहते जवानी में
यही सब लिखाता है.

फिर जल्दी ही कुछ अलग लोगों से भेंट हुई
घर-परिवार, जीवन-यापन, नौकरी, रोजगार, व्यवस्था, संचय
समाज, मान-अपमान, आशा-निराशा,कर्तव्य बोध, अधिकार
असफलता, संघर्ष, अवरोध, पत्नी, बच्चे, शिक्षा, अवसाद, भ्रम
प्रतिस्पर्धा, क्रोध, जलन, डर, साहस, दुत्कार, छल- कपट
आरोप, उलाहना, जीत- हार, स्वाभिमान, दिखावा, अन्धकार आदि से
अब लोग देखते तो खाते अच्छी कविता लिखते हो
समय के साथ उम्र बीतती गयी.

इस बीच कुछ ख़ास लोग मिले दुःख, संत्रास, गरीबी, घाव, राजनीति
गुट, क्षोभ, आडम्बर, मिथ्या, मिथक, धन,मोह, आभा, प्रतिष्ठा
सम्मान, विश्वासघात, हत्या, चोर, नैतिक, असभ्य, लूट, भ्रष्टाचार
बेबसी, भूख, धर्म, श्रद्धा, भक्ति, व्यवसाय, एकाकीपन, निंदा, आलोचना
टिप्पणी, समीक्षा, प्रशंसा, चाटुकारिता, वाद, परिवाद  स्वहित
और आखिर में मिला जनहित मैले कुचैले बदबूदार
फटे चीथड़ों में सहमा सा जनहित और फिर मैं दुखी
होकर इधर शब्दों से मिलना कम कर दिया.

अब लोग देखते हैं तो कहते हैं – अच्छी कविता लिखते हैं आप.
आप की कविताओं में जीवन की सूक्ष्म संवेदनाओं के अंकुर
सहज ही फूटते हैं. विपरीत परिस्थितियों में में भी
पीड़ा से सघन संवाद करती हैं आप की रचनायें
आप सचमुच महान कवि हैं.
जीवन के आख़िरी दौर में पहुँच कर

अब सोचता हूँ कवि और कविता तक पहुँचने में छल, कपट
पीड़ा, संत्रास, विश्वासघात, अपमान, अवरोध, निंदा से मिलना ही
यदि कवि होने की शर्त है तो काश मैं कवि न होता !
फिर सोचता हूँ, इसीलिये बहुत कम कवियों के नाम स्मृति में आते हैं,
बस यही समझने में पूरी उम्र निकल गयी, अब मैं बता सकता हूँ
पूरे विश्वास से कवि साधरण दिखते हुए असाधारण क्यों होता है ? 
   

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com