यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

भोलापन


भोलापन  भी  है   दुःखदायी
खेल को समझा  प्रेम मितायी
मतलब साध लिए जब मुझसे
तब  मेरी   औकात  दिखायी

सच  है  मेरा   गीत  नहीं है
दिखता है पर  मीत  नहीं  है
मजबूरी   में    मुस्काता  हूँ
आज का  सच अतीत नहीं है

कैसे  रोता   भरे   नगर  में
किसे  बताता  फंसा अधर में
नस-नस सूज गयी दुःख से तो
दुःख निकला बन गीत शहर में

सब   सोचे   मैं   गाता  हूँ
सबका   दिल   बहलाता  हूँ
जन क्या समझे स्वर में रोना
यूँ  अपने   दुःख  खाता  हूँ

विश्वासों  ने  ही  लूटा  था
तब जाकर  ये उर टूटा  था
देवी समझ  जिसे  पूजा था
उसने ही मेरा  घर लूटा था


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com        

  

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

व्यवस्था


एक तरफ लच्छेदार भाषण,
एक तरफ अटकती टूटी- फूटी बोली.
एक तरफ सलीकेदार वस्त्रों में सजे,
एक तरफ आधे बदन नंगे
मैले – कुचैले फटे कपड़ों में अधढँका बदन;
एक तरफ बड़ी-बड़ी घोषणाएं,
एक तरफ असंख्य छोटे-छोटे पेट;
एक तरफ संवेदना के प्रवचन
एक तरफ टिमटिमाती गीली आँखें,
एक तरफ स्वतंत्रता और
मूलभूत अधिकारों की बात,
एक तरफ जीवन की
भीख माँगते जुड़े हुए हाथ;
एक तरफ वातानुकूलित कक्षों से
संदेशों का सीधा प्रसारण,
एक तरफ नंगे पाँव
धूप में खड़े लोग !
एक तरफ राष्ट्र के विकास का
डंका पीटने वाले लोग,
एक तरफ रैन बसेरों में
भूख और ठण्ड से ठिठुरते लोग !
एक तरफ अट्टालिकाओं में
सुविधाओं से सजे विद्यालय
और उसमें तानाशाहों की संताने,
एक तरफ सरकारी विद्यालयों में
प्रतिदिन चलने वाले भंडारे में
खिचड़ी के लिए जाते गरीबों के बच्चे !
पुलिस ! केस की बात तो दूर
गरीब का आवेदन तक
ठीक से नहीं स्वीकारती, बल्कि
करती है उलटे सीधे दस सवाल !
और साहबों के लिए आधी रात को
खुल जाता है उच्चतम न्यायालय का द्वार
अगर यही व्यवस्था है
लोक के लिए महान व्यवस्था
तो निकृष्टतम क्या होगा ?
बस! विचारता हूँ !


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com        

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

मैं और मेरी लेखनी


हर दिन हर रचना के साथ
दाव पर लगती है मेरी लेखनी !
और मेरे अंतर्मन के
उदात्त ध्वनि की साख,
और मैं, जीत जाता हूँ.
हर रोज गर्व से भर जाता हूँ.
किन्तु, मेरी इस जीत के बदले
हार जाता हूँ बहुत कुछ !
जैसे- बच्चों की खुशियाँ,
पत्नी के श्रृंगार,
एक अदद छत,
और भी बहुत सारी
साधारण इच्छाएँ !
पास आकर उपहासात्मक हँसी
के साथ धीरे - धीरे
दूर चली जाती हैं.
यह सब एक क्षण में
मेरे चरणों के मोटे अंगूठे के
नख पर रख देंगे अपना मस्तक !
केवल उन्हें अपने अंतर्मन की
उदात्त ध्वनि और लेखनी का गर्व
सौंपने का, कर दूँ संकेत भर;
किन्तु, ऐसा होने पर
मैं हो जाऊँगा पराजित !
अपमान के साथ
पराजित होने से अच्छा
वीरता के साथ
संग्राम करते हुए
मृत्यु का वर्ण करना
अधिक सम्मान जनक होता है.
मरना तो कोई नहीं चाहता !
हाँ, किन्तु मृत्यु तो
सम्मान जनक ही होनी चाहिए.
और मैं इस वाक्य में
रखता हूँ पूर्ण निष्ठा !



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com  

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

तुम्हारे बारे में सोचा था


तुम्हारे बारे  में सोचा  था सुधर जाओगे
प्यार पाओगे तो पक्का है निखर जाओगे

इतना मजबूर तुम्हें देखा तो ये समझा मैं
आज जरूर  किसी  दोस्त के घर जाओगे

प्यार में हार के  कमाल  तुमने कर डाला
अब तो जीतोगे ही जाओगे जिधर जाओगे

प्रेम के प्यासे हो भटकोगे बहुत  भटकोगे
जाने कैसे कहाँ और कौन नगर  जाओगे



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gamail.com


भारत समर्थक


हाँ, मैं हर हाल में भारत का समर्थक हूँ.
और रहूँगा आख़िरी साँस तक,
मैं हर हाल में सरकार का समर्थक नहीं हूँ
तुम यदि हर हाल में सरकार के समर्थक हो
तो तुम भारत के अपने हो मुझे संशय है
इस बात पर तुम मेरी घोर निंदा कर सकते हो
मुझे कह सकते हो अपशब्द तक
फिर भी तुम्हारी असमतियों का सम्मान रखते हुए
अपनी बात पर अटल रहते हुए
बोलता रहूँगा-
तुम भारते के अपने हो मुझे संशय है ...


पवन तिवारी
संवाद- ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

खुशियाँ मिली जब भी


खुशियाँ मिली जब भी दोस्तों का साथ  था
मगर आगे  बढ़ने में  दुश्मनों का हाथ था
वे पग - पग पे  झूठ कहे  और छल किये
जिनके  सम्मान  का मैं माथा व नाथ था

चार  साथी  विपति  में परखिये कहे गये
धीरज  धरम  व मित्र  तीन तो सहे गये
किन्तु  एक  नारी  ने घाव ऐसा दे दिया
गंगा  में  जीवित  ही  शव  से बहे गये

किसी से भी प्रेम स्वयं से अधिक करो नहीं
दूसरे का भार भी निज माथे धरो  नहीं
हिय जो कहे सच्चा चुपचाप कर  जाओ
कौन क्या  कह  रहा उससे  डरो  नहीं

अर्थ के तले चरित्र और  भाव  घुट रहा
छल-कपट, धूर्त जहाँ  अर्थ वहाँ जुट रहा
अनाचार ना  सही  व्यवहारिक हो जाओ
जो जितना नैतिक है उतना वो लुट रहा



पवन तिवारी

संवाद – ७७१८०८०९७८

अणु डाक – poetpawan50@gmail.com     


उसे लगता है


उसे लगता है कि सज़ा दे रहा है
मगर आगे का  रास्ता दे रहा है

खड़ी करके दुश्वारियाँ  राह में वो
तज़ुर्बे का इक क़ाफ़िला दे रहा है

मज़म्मत करे मेरी क़ाबीलियत की
हुनर  को  मेरे हौंसला  दे रहा है

उसे क्या पता हों खुशी के भी आँसू
मुझे  मेरा  रोना  मज़ा  दे रहा है

उसकाना उसका भी अच्छा लगा है
मेरे  हौंसलों  को  हवा  दे रहा है

किया उसको मज़बूर छोड़े वो मुझको
समझता  है  वो कि दगा दे रहा है

इन्साफ की लाश सड़ने  को आयी
क़ातिल  पवन  फैसला  दे रहा है



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com


रविवार, 12 अप्रैल 2020

प्रकृति और मनुष्य


मनुष्य को विध्वंस अच्छा लगता है!
पेड़ काटना, तालाबों को पाटना,
हवा को जहरीला करना;
पर्वतों को ढहाना,
पशुओं, पक्षियों,जलचरों
तथा अन्य को भी
बंधक बनाना,
कारागार में रखना,आखेट करना,
और मन न भरे तो हत्या कर
उनका भक्षण कर जाना!
दूसरों का भाग सीमित करना;
पर अधिकार व स्वतंत्रता को
नष्ट करना,
मनुष्य को अच्छा लगता है.
वह अपनी कुटिल बुद्धि और युक्तियों
के दुरुपयोग पर करता है गर्व!
वह अपूर्व सुन्दरी, आभामयी,
सर्वशक्तिमान,सर्जक,सम्मोहक
वात्सल्य से पूर्ण प्रकति को
करना चाहता है अपने आधीन!
और रहता है प्रयासरत.
जैसे वृकासुर ( भस्मासुर )की कुदृष्टि
आदिशक्ति के प्रति थी.
हाँ, वह स्वयं कभी नहीं चाहता
होना प्रकृति के अनुकूल.
सम्बंध तो दूर
अनुबंध भी नहीं चाहता मनुष्य!
प्रकृति को समझता है इतना तुच्छ
जैसे कौरवों ने नहीं दिया था
पांडवों को पाँच गाँव!
बिना युद्ध के सुई के बराबर भूमि
ऐसा ही उद्घोष किया है
मनुष्य ने प्रकृति से
अपने मिथ्या अहंकार में;
ऐसे में युद्ध तो होना ही है !
कृष्ण के शांतिदूत बनकर आने पर !
पुनः दोहराया जाएगा इतिहास
मनुष्य करेगा बंधक बनाने का प्रयास
किन्तु अहंकारी मनुष्य का दुर्भाग्य
उसे पुनः कर देगा
दुर्योधन की तरह हतबुद्धि
ये महामारी वही कृष्ण है
जिसे बंधक बनाने के प्रयास की
प्रतिक्रया भर है.
अब युद्ध होना निश्चित है.
और युद्ध का परिणाम जो भी हो
किन्तु विनाश तो युद्ध का शाश्वत सत्य है.


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com