यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

नाउम्मीदियों के बीच


नाउम्मीदियों के बीच ही उम्मीद छुपी है
हो कर  शांत  सोचना  तकदीर छुपी है

राह जो तू मुश्किलों से भरा समझता रहा
उस राह में ही  जीत की शमशीर छुपी है

उसकी हँसी उड़ाता जो  हर वक़्त हँसे है
उस हँसी के पीछे  ही इक  पीर छुपी है

ज्यादा बुरा  नहीं  लगा ये  हारना तेरा
इस हार में देखा  हूँ  तेरी जीत छुपी हैं

ये हूक ये हिचकी ये दरद जो भी हो रहा
उसके लिए इन सब में तेरी प्रीत छुपी है

उसने तुझे छोड़ा तो ना मायूस हो पवन
तेरे उरूज़  की  वहीं  तदबीर  छुपी  है



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८      

प्रकृति के प्रताप को


प्रकृति के प्रताप को प्रकोप तुम समझ रहे
और निज  प्रकोप को  प्रताप  ही कहते रहे
शर्म किन्तु लेशमात्र  भी  तुम्हें आयी नहीं  
विकास का लगा के पट विनाश खेलते रहे

जिसने  दी  छाँव  तुम्हें   उसे    काटते   गये
जिसने  सच  बोला  उसी  को  डाँटते  गये
नदी नाले ताल झील जल के जो भी श्रोत थे
निज अहं  व स्वार्थ में उन्हीं को पाटते गये

जो  हमारे  गर्व  के  पहाड़  थे  ढहा  दिए
स्वास्थ्य के अरण्य श्रोत को भी तुम जला दिये
ये  गगन  जो  प्रेरणा व  हर्ष का प्रतीक था
उसको भी विषाक्त  धुंध  लेपकर मिटा दिये

नभ  जल  व धरती  को  त्रास दिए जा रहे
जिस प्रकृति ने है  पाला  उसको ही खा रहे
अब जो  सहनशीलता  जवाब उसकी दे रही
कोस  रहे  हो तिस  पर  हाय  मरे जा रहे

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com  




गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

ऐसे हालात में भी


ऐसे  हालात में  भी  तुम  सवाल करते हो
किस ज़माने के हो तुम आगे गाल करते हो

रह  करके   झूठों   में   बोलते  हो  सच
कैसे  आदमी  हो  ख़ुद पर ज़वाल करते हो

अपनों  ने एक  बार ही तो  चुप कराया है
एक सच के मरने  पे यूँ मलाल  करते हो

अपना घर  देके  फुटपाथ पे आ हँसते हो
क्या कहूँ कि बेवकूफ़ी या कमाल करते हो

जिनसे पहचान नहीं उनके  लिए लड़ते हो
आदमीयत ठीक पर इतना बवाल करते हो

पवन इस अदब ने तुमको बहुत सताया है
फिर भी मजलूमों को तुम जमाल करते हो



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50gmail.com    

रामसखा शिवशक्ति स्वरूपा



रामसखा   शिवशक्ति   स्वरूपा
गुण   गावहिं   तुम्हरे  सुरभूपा
जग   उद्धारक   शोक  निवारक
राम में  तुम्हरी  भक्ति  अनूपा

अनगिन काण्ड किये जनहित में
बस गये तुलसी दास के चित में
सुंदर  काण्ड  लिखे तुलसी  तब
भक्ति से गाये जन-जन छित में


सहज कृपालु  हैं  मारुति नन्दन
जा  पर  कृपा  करें  सो चन्दन
भक्ति  शक्ति  आरोग्य  प्रदाता
महावीर  का  जग  करे  वन्दन

अस्त्र  शस्त्र व  शास्त्र के ज्ञाता
राम  भजन  प्रभु  तुमको भाता
दीन दुखी  के तुम  हो  नायक
सब वर तुम्हरे  द्वार  से पाता

दो  विवेक  अज्ञान  को हर लो
अपनी भक्ति में  हमको वर लो
है सहस्त्र  वन्दन  प्रभु  तुमको
तुम्हरी शरण प्रभु बाँह ये धर लो

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

पहले मुझे लगा था


मैंने  किया वफ़ा तो  ये एहसान नहीं था !
वो निकली बेवफ़ा तो ये एहसान हो गया !!




पहले मुझे  लगा  था हाँ  मर ही  जाऊँगा
कुछ ही दिनों में हो न हो गुज़र ही जाऊँगा

फिर देखा  बेवफ़ाई  करके ख़ुश है वो बहुत
फिर सोचा हँसू क्यों दिखाऊं डर ही जाऊँगा

शौहर  को  कोसती  है  प्रेमी को  चूमती
अय्यारी सीख करके उस डगर ही  जाऊँगा

होकर  वो  खवातीन  गर  गुरुर  पाले है
हूँ मैं भी आदमी  कुछ तो कर ही जाऊँगा

घर से मेरे पहले बहुत कुछ और भी पड़ता
मयखाना भी पड़े है क्या मैं घर ही जाऊँगा

मुझसे किया निकाह मोहब्बत किसी से की
ये  खेल  खेलने  तेरे  शहर  ही  जाऊँगा

तुझसे किया था प्रेम तुझ पर ही मिटा था
अब कोई नहीं  मंजिल के दर ही जाऊँगा


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८  


मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

फूल के होंठ


फूल के होंठ याद करते हैं
बाग़ में सारे बात करते हैं

रातरानी भी चाहती तुझको  
रात  में  इंतज़ार  करते हैं

सब करें  इंतज़ार सूरज का
तेरी ख़ातिर वो रात करते हैं

इश्क में तू ही एक बन्दा है
जिसका सारा मलाल करते हैं

तेरी तहजीबो-अदा क़ातिल है
सारे तुझसे ही प्यार करते हैं

तेरी ख़ुशबू बदन के क्या कहने
तू जो गुज़रे  तो आह करते हैं

पवन जल-जल के मरे  जाते हैं
वो भी तुझसे  सलाह  करते हैं 


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८  



बचपन में सचमुच भोला था


बचपन में सचमुच भोला था
दीवाना  था  कुछ  के लिए
जिनके प्रति था स्नेह  भाव 
आवारा   था   उनके  लिए

थोड़ा  बड़ा  हुआ तो उमड़ा
रिश्तों के  प्रति  अपनापन
उनके दुःख से द्रवित हुआ तो
निज को लेकर चल दिया वन

कितने दिन ही भूख  प्यास से
वन वन निज को भटकाया था
था उसमें  भी  मिला हमें जो
यत्न से उन तक  पहुंचाया था

मजे में था मैं उनकी सोच से
अपना  तन   घबराया  था
अपनी  पीठ  ठोंकने खातिर
ब्याह में   मुझे  फंसाया था

अपनेपन  वाली  माया में
ऐसा कुछ  उलझाया  था
दुल्हन भी उनसे आगे थी
खुद का जाल बिछाया था

कुछ दिन तक तो ठीक रहा
फिर  दुल्हन  ने पैंतरे लिए
वन के  मोटे  आसामी  से
मिल यौवन के  मजे किये

आपस में कुछ टुनफुन हो गयी
भेद खुला तब रति  प्रसंग  का
मैं पति  होकर  खलनायक था
उनके  प्रेम   में   भंग   का

अपनी कहानी बस इतनी सी
बचपन  में   आवारा   था
यौवन में पत्नी   से  धोखा
अब  तो   मैं   बंजारा  था



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८   

संघर्ष और वेदना


जीवन के अधिकाँश मार्ग पर वेदना का उपहार मिला
साथ चले संघर्ष  सदा  ही  अपमानों  का हार मिला
छोटी - छोटी भी खुशियाँ  ना सहन हुई थी काल को
जो करीब अपने थे उनसे पग - पग दुर्व्यवहार मिला

जो भी मिला था संघर्षों से काल को धकियाया था तब
जग देखा पर  अपने  पूछते  कैसे किया बताओ कब
अपनों के अविश्वासों  ने ही  मुझसे मुझको छीना था
वरना हम भी शिखर पे होते प्रश्न पूछता ना कोई अब

मातु पिता भाई पत्नी तक हर अवसर पर मुझे छला
और  दिखाते  रहे  जगत  को  चाहें मेरा सदा भला
सबसे अधिक यही तड़पाये जीवन भर बस भ्रमित किया
बाकी रिश्तों पर क्या लिक्खूँ, सबमें एक से एक कला

जीवन को संग्राम था समझा और महाभारत  निकला
मरते-मरते भाग्य  भरोसे अक्सर  ही  मैं बढ़ा  पला
निष्ठा, दृढ़ता के अस्त्रों संग विषम मार्ग पर बढ़ा रहा
भीगा बहुत दुखों के जल से साहस था सो नहीं  गला

निकट लक्ष्य के पहुँचे तो फिर अपनों का ही प्रहार हुआ
एक आह गूँजी नभ  भर  में दुःख उनका  आहार हुआ
हुआ पराजित लगा उन्हें था  हो  प्रसन्न  मद में झूमें
घायल था पर बढ़ा लक्ष्य पर निकट पहुँच  संहार किया


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८  

रविवार, 5 अप्रैल 2020

मेरे प्राण ने


मेरे प्राण ने मेरे  प्राण पर  ऐसा अस्त्र  चलाया
अस्त्र दिया था परम मित्र ने सुनकर धैर्य गंवाया
दोनों  मिल यूँ रूप  दिखाये तन की साधना का
प्राण हुए  भय से उड़ने को उर कम्पित घबराया

हिय से निकल प्रेम तब भागा फिसला बिखर गया
जिससे  प्रेम   वही  हत्यारा  देखा  अखर  गया
मूर्छित होकर गिरा  धरा पर  प्राण फँसा ग्रीवा पर
कातर नयनों से नीर ढले  यूँ  जैसे था  खर गया

कोई  अभिलाषा, अपेक्षा  जैसा  कोई  दुराव न था
रिश्ते में कोई दाग पुराना,पहले का कोई घाव न था
हाँ, निष्ठा का एक भाव  गहरे तल में चुप बैठा था
उसकी भी यूँ हत्या होगी आया कभी ये भाव न था

प्रेम में निष्ठा की हत्या ने मन की हत्या  कर डाली
हिय की गोद एक क्षण में ही नयन नीर से भर डाली
ग्रीवा में हैं प्राण सिसकते, मुक्ति, मुक्ति की नाद से
पावन  भावों  को  वासना  की चक्की  से दर डाली

मृत्यु से संघर्षरत जीवित बचने की आशा में ... यह रचना



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८




गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

जिसको वर्षों से चाहा था


जिसको वर्षों से चाहा था मैनें वह ही मेरी  डगर आ रहा है
दिल उछलने लगा है अभी से वो जो आता नज़र आ रहा है

चाह दिल से निकलती  अगर है चाह खुद ही चली आती है
जो बलन्दी लिए हसरतों में उनके घर तक सफ़र आ रहा है

ये पसीने  सजे हैं  जो  माथे  मेरे  मेहनत  के  हैं ताज़ सारे
इनको कहना महज मत पसीना इनसे महलों का डर आ रहा है

आके चौराहों पे सारे रिश्ते  अपने मतलब  की गाड़ी है ढूंढें
रिश्तेदारों की अटकी हैं सांसे सुन के रिश्ता नगर आ रहा है

मारने के लिए  जिसको  उसने  पवन  सौ पैंतरें आजमाये
लोगों को सामने देखकर करके बोला मेरा जिगर आ रहा है




पवन तिवारी
सम्वाद – ७७१८०८०९७८