यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

गुरुवार, 26 मार्च 2020

घास छीलना



 जीवन भर घास छीलने का मुहावरा
सहज भाव में न्यूनता का,
विकास में स्थायी अवरोध
और व्यंग्यात्मक उपहास
और अपमान का
थोपता है बोध !
किन्तु ,अगर वो देखे
जिसके पास हो समझ,
कला और दृष्टि !
वह घास छीलने को
सिद्ध कर सकता है महान कर्म !
क्योंकि प्रत्येक कार्य में
कला का अदृश्य किन्तु,
शसक्त पक्ष उपस्थित होता है.
अब्राहम लिंकन ने भी छीली थी घास !
जिसे घास छीलने में, उसके
कला पक्ष का है ज्ञान ;
वह घास सतत छीलता है
किन्तु, उसमें मिट्टी आती नहीं
ज़रा भी उठकर!
किन्तु कलाहीन जब
छीलने जाता है वही घास !
घास से अधिक खोद देता है मिट्टी,
और काट लेता है कभी उंगलियाँ भी.
फिर खुरपी पर, कभी खुद पर,
होता है खिन्न
क्योंकि घास छीलना
कला है, न्यूनता नहीं,
बात तो मात्र दृष्टि की.

पवन तिवारी
सम्पर्क – ७७१८०८०९७८



सोमवार, 23 मार्च 2020

संघर्षों का तुमुलनाद


संघर्षों   का   तुमुलनाद  कर
अरि के अन्तस् में खल जाओ
अनल अनिल को मिलने मत दो
खींच के उनको जल पर लाओ

एक  नहीं   असंख्य  चाहिए
आओ  सारे  मिलकर  आओ
अपने हिय ही प्राण शक्ति से
अनहद  जैसी  नाद  लगाओ

न्यौछावर का प्राण  ले लो तुम
संघर्षों   को   बल   देना  है
मिथ्या  को  रौंदते  चलो तुम
सत्य को जीत का फल देना है

नव शोणित तुम ही भविष्य हो
सर्वश्रेष्ठ  तुम्हें   हल  देना है
रचो कि  ऐसा गर्व  हो सबको
राष्ट्र  को सुन्दर कल  देना है

शिशु किशोर से युवा आयु तक
नव  प्रवाह  चेतन  भरना  है
बाहु  ज्ञान  का संगम कर दो
असम्भव   संभव   करना  है

सोचो मत निर्णय का काल है
धमनी  में  संचार  बढ़ा  दो
काल यही उपयुक्त समझ कर
अभी  नवल इतिहास गढ़ा हो


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८

शनिवार, 21 मार्च 2020

लेखक की शक्ल




आप बस पाठक हैं !
सुधी पाठक हैं !
तब तो आप
अवश्य जानते होंगे !
लेखक की दो शक्लें होती हैं ;
जरासंध के जैसी,
आधी शक्ल उसका लेखन,
आधी शक्ल उसका जीवन,
क्या आप ने उसकी
दोनों शक्लें देखी हैं ?
यदि दोनों शक्लें मिलती हैं तो
हाँ, वह एक सच्चा लेखक है.
हाँ, महान होना न होना समय तय करता है.
पर एक सुधी पाठक के रूप में
आप, यह अवश्य तय कर सकते हैं.
कि आप पढ़ रहे हैं.
एक सच्चे या झूठे लेखक को,
आप के काल के लेखकों को
पढ़ने के साथ उससे जीवन में
मिलना भी अवश्य चाहिए.
ताकि आप सच्चे और सुधी पाठक
होने का संतोष पा सकें.
और जिसे आप पढ़ रहे हैं
उसे पूरा पढ़ सकें.
लेखक और उसका लेखन
मिलकर ही एक लेखक का
सही चित्र उकेर सकते हैं.
अगर नहीं उकेरते तो
वह सच्चा लेखक नहीं.
हाँ, महान बनाना या न बनाना
तो समय के साथ में है.
यदि लेखक के लेखन
और उसके जीवन में
कोई साम्य नहीं है तो
वह लेखक है, किन्तु
बहुरुपिया लेखक !
लेखक ( सच्चा लेखक)
कभी बहुरुपिया नहीं होता.
मुझे लगता है,
अब मुझे चुप हो जाना चाहिए !
और आप को विचार हेतु
छोड़ देना चाहिए अकेला, ताकि
आप एक पाठक के रूप में
तय कर सकें कि आप ने
कितने सच्चे लेखकों को पढ़ा है या
जानते हैं !
या लेखक मिले ही नहीं,
बहुरूपिये मिले !
यदि आप एक अदद लेखक को
अब भी खोज रहे हैं तो
मैं आप को एक पता लिखवा सकता हूँ.

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८ 

अणुडाक - poetpawan50@gmail.com  

  
  

मंगलवार, 17 मार्च 2020

सबके अपने अपने सपने


सबके अपने  अपने  सपने
जितनी जरूरत उतने अपने
संबन्धों  को  नाप  रहे  हैं
स्वारथ के अनुसार हैं अपने

सबको  नाम  प्रशंसा  चाहिए
जगह–जगह अनुशंसा  चाहिए
खुद के जय की चिंता सबको
व्यक्ति भी सबको शंसा चाहिए

सबके  लम्बे   हाथ  चाहिए
एक नहीं कई  नाथ  चाहिए
प्रतिभा पर विश्वास रहा रहा
षड्यंत्रों  का   साथ  चाहिए

चारों तरफ है  आपा  धापी
खुद ही जाँचे  अपनी कापी
किसे  कहें  सच्चा या झूठा
थोड़े  बहुत  सभी हैं  पापी

शब्दों में भी विकार आ गया
कविता में  बाज़ार आ गया
ऐसे में जग  से  क्या आशा
भ्रष्टों में  पत्रकार  आ गया



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८


रविवार, 15 मार्च 2020

बेटियाँ


बेटियाँ,  बिटियाँ,   बेटियाँ,  बेटियाँ
प्रेम  से  हैं  खिलाती  यही रोटियाँ

इनसे ही  रक्षाबंधन  का  त्योहार है
इनसे ही प्रेम का जग में व्यवहार है
दो कुलों की यही बनती हैं ज्योंतियाँ
बेटियाँ,  बिटियाँ,  बेटियाँ,  बेटियाँ

प्रेमिकायें  यही, ये  ही हैं  पत्नियाँ
ये ही माँ हैं, यही  प्यारी  मौसियाँ
सारे रिश्तों की बुनती यही आशियाँ
बेटियाँ,  बिटियाँ,  बेटियाँ,  बेटियाँ

प्रेम की भूखी हैं, उसमें खो जाती हैं
जिसके घर जाती हैं उसकी जाती हैं
ये ही हैं जो  नहीं मानती  जातियाँ
बेटियाँ,  बिटियाँ,  बेटियाँ,  बेटियाँ

सारी इज्ज़त का ठेका इन्हें ही मिला
कोई ग़लती  करे  भोगें ये ही सिला
सारे रिश्तों की इनपे सिंकी  रोटियाँ
बेटियाँ,   बिटियाँ,  बेटियाँ, बेटियाँ



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८


गुरुवार, 12 मार्च 2020

बम्मई में जाके सइयां - अवधी गीत


बम्मई में जाके  सइयां  रिक्सा चलावै न
किसिम-किसिम के औरत वहमें घुमावैं न
जहियो हम फून लगाई वनसे बतियावै के
किसिम-किसिम के हमसे बहाना बनावैं न

अब त दुई - दुई साल  घरहूँ न आवै न
पुछले पे झंझट  अउर  करजा बतावै न
पहिले त सालि भर में कइयो बार आवें ऊ
टिकट नाही मिलले  कै बहाना लगावै न

सुनले में आयल हउवै चक्कर चलावै न
कवनो  ऊ गोर  मेम के खूबै घुमावै न
हम तनकी साँवर बाटी बाकी त सुन्नर हो
हमरो पीछे बहुत जने चक्कर लगावै न

अबकी जौ  साफ़-साफ़  नाहीं बतइहैं हो
साल भर में दुई बार घर नाहीं अइहैं हो
तिरिया  चरित्तर तब  हमहू देखाइब हो
हमरो कहानी टोला भरि मिलि सुनइहैं हो



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८  

मंगलवार, 10 मार्च 2020

सबसे बड़ा दुःख ?




कई बार ऐसी स्थिति बनती है कि
दुःख को व्यक्त करने में ही
इतना दुःख होता है कि,
गले में अटक जाता है.
और अक्सर,
जीवन भर अटका रहता है.
पता है, जीवन भर ! 
दुःख की खरास रहती है.
जीवन भर ज़ुबान
लड़खड़ाती रहती है,
और आँखें डबडबायी ;
और वो कहता है-
कुछ नहीं हुआ, सब ठीक है !
क्या यह कहना ही सबसे बड़ा दुःख ?

कई बार दुःख को
न व्यक्त करने
में भी सुख होता है.
क्योंकि व्यक्त करने पर
वह दुःख और बढ़ जाता है.
और न व्यक्त करने से
कम दुःख होता है.
ऐसे में वो ‘कम’ दुख ही सुख है.
यदा कदा दुःख का अभिनय करना सुख,
यदा कदा दुःख देता है.
कई बार दुखी दिखना भी
दुःख देता है.
क्या यह सबसे बड़ा दुःख नहीं ?

कई बार दुखी देखना अच्छा लगता है.
और कई बार बुरा भी,
कई बार दुःख प्रकट करना भी
दुःख देता है.
तो क्या सबसे बड़ा दुःख यह है ?

आप ने ओढ़ा हुआ दुःख देखा है ?
यह कई बार जोंक बन जाता है
उसके बाद का दुःख
क्या सबसे बड़ा दुःख नहीं होता ?

एक निराला दुःख होता है
जो दूसरों की खुशियाँ देखने से
उत्पन्न होता है.
कई बार उन खुशियों के
मिटाने के प्रयास में
अपना दुःख और बढ़ जाता है
तब क्या वह ?
सबसे बड़ा दुःख नहीं होता ?    


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८