यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

स्वच्छता का हमें ध्यान रहे- सवैया


स्वच्छता का हमें ध्यान रहे अरु संस्कृति का अभिमान रहे
चारो तरफ हम ही हम हैं  नहीं अन्य का भी  सम्मान रहे
निज सम अन्य की  भाषा परम्परा  धर्म का पूरा मान रहे
राष्ट्र की यह भी सेवा  ही सम राष्ट्र पे अपने गुमान  रहे

हम क्या हैं इतिहास  हमारा  इसका भी आभास रहे जी
बलिदानी वीरों की  स्मृति  उर में सुरक्षित ख़ास रहे जी
सब भावों में  सेवा ऊपर  मन  भारत  का दास रहे जी
सर्वोपरि हो राष्ट्र सदा ही  हिय  के तिरंगा पास रहे जी


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८



शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

सही पथ




कभी-कभी संतोष के साथ
थोड़ा - थोड़ा, रुक – रुक,
वो कभी-कभी उस दिन आता;
जब अकेले में होता हूँ.

या भीड़ में भी अकेले
हो रहा होता हूँ.
और अपने अंदर
देखने लगता हूँ.
अपनी ही दृष्टि को और फिर
वो दिखाती है कुछ विरल

जब दूसरों की आँखों की
पुतलियों के भीतर
गड़ने लगता हूँ;
और वे डबडबा कर
हो जाती हैं लाल,

जब कुछ आँखों में
खटक रहा होता हूँ और
किन्हीं में तो
अटक ही जाता हूँ.
तब डरता नहीं हूँ.
परेशान भी नहीं होता;
भर जाता हूँ आत्मविश्वास से,
ज्वार की तरह.

बढ़ने लगती है ऊर्जा
साधारण सा, गेहुँए रंग का;
थोड़ा मटमैले सा,
जरा खुरदुरा भी
मेरा गोल मटोल चेहरा
चमक उठता है.

हृदय में विश्वास का
स्वर उभरने लगता है,
शरीर की भाषा भी
बदल जाती है, देखते-देखते.
आभार प्रकट करने की
दृष्टि से देखता हूँ;
अपनी विरल दृष्टि को;

मुस्काते हुए
अपनी पीठ को
अपने ही हाथों ठोंक कर,
शाबासी देने की
असफल कोशिश करते हुए
कदम तेज हो जाते हैं.
क्योंकि उन्हें आभास हो जाता है कि
वे सही पथ पर हैं.

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८     



  

   

मान लिया मैं मर जाऊँगा


मान लिया मैं मर  जाऊँगा
फिर भी ज़िंदा रह  जाऊँगा
तेरे अधरों  से ही  सही मैं
मेरे     गीत    सुनाऊँगा

मैं मर  कर भी  अमर रहूँगा
अपना किस्सा खुद ही कहूँगा
मेरे गीत  कहानी  जब  तक
तब तक  कैसे  भला  मरुंगा

गीतों पर मेरे  कितने ही झूमेंगे
जाने कितने  गोल-गोल ही घूमेंगे
मेरे गीतों को सुन करके मस्ती में
प्रिय के नाजुक हाथों को बस चूमेंगे

मेरे  दर्द  जमाने  को  खुशियाँ देंगे
ढल करके गीतों में  गलबहियाँ देंगे
गर हों मेरे दर्द खिलौनें जग भर के
इससे खुशी क्या जग भर को खुशियाँ देंगे


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८  

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

आओ गाय के उर को टटोलें


आओ गाय के उर को टटोलें
पौधे भी कुछ  दिल की बोलें
पानी का भी  हाल  जान लें
आओ  जंगल – जंगल  डोलें

हवा  बहुत  ही  परेशान  है
तभी   आदमी    हैरान  है
हो प्रकृति का समाधान यदि
तभी सुरक्षित सबकी जान है  

गुमशुम  पर्वत   बेचारा  है
अन्न  रसायन  का मारा है
देसी  को  ऐसे   धकियाया
गोबर  दर - दर का मारा है

सारे  बदन में  जहर  घुल गया
उन्नति का जी नक़ाब खुल गया
जिस  देसी   को  थे  गरियाते
वही जीवन का बन ही पुल गया

पश्चिम देख के  भोग लिया
बड़ा  पछताए  जोग  लिया
पूरब देखे  मस्त  हुए  तब
पूरब का जब  योग  लिया

सूरज  पूरब  में  उगता है
पश्चिम में चुपके भगता है
पूरब तुम खुद को पहचानों
तुमसे सुंदर  जग लगता है

पूरब का  सूरज  है भारत
युगों युगों से है ये कार्यरत
प्रेम सिखाता है सहिष्णु ये
यह गंगा सा सबको तारत

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८    

सारे जतन


सारा  जतन  मुझे  करना है
तड़प है बस तुमसे मिलना है
मैं ही  केवल  प्रेम में पागल
या तुम्हें  भी सूली  चढ़ना है

आग  यहाँ  पर लगी  हुई है
क्या तुम में भी  जगी हुई है
ऐसा  कभी विचार  न लाना
क्या दिल से कुछ ठगी हुई है

जब से दूर हुआ उर  से  उर
हिय में बहे हवा झुर झुर झुर
बिछुड़न का आनन्द अलग है
उखड़े मन तो  बोले चुर  चुर

इस दुःख में  आनन्द  बड़ा है
सच्चा प्रेम सो तन के खड़ा है
अबकी मिले तो  मिल जायेंगे
देख  रहे  सब  प्रेम  अड़ा है

तुम विश्वास  बनाए  रखना
प्रेम का दीप  जलाए  रखना
अधिंयारे  सब  जल  जायेंगे
हौंसला सर पे उठाये  रखना

साथ  साथ  हमको  जीना है
बैरी  जाने   क्या   मरना है
प्रेम तो प्रभु का प्रिय स्वरुप है
अपना  ध्येय  प्रेम  करना है


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८   

अपनी मर्जी से जीने के मोल चुकाने होंगे


अपनी  मर्जी  से  जीने  के मोल  चुकाने होंगे
अपनों  से  मिलने  वाले भी घाव  भुलाने होंगे
अपनी शर्तों पर जीना आसान कभी भी रहा नहीं
हँस – हँस  क र संघर्षों के हर  भार उठाने होंगे

अपने रिश्ते अपने को ही बढ़ के बचाने होंगे
पीड़ा में भी मुस्काकर हमें गीत सुनाने होंगे
कितनी परीक्षाएँ कब कैसे और किसे देनी पड़ जाय
ऐसे में अपमानों वाले सारे घूँट जलाने होंगे

कई बार इक तरफा ही रिश्ते  तुम्हें  निभाने होंगे
खुद को ही खुद नैतिकता के सारे पाठ पढ़ाने होंगे
भाई - बहन  और  भी  रिश्ते  तोड़  के  जायेंगे
ऐसे भी हालात बनेंगे तुमको  कदम  बढ़ाने  होंगे

जिद के साथ धैर्य व साहस वाले अस्त्र जुटाने होंगें
अपनी जरूरतों के गुल्लक  थोड़े बहुत घटाने  होंगे
ऐसे में मधुमास को चल के पास तुम्हारे आना होगा
गरिमा आ जाने पर निज से निज के शीश झुकाने होंगे

जाने  कितने  लोग  तुम्हारे  पैताने  सिरहाने होंगे
तुम पर मिटने वाले अनगिन हँसते हुए परवाने होंगे
दोनों हाथ  उठाकर  जग अभिवादन  करने आएगा
ऐसे क्षण में भी  बैरी के दुःख  तुमको सहलाने होंगे

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८      

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

सोचना !


सोचना !
सोचकर करते जाना,
या करते जाना विचारते हुए;
जीवन है.
मात्र विचारना या
मात्र करते जाना,
विचार के बिना,
हो सकता है घातक;
सम्पूर्णता में,
कोमल जीवन के लिए.

कर्ता,क्रिया,कर्म के
समन्वय से भी,
कई बार नहीं मिलती
जीवन को गति;
बिना ध्येय !

व्यस्त जीवन
बड़ा जीवन
हो सकता है छुद्र
सार्थक जीवन के सम्मुख


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८ 

हैं गीत के राज कुमार- नकटा


हैं गीत के राज कुमार गवावैं मोरे सइयाँ
जी सुबह सुबह दरबार लगावैं मोरे सइयाँ

हम दुल्हिन नयी नवेली
यनकै  घर  भूत हवेली 
हम कइसे करी यन्हें प्यार
सतावैं   मोरे   सइयाँ
ई भूतन कै सरदार सतावैं मोरे सइयाँ

हम बार – बार  गोहराई
अइसन जिनि हमैं कराई
पर सुनै न  मोर  हजार
नचावैं    मोरे   सइयाँ
हैं नचनियों के यार नचावैं मोरे सइयाँ

दिनवों  में  खूबै   घूमैं
अउ राति में पी के झूमैं
ई कइसन  मर्द  हमार
गवावैं    मोरे   सइयाँ
अरे दारू पी के यार गवावैं मोरे सइयाँ

ई खुद त हवैं बताशा
औ हमसे राखैं आशा
ऊपर से करैं तकरार
फंसावैं  मोरे  सइयाँ
ई रोज मचावैं रार फंसावैं मोरे सइयाँ

सासू  कै  बड़ा  दुलारा
ननदी के आँख क तारा
झूठै  खायें  मोसे  खार
रिझावें   मोरे   सइयाँ
ई अभिनय से हर बार रिझावें मोरे सइयाँ

ई हचकि भचकि के नाचैं
सीसा में  खुदि  के जाँचैं
हम  काव  करी  सिंगार
चिढावें    मोरे    सइयाँ
ई नेटुवन के हैं यार चिढ़ावें मोरे सइयाँ

जी लम्बा लम्बा घूँघट
कइसे चली हम झटपट
वहपे  कहैं  चला झार
खिझावैं   मोरे  सइयाँ
ई मरद हैं लम्बरदार खिझावैं मोरे सइयाँ

ई मीठ-मीठ बतियावैं
यन्हैं सबही  गरियावैं
ई गाँव भरे कै  सार
कहावैं  मोरे  सइयाँ
ई मेहरा बरखुर्दार कहावैं  मोरे  सइयाँ

देवरू कै सकलि है बानर
देखैं  नै  जइसे  आन्हर
हम  कइसे  करी  दुलार
बतावैं    मोरे    सइयाँ
जी सगरो दोस हमार बतावैं मोरे सइयाँ

जब देखा मारा – मारी
औ बाति–बाति पे गारी
 लंठन  कै  सरदार
थुकावैं   मोरे   सइयाँ
ई देखै ना घर द्वार थुकावैं मोरे सइयाँ

ई नौकर  हैं  सरकारी
‘यस सर’ कै है बीमारी
घरहूँ  में इहै  ब्यवहार
करावैं   मोरे   सइयाँ
मनमानी ही सब कार  करावैं मोरे सइयाँ

जेही मिलै तेहि तारैं
बहिनियों पे रंग डारैं
जी बिगड़ा हुआ भतार
कहावैं  मोरे   सइयाँ
ई सोहदा दंतचियार कहावैं मोरे सइयाँ



पवन तिवारी

संवाद – ७७१८०८०९७८