यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

मेरा दिल गाँव जा रहा है




खेत और खलिहान
ऊसर और मकान
मंदिर, कुआँ, जुआठा
जाँत में पिसता आटा
सरसों के फूल
बच्चे उड़ाते धूल
टायर का खेल
गुल्ली डंडा का मेल
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है


बंदरिया की नाच
अलाव की आँच
गुड़ का चाटना
मेड़ का पाटना
बैलों को हाँकना
बारात में नाचना
नदी में कूदना
रस्सी से फाँदना
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है


चोरी से बेर तोड़ना
बात बात पर बाँह मोड़ना
ढेले से मारना
गाली से तारना
कल्लू के खेत से गाजर चुराना
छुपकर के कोने में बताशा खाना
शाम को बाबूजी का लेमनचूस लाना
अम्मा का जाँते पर लोकगीत गाना
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है



आठ आने का पलटू से चाट मँगाना
दोस्तों के पैसे से समोसे खाना
दोस्त की कोट पहन शादी में जाना
गुमटी से पान अम्मा के लिए लाना
पढ़ाई के लिए बाबूजी का चिल्लाना
घूमने के लिए पिछवारे दोस्तों का आना
हारने पर खेल छोड़ कर भाग जाना
अपनी पारी खेलकर जरूरी काम बताना
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


मकर संक्रांति पर डुबकी लगाना
सरयू जी में जाकर खिचड़ी चढ़ाना
बाबूजी का गरम गरम जलेबी खिलाना
हाथ पसारे पीछे से माली का आना
पंडित जी ज्यादा नहीं दे दो चार आना
कहाँ रोज-रोज है संक्रांति का आना
पंडा  की कंघी से बाल घुमाना
पंडा जी का प्यार से टीका लगाना
याद आ रहा है
दिल मेरा गाँव जा रहा है


दूसरे के खेतों से गन्ना चुराना
खेत में खोज-खोज टमाटर का खाना
तरबूजे वाले को जोर से चिल्लाना
तरबूजे वाले चाचा जरा इधर आना
गेहूँ के बदले में दे दो तरबूजा
बोलो तो दे दूँ अनाज कोई दूजा
बाइस्कोप वाले का तमाशा दिखाना
गली गली में घूम के आवाज लगाना
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


ढलान पर साइकिल दौड़कर चढ़ना
गलती करके दोष सारा दीदी पर मढ़ना
मलाई सहित दही की खातिर अम्मा से जिद करना
गुस्सा होने जाने पर पेड़ पर चढ़ना
अम्मा का मनाना
कहना दूध भात खाना
आ जाओ नीचे मामा के यहाँ जाना
मेरा खुश हो के पेड़ से नीचे उतर आना
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


क्या क्या बताऊँ
कहाँ- कहाँ जाऊँ
एक एक दृश्य सब नाच रहा है
याद आ रहा है
मेरा दिल गाँव जा रहा है


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

रविवार, 23 दिसंबर 2018

वो हमें देखे तो प्यार होने लगा


वो  हमें  देखे  तो   प्यार   होने  लगा
समझे   हमको  तो   बाज़ार  होने लगा

एक  दिन  फायदा  हो  गया  रिश्ते  से
फिर तो रिश्तों  का कारोबार  होने  लगा

सजा होनी थी पर  तालियाँ  मिल गयी
वही फिर  उनसे  बार - बार होने लगा

घर की  ख़ुशबू जो बाहर गली तक गया
घर  की  चौखट  पे  दरबार  होने लगा

बा   कमाल  ही  है  ये  रईसी  रकम
वो  जो जलती थी  इजहार  होने  लगे

ये  मोहब्बत  बीमारी  ग़जब   साहिबों
दुश्मनों  से  उन्हें  प्यार   होने  लगा

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

अपनों की चर्चा


अपनों  की चर्चा जब की जाने लगी
मुझको बस आप की याद आने लगी

क्या बताऊँ मोहब्बत में होता है क्या
बिछड़े जब से सनम जान जाने लगी

जब  से  है  ये कहा प्रेम उनसे नहीं
रात  दिन  याद  उनकी सताने लगी

जब  से  मैंने  कहा प्रेम तुमसे प्रिये
हर  घड़ी  मुझको वो आजमाने लगी

दोस्तों  की  वफ़ा पर जो चर्चा उठी
दोस्ती  सुन कर ये कंपकंपाने लगी

जब से खुद से कहा पवन मगरूर हूँ
मेरी  तस्वीर  मुझको  डराने  लगी


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

जिसे है स्वार्थ वो चल करके आयेगा ही


जिसे स्वार्थ  चल  कर वो आयेगा ही
दुश्मन तो बार – बार  आजमायेगा ही

आयेगा बिन बुलाये जिसे प्रेम है तुमसे
खुदगर्ज़ काम  निकलने पर जायेगा ही

बर्बाद होना दिखावे में भी लाजमी ही है
जब सांड़  पालोगे  तो  खेत खायेगा ही

जैसा  रहे साथी  वैसा  ही  हो अंजाम
गर  बैल  सवारी  तो   गिराएगा  ही

दिखता स्वभाव सबका है वक्त आने पर  
संगीत  सुन कर गायक गुनगुनाएगा ही

कुछ  भी  करे  कोई  बेकार  नहीं कुछ
देर  भले  कर्म  का  फल  पायेगा  ही

अच्छे पे जो देता है यूँ शाबाशी ढेर सी
गर  करोगे  गलत  तो  सुनाएगा  ही

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com  

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

प्रेम में जो भी हैं जितने समीप हैं


प्रेम  में जो भी हैं जितने समीप हैं
सब  प्रेम  पुंज  हैं  सब प्रेम दीप हैं
राग के पूजकों को कहें भी तो क्या
मोतियों  से  भरे   हुए प्रेम  सीप हैं

जाति और वर्ण में ये तो अपवाद हैं
प्रेम  के  श्लोक  के सुघर अनुवाद हैं
सच्ची  मानवता  के हैं द्योतक यही
बैर , इर्ष्या  के  ये सच्चे प्रतिवाद हैं

वंश  के  बैर  को  प्रेम   ने  मारा  है
घृणा  को  प्रेम  के  पुण्य  ने तारा है
प्रेम के मन्त्र को याद जिसने किया
उसकी मुट्ठी में तो फिर जग सारा है

इसलिए  प्रेम  पथ  का करें  अनुसरण
प्रेम  के  दीप  का  हम करें अनुकरण
सारे दुःख सुख में खुद ही बदल जायेंगे
आओ  मिलकर चलें प्रेम की हम शरण

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

सज धज के चल दिया था मैं


सज धज के चल दिया था मैं  
टूट - फूट के लौटा मैं
मुस्काते - मुस्काते गया था
लौटा बुझा उदास था मैं


खुली आँख से देख के सपने
मिलूँगा आज रहेंगे अपने
इसी सोच में उड़ा ही था कि
गिरा धड़ाम जो मारा उसने


दाहिना बाजू खूब चिल्लाया
दाहिना पैर भी था मिमियाया
होंठ भी काँप उठा पीड़ा से
आँखों में भी जल भर आया


किया फोन मित्र तब आये
तत्क्षण अस्पताल पहुँचाये
हुआ क्ष-किरण दाहिना बाजू
सूचना पाकर डॉक्टर आये


पट्टी लगी हुई दवाई
चीखा याद आ गई माई
दर्द में भी हँसने का आदी
आ गई हंसी जो सुई लगाई


मित्र ने ही फिर रकम चुकायी
होइहैं वहीं राम जो भायी
अपनी सोच,सोच ही रह गयी
विधना चाह तुरत होई जायी

घर आए पत्नी बौरायी
सब दुःख कांहें तुम पर आयी
यही रह गया था बस बाकी
भरी आँख आ गई रुलाई


हँसकर उसको मैं दुलराया  
अच्छा हुआ जो संकट आया
थोड़े ही निपट गया है
तेरा बुद्धू लौट जो आया        [ दुर्घटना में घायल होने के बाद लिखी गयी कविता १६/१२/२०१८ ]


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक – poetpawan50@gmail.com

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

हम जो जीते हैं


हम जो जीते हैं हम ही जाने हैं
लोग  अपने  सुहाना  जाने हैं
कितने  कैसे  कहाँ  से टूटे हैं
हँसे हैं हम पर सच जो जाने हैं

हर  घड़ी  पर  सवाल आया है
एक  सुलझा  तो दूजा आया है
दुखों  के  प्रश्न  आए हैं इतने
भूला सब, गया , कौन आया है

कहने को अपना मगर संगदिल है
फिर भी लगता है पास मंजिल है
यह जो साहस  का हुनर पाया है
गम में भी रखे जो  जिंदादिल है

हर  कोई  अपना अपना देख रहा
सबको शक की नजर से देख रहा
कोई  शक की दवा  न है जग में
यही  जो  दुख के बीज बो है रहा

कहो ना दुख यूँ ही सुनते जाओ
बने  जो  भी  उसे करते जाओ
बात  बन जाएगी करते - करते
कर्म  की  राह  पर बढ़ते जाओ

नहीं  बेबात   रोना - धोना
भर दो साहस बस कोना कोना
जिंदगी लौट  के करके आएगी
करेगी फिर तुम्हें चोना – मोना


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८
अणु डाक- poetpawan50@gmail.com