यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शनिवार, 20 जनवरी 2018

अर्थ और सम्मान

क्या कहूँ सम्मान का अपमान का
जय,पराजय और आत्मसम्मान का
मन अहं पोषित हुआ सम्मान पाकर
पर उदर भूखा रहा सम्मान पाकर

एक तन की वृत्तियाँ हैं कई – कई
मान में अपमान निहित कई – कई
जब भी करता बात मैं सम्मान की
गृहणी करती बात चूल्हेदान की

सारा गर्वित मन ही क्षण में बिखरता
फिर उदार का राग मन को अखरता
पहले करता था, मैं अब करता नहीं
सम्मान की बातें मैं अब करता नहीं

गृहणी कहती इससे घर चलता नहीं
घर - गृहस्ती का नगर पलता नहीं
मान संग कुछ अर्थ तो लाओ सही
घर चलेगा कैसे क्या अनुचित कही

कविता,कहानी आप की मैं सब सुनूँगी
हो विभूक्षित उदर तब भी मैं सुनूँगी
पर इन नन्हें बच्चों से कैसे कहूँगी
पेट कविता से भरो कह न सकूँगी

कह भी दूँ निर्लज्ज हो वो समझेंगे क्या
वे तुम्हारी कविता - वविता समझेंगे क्या
जब बड़े होंगे तो समझेंगे तुम्हारे मान को
पहले पोषण दो बड़े हों तब तो जाने मान को

मान, ना सम्मान,ना कुछ और अभिलाषा मेरी
मेरे बच्चों की खुशी , बस वही आशा मेरी
कुछ प्रयोजन तो करो, घर गृहस्ती भी चले
अर्थ बिन सब कुछ अधूरा जिन्दगी भी ना चले

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com            

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

दिल से निकली बात

दिल से निकली बात और गर होती है तो हो जाने दो
जो भी हो फिर प्रेम , अदावत होती है तो हो जाने दो

मुँह की देखा - देखी मुझसे बात कभी भी ना होती
कहूँगा  सच्ची बात बगावत होती है तो हो जाने दो

कहने को सब के सब सच्चे,पर ये सच्ची बात नहीं
मजबूरी में थोड़ी  मिलावट होती है तो हो जाने दो

ढोल का पोल बनाते सब ही कोई थोड़ा कोई ज्यादा है
सच्ची चीज पे थोड़ी सजावट  होती है तो हो जाने दो

खूबसूरत और जवाँ हैं अक्सर हँसकर मिलते-जुलते हैं
ऐसे में दिल धड़क मोहब्बत  होती  है तो हो जाने दो 

अच्छा बुरा हुआ जो भोगा , आया नहीं तुम्हारे पास
अब थोड़ी जो हुई है अज़मत होती है तो हो जाने दो


पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com

भरेंगे जो भी हो जुर्माना अब तो दिल की करनी है

वक़्त ने की बड़ी गुस्ताखियां कुछ मुझको करनी है
भरेंगे जो भी हो जुर्माना अब तो दिल की करनी है

बस कुछ दिनों के ही लिए अब लौट आ ऐ दुःख
मुझे कुछ दोस्तों की आजमाइश फिर से करनी है

बहुत खुशियों से इश्क करना था मैं कर न पाया था
फ़कत अब एक चाहत गैर दिल में खुशियाँ भरनी है

मेरे बचपन को खाया इस कदर कुछ यूँ गरीबी ने
जवानी भी नहीं उबरी न चाहें जो वो करनी है

भीड़ से चेहरे लोगों के कि अब पहचानना मुश्किल
कि किसके पाँव पड़ना है औ किसकी बाँह धरनी है

नफरतों के दुपट्टे पर तुम करो प्यार के छींटे
भीग के शर्म से वो देखना तुमसे लिपटनी है

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com  

रविवार, 14 जनवरी 2018

देखने वाले देखते रह जायेंगे

देखने वाले  देखते रह जायेंगे
करने वाले करके गुजर जायेंगे

छोटी उम्र नाम की मोहताज़ नहीं
लम्बी  उम्र लेके  भी मर जायेंगे

यूँ ही गुज़री जिंदगी तो क्या बनेंगे
जिन्दगी से लड़कर निखर  जायेंगे

यूं ही मिला मौका तो बिगड़ जायेंगे
कौन  जाने क्या पता सँवर जायेंगे

बात  करो  बात से बात  बनती है
जरूरी नहीं हर बात पे बिफर जायेंगे

दोस्ती में जो भी कहो तो सच कहो
ऐसा तो नहीं गुस्सा होंगे मर जायेंगे

यही हाल रहा तो देखना जल्दी
लोग नहीं गाँव ही शहर जायेंगे

इस तरह रौंदेंगे क़ुदरत को जो
गाँव  नहीं  पहले नगर जायेंगे

जंगलों को काट के क्या बच पायेंगे
हम  भी  जायेंगे गर शज़र जायेंगे

मगरूरियत अच्छी नहीं अच्छे दिनों में भी
अच्छे  दिन  भी  देखना  गुज़र  जायेंगे



पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978

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शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

कौन जानता है किसका वजूद कितना है

कौन जानता है किसका वजूद कितना है
ये वक़्त जानता है किसका वक़्त कितना है

कयास कोई भी लगा सकता है हक है उसका
सच तो गाल को पता है तमाचा सख्त कितना है

किस्में कितनी अना है कौन खानदानी है
शऊर का लहज़ा बताता है रक्त कितना है

किसी से पूछिये अक्सर है कहता ठीक हूँ बस
सच कोई नहीं कहता कि मस्त कितना है

मालिक के सामने मजदूर क्या कहेगा, कहेगा अच्छा है
अकेले में मिलो कभी फिर पूछो बताएगा त्रस्त कितना है

बहुत कुछ हाथ मिलाना भी बता देता है
कितनी ताक़त है मज़बूत दस्त कितना है


पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978


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बुधवार, 10 जनवरी 2018

निर्धनता के द्वार ने मुझको खींच लिया























निर्धनता के द्वार ने मुझको खींच लिया
कोटि प्रयत्न किये पर उसने भींच लिया

अभिरुचि विरुद्ध अभिवादन मुझसे हो न सका
खंडित अभिमान हुआ उसका अभिलषित वो वांछा पा न सका

अभिव्यक्त रहा अव्यक्त हुई अंतस में वेदना
स्व का अभीष्ट कर क्रंदन अन्तस में देखना

जिस द्वार गया दुर्भाग्य मेरा,डटा अर्थ गर्वोक्ति किया
शीश झुका पग में मेरे, कर वन्दन, का आदेश किया

ज्वाला धधकी,अंतस खौला,भींचे अधरों संग लौट पड़ा
शारदा पुत्र के मुखमंडल पर अर्थ का व्यर्थ ही चोट पड़ा

विमला के तात का मान किया,बहुतों ने खुलकर गान किया
पर उदर विभुक्षित हँस न सका , उसने अश्रु का मान किया

फिर भी मेरा मस्तक ऊँचा , अधिपत्य न मुझ पर था दूजा  
फिर द्वार सभी, साहचर्य त्याग बस एक अलख का गृह सूझा

जितना भी फिर रोना-धोना , बस उनसे ही सुव्यक्त किया
कुछ रात्रि,प्रात,कुछ मास गये,कुछ मार्ग उन्होंने प्रशस्त किया  

सब संबंधी, सब सख्य गये, बस एक अयोनिज साथ रहे
जिसने सारे जग को साधा,हम उसकी शरण को साध रहे

हम मस्तक धरे निरंजन पग , वे धाय भुजा में गाहि लिए
तब भव धाया,हितई जागा,निज आनन प्रभु में छिपाय लिए

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com   


   

शनिवार, 6 जनवरी 2018

और खुदा बनता है

बेगुनाहों  पे इस क़दर ज़ुल्म  अरे तूँ क्या  करता है
किसी को ज़िन्दा कर नहीं सकता और खुदा बनता है

बुराई  करना  मेरी खूब,  मगर इतना करना
बुरा आदमी है बहुत, मगर वसूलों पे चलता है

ऐ मेरे रब मेरे दुश्मन को यूँ ही सलामत  रखना
मज़ा आता है जब वो मेरी कामयाबी से जलता है

मरते - मरते  भी जब बच  जाता हूँ , मज़ा आता है
देखता हूँ जब वो मुँह बना के बेसाख्ता हाथ मलता है

हर मोड़ पर तेरे लिए सहारे फिर भी तूँ डरता है
वो एक  पाँव से ही देख लम्बी  डगर  भरता है

तूँ  तो  कहता है तूँ मौत से भी नहीं डरता
तो जरा ये बता इन फरेबों से क्यों डरता है

पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com  

    

अपनी आखों की नमीं से ज़रा मिलकर देखो

अपनी  आखों की नमीं से ज़रा  मिलकर देखो
खुद के जुल्मों-सितम से भी जरा मिलकर देखो


दूसरों को  जलाकर जिन्दगी ना सीख पाओगे
कभी खुद आग की लपटों में भी जलकर देखो


माना कि कभी खुद के घर में आग लगी हो
और कहूँ मैं ये तमाशा भी जरा रुककर देखों


कोई  घर दूर से जलते  देखा तो क्या देखा
करीब जाओ  जरा लपटों से मिल  कर देखो


झोपड़ी ही सही , जलती हो,मगर  अपनी हो
जलेगा खून , जब कहूँगा जरा चलकर  देखो


जिन्दगी  बेवफा है रोज  कहते  हो तो चलो
आओ कोशिश करो इक रोज़ तो मरकर देखो


पवन तिवारी

सम्पर्क- 7718080978

poetpawan50@gmail.com

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

हाँ, मोहब्बत हो गयी तो हो गयी है








































भूल थी , कहते  खता  तुम  हो  गयी  है
देखो जनमत,हो गयी तो हो गयी है  

बोल दो सच ,तो वहाँ बच जाओगे
जुर्मे-सोहबत,हो गयी तो हो गयी है

जो नहीं  मैं, वो  समझता है मुझे  सारा  जहाँ  
लोगों हैं लोगों में गफ़लत,हो गयी तो हो गयी है

झूठ कब तक बोलूँगा,कब तक छुपेगी
हाँ, मोहब्बत हो गयी तो हो गयी है

इक मोहब्बत के लिए हर पल जुबाँ शर्मिंदा हो
जी मुकर सकता नहीं,सच,हो गयी तो हो गयी है

बात पुरानी,जाने कब की,अब तक,वहीं पे अटके हो
मान गये सब,तुम्हीं असहमत,हो गयी तो हो गयी है

पवन तिवारी
सम्पर्क 7718080978
poetpawan50@gmail.com

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

रूह और बदन की रुसवाई







































मैं जानता हूँ आज – कल मेरी रूह
जागते हुए भी सोई रहती है
मैं बडबडाता हूँ उसके साथ होते हुए भी
अकेले और वो ख़ुद में खोयी रहती है

अब ये आलम है कि
एक ही कमरे में दो लोग रहते हैं
दोनों एक दूसरे में रहते भी हैं साथ-साथ
मगर फिर भी हैं जुदा-जुदा

मेरे बिना वो नहीं, उसके बिना मैं नहीं,
सदियों का सच , फिर भी जाने कैसे
दोनों एक - दूसरे के बिना जीते हैं
ये सच नहीं होना चाहिए मगर आज-कल का सच यही है

जानते हो क्यों, क्योंकि 
दोनों की चाहते अब साझा नहीं रही
वो कुछ और चाहती है
मेरी प्राथमिकता कुछ और है

उसे एकांत चाहिए, शांति चाहिए, और 
ढेर सारा, उसका वाला प्यार चाहिए
मैं भी उसकी चाहतों में शामिल होना चाहता हूँ
हमारा बनाना चाहता हूँ.

पर मेरी प्राथमिकतायें बताती हैं
पहले रोटी चाहिए, कपड़ा चाहिए
और हो सके तो थोड़ा पैसा चाहिए.
मैं अनाज का भूखा हूँ वो प्यार की.

कुछ खाए-अघाए लोग 
मेरे खिलाफ भड़का रहे हैं .
बराबरी के नाम पर,स्वतंत्रता 
और अभिव्यक्ति के नाम पर

ये खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं
संस्था भी चलाते हैं
मंहगे चश्में पहनते हैं इतने कि 
मेरे तीन जोड़ी कुर्ते पायजामें आ जाय .

मंहगे होटलों में विचार-विमर्श करते है
उस विमर्श के कुछ घंटे के खर्च से 
मेरा पूरा साल कट सकता है.
पर ये इस बात को समझ के भी कभी नहीं समझेंगे

जैसे देशी बाबू अमेरिका से कुछ साल बाद
लौटने पर भोजपुरी नहीं समझते या... जो भी हो
वैसे वो जानती है, मैं ज़िंदा नहीं रहूँगा
तो, वो भी ज़िंदा नही रहेगी

बस उसे यही समझाना चाहता हूँ
मैं उससे समझौता चाहता हूँ.
थोड़ा वो झुके,थोड़ा मैं झुकूं, मैं नहीं, 
हम बनकर जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ–साथ

थोड़ा तुम अपने अरमानों को मारो,
थोड़ा मैं अपनी जरूरतों को मारूं
थोडा तुम मुझे सम्भालो, 
थोड़ा मैं तुम्हें सम्भालू

अगर मंजूर है तो आओ 
तुम्हारा बहुत सा स्वागत है .
वरना मैं बलिदान होने को तैयार हूँ
करता हूँ तुम्हें स्वतंत्र 

तो जाओ ढूंढो कोई ऐसा बदन
जो तुम्हें दे सके पनाह 
जिसके बदन की जरूरतें अघा गई हों
फिर देखना तुम्हारा राज हो शायद

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmai.coml