यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

मैंने भविष्य देखा



इधर कई दिनों से भविष्य के बारे में
सोच रहा था गंभीरता से कि
तभी सामने से आता दिखा विशालकाय भविष्य
मैं कर गया उसमें प्रवेश, मैंने देखा
आज से बिल्कुल ,पूरी तरह अलग
पर वर्तमान को भोगते हुए
भविष्य के बदलाव को देखकर
नहीं हुआ अधिक आश्चर्य
हाँ, मन चिंतित अवश्य हो गया
भविष्य में मेरी उत्सुकता
मनुष्य से मिलने की हुई
पर मनुष्य कहीं नहीं दिखा
बस रोबोट ही रोबोट नजर आये
बड़े यत्नों, प्रयत्नों के बाद जान पाया
उन रोबोटों के अंदर कुछ मनुष्य भी थे
पर हाँ सिर्फ तस्सली को


वे मनुष्य भी रोबोटों जैसे किये थे धारण वस्त्र
ताकि प्रदूषित जलवायु,घातक किरणें
नष्ट न कर दें उनकी त्वचा को
जल न जाएँ विकिरण से  
इस लिए धारण किये हैं कवच
हाँ अब वे हंसते नहीं, बोलते भी नहीं
अन्यथा शरीर में प्रवेश कर सकते हैं
जानलेना विषाणु इसलिए
शरीर में लगे यंत्र साधते हैं संवाद
रोते हुए भी किसी को नहीं देखा
मेरा प्रिय शब्द ‘मित्र’
हो गया है अर्थ हीन


यहाँ चौपाल,मजमा,अड्डाबाज़ी,महफिल
सब निरर्थक शब्द हो गये हैं
यंत्रों के माध्यम से संचरित होते है विचार
समझिये जैसे गोपनीय कूट शब्द
विज्ञान की प्रगति के दुष्प्रभाव का परिणाम है
या कमाल भी कह सकते हैं
मनुष्यता और संवेदना भविष्य में मर चुके हैं.
शोध करने पर इतिहास में शायद मिलें


यहाँ मैंने देखा ,
आदमी मशीन की तरह
दिखता और व्यवहार करता है
मैंने देखा जगह-जगह छोटी-छोटी
अद्भुत प्रयोगशालाएं बनी हैं
पता किया तो ज्ञात हुआ
यहाँ होते हैं निर्मित आदमी के भ्रूण
जिन्हें होती है आवश्यकता
बनवाकर ले जाते हैं


यहाँ माता पिता नहीं होते
खरीददार और गुलाम होते है
यहाँ अब पति – पत्नी नहीं होते
विवाह शब्द भविष्य के लोग नहीं जानते
स्त्रियों एवं पुरुषों कोई भेद नहीं
वे माँ नहीं बनती, बच्चे नहीं जनती
वे पूछने पर मेरा मजाक उड़ाने लगीं
आश्चर्य जताने के साथ,
बोली किस ग्रह से आये हो
ये काम प्रयोशालाओं में होता है
और उन्ही का काम है .


मैं बोध शून्य हो गया
यहाँ न अब कोई पिता होता है
न पुत्र, न बहन, न जन्मभूमि
जैसी अवधारणा में विश्वास
शेष रिश्ते मामा,मौसी,चाची,
यहाँ दूसरे लोक के शब्द हैं
एक सज्जन ने कहा,
आर्काइव में जाकर खोजिये
शायद मिल जाएँ.


यहाँ यौन क्रीड़ा या बलात्कार
जैसे शब्द भी लुप्त हो गये हैं
इसका क्या मतलब होता है
भविष्य के लोग नहीं जानते
ये भी आर्काइव में शायद मिले
कभी- कभी रोबोट करते हैं
आपस में यौनिक क्रिया जैसा
पर पता लगाना मुश्किल
इसमें रोबोट कौन और आदमी कौन
या दोनों रोबोट
ऐसा ही स्त्री और रोबोट में भी
हाँ आदमी की अपेक्षा
रोबोट में कहीं-कहीं मैंने
देखी है हल्की सी संवेदना
मनुष्य हो गया है रोबोट
और रोबोट मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है
मनुष्य, मनुष्य से आदमी
और आदमी से रोबोट हो गया
यही मुझे हदप्रद कर गया


और भी बहुत कुछ था भविष्य में
पर मैंने न देखने का निश्चय किया
मैं भविष्य से भाग खड़ा हुआ,
हांफने लगा,कुछ दूर जाकर रुका
थोड़ी देर तक लेता रहा लम्बी साँस
और याद आने लगा
एक गोल चक्कर की तरह
मनुष्यता,मित्रता,अड्डेबाजी,माता-पिता,
ढेर से रिश्ते,प्रेम,पत्नी,बच्चे और
मैं फफक कर रो पड़ा


मैंने संकल्प किया .
अब मैं सिर्फ वर्तमान में जियूँगा
और सोचूंगा .
इन्हीं विचारों के मध्य किसी ने झिंझोड़ा
उठिए कार्यालय नहीं जाना है
निद्रा भंग हुई
सामने शालू जी मुस्कराते हुए खड़ी थी
ऐसे क्या देख रहे हैं ,क्या हुआ ?????

पवन तिवारी
सम्पर्क- 7718080978
poetpawan50@gmail.com                 


गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

प्रेम अपना हिमालय सा उद्दात है



















चाहूँ मैं और कुछ भी इरादा नहीं
संग तूँ बस रहे इससे ज्यादा नहीं

मुझपे विश्वास हो इससे ज्यादा नहीं
चाहूँ  तुझसे मैं कोई भी वादा  नहीं  

जैसा भी है मेरा तूँ मुझे प्यारा है
ओढ़ना तूँ कोई  भी लबादा  नहीं  

प्यार तो है इबादत फिर हो झोपड़ी
यूँ जरूरी  महल सा  कुशादा  नहीं

दो अधूरे मिले फिर कहाँ गम रहा
प्यार  पूरा हमारा  है आधा  नहीं

कोई  हमको बिछोड़े  दफन कर दे यूँ
प्यार अपना भी यूँ सीदा - सादा नहीं

प्रेम अपना हिमालय सा उद्दात है
फूंक दे कोई  हमको  बुरादा नहीं


पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

ये जो सर्दी आई है ढेर सारा प्यार लेकर









ये जो सर्दी आई है ढेर सारा प्यार लेकर
मेरी होठों की दुश्मन ढेर सारा बाज़ार लेकर
यही तो लाती है रजाई में सोने का मजा लेकर
आती है ढेर सारा बहुत कुछ और भी लेकर
स्वेटर,टोपी,साल मोफलर,फटी एड़ियाँ,कांपते होठ
और जाड़े वाली क्रीम के मुलायम खर्चे लेकर  

दिन भर सुलगती अंगीठियाँ,ठरते पाँव
घासों और फूलों पर सँवरती ओस की बूँदे,
खेतों से गुजरने पर शरमा के प्यार से
लिपट जाती हैं बदन से पीली सरसों की पंखुड़ियाँ
और किसान गुनगुनाता है फसलों की रंग-बिरंगी बहार लेकर
और कभी इसकी मार से बेहाल दम तोड़ती फसलों की आह लेकर

जिस धूप से जल जाते थे जेठ में बेवक्त अक्सर
अब उसी धूप पर बिछ जाते हैं धूप बरसे प्यार लेकर
जो नहीं पीते थे सिगरेट या बीड़ी उनके मुँह से भी
निकलता है धुँआ इन नया अंदाज लेकर
सर्दियाँ ही ले आती हैं 
अच्छा वाला गले मिलने का मौसम

दिल कहता है बेसाख्ता समा जाएँ
एक दूसरे में गर्माहट वाला प्यार लेकर
इस गर्माहट वाले प्यार से भी बहुत कुछ जुदा 
ये सर्दियां और भी बहुत कुछ लाती हैं ले जाती हैं
अमीरों के लिये प्यार का गुनगुना मौसम
और अक्सर गरीबों के लिए बेशरम मौत लेकर  

पवन तिवारी
सम्पर्क - 7718080978
poetpawan50@gmail.com



शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

पवन तिवारी को साहित्य अकादमी का जैनेन्द्र पुरस्कार

मुंबई,युवा साहित्यकार पवन तिवारी को उनके चर्चित उपन्यास "अठन्नी वाले बाबूजी" के लिए महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का वर्ष 2016-1017 का जैनेन्द्र पुरस्कार दिया गया है। पवन तिवारी ने साहित्य की तमाम विधाओं में काम किया। उनकी पहली पुस्तक ''चवन्नी का मेला'' भी काफी चर्चित रही जो कि एक कहानी संग्रह थी।12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखनविद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषणगायनअन्ताक्षरीएकांकी आदि में प्रथम आने वाले पवन तिवारी की पहली पुस्तक मात्र २३ वर्ष की आयु में प्रकाशित हुई थी. पवन तिवारी न सिर्फ एक संवेदनशील लेखक हैं वरन एक प्रखर पत्रकारवक्ताशोध कर्ताकई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन करता होने के साथ-साथ , फिल्म लेखनकई पुस्तकों के सम्पादन सहित आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य विशेष चर्चित रहा , देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन एवं इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन भी किया।12 वर्ष की उम्र में लेखन की शुरुआत करने वाले पवन तिवारी का जन्म उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले के जहँगीरगंज ब्लॉक के अलाउद्दीन पुर गांव में एक किसान परिवार में हुआ। पिता चिंतामणि तिवारी एवं माता श्रीपत्ती तिवारी की 7 संतानों में 3रे नम्बर की संतान पवन तिवारी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। बचपन में ही रामचरित मानस का पाठ करने दूर- दूर बुलाये जाते थे। गरीबी तथा माता की असाध्य बीमारी के कारण 1998 में 16 वर्ष की आयु में पढ़ाई त्याग कर मुम्बई आना पड़ा। तमाम संघर्षों से गुजरते हुए सफलता की अनेक इबारत लिखी। पवन तिवारी बेहद कम आयु में ही सनातन चैनल में शोधकर्ता और रचनात्मक निर्देशक भी रहे। जहां उन्होंने अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी. मुम्बई आकाशवाणी पर अनेक विषयों पर उनके व्याख्यान प्रसारित हुए। जिनमें इनके स्व रचित अवधी लोकगीत काफी प्रसंशित हुए। चर्चित कहानी तेरे को मेरे को पर हिंदी फिल्म बन रही है। हिंदी भाषा के उत्थान के लिए किए गए उनके प्रयास सराहनीय हैं। 








गुरुवार, 30 नवंबर 2017

रेस की पहली और आख़िरी शर्त केवल विनम्रता होगी

इस बार
जो सोचा था
सच हुआ
मेरा अनुमान था
या मेरा विश्वास
या मैं ढीठ था
जुगाड़ों के खेल से
परिचित होते हुए भी
बेपरवाह, अपने में मग्न
जो भी कहूँ अच्छा था
इस बार जुगाड़ें
हार गई थीं
सच से ,सर्वश्रेष्ठ से
अलसायी आखों को
खुशियों ने बेसाख्ता
चूम लिया था  

आप जो सोंचे
सपनें देखें
हूबहू, वैसे ही
सच हो जाएँ
बिना किसी वैसाखी के
फिर तो लगते हैं
खुशियों के पंख
भरोसे,आत्मविश्वास की
पतंग उड़ती है
खुले आसमान में
ऐसा कई बार हो
तो ये समझ लो
लगानी है तुम्हें लम्बी रेस
इस रेस की पहली
और आख़िरी शर्त
केवल विनम्रता होगी
वरना रेस कभी भी
नहीं बनेगी मंजिल
बस रेस में बने रहोगे
धक्के खाते धकियाते

पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com



सोमवार, 27 नवंबर 2017

और कमाल कि हँसते भी हो

घूमता हूँ खूब
लिखता हूँ खूब
बहस करता हूँ खूब
हंसता हूँ खूब
उत्साह है खूब
जीने की चाह है खूब
जीवन भी है खूब
जीता भी हूँ खूब
अभाव भी है खूब
फिर भी
मस्त हूँ खूब
इस भयावह अभाव में
कैसे जीते हो, जिन्दादिली से
देखकर,सोंचकर
मित्र हैं दंग,कैसे टिके हो
शहर में बिंदास , इस तरह
और कमाल कि हँसते भी हो


पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com


रविवार, 26 नवंबर 2017

अत्तरकारी- पत्तरकारी [कहानी]











दीपावली बीत कर करीब 1 महीने गुजर चुके थे.तब से एक बार भी घर पर फोन नहीं
किया था.या यूं कहूँ कि साहस ही नहीं हुआ. दीपावली में अम्मा से बोला था,एक हप्ते के
अन्दर मनीआर्डर भेजूँगा.पर सम्पादक कम बनिए मालिक ने बोनस को कौन कहे बकाये
वेतन से भी एक रूपये ढीला न किया. बड़ी आस थी कि चलो साल भर का त्यौहार हैं वेतन
दे देगा ही. पर आस करना मेरे लिए मूर्खता सिद्ध हुई.ठन-ठन गोपाल ही रहा.उजाले के इस
 त्यौहार में भी मेरे चेहरे पर अन्धेरा ही रहा.जब भी वेतन की बात करता... विज्ञापन का
पैसा आने वाला है.अगले हप्ते देता हूँ, कहकर टाल देता.सोंचता, एक बार पैसा मिल
जाय,मनीआर्डर कर दूँ. फिर शान से फोन करूँ कि अम्मा 1000 का मनीआर्डर कर दिया
हूँ.पर किस्मत फूटी जो पत्रकार बनने का शौक चर्राया. उस पर तुर्रा गणेश शंकर
विद्यार्थी,बाबू विष्णुराव पराड़कर,राहुल बारपुते का आदर्श. वेतन के नाम पर कहने को
 1500 महीना, पर ४ महीने से सिर्फ रेलवे पास का पैसा ही बड़ी मुश्किल से नसीब हुआ
था.ऐसे में ना तो फिर कोई पत्र लिखा और ना ही फोन.वही दीपावली के दिन घर पर फोन
किया था, तब से वेतन की आस लिए ज़िंदा था. बेरोजगारी भी बहुत थी.उम्र भी कम थी.जो
भी शक्ल देखता था,कहता - तुम और पत्रकार.... तुमको तो दाढ़ी - मूछ भी नहीं आयी
है.शक्ल से तो बच्चे दिखते हो....आई कार्ड दिखाओ...कितना पढ़े हो...उल्टा मेरा ही इंटरव्यू
 शुरू हो जाता. हर दूसरी जगह मुझसे यही सवाल होते.मैं भी जवाब दे दे कर थक गया था.
इसलिए जब भी किसी बड़े होटल में या बड़े समारोह में जाता या अखबार की ओर से भेजा
जाता.जगह पर पहुँचने से कुछ दूर पहले ही परिचय पत्र झोले से निकालकर गले में टांग
लेता और पहले से ही एक कागज पर मुझसे अक्सर पूछे जाने वाले सवालों का जवाब
लिखकर कुर्ते की बाईं जेब में रख लेता. एक तो मेरी उम्र और  छोटा कद,उस पर
भी शरीर के नाम पर दधीचि की हड्डियों को कौन बड़े अखबार में रखता,शिक्षा भी आधी
अधूरी... उस पर भी दस सवाल... पढ़ाई क्यों छोड़ दी.... अच्छा,पढ़ाई भी कर रहे हो... तो
 पहले पढ़ाई पूरी कर लो, फिर पत्रकारिता में आना... कई बड़े पत्रकारों ने तो सीधे
कहा...आत्महत्या [पत्रकारिता] क्यों करना चाहते हो ? ऐसे में ऐसे अनेक उपदेशक  कथित
बड़े पत्रकारों से बचने की कोशिश भी करता, फिर भी कहीं न कहीं मुझे पकड़ के ज्ञान
पिला ही देते. ऐसा ही एक बुरे वाले दिन को  मेरे साथ हुआ, एक ज्ञानी पत्रकार जो पत्रकार
कोटे से २-२ मकान ले रखे हैं.एक में रहते हैं एक किराए पर दिए हैं.मुझे एक कटिंग चाय
पिलाकर जबरदस्ती एक घंटे पत्रकारिता की बुराई पर प्रवचन दिए. किसी तरह से उनसे
जान बचाकर प्रेस क्लब के अहाते से बाहर हुआ, तो जान में जान आयी. दिमाग का दही हो
चुका था. ऐसे में एक मित्र के घर की राह पकड़ा.मित्र के घर गया तो पूछने लगे, घर की
हाल - चाल क्या है ? फोन-वोन किए थे कि नहीं, मैंने कहा- दीपावली में किया था, मन
बदला, मित्र को बोला, चलो अभी STD लगाता हूं. मैं और मेरे मित्र STD बूथ पर गए, फोन
के लिए कतार लगी थी.आधे घंटे की प्रतीक्षा के बाद आखिरकार हमारा नम्बर आ ही गया.
पहले दो बार तो नम्बर मिलाने पर चोंगे से आवाज़ आयी.इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं
कृपया थोड़ी देर बाद प्रयास करें. तीसरी बार डायल करने पर ५-६ बार टू- टू की बीप जाने
के बाद आख़िरकार घंटी बज ही गई. इसके साथ ही मेरी धड़कने भी बढ़ गईं. तभी बाहर
अपनी बारी आने के इंतज़ार में किसी ने जोर से बूथ का दरवाज़ा पीटते हुए कहा- अरे नहीं
 लग रहा है तो बाहर निकल, दूसरों को लगाने दे. इधर मुझे गुस्सा आ रहा था कि घंटी बज
 रही है और सामने वाला फोन नहीं उठा रहा है. कहीं फोन कट न जाय, धड़कन की गति
और तेज हो गयी. दुर्भाग्य से बूथ के अन्दर का पंखा खराब था, सो गर्मी के कारण पसीने
 से तर हो गया था. खैर फोन कटने से पहले उधर से हलो की आवाज़ आ गयी थी. जिससे
जान में जान गा गयी थी.फोन पड़ोसी के घर मिलाया था.पूरे गाँव में दो ही लोगों के घर
फोन था. जो गाँव में रुतबे का प्रतीक था.फोन उठाने वाली रिश्ते में चाची लगती थी. सो
जल्दी से प्रणाम कर बोला- मैं मुंबई से पंकज बोल रहा हूं, हमारी अम्मा या फिर बाबूजी को
बुला दीजिए. 10 मिनट बाद फोन करूंगा. उधर से आवाज़ आई ठीक और मैनें चोंगा रखा
दिया, पर इतने में साढ़े तीन रूपये का बिल गिर ही गया.10 मिनट बाद फोन किया तो मां
की आवाज आई, बाबू पंकज... मैं बोला, हाँ अम्मा ! पालागी, कैसे हो बच्चा, तुम्हारी सर्दी
 ठीक हो गई, मैं बोला- ठीक हो गई. मैं अच्छा हूं, बाबू जी कहां है ? अम्मा बोली- बच्चा हो वो
तो धान के खेत में हैं. मैं भी खेत में ही थी, खेत से जैसे ही घर आई, तभी बुलाने राजू आये
कि तुम्हारा मुंबई से फोन है. मैं भागी - भागी आई. बच्चा तुम तो सब जानते हो, थोड़ा घर
का ख्याल रखो, कुछ मिला कि नहीं. ई पत्तरकारी करने से का फायदा. जब कुछ ना मिले.
4 महीने से एक पैसा नहीं भेजे. तुम्हारे सिवा कोईदूसरा सहारा नहीं है. बच्चा, तुम्हारे
बाबूजी परेशान हैं. कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं. खाद की उधारी पिछले सीजन की बाकी है.
बिजली भी मुश्किल से एक दो घंटे के लिए आती है.खेत तक पानी पहुंचता है कि तब तक
बिजली कट जाती है. इंजन से सिंचाई बहुत मंहगी है. डीजल भी बलैक के बिना मुश्किले है.
अइसे तो खेती गिरहस्ती बिलाय जाई बेटवा. कैसा मालिक है ? कुछ करो बच्चा, मैं बोला-
हां, मैं कुछ करता हूं, जैसे मिलता है.तभी अम्मा बोल पड़ी, मिलता नहीं, कुछ करो बच्चा.
 नहीं तो खेती-बारी बेचनी पड़ जाएगी. मेरी बात का बुरा मत मानना बच्चा. अपने सेठ को
 बोलो कि घर पइसा भेजना बहुत जरूरी है. तुम बोले ही नहीं होगे. मैनें कहा- बोला था, कि
बहुत जरूरी है घर पइसा भेजना है, पर कुछ बोला नहीं. इतना सुनकर अम्मा गुस्से में
बोली – ई कइसा मालिक है बेईमान, काम करा के पइसा नाहीं देत. देवीमाई  उसकी
कमाई में आग लगे. मेरे बेटे की कमाई हजम करेगा कीड़े पड़ेंगे बेईमान को. ई अत्तरकारी-
पत्तरकारी के आलावा कौनो काम नाही मिलत.गरीब की आह खाली नाही जात. बहुत
नरक भोगेगा. मैंने कहा जाने दो सरापो मत. उधर मेरा ध्यान बिल पर गया तो देखा 60
रूपये तक पहुँच गया था.अम्मा फिर बोली सरापूं नहीं तो क्या करूँ तुम्ही बताओ ? अब
तक कितने साल से बम्बई में हो, कभी एक पैसा नहीं मांगी. पर अब बच्चा पानी सिर से
ऊपर हो रहा है. तो चुप नहीं रहा जाता.तुम्हारे बाप दिनों-दिन बूढ़े होते जा रहे हैं, अब वो
पहले वाली ताकत नहीं रही. घुटने में अक्सर दर्द रहता है.मुझे भी आज कल चक्कर आता है
एक दिन सरकरिया अस्पताल पर गई थी,डाक्टर बोला- चश्मा बनवाना पड़ेगा. आँख भी
जबाब दे रही है.ज्यादा क्या बोलूं, बच्चा तुम खुद ही समझदार हो. बगल से आवाज आ रही
थी, भइया, वहां कैसे हैं ? किस परिस्थिति में है ! तुमको मालूम है ! अपना बोझ भइया के
ऊपर.... पइसा के अलावा कुछ और नहीं.. लाओ अम्मा मुझे भी भइया से बात करनी है. मैं
कभी बात नहीं कर पाती. सब लोग भइया से बात करते हैं. फोन में सब आवाज आ रही थी
 वह मेरी प्यारी बहन अनामिका की आवाज थी. तभी अम्मा बोली, ‘ये बच्चा पंकज’ जरा
अनामिका से बात करो, कहती है- सब लोग बात करते हैं, परंतु मैं भइया से कभी बात नहीं
कर पाती.मैंने कहा - फोन दीदी को दो अम्मा, फोन पर एक स्नेह भरी आवाज़ उभरी, भइया
 प्रणाम.मैंने आशीर्वाद दिया-  खुश रहो बच्चा. अनामिका कैसी हो बच्चा ? अच्छी हूं भैया.
आप कैसे हो ? अम्मा की बात पर ध्यान मत देना. अपना ख्याल रखना. कैसे हो ? मैंने
कहा - अच्छा हूं. तुम बोलो, क्या बोलूं, मैं भी अच्छी हूं. आप बताओ भइया, मैंने फिर कहा - मैं
बिल्कुल ठीक हूं. तुम क्या कहना चाहती हो बच्चा ? बोलो, संकोचो मत, मैं अच्छी हूं भइया,
कहते हुए उसका गला रूँध गया.अनामिका ने दबे स्वर में कहा- कोठरी का दरवाजा टूट
गया है. फिर वह सकुचाते हुए बोली- मैं बिना दरवाजे के अकेले  कोठरी में सोती हूं. डर
लगता है. सब कुछ वही ले दे के एक कोठारी ही है.सारा सामान यहां तक कि आटा-दाल भी
 उसी में रहता है. हो सके तो दरवाजे के लिए कुछ करना, मैं यह सब नहीं कहती भइया...
लेकिन … कहते–कहते रो सी पड़ी और फोन रख दी.मेरा भी गला रुंध आया. आँख भर
 आई. हम भाई-बहन एक - दूसरे को देख तो नहीं सकते थे,परन्तु दर्द महसूस कर सकते थे.
 और महसूस कर रहे थे. मैं उसकी परेशानी, भावना, समझ रहा था . उसका स्नेह, उसकी
पीड़ा, उसका अनबोला डर, अनकहा संशय,विवशता से भरी अतुल्य आत्मीयता इन सबने
मुझे एक क्षण के लिए अपरिमित पीड़ा से मुर्क्षित कर दिया और पुनःअगले क्षण मुझे
झकझोर कर रख दिया. ऐसी विवशता ... किकर्तव्य विमूढ़ सा हो गया.एक भाई ही एक
बहन की भावना को समझ सकता है.  फोन कट जाने के बाद भी थोड़ी देर तक मेरी आँखें
बरसती रही. तभी किसी ने जोर से आवाज़ दी,साथ ही कांच के लगे पारदर्शी दरवाजे को
कई बार तेजी से थपथपाया... ये भाई बाहर निकल. बाहर आके जितना रोना है रो. हमें भी
 फोन करना है.मैं उस अपरिचित की बातों का बिना कोई उत्तर दिए बिना बूथ से बाहर आ
 गया.कुछ घंटों के लिए अम्मा की बातें भूल गया.सिर्फ बहन की आवाजों की गूंज मेरे
कानों में दौड़ रही थी. मित्र मेरी हालत देख कर थोड़ा घबरा गया, थोड़ा सकुचाते हुए बोला-
क्या हुआ ? सब ठीक तो है. मैं उसके प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दे सका.उसने फिर पूछा- घर
में सब कुशल तो है ? इस बार मैनें हाँ में सर हिलाया. रात को थोड़ी राहत मिली.तो सोंचा
क्या करूँ ? सम्पादक कम मालिक जी से से कह-कह के परेशान हो गया था,परन्तु फिर
हिम्मत किया कि कल जरूर पैसे मांगूंगा चाहे झगड़ा ही होजाए. फिर सोंचा कल का कल
देखेंगे.फिलहाल किसी तरह आज कटे.आज छुट्टी थी, देर तक नीद नहीं आई. बार-बार घड़ी
देखता ...रात के 2 बज चुके थे.सोंचा कब सुबह हो और सम्पादक जी से बात हो. मेरी चार
महीने का पगार दें अथवा हिसाब करके नौकरी से निकाल दें.

पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

बियाह कटवा






















जब से भगेलू कै बियाह तैं भयल है
जब देखा दोस्तन संग बगियै में जमल है

नयका अँगोछा तब से गंटई में टंगल है
खोब पान खात हवै अपने में रमल है

गाएँ कै जौ पूछै केहु कहिया बियाह है
मुस्की मारि उल्टै पूछै केकर बियाह है

सुनली तौ तोहरै है तूही के पता नाय
कहैं तब भगेलू अबहिन बातचीत चलति है

क्योह भी जौ पूछाला तौ इहै बतावैनै
आवत-जात बाय सब बातचीत चलति है

चाची वोकर कहले हईं केहू से बताया जिन
भेद बहरे जाई नाही घर ही के भेदी बिन


गउवैं कै चुगुली कइके बियाह तोड्वावै नै
आई के दुवारे फिर मुँह बिच्कावैं न

चौराहे पे नात-बात क्योह जौ भेंटाला
बियाहे के जौ पूछै तौ पान खियावैला

 यही के खिया के पान एक दिन मंगरू
बाति ही बाति में कुलि जानि लेहनै मंगरू

दुइय्यै दिन बाद नाऊ भगेलू के घर आयल
लड़की के बापे कै एक चिट्ठी लै आयल

लड़की के मंगरू के पसंद नाहीं फोटो है
देखले में लगत है कदो वोकर छोटो है

लड़की के मामा के जंचत नाही रंग है
यही नाते शादी हम करत हई भंग है


मँगरू कै बाप पढिके गइनै गुस्साई
कवनो सार चुगुली लगाय देहलै माई

दुसरे कै दोष का इहै है निकम्मा
इहै ससुरा कवनों से बकले होई अम्मा

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com