यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

बुधवार, 22 नवंबर 2017

जनतंत्र बोल रहा है









जनतंत्र बोल रहा है
गड्ढ़ों में बिलखती सड़कें बोल रही हैं
अपने ही बदन की बदबू से परेशान कचरे
दबे हुए सांप की तरह फुसफुसा रहे हैं
यातायात में फँसे वाहन की विवशताएँ
फुरफुराते हुए कुछ तो बोल रही हैं
प्रदूषण से परेशान हवा रो-रो कर डोल रही है
तालाब में मच्छरों से घिरा बेबश
सडांध को झेलता पानी कौन जाने
कुलबुला रहा है कि बोल रहा है
रसायनों से पीड़ित बजबजाते
काले हो गये नाले रेंग रहे हैं
शायद वे अपना दुखड़ा बोल रहे हैं
एक अजीब गंध से परेशान सरकारी अस्पताल
न डोल रहे,न बोल रहे, बस घिंघिया रहे हैं
रिश्वत से परेशान वर्षों से दबी फाइलें
जिनकी मजबूरी का बेसाख्ता फायदा उठाकर
दीमक नोच रहे हैं
वो बस चीखने की कोशिश में मर रही हैं
युवा परेशान है और बेरोजगारी
छाती पीटकर मुनादी कर रही है
फिर भी कोई हलचल नहीं
और वो पछाड़े खाकर गिर रही है
असुरक्षा की आशंका से सुरक्षा को शंका है
सुरक्षा की ये हालत देख बेटियाँ भयभीत हैं
और कुछ उंगली पर नाचने वाले लोग
नारा दे रहे हैं, इण्डिया गेट पर चिल्ला रहे हैं

जनतंत्र बोल रहा है 

पवन तिवारी 
सम्पर्क - 7718080978
poetpawan50@gmail.com

रविवार, 19 नवंबर 2017

पास जब पैसे नहीं होते




















पास जब पैसे  नहीं होते 
लोग फिर लोग नहीं होते

ख़ूब  देखा है जी  करके
यूँ विश्वास डिगे नहीं होते

जिन्दगी  थम  जाती है अचानक
जिस दिन कुरते में जेब नहीं होते

साथ छूटने का डर तब ज्यादा होता है
जब कभी हमारे खाते अमीर नहीं होते

नज़रें,नजरिये बदल जाते हैं बेसाख्ता
जब  कभी  बटुए  गरम  नहीं  होते

दौलत  जब  दामन  छुड़ाती  है  तो
अंदर के जज्बात तक अपने नहीं होते


और जब ये  साथ  नाचती है तो
क्या बताऊँ गैर भी गैर नहीं होते

धन्यवाद ईश्वर का ऐसे हालात में
बस  जो  दोस्त  हैं गैर नहीं होते


पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

निर्धनता की घोर घटा



















निर्धनता की घोर घटा जब घिर-घिर आयें
उमड़-घुमड़ बादल आयें टिप-टाप बरस जायें
असफल प्रयास हों जब सारे ना कोई युक्ति चले
ऐसे में केवल धर्म मित्र उसकी ही शरण चले आयें

होके समर्पित बिन विचलित हो करें कर्म
ना सोंचे परिणाम अधिक क्या होगा मर्म
सुत,भगिनी,दारा,संबंधी भी छिटकनें लगें जब
समझो तुम्हे परखने को आया हुआ है धर्म

भरी सभा में द्रौपदी सा जब भीषण संकट आये
छोड़ आस जग की तब केवल ईश्वर में रम जायें
ऐसे में डूबती हुई नैय्या भी ऊपर आ जाती
धर्म की हो पतवार तो खेने खुद ईश्वर आयें

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com
  

बुधवार, 15 नवंबर 2017

जिनको भी धन मिला , चाहें सम्मान वे




















जिनको भी धन मिला,चाहें सम्मान वे

जिनका सम्मान,धन को तरसते हैं वे 

विद्वता, सारा सम्मान है अधूरा
धन के बिन सच में होता न ये पूरा
मान सम्मान के साथ धन भी जो है
पूर्णता में तभी उसका सम्मान है

मान सम्मान से अहं भर जाता है
मान-सम्मान से उदर भरता नहीं
भूख जब भी मचाती कोहराम है
मान-सम्मान का होता अपमान है

सच यही है कि कुछ एक अपवाद हैं
मरते दम तक हैं लड़ते जज्बात हैं
अर्थ बिन भी जिए जो सम्मान से
वे महामना हैं कर गुजर जाते हैं

पवन तिवारी

सम्पर्क - 7718080978 
poetpawan50@gmail.com

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

जाने क्यों बहुत कुछ आता है जाने के बाद















जाने क्यों बहुत कुछ आता है जाने के बाद
जाने क्यों बहुत कुछ मिलता है मरने के बाद
जाने क्यों कुछ लोग मशहूर होते हैं गुजरने के बाद
जाने क्यों बहुत अच्छे आदमी कहे जाते हैं न रहने के बाद
किसी में अच्छाइयाँ क्यों आ जाती हैं अचानक उसके न होने के बाद
क्यों किसी की पीढ़ियाँ अमीर होती हैं उसके मरने के बाद
उसके सवालों के जवाब क्यों मिलते हैं उसके चले जाने के बाद
क्यों नहीं कुछ होता वक्त पर क्यों होता है वक्त बीत जाने के बाद
क्यों कुछ लोग अमर होते हैं मर जाने के बाद
फिर भी ये बाद क्यों होता है सब कुछ करने के बाद
लोग सरकारी योजना क्यों हैं जो होती है पूरी समय बात जाने के बाद
जिस दिन ये बाद हो जाएगा पहले वो दिन होगा
दुनिया भर के लिए ख़ास
लोग पढ़ेंगे,याद करेंगे कविताएं लेकिन कविताओं में
कुछ मर जाने के बाद
काश ये बदले मनहूस परम्परा, लोग याद किये जाएँ
अच्छे कहलायें ,अमर हों,बाद होने से पहले आबाद हों
फिर कहीं बाद हों


पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com
  

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

लोग लिख नहीं रहे वे तो बस रच रहे


























लोग लिख नहीं रहे 
वे तो बस रच रहे
लीप रहे पोत रहे
कविता, कहानी, उपन्यास
गज़ल और गीत के नाम से
रच रहे, गांज रहे
यौवन की विकृति कालिख
कामुकता,हिंसा, राजनीति
पक्ष-विपक्ष, प्रेम के नाम से
स्त्री के शरीर का बारीक विच्छेदन
किसी की अतिरेक प्रशंसा में
खर्च कर रहे सफ़ेद पन्ने
किसी की निंदा में
काले हो रहे पन्ने
नहीं हो रही आलोचना कहीं भी
मूल्यांकन को चिढ़ा रहे
प्रशंसा और निंदा मिलकर
बरस रहे पुरस्कार
मेहरबान अकादमियाँ
होकर प्रफुल्लित ढेर सा
रचते हैं कामुकता, निंदा
और भी ऐसा ही लपलपाता बहुत कुछ
जो कुछ अघाये खाये लोगों की
आँखों को ललचाता
ऐसे में कौन लिखेगा
श्रम की महत्ता
उसका अवमूल्यन
भूख,प्रताड़ना,
असमानता का घाव
सामाजिक पिछड़ापन
बेरोजगारी के दुष्परिणाम
आम आदमी की वेदना
युवाओं को सही रास्ता कौन बतायेगा
साहित्य के नाम पर
रची जा रही ये निंदा
प्रशंसा , कामुकता दे पायेगी
देश और समाज को
कोई भविष्य का सही रास्ता
सोंचता हूँ रह-रह कर

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com


हे कल्याणक जगत पालक




हे कल्याणक जगत पालक , दीनबंधु दयानिधी .
राष्ट्र के प्रति हों समर्पित, ज्ञान की दो वो विधी.

सत्य का संधान हो, सद आचरण का भान हो
करुणा रहे साथी सदा, उपकार का भी मान हो

तिमिर को हम भेद कर,आलोक के पथ पर बढ़ें
राष्ट्र  गौरव  से  भरे , प्रतिमान  कुछ  ऐसे  गढ़ें

निंदा , ईर्ष्या से बचें और प्रेम  का  संगम रचें
अवगुणों से दूर हों और ह्रदय में सद्गुण बसें

निष्कलंकित हो ये जीवन, मर के भी हम ना मरें
कर्म  ऐसे  करके  जाएँ ,  जयति जय जय जन करें


पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978


poetpawan50@gmail.com

शनिवार, 4 नवंबर 2017

भारत को सभी प्रणाम करो






















जब संकट  का हो व्यूह खड़ा
तब अर्जुन सा तुम ध्यान धरो

तब  धैर्य  धरो , सोंचो समझो
फिर लक्ष्य पर तुम संधान करो

हारेगा  संकट  निश्चित  ही
सच्चे मन से बस काम करो

इस जग में नहीं असम्भव कुछ
दृढ़ता  के  साथ  प्रयास  करो

संकट तो केवल शब्द  एक
तुम पूरी पुस्तक ध्यान करो

निज संस्कृति, धरा तथा निज का
नित – नित गौरव  सम्मान  करो  

सब में भारत, सब भारत हैं
भारत को सभी प्रणाम करो

पवन तिवारी

सम्पर्क – 7718080978
poetpawan50@gmail.com



अपनों की खातिर




अपने खातिर नहीं
अपनों की खातिर
जो लुटे पिटे हैं
अपनों की ख़ातिर

जो झुके ना कभी
अपनी रौ में रहे
जिन्दगी को जिये
अपने ही ढंग से
पर वे जब भी झुके
अपनों की खातिर

कभी ना किसी की
जो परवाह किये
मस्त मौला रहे
फक्कड़ों सा जिये
एक परिवार की
बेबसी देखकर
खुद के सम्मान को
दांव पे रख दिये
अपनों की खातिर

अपनी खुशियों की बलि
अपनी स्वायत्तता
खुद ही गिरवी रखी
अपनों की खातिर

कभी बेटी का मुंह
कभी बेटे का मुंह
कभी भाई,बहन
और माँ देखकर
अपने अरमानों का
यूं गला घोंटकर
सर झुका चुप रहा
अपनों की ख़ातिर

समय बदला तो
सबके दिन अच्छे हुए
सब अच्छे हुए
हम बुरे हो गये
सारे बलिदानों को
कर किनारे सभी
एक स्वर में कहें
तुमने जो भी किया
वो तो कर्तव्य था
कोई एहसान ना
क्या कोई उनके
कर्तव्य होते नहीं
अपने होकर भी
अपने वे होते नहीं
स्वार्थ सधते ही सब
गैर क्यों हो गये
हम थे अपने तो
पराये अब क्यों हो गये
कोई उत्तर नहीं
प्रश्न ही प्रश्न हैं
क्यों लुटे और पिटे
अपनों की खातिर

पवन तिवारी
सम्पर्क – 7718080978

poetpawan50@gmail.com