यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी
सोमवार, 20 जून 2016
पिछले दिनों मैंने सुना मेरे लिए विश्व युद्ध होगा
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
रविवार, 19 जून 2016
अब मैं गाँव नहीं हूँ
अब मैं गाँव नहीं हूँ
अब मुझ में मैं नहीं हूँ .
मुझमें सिर्फ मेरा नाम बचा है .
आप ने किताबों में जैसा मेरे बारे में पढ़ा ,
चित्रों में , फिल्मों में देखा , अपने अध्यापकों से सुना ,
कल्पना की , मैं अब वैसा नहीं हूँ.
मेरे नाम पर , मुझसे मिलने मत आइयेगा ,
आप को दुःख होगा , आप को लगेगा
मैंने आप को गाँव के नाम पर ठग लिया है.
पर सच ये है कि मुझे लूटकर
मेरी पहचान को रौंद दिया गया .
अब मुझमें मिट्टी की दीवार , नरिया ,
खपरैले , बल्ली और सरकंडे से बने घर नहीं दिखेंगे
उनमें चमगादड़ , गौरैये और कबूतरों के घोसले नहीं मिलेंगे .
मेरी पहचान का सच्चा प्रतीक जुआठे में नधे बैल
और उनके पीछे सिर में अंगोछा बांधे
और कंधे पर रखे हल लेकर चलने वाला किसान नहीं मिलेगा .
मेरी कुछ और निशानियाँ कोल्हू खींचते बैल ,
जाँता पीसती औरतें नहीं दिखेंगी,
मेरी घरेलू सांस्कृतिक पहचान
मसाला पीसने और जीभ की चटोरी दोस्त चटनी की मालकिन
सिल बट्टा, दूध वाली कहतरी
और आम के लकड़ी की मथनी को घरबदर कर दिया गया है .
अब पलटू काका की धनिया को छूने से उँगलियाँ नहीं महकती
बुधई भाई के घर में पकने वाली आलू -गोभी की तरकारी
पूरब के टोले तक नहीं महकती ,
अब निमोने में पहले जैसी मिठास नहीं मिलती,
क्योंकि सब अब देसी गोबर से दूर हो गये हैं.
आलू ,गोभी, मटर, टमाटर, धनिया और तो और
गेहूं और धान भी पक्के नसेड़ी हो गये हैं.
अब सबको डाई , यूरिया और पोटाश चाहिए ,
इनके शरीर में खुसबू की जगह अब जहर दौड़ता है ,
मेरी बाहरी पहचानों में कासि ,
पुआल , गन्ने की सूखी पत्तियों से बनी मडई ,
कच्ची टेढ़ी- मेढ़ी गलियां और खेत के कोने में पड़े गोबर के घूर
अब नहीं दिखते ,
लौटू चाचा के घर के सामने वाले
पीपल पर अब गिद्धों के घर ,
सिर पर खंचोली रखकर
तरकारी बेचने वाले रामाधार कोइरी,
बुढ़िया का बार बेंचने वाले लाला
और गेहूं के बदले बर्फ देने वाले फिरतूलाल
अब नहीं दिखते
अब लकड़ी के तराजू , मिट्टी के बर्तन,
अनाज रखने को माटी की डेहरी
दिवाली पर दियली , कोसे और घंटी ,
अब पीपल और पाकड़ के पेड़ के नीचे पंचायत नहीं होती ,
अब पंच नहीं पुलिस मामले सुलझाती है.
अब पीपल और पाकड़ के जगह पर
आधुनिक पंचायत घर बन गया है
जहाँ पंचायत के सिवा सब होता है ,
अब यहाँ बियाह नहीं होता
अब कंहरवा , बिदेसिया , नौटंकी नहीं होती
अब मैरिज होता है , आर्केस्ट्रा और डीजे होता है .
अब मैं भी बदसूरत कक्रीट सा हो गया हूँ.
मुझे शहर बनाने के नाम पर ,
विकास के नाम पर लूटा गया,
मुझे पिछड़ा, गंवार कहकर दुत्कारा गया ,
शहर बनने के सपने दिखाया गया,
हमारे खेतों को उद्योगों के नाम पर हड़पा गया
विकास के नाम पर मेरे चरित्र
और चेहरे को बिगाड़ा गया
मैं भी उनके बहकावे में आकर
बिना सोंचे समझे दौड़ पड़ा शहर बनने
बिना बिजली , बिना सड़क, बिना उद्योग, बिना तकनीक
मैं कैसे बनता शहर, मैं शहर बनने के चक्कर में
न गाँव रह सका न शहर बन पाया
बस मेरा नाम गाँव है,
मैं अब गाँव नहीं हूँ,
शहर का पिद्दी सा पिछलग्गू हूँ.
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
शनिवार, 18 जून 2016
कविता नहीं पढ़ते लोग
कविता नहीं पढ़ते लोग
कविता नहीं पढ़ते लोग
क्योंकि कविता पढ़ना मनुष्य बनने की प्रक्रिया है.
कविता में होता है जीवन , सम्वेदना , दया ,
मनुष्यता का गाढ़ा इतिहास , एक जीवंत चेतना
जीवन की एक पूरी प्रकृति , क्षमा और प्रेम
कविता नहीं पढ़ते लोग
क्योंकि कविता पढ़ते – पढ़ते मनुष्य बनने का डर होता है .
कविता गढ़ों, आडम्बरों ,पूर्वाग्रहों ,पाषाणों को ध्वस्त कर
पनपाती है कोमल जीवन की सम्भावना , बताती है जीवन के मायने ,
कविता में होता है जीवन का भूगोल और विज्ञान
कविता नहीं पढ़ते लोग
क्योंकि बड़ी मुश्किल से प्रकृति के विनाश पर , पाषणों के नगर के नगर बने हैं
बड़ी मुश्किल से मनुष्य जानवर बना है , स्वतंत्र से स्वच्छंद बना है ,
सम्वेदना से पाषाण बना है , प्यार से छूटकर बाज़ार बना है .
उसको और आगे बढ़ना है. उसे रोबोट बनना है.
कविता नहीं पढ़ते लोग
क्योंकि कविता पढ़ने से मनुष्य बनने की सम्भावना हमेशा बनी रहती है .
कविता रोबोट बनने के सपने को तोड़ सकती है .
पीछे जाने और फिर से मनुष्य बनने का ख़तरा उठाने से डरते हैं.
कविता नहीं पढ़ते लोग
poetpawan@gmail.com
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
शुक्रवार, 17 जून 2016
चवन्नी का मेला: पिता
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
पिता

पिता इतिहास है भूत का ,
वर्तमान का और भविष्य का भी
जीवन का नागरिक शास्त्र है ,
भूगोल है , प्राथमिक विज्ञान है
पिता नीति है , संस्कार है ,
अपराजेय योद्धा है , मित्र है ,
मार्गदर्शक है ब्रम्हांड है, गुरु है,
धर्म है , शास्त्र हैं, ब्रम्हास्त्र है ,
पिता हमारी अभिलाषा का अक्षय पात्र है ,
आकाश है , धरा है, कल्पवृक्ष है,
अशोक है , अलादीन का चिराग है ,
पिता जीवन का ज्योतिष है
शरीर की आत्मा है ,
मूलांक है , भाग्यांक है,
पिता जीवन का ज्योतिष है
निर्माता है , पालक है ,स्नेह है ,
करुणा है , प्रेम है
पिता शिव का तीसरा नेत्र है
poetpawan50@gmail.com
सम्पर्क-7718080978
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
बुधवार, 15 जून 2016
बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी
सिर पर लकड़ी का गट्ठर था, वह हौले - हौले चलती थी
जैसे - जैसे वह चलती थी ,पग नूपुर छम -छम बजते थेउसका चलना नूपुर बजना सुर ताल के जैसा था
बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी
सिर पर चढ़ आया था दिनकर, धूप से अवनी तब रही थी
चेहरे पर अजीब सी चमक भी थी
आंखों में स्वाभिमान की जलकर भी थी,
मस्तक से नासा तक उसके , परिश्रम का नीर था टपक रहा
पर थमने का नाम नहीं , पग-पग वह बढ़ती जाती थी
बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी
वह नारी थी, श्रमकारी थी ,नंगे पर चलती जाती थी
मारुत के ग्रीष्म थपेड़ों ने , उस के तिरपन को था शुष्क किया
उसके तिरपन को देख मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ
शायद रुक जाए , शीतल हो जाए
शायद वे मुझसे कहते हों - पय की क्षुधा व्याप्त मुझ में
अल्प ही सही ,पर दे तो दो
नारी की सारी भीगी थी, धड़कनें थी उसकी बढ़ी हुई
शायद रुक जाए, शीतल हो जाये , फिर चाहे चली जाए
बदन पसीने में डूबा , देख यह तरु द्रवित हुए
तरु झूमे बह निकला समीर का झोंका
मिली हो राहत शायद उसको, पर रुकने का नाम नहीं
हर पल वह बढ़ती जाती थी ,
बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी .
श्रमकारी नारी भारती
जय भारती
जय भारती
जय भारती
poetpawan50@gmail.com
सम्पर्क- 7718080978
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
मंगलवार, 14 जून 2016
चवन्नी का मेला: चवन्नी का मेला
चवन्नी का मेला: चवन्नी का मेला: जाड़े की शुरूआत हो चुकी थी. धान की फसल तैयार थी , धान की कुछ बालियाँ आधी हरी, आधी सुनहली थी. कुछ बालियाँ पककर सोने जैसी होकर मेड पर पगडं...
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
चवन्नी का मेला
जाड़े की शुरूआत हो चुकी थी. धान की फसल तैयार थी , धान की कुछ बालियाँ आधी हरी, आधी सुनहली थी. कुछ बालियाँ पककर सोने जैसी होकर मेड पर पगडंडी की तरफ लटक रही थी .कुछ - कुछ बांस की बनी धनुष जैसी .ज्यादातर धान के हरे पत्ते पीले हो चुके थे. जो धान आगत थे. वे कुछ आदमियों और औरतों द्वारा हंसिए से रेते जा रहे थे . मेड़ों पर अभी भी हरियाली थी . मेले का मौसम शुरु हो चुका था . हर दूसरे - तीसरे दिन आसपास के इलाके के किसी न किसी भाग में मेला लगता , किसी मंदिर , किसी नदी के किनारे , किसी बाग़ में , किसी ऊसर के मैदान में , किसी पोखरे के पास , पुराने शिव मंदिर के पास , किसी मठ या देवस्थान पर , कहीं न कहीं मेला लगा ही रहता था . हर मेले के पीछे एक कहानी होती . गाँव के पुराने लोग बताते . इधर दो -तीन सालों से रामलीला मंचन भी कम हो गया है . वरना जहाँ भी रामलीला होती . वहाँ रामलीला के आख़िरी दिन मेला जरुर लगता . मेले के बीचो - बीच सजावटी कुर्सी लगती . जिस पर एक दूसरे के विपरीत दिशा में करीब 100 मीटर की दूरी पर राम रावण बैठते और मेला प्रबन्धन का इशारा होने प र, राम - रावण आपस में युद्ध करते . 6 -7 चक्कर काटने के बाद राम अपने सरकंडे के बाण से रावण का वध कर देते . रावण कई बार सरकंडा नहीं लगने पर भी , राम के इशारे पर जमीन पर गिरकर मर जाता और मेले में एक साथ जोर की आवाज़ होती . जय श्री राम, कोई कहता- जोर से बोलिए - पुनः सब एक स्वर में जोर से बोलते - मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जय हो . धर्म की विजय हो , अधर्म का नाश हो .कई धर्म भीरु बुजुर्ग राम बने नौजवान का पैर भी छूते . राम द्वारा रावण वध के बाद भी मैंने कई बार मेले में राम - रावण को साथ में जलेबियाँ खाते और हँसकर बतियाये हुए भी देखा था . अचरज भी हुआ था . कट्टर दुश्मन अगर साथ में हँसते हुए जलेबियाँ खाएं तो, अचरज तो होगा ही . कई सालों गुजरने के बाद जब मैं बच्चा नहीं रहा , तब समझ में आया .
दुर्गा पूजा खत्म होते ही , हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मेलों की भरमार थी . दूसरी तरफ फसल भी तैयार हो चुकी थी .तो हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मेले का सीजन शुरु हो चुका था . गांव में मेला एक उत्सव की तरह होता है . एक खुशी के मौके की तरह .पूरा परिवार बूढ़े से लेकर जवान , बच्चे यहां तक की घर की औरतें व लड़कियां भी सज - धज कर मेला देखने जाती हैं. मेला देखना गांव में एक परंपरा, एक संस्कृति सी है . एक पुरानी परंपरा , खुशियों भरी परंपरा , प्रत्येक गांव या कस्बे के पास एकाध मेला खास होता है .वहां उस गांव या कस्बे के लोग जरूर मेला देखने जाते हैं. उसका भी कोई न कोई सांस्कृतिक व सामाजिक कारण होता है .बूढ़े जवान हर कोई मेला जाता है , परंतु बच्चों के लिए हर मेला खास होता है. बच्चे एक भी मेला छोड़ना नहीं चाहते. हर मेले में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना , चाट खाना , मूंगफली खाना, बांसुरी खरीदना, गुब्बारे फुलाना और सीटियाँ बजाना वे अपना हक समझते . यह अलग बात है कि पैसे के अभाव में अथवा किसी का साथ ना होने के अभाव में या फिर परिवार वालों की अनुमति न होने के कारण मेला नहीं देख पाते या मेले में नहीं जा पाते , अर्थाभाव के कारण . इधर कई वर्ष बीत गये . मैं भी कोई मेला नहीं देख पाया था . मेलों का आधे से ज्यादा सीजन बीत चुका था . एकाध जगहों पर जहाँ रामलीला हो भी रही थी .वो अपने अंतिम दौर में थी और मेरे गाँव से काफी दूर भी .तभी मुझे स्कूल में पता चला कि कल अलऊपुर का मेला है .इसी गांव में एक प्रसिद्ध कवि हुए थे नाम था दानबहादुरसिंह पर लिखते थे ''सूंड फैजाबादी'' . जिनका अपना एक अलग ही इतिहास है .अलऊपुर वही ऐतिहासिक गांव है . जहां पर पहली बार हमने पिकिया नदी पर पुल देखा था . मैंने इस पुल का बहुत नाम सुना था . पुल देखने में कैसा होता है . मैं जानना चाहता था .मुझे अलऊपुर का पुल देखने का शौक था. और वह इस पूरे इलाके का पहला पुल है . मैंने अभी पिछले साल ही बाबू जी के साथ देखा था . मैं साइकिल से उतर कर पुल पर पैदल भी चला था . एकदम चिकना था .चकाचक . लिंटर लदा था . रेलिंग के पास खड़े होकर मैंने नीचे पिकिया नदी को भी निहारा था . थोड़ी झांवर आयी थी , पर अच्छा लगा था .ठीक नदी के बीचो - बीच आसमान में खड़ा होना और दूर नीचे धीरे - धीरे बहती हुई नदी देखना , मेरा रोम -रोम रोमांच से भर गया था . मैं पुल से नीचे की तरफ नदी को तब तक निहारता रहा जब तक बाबू जी ने आवाज़ न दे दी . चलो देर हो रही है .देख लिए न , नदी ही तो है .
कल उसी अलऊपुर में मेला लगने वाला था . मेरे दोस्तों ने मेला जाने की पूरी योजना तैयार कर ली थी . बात मुझ तक पहुंची तो मैंने सोचा , इस वर्ष मुझे एक भी मेला देखने का मौका नहीं मिला .कल का मेला जरूर देखने जाऊंगा . कल रविवार है छुट्टी भी है .स्कूल से छुट्टी होते ही मैं सीधा नाक की सीध में तेज कदमों से घर की ओर बढ़ चला . रोज की अपेक्षा आज जल्दी घर पहुँच गया . दीदी देखते ही बोली - आज बड़ी जल्दी घर आ गये. मैंने दीदी की बात अनसुनी करते हुए आगे बढ़ दालान के कोने में बस्ता पटक कर सीधा आंगन में पहुंचा .जहाँ अम्मा कहतरी और मथनी लेकर दही और साढी [मलाई] मथने की तैयारी में थी . मैं तपाक से हांफते हुए बोला. अम्मा कल मुझे मेला जाना हैं . जल्दी से मेरा कुर्ता पायजामा धो दो . इतना बोलकर मैं कुर्ता उतारने लगा .अम्मा कहतरी में खईलर[मथनी ] रखते हुए बोली - कल ऐतवार है कल धो दूंगी . मैं क्रोध से भर गया . चिढ़ते हुए बोला - कल धोवोगी तो सूखेगा कब, इस जाड़े में, कल मुझे अलऊपुर का मेला जाना है . अब अम्मा के कान में ठीक से आवाज़ पहुँची. अम्मा बोली - तुम्हारे बाबू जी से पूछे और फिर पैसा कहाँ है . मैंने झट से कहा- बाबू जी से तुम कह देना और मुझे इस बार पैसे नहीं रूपये चाहिए. इतना कहकर मैं जन्घियाँ पहने हाथ में कुर्ता पायजामा लेकर नल की तरफ बढ़ गया . जैसे - तैसे मलमल कर एक साबुन के पड़े छोटे पुराने टुकड़े से कपड़े धोकर नीम के पेड़ से बंधी रस्सी पर डाल दिया . ताकि कल सुबह या दोपहर तक सूख जाए .
अगले दिन कपड़ा पहन कर तैयार हुआ और अम्मा को बोला मेला जाना है मेरे स्कूल के साथी भी जा रहे हैं रूपये चाहिए हमें . अम्मा बोली पैसे नहीं है. मैंने कहा - पैसे नहीं, रूपये चाहिए. डेढ़ रूपये से कम नहीं. अम्मा बोली - मेला नहीं जाना है . तुम्हारे बाबू मना किये हैं .मिट्टी का तेल लाना है. पैसे होते तो मिट्टी का तेल आता. देर रात तक तुम्ही लालटेन जलाते हो . मेला अगले साल देखना . गुस्से और विवशता के बीच आँख डबडबा आयी . मैं जिद पर अड़ गया . सिसकते हुए बोला - मुझे मेला जाना है. मैं कुछ नहीं जानता . मुझे सिर्फ पैसे चाहिए. अम्मा बोली - तो जाओ , जहां पाओ ले लो. मेरे पास क्यों आये ? मेरे पास, मेरे बचत के 15 पैसे थे . बहुत ढूंढने पर घर की आलमारी में 10 पैसे मिल गये. कुल मिलाकर अब मेरे पास 25 पैसे हो गए थे. मैं आख़िरी उम्मीद लेकर दीदी के पास गया . बोला - दीदी तुम मुझे मेला देखने के लिए अपने गोल्लक से निकाल कर एक रुपया दे दो . मैं तुम्हारे लिए मेले से चाट लेकर आऊंगा. पर दीदी चाट के झांसे में नहीं आयी . दीदी ने साफ़ मना कर दिया .मैंने द्वार की तरफ देखा सूरज भगवान् बूढ़े हो रहे थे . अंदर धड़कन की धुकधुकी बढ़ रही थी . चारों तरफ से ना हो गया .अंत में मैंने निर्णय लिया . मैं मेला जाऊंगा और 25 पैसे में ही मेला करके आऊंगा .
पैसे का जुगाड़ करने के चक्कर में मुझे काफी देर हो चुकी थी . मित्र इन्तजार कर जा चुके थे . मैं पिंटू ,रिंकू, होली, बुधई सबके घर गया .पर घर पर कोई नहीं मिला . मैं थोड़ा हताश सा हो गया था . एक पल के लिए मन में आया मेला न जाऊं . फिर सोंचा वापस घर गया तो दीदी और घर के लोग मजाक उड़ायेंगे . बस फिर क्या ?मेले की दिशा में कदम बढ़ चले . गाँव लाँघ कर बाग़ में पहुँचा तो लगा जल्द ही अँधेरा हो जाएगा . क़दमों को मैंने दौड़ना शुरूकर दिया . धडकने बिना कहे ही दौडनें लगीं . मुँह बेचारा हांफने लगा. पर इसका परिणाम ये हुआ कि मैं अब मेले को जाने वाली पगडंडियों पर आ गया था .यहाँ से देखने पर सूर्यनारायण थोड़े तेजस्वीलग रहे थे . एक पल के लिए ठहरकर मेले की दिशा में देखा . तभी मुझे एहसास हुआ कि जाड़े के इस मौसम में मेरा कुर्ता गर्म हो गया है और कान के पास कुछ रेंग रहा है, हाथ लगाया तो पता चला पसीना जी थे . अब मैं पगडंडियों के रास्ते से मेले की तरफ तेज कदमों से बढ़ रहा था . मैंने देखा सामने से मेलाकरों का झुण्ड मस्ती में कोलाहल करते, सीटियाँ बजाते ,हाथों में खिलौने लिए, कुछ बूढों के हाथों में सब्जिया भी थी . एक आदमी गन्ना भी लिए आ रहा था . लोगों को लौटते देख मेरा दिल बैठा जा रहा था . मैं उनके सामने नहीं पड़ना चाह रहा था . पर दूसरा रास्ता भी नहीं था. बगल में हाँ का खेत था उसमें भी पानी भरा था . मेरे मित्र भी मेला करके वापस गांव की तरफ आ रहे थे . मुझे देखकर वे चौंक पड़े , अरे पंकज तुम , अब मेला जा रहे हो. हम तो मेला घूमकर घर जा रहे हैं . हमने तुम्हारा बहुत इंतजार किया, परंतु जब तुम काफी देर तक नहीं आए और हमारी धड़कनों की गति और बढ़ गई ,फिर ना तो तुम्हारा कोई संदेश ही मिला. तो हम लोग चल दिए. हम सोचे शायद तुम्हारे बाबूजी न जाने दें . होली की इतनी बात सुनकर मैं बिना बोले आगे चल दिया . बिना पीछे मुड़कर देखे मैंने अपनें कदमों की रफ्तार बढ़ा दी . मैं मेले के करीब पहुंचकर दौड़ने लगा . हाँफते - हाँफते मैंने मेले में प्रवेश किया . पूरा मेला घूम डाला . परंतु 25 पैसे में ढंग का सिर्फ कोई एक सामान ही ले सकता था , किन्तु मैं कई सामान लेना चाहता था . 25 पैसे में मेरी इच्छा पूरी होनी मुश्किल लग रही थी . मैं मेले में सजी - धजी दुकानों को देखकर मेले की चहल-पहल में खो गया . मैं मेले में घूमता रहा ,घूमता रहा और मन ही मन आनंदित होता रहा . इससे समय का मुझे पता ही नहीं चला. शाम होने लगी थी . धीरे - धीरे मेला उठना भी शुरू हो चुका था. काफी सोचने के बाद मैंने लाल रंग की पांच पैसे की गगरी खरीदी [ पानी से भरा गुब्बारा साथ में रबर की डोरी ] सीटी वाले ने 15 पैसे की सीटी 10 पैसे में दे दी. क्योंकि ये उसकी आख़िरी सीटी थी और मेला भी उठ रहा था . मैंने सोंचा चलो मेले के आखिर में आने का फायदा भी तो हुआ . अब मेरे पास 10 पैसे शेष रह गये थे . मेले में टहलते हुए चकर - मकर देखे जा रहा था कि , 10 पैसे में खाने वाली क्या चीज मिल सकती है ? पर कुछ ख़ास नजर नहीं आ रहा था .चाट तो कब का खतम हो चुका था . मूंगफली वाला अपना नन्हा तराजू बोरी में रख रहा था. हाँ जिलेबी वाले की परात में 2-3 छत्ते जिलेबियां मक्खियों के लिए जरुर पड़ी थी . मैं मेले के आख़िरी छोर पर टहलते -टहलते आ पहुँचा था तभी मेरी नजर साइकिल वाले पर पड़ी . जो थकी - थकी सी आवाज़ में रुक - रुक कर बोल रहा था . संतरे वाला , गुलाब वाला , डंडे वाला लेमनचूस ले लो , खुद भी खाओ , बच्चों को भी खिलाओ , बच्चे की माँ को भी खिलाओ . मैं झट से लेमनचूस वाले की तरफ बढ़ चला . मैंने झट से 10 पैसे का गोल धारीदार अल्यूमिनियम का चमकता सिक्का बढ़ा दिया . साइकिल के हैन्डल में खोंसे डंडी वाले लेमनचूस की तरफ मैंने इशारा किया और अगले पल वो मेरे हाथों में था . अब मेरी खुसी का ठिकाना नहीं था . इतना सामान खरीद कर मेले से गुनगुनाते हुए चल दिया . लेमन चूस चूसते हुए , गगरी हिलाते हुए, बीच - बीच में रास्ते में सीटी भी बजा लेता . आराम से मौजते हुए घर आ गया .
घर में जैसे ही घुसा . दालान में गगरी हाथ से छूटकर गिर गई और फूट गई . बेचारी गगरी फूटने की लज्जा से सिकुड़ कर अपने में सिमट गयी . अब वह गगरी की उपमा से मुक्त होकर फूटा हुआ गुब्बारा थी . बरामदे की सूखी, पर थोड़ी सिमसिम जमीन पर उस गगरी का पानी बिखर गया . मेरा चेहरा फक पड़ गया . जैसे किसी ने उस गगरी को मेरे मुँह पर दे मारा हो और वह फट गयी हो . मेरी आंखें भर आई . मैं दीदी को खुश होकर बताना चाह रहा था कि मैं मेला कर आया. पर यह खुशी गगरी के फूटने के साथ ही काफूर हो गई . मैं स्तब्ध था . चेहरे पर न जाने कहां से एक उदासी छाई हुई थी. जो हटने का नाम नहीं ले रही थी . रोना आ रहा था पर न जाने क्यों रो भी नहीं पा रहा था . तभी घर में से दीदी बाहर की तरफ आयी . दीदी ने मेरा चेहरा देखा तो वह देखती रह गई . उन्होंने थोड़ी देर तक शांत रहने के पश्चात कहा - मुझे मालूम होता कि तुम 25 पैसे लेकर मेला चले जाओगे तो , मैं तुम्हें गोलक तोड़ कर पैसे दे देती . भाई से बढ़कर पैसा नहीं . लेकिन मुझे पता नहीं कि तुम इतनी हिम्मत करके इतनी दूर अलऊपुर अकेले मेला देखने चले जाओगे . वैसे भी 25 पैसे में क्या मिला होगा ? मैंने झट से जेब में हाथ डाली और अपनी सीटी मुंह में लगाकर जोरदार फूंक मारी और सीटी ने एक जोर की आवाज की और फिर मैंने दूसरे हाथ में पकड़ा हुआ डंडी वाला लाल रंग का थोड़ा चूसा हुआ लेमनचूस दिखाया और दीदी की होठों पर एक मुस्कान दौड़ गयी. उन्होंने तेजी से दौड़ कर मुझे गोद में उठाना चाहा, कि गगरी के गिरे हुए पानी ने उनका काम तमाम कर दिया . उनको बचाने के चक्कर में मैं भी धराशायी हो गया और हम दोनों भाई बहन उस गीली मिट्टी में लोट-पोट हो गए . उसके बाद एक पल के लिए दोनों कराहे , पर अगले पल एक दूसरे को देखकर हँस दिए . मेरा कुर्ता जो कल ही मैंने धोया था . मिट्टी से सन गया था .शरीर गलने लगा था . लेकिन जीवन के इस पल में , अंदर एक खुशी का समंदर हिलोरे मार रहा था . गालों में , कपड़ों में, हाथों में , गीली मिट्टी के साथ हम दोनों हंस रहे थे . आज भी उस दिन की बात याद कर भावनाओं का ज्वार मेरी आंखों को गीला कर देता है . लेकिन कुछ भी हो जो सुख मैंने उस दिन , मेले में सिर्फ 25 पैसे में हासिल किया था वह सुख बाद में सैंकड़ों रुपए खर्च करके भी हासिल नहीं कर सका .
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12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
मंगलवार, 7 जून 2016
एक महान स्वच्छंद व्यक्तित्व - राहुल सांकृत्यायन
राहुल संकृत्यायन का व्यक्तित्व विरला है. विराट एवं विस्मयकारी व्यक्तित्व के मालिक राहुल संकृत्यायन जैसा मनीषी कई सदियों में एकाध पैदा होता है.
जानकर आश्चर्य होता है कि, एक व्यक्ति जिसने बचपन में ही घर-बार त्याग कर घुमक्कड़ी जीवन अपना लिया हो. जिसको अभावों व संघर्षों के सिवा कुछ विशेष सुविधा न मिली हो , उसने 36 भाषाओं का ज्ञान अर्जित कर लिया. 150 से अधिक तथ्यपरक पुस्तकें लिखी .कई देशों में अध्यापन किया. अनेक देशों की यात्रा की . इतिहास, धर्म,दर्शन ,राजनीति, जीवनी, भाषा कोष, यात्रा वृतांत, उपन्यास, कहानी जैसे तमाम विषयों पर अर्थपूर्ण लेखन के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन , किसान आंदोलन के साथ ही भाषाई विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. अद्भुत और चमत्कृत करने वाला व्यक्तित्व है राहुल जी का.
राहुल जी का जन्म 9 अप्रैल 1893 ईस्वी में आजमगढ़ जिले के कनैला में हुआ. इनके पिता गोवर्धन पांडे साधारण किसान थे. माता कुलवंती देवी का बचपन में ही निधन हो गया था. जिसके कारण राहुल जी का पालन पोषण ननिहाल पन्दहा में नाना रामशरण पाठक के यहां हुआ . इनकी प्रारंभिक शिक्षा मदरसे में हुई. 11 वर्ष की अल्प आयु में ही राहुल जी का विवाह "संतोषी" जी के साथ कर दिया गया . जो राहुल जी को रास नहीं आया और किशोरावस्था में ही घर त्याग दिया . मदरसे में पढ़ाई के दौरान ही उनके पाठ्यक्रम में एक शेर था .
सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां
जिंदगानी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहां
इस शेर ने ही सर्वप्रथम राहुल जी के मन में घुमक्कड़ी बनने के लिए प्रेरित किया . उनके जीवन की पहली यात्रा बनारस से प्रारंभ होती है और फिर कोलकाता, बिहार होते हुए उत्तराखंड और उसके बाद फिर पूरी दुनियामें पंख पसार लेती है . उनके जीवन की यात्रा कदम-कदम पर हमें चकित करती है . उनके परिवार का नाम केदारनाथ पांडे था और जब वैष्णव बने तो नया नाम मिला स्वामी राम उदार दास और उसके बाद श्रीलंका यात्रा और अध्यापन के दौरान बौद्ध धर्म से प्रभावित हो बौद्ध धर्म स्वीकार किया तो वह नया नामकरण हुआ "राहुल" .सांकृत्यायन गोत्र में पैदा होने के कारन राहुल के आगे सां कृत्यायन लगाया और इस प्रकार केदारनाथ और राम अवतार दास के नाम मिला "राहुल संकृत्यायन" . राहुल नाम भी इसलिए धारण किया क्योंकि , राहुल गौतम बुद्ध के पुत्र का नाम था और राहुल जी स्वयं को गौतमबुद्ध का मानस पुत्र मानते थे . उसके बाद रूस यात्रा के दौरान वह मार्क्सवाद से प्रभावित हुए और कम्युनिस्ट हो गए . 1915 से 1922 तक वे आर्य समाज के राष्ट्रवाद व समाज सेवा से प्रभावित होकर स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में आजादी के आंदोलन में कूद पड़े और पहली बार जेल गए . राहुल जी स्वामी सहजानन्द के नेतृत्व में ही बिहार प्रांतीय किसान सभा से जुड़े.
1922 से 1927 तक का समय राहुल जी के "जीवन दर्शन" और चिंतन के विकास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण रहा . इसी काल में उन्होंने जीवन विश्व दर्शन और राजनीति का गहराई से अध्ययन किया. 1928 में संस्कृत अध्यापक के रूप में राहुल जी श्रीलंका गए . वहां विद्यालंकार के राजकीय महाविद्यालय में त्रिपटक का अध्ययन किया और साथ ही सिंहली भाषा भी सीखी . त्रिपटक से प्रभावित होकर ही उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय लिया और श्रीलंका में ही बौद्ध के रूप में दीक्षित हो राहुल सांकृत्यायन बने . इसी बीच राहुल जीनेंबौद्ध धर्म को गहराई जाननेके लिए तिब्बत यात्रा करने की ठानी .उस समय तिब्बत यात्रा करना आसान नहीं था . ब्रिटिश हुकूमत को यदि पता चल जाता तो वह राहुल जी को कदापि तिब्बत न जाने देती और तिब्बत सरकार भी उन दिनों भारतीयों को तिब्बत नहीं आने देती थी इसलिए उन्होंने चुपके से दुर्गम पहाड़ी मार्ग से तिब्बत यात्रा करने की ठानी .
जिसमें राहुल जी सफल रहे. राहुल जी ने चार बार तिब्बत की यात्रा की .पहली बार 1929 -30 उसके बाद 1934 फिर 1936 और उसके बाद 1938 में तिब्बत यात्रा की .इस यात्रा से भारत व विश्व साहित्य को राहुल जी ने अमूल्य निधि प्रादान की . राहुल जी का अदम्य साहस देखिए कि उन्होंने तिब्बत से 22 खच्चरों पर लादकर साहित्य , 200 पेंटिंग व अन्य शोधपरक सामग्री भारत ले आए. भारत में अनुपलब्ध भारतीय न्याय दर्शन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति "प्रमाण वर्तिका" जिसे छठी शताब्दी में धर्मकीर्ति ने लिखी थी ,उसे खोज कर भारत लाए. साथ ही "वज्रडाक तंत्र" एवं "कंजूर" ले आए . जो संस्कृत में ताड़ के पत्तों पर हस्तलिखित थी .बौद्ध धर्म व दर्शन से जुड़े तिब्बती भाषा में लिखेकरीब 156 ग्रंथों से 40000 श्लोकों को पुस्तकों में उतारा .जिन पुस्तकों या साहित्य को राहुल जी तिब्बत से लाने में समर्थ नहीं थे, उनके करीब 1 लाख 80 हजार श्लोकों की फोटो खींचकर भारत लाये साथ ही सरह या सरहपा लिखित दोहाकोश भी तिब्बत से लाए . .जो आठवीं शताब्दी का ग्रंथ है .इससे पहले पता चला कि हिंदी का प्रारंभिक काल दसवीं , ग्यारहवीं नहीं आठवीं शताब्दी में था. इससे पहले रामचंद्र शुक्ल एवं द्विवेदी जी हिंदी का उद्भव 10 वीं 11 वीं शताब्दी मानते थे . महाभारत से भी बड़ी 50 लुप्त हो चुकी महत्वपूर्ण पुस्तकों की खोज राहुल जी ने की . राहुल जी की इसी प्रतिभा को देखकर लेनिनग्राद विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर शर्वेत्स्की ने उन्हें भारतीय "कान्ट" कहा था . राहुल जी के मित्र व सुप्रसिद्ध साहित्यकार बाबा नागार्जुन ने अपने एक लेख "विलक्षण राहुल" में लिखा है कि राहुल जी 18 - 18 घंटे काम करते थे और बुखार में भी लिखते थे . वह कलम ही नहीं छेनी, हथौड़ी , टांका , सुई सब चलाना जानते थे. साहित्य , दस्तकारी सब एक आदमी कर ले तो निसंदेह प्रभावित करने वाली बात है .उनसे पूर्व - पश्चिम दोनों जगहों के विद्वान प्रभावित थे .आचार्य नरेंद्र देव , नेहरू , राजेंद्र प्रसाद , काका कालेकर से सिल्थालेवी, चरेवास्की, रूडोल्फ आदि सभी प्रशंसक थे . नागार्जुन जी के इस कथन से राहुल जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व का पता चलता है . सबसे अधिक चकित करने वाली बात यह है कि उनके समय की लगभग सभी प्रतिभाएं संपन्न व बुद्धिजीवी परिवार में पैदा हुई और अधिकांश ने विदेशों में शिक्षा प्राप्त की . जबकि राहुल जी आम परिवार में पैदा हुए और स्वशिक्षित थे . उन्होंने स्वयं के अभ्यास व लगन से दुनिया भर की संस्कृति , समाज व इतिहास का वैज्ञानिक व वैचारिक दृष्टि से उनकी भाषा सीख कर अध्ययन किया और उसका निचोड़ लिखा . जिस समय राहुल जी लिख रहे थे उस समय राधाकृष्णन, रानाडे, दासगुप्ता जैसे दर्शनवेत्ता थे . जगदीशचंद्र बसु , सीवी. रमन, मेघनाद साहा जैसे वैज्ञानिक थे . लेकिन इन सब में राहुल जी विशिष्ट थे .क्योंकि वह प्रयोगशाला या अध्यापन तक सीमित नहीं रहे . वे घुमक्कड़ ,सक्रिय राजनीतिज्ञ ,विश्व पर्यटक होने के साथ – साथ श्रीलंका , चीन और रुस में प्राध्यापक भी रहे . एक ही व्यक्ति में इतने गुण दुर्लभ हैं .राहुल का व्यक्तित्व बहुआयामी था . वह लेखक, चिंतक, घुमक्कड़ के साथ - साथ प्रबल राष्ट्रवादी थे. वह हिंदू - मुसलमान को अलग नहीं मानते थे . बल्कि भारतीय मानते थे .वह अपने एक निबंध“तुम्हारे धर्म की क्षय “ में लिखते हैं - हिंदू और मुसलमान फरक - फरक रखने के कारण क्या उनकी अलग जाति हो सकती है ? जिनकी नसों में उन्हीं पूर्वजों का खून बह रहा है . जो इसी देश में पैदा हुए और पले फिर दाढ़ी और चुटिया, पूरब और पश्चिम की नमाज क्या उन्हें अलग कौन साबित कर सकती है ? क्या खून पानी से गाढ़ा नहीं होता ? फिर हिंदू और मुसलमान के फरक से बनी इन अलग-अलग जातियों को हिंदुस्तान के बाहर कौन स्वीकार करता है ? जापान में जाइए, जर्मनी जाइए, ईरान जाइए या तुर्की . सभी जगह हमें हिंदी और इंडियन कह कर पुकारा जाता है . जो धर्म भाई बेगाना बनाता है . ऐसे धर्म को धिक्कार ... आगे लिखते हैं - एक चीनी चाहे बौद्ध हो या मुसलमान, ईसाई हो या कन्फूसी लेकिन उसकी जाति चीनी रहती है . एक जापानी चाहे बौद्ध हो या शिन्तोधर्मी है लेकिन उसकी जाति जापानी रहती है . तो हम हिंदियों के मजहब को टुकड़े टुकड़े में बांटने को क्यों तैयार हैं . हम इन नाजायज हरकतों को क्यों बर्दाश्त करें ? राहुल जी सनातनी ब्राम्हण परिवार में पैदा होने के बावजूद पंडे- पुजारियों और उनके धार्मिक आडंबरों के कट्टर विरोधी थे . वे बौद्धिकवाद के प्रबल समर्थक थे .राहुल जी अपने एक निबंध “धर्म और ईश्वर “ में लिखते हैं - मनुष्य जाति की शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उससे उत्पन्न मिथ्या विश्वासों का समूह ही धर्म है . हलांकि इस पर लेखकों के गहरे मतभेद हैं . यह बातें उन्होंने अपनी बौद्धिकता के आधार पर कही . राहुल जी एक दुर्लभ एवं स्वच्छंद व्यक्तित्व वाले थे . वह अपने दायरे स्वयं बनाते एवं तोड़ते थे . जो उनकी जीवन यात्रा में स्पष्ट दिखता है . पहले हिंदू बैरागी, फिर आर्यसमाजी ,फिर बौद्ध और फिर 1939 में कम्युनिस्ट .विवेकानंद की तरह राहुल जी भी नवजागरण के शिखर पुरूष थे . राहुल जी रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में पैदा होकर भी धर्मांधता का विरोध करते रहे . जो राहुल जी की बड़ी विशेषता थी. राहुल जी के चरित्र में सादगी, स्वध्याय, निर्भीकता, त्याग ,लोकोन्मुखता, दिमागी खुलापन, बहुआयामिता, विवेकपरकता, कला प्रेम, देशभक्ति ,स्वच्छंद भ्रमण, पुरातत्व इतिहास से लगाव एवं क्षमा जैसे गुण समाहित थे . यही सब मिलाकर उनके व्यक्तित्व को महान व बहुआयामी बनाते हैं . राहुल जी किसानों के सच्चे हिमायती थे.
साहित्य व घुमक्कड़ीपन से इतर जब जमींदारों द्वारा किसानों के हक़ों पर बर्बरतापूर्वक कब्जा किया जा रहा था . तब राहुल जी किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए नागार्जुन जी व अन्य सहयोगियों के साथ 20 जनवरी 1939 को छपरा पहुंचे . सभी प्रभावशाली लोगों से मिले किसानो की व्यथा सुनाई . किन्तु सुनवाई न होते देख स्वयं हँसिया लेकर गन्ना काटने के लिए खेत में खुद उतर गए . जमींदारों की तरफ से राहुल जी पर लाठी से हमला कराया गया . राहुल जी का सिर फट गया . खून से लथपथ हो गए और उल्टा गिरफ्तार कर उन्हें छपरा जेल भेज दिया गया .इस आंदोलन में नागार्जुन जी भी उनके साथ थे . राहुल जी डटे रहे .राहुल जी को चोट लगने की खबर जब अखबारों में छपी . तो पूरा बिहार आंदोलित हो उठा. इसी घटना पर प्रसिद्ध हिंदी अख़बार “साप्ताहिक जनता” में मनोरंजन जी की कविता छपी .
राहुल के सिर से खून गिरे,
फिर क्यों वह खून न उबल उठे
साधु के शोणित से फिर क्यों ?
सोने की लंका जल उठे .
उस समय यह कविता लोगों की जुबान पर चढ़ गई . राहुल जी को स्वस्थ होने में लंबा समय लगा. क्योंकि घाव गंभीर थी. फिर भी वह लड़ते रहे . आखिरकार 1 अप्रैल 1939 को पूरे बिहार में राहुल पर प्रहार विरोधी दिवस मनाया गया . जेल में रहते हुए ही राहुल जी ने 14 मार्च 1939 को चर्चित पुस्तक “तुम्हारी क्षय” लिखना आरंभ किया . दूसरी तरफ केस चलता रहा.
7 अप्रैल 1939 को सीवान अदालत ने धारा 379 के तहत 3 माह की कैद और 30 का जुर्माना राहुल जी सहित आंदोलनकारियों पर लगाया . उस वक्त के “जनता साप्ताहिक” के संपादक व प्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने जोरदार संपादकीय लिखा. उन्होंने अदालत के फैसले को अविवेकपूर्ण बताते हुए लिखा कि - “एक विश्वविख्यात महात्मा की कीमत 10 रुपये आंकी गई” .ऐसे थे राहुल सांकृत्यायन .राहुल जी ने वास्तव में किसानों की लड़ाई पूरी निष्ठा से लड़ी. इसमें राहुल जी का बराबर साथ दिया नागार्जुन जी ने . इसी आंदोलन के समय जेल में ही रूस से राहुल जी को आचार्य शचेर्वात्सकी का तार मिला . जिसमें लिखा था - लोला को एक सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ है. जन्म की प्रसन्नता होनी ही चाहिए. क्योंकि पुत्र ही आदमी का पुनर्जन्म और परलोक है .पत्र के साथ फोटो भी था. लोला राहुल की जी की रूसी पत्नी थी यह बात राहुल जी ने अपनी जीवनी मेरी जीवन यात्रा में लिखी है . राहुल जी के जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिहार में बीता 20 अक्टूबर 1939 को जब पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कमेटी का गठन हुआ तो , उसके 19 प्रारंभिक सदस्यों में से एक राहुल जी भी थे . राहुल जी के जीवन पर रूस यात्रा का काफी प्रभाव पड़ा . राहुल जी के मन में साम्यवाद के प्रति 1918 -19 से ही एक आकर्षण था उसका कारण हिंदी पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित रूसी क्रांति की खबरें थीं. आखिरकार 1935 में उन्होंने पहली रूस यात्रा की. फिर उन्हें साम्यवाद का सैद्धांतिक ज्ञान व अनुभव हुआ .1937 में दूसरी बार उन्होंने रूस की यात्रा की और 15 मास रूस में रहे. इस दौरान उन्होंने 12 सौ पृष्ठों का नोट तैयार किया तथा 500 पृष्ठों में रूसी संस्कृति ,शब्दावली ,व्याकरण आदि की टिप्पणियां तैयार की . जिसका परिणाम 1939 में उनकी दो पुस्तकें सोवियत न्याय और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास प्रकाशित हुई. 1942 में वैज्ञानिक भौतिकवाद लिखा . इसी समय राहुल जी की जीवन एवं इतिहास दृष्टि भी प्रौढ़ हुई. इसी समय रूस में राहुल जी का लोला से प्रेम हुआ और आगे चलकर लोला से उन्हें इगोर नामक पुत्र पैदा हुआ . जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं. रूस यात्रा का राहुल जी के जीवन पर अमिट प्रभाव पड़ा .मार्क्सवाद और बुद्धिज्म का तुलनात्मक अध्ययन का विचार राहुल जी के रूस भ्रमण के बाद ही आया .राहुल जी का मत था कि जिस प्रकार यूरोप में मार्क्स के सिद्धांत की नींव हीगेल के दर्शन से उठी थी, उसी प्रकार भारत में मार्क्सवाद को बौद्ध दर्शन से प्रेरणा लेनी चाहिए . राहुल जी ने बुद्धिज्म को जानने के लिए निष्ठापूर्वक अध्ययन किया . बुद्धिज्म के लिए जो प्रयास राहुल जी ने किया . वह शायद ही किसी ने किया. राहुल जी के मित्र व विद्वान काशी प्रसाद जायसवाल लिखते हैं कि - 1930 में पहली तिब्बत यात्रा में राहुल जी तिब्बत से पुस्तकें, पेंटिंग व अन्य साहित्य सामग्री 22 खच्चरों पर लादकर भारत लाए .उनमें वज्र डाकतंत्र की एकमात्र संस्कृत की हस्तलिखित पुस्तक थी . जो ताड़ के पत्तों पर कुटिल लिपि में लिखी गई थी .यह 11 वीं या 10 वीं शताब्दी की रचना है . इसे पटना संग्रहालय में रखा गया है . भारतीय न्याय- दर्शन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति प्रमाण वर्तिका की मूल प्रति की खोज में दुबारा 1934 में राहुल जी तिब्बत गए . अपनी तीसरी यात्रा 1935 में इस महान अन्वेषक ने शाक्य , नगौर एवं शालू मठ से 156 नए ग्रंथों का उद्धार किया .जो अपने आप में युगांतकारी घटना है. भारतीय दर्शन एवं बौद्ध दर्शन के अध्येयता शताब्दियों तक इस महान खोज कर्ता के प्रति कृतज्ञ रहेंगे . राहुल सांकृत्यायन द्वारा उद्धार किए गए ग्रंथों की संपूर्ण सूची बिहार एवं उड़ीसा रिसर्च सोसायटी में उपलब्ध है .तिब्बत से लाये गये समस्त ग्रन्थ संग्राहालय में रखे गए हैं .उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना बुद्ध के जीवन पर बुद्धचर्या है यह बातें काशी प्रसाद जायसवाल ने “संस्कृत की कोई कृतियों का तिब्बत से उद्धार”नामक एक लंबे लेख में लिखी है . राहुल जी ने बुद्ध दर्शन को तार्किक रुप से स्थापित किया. दर्शन की कई किताबें लिखी .जिनमें वैज्ञानिक भौतिकवाद, बौद्ध दर्शन एवं दर्शन दिग्दर्शन जोकि बेहद चर्चित भी रही .वहीं बौद्ध धर्म पर बुद्धचर्या, धम्मपद, मज्झिम निकाय, विनय पटिका, दीर्घ निकाय एवं महामानव बुद्ध लिखी . राहुल जी ने विपुल साहित्य का लेखन किया . जिनमें दर्शन, राजनीतिक, जीवनी , निबंध , यात्रा वृतांत , इतिहास, कहानी, उपन्यास आदि बहु विषयों एवं विधाओं में लिखा और पूरी गंभीरता एवं शोधपरक ढ़ंग से लिखा . जीवनियों में स्वयं की जीवनी मेरी जीवन यात्रा दो भागों में लिखी . थी इसके अलावा सरदार पृथ्वी सिंह, अतीत से वर्तमान ,स्तालिन, कार्ल मार्क्स, लेनिन, माओ त्से तुंग , वीर चंद्र गढ़वाली ,जिनका मैं कृतज्ञ और अकबर आदि महत्वपूर्ण जीवनियां लिखी . अकबर पुस्तक के अंतिम 37 पृष्ठ में सिर्फ परिशिष्ट है .जिसमें लिखा गया है कि पुस्तक की फला - फला घटना की वास्तविक जानकारी किस श्रोत या कहां से प्राप्त की गई है. इससे राहुल जी के लेखन की गंभीरता एवं शोधकर्ता का पता चलता है. वहीं राजनीतिक साम्यवाद पर साम्यवाद ही क्यों, दिमागी गुलामी , सोवियत न्याय, आज की राजनीति, कम्युनिष्ट क्या चाहते हैं, भागो नहीं दुनिया को बदलो , मानव समाज एवं बाईसवीं सदी ,प्रमुख हैं . यात्रा वृतांत के मामले में तो राहुल जी को भारतीय यात्रा साहित्य का पितामह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. उन्होंने आधी दुनिया की यात्रा की .रूस,चीन, ईरान, तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका ,कोरिया ,जापान, इंग्लैंड, एवं यूरोप यात्रा की और यात्रावृत्त पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी . जिनमें मेरी लद्दाख यात्रा, लंका यात्रावली, तिब्बत में सवा वर्ष, मेरी यूरोप यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा, जापान, ईरान, रूस में 25 मास , एशिया के दुर्गम खंडों में, एवं सबसे चर्चित यात्रा की पुस्तक घुमक्कड़ शास्त्र विशेष उल्लेखनीय है . जिसमें 15 लेख हैं सबसे चर्चित लेख है अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा इसमें राहुल जी लिखते हैं - कोलंबस और वास्को द गामा घुमक्कड़ी ही थे . जिन्होंने पश्चिम देशो के आगे बढ़ने का रास्ता खोला . अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था . एशिया के कूपमंडूकों को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गई . इसीलिए अमेरिका पर अपना झंडा नहीं गाड़ा . दो शताब्दियों तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था. चीन और भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व था लेकिन इनको इतनी अकल नहीं आई कि वहां जाकर अपना झंडा गाड़ आते . आज अपने 40 - 50 करोड़ की जनसंख्या के भार से भारत और चीन की भूमिका दबी जा रही है और आस्ट्रेलिया में एक करोड़ आदमी भी नहीं हैं . आज एशियाईयों के लिए आस्ट्रेलिया का द्वार बंद है . लेकिन दो सदी पहले वह हमारे हाथ की चीज थी . क्यों भारत और चीन ऑस्ट्रेलिया की अपार संपत्ति और अमित भूमि से वंचित रह गए . इसलिए कि वह घुमक्कड़ धर्म से विमुख थे उसे भूल चुके थे . इसी निबंध में बड़े ही रोचक तरीके से राहुल जी लिखते हैं कि कैसा घुमक्कड़ होना चाहिए, या घुमक्कड़ बनने के लिए क्या गुण होने चाहिए . निबंध के उत्तरार्ध में लिखते हैं - यदि कोई तरूण - तरुणी घुमक्कड़ धर्म की दीक्षा लेता है मैं यह अवश्य कहूंगा कि यह दीक्षा वही ले सकता है जिसमें बहुत भारी मात्रा में हर तरह का साहस है , तो उसे किसी की बात नहीं सुननी चाहिए, ना पिता के भय और ना उदास होने की , न भूल से विवाह कर लाई अपनी पत्नी के रोने - धोने की और न किसी तरुणी को अभागे पति की कलपने की. बस शंकराचार्य के शब्दों में यही समझना चाहिए - निस्त्रैगुन्यै पथ विचारतः को विधि को निषेधः और मेरे गुरु कपोत राज को अपना पथ प्रदर्शक बनाना चाहिए.
सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां
जिंदगानी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहां
अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा के आखिरी हिस्से में वास्तव में राहुल जी ने स्वानुभव रखा है एक पंक्ति उन्होंने शायद अपनी पहली पत्नी संतोषी जी के बारे में निर्ममता पूर्वक लिखा है - न भूले से विवाह कर लाई गई अपनी पत्नी के रोने धोने की वे संतोषी के साथ विवाह को भूल मानते थे. पर राहुल जी और इनके परिवार की एक भूल से संतोषी का पूरा जीवन ही निर्जन हो गया . उस समय की सामाजिक प्रथा के हिसाब से संतोषी जी ने अपना संपूर्ण जीवन बलिदान कर दिया . वास्तव में संतोषी के बलिदान का फल हैं कि साधारण अनगढ़ केदार महान राहुल सांकृत्यायन बन सके.
अपनी रूस यात्रा के दौरान ही राहुल जी ने रूस में लोला और फिर भारत लौटने पर कमला से विवाह किया . उनके जीवन के कुछ बड़े अंतर्विरोध भी हैं नागार्जुन जी एक बार राहुल जी के गांव गए थे . उनकी पत्नी से भी मिले थे . राहुल जी लिखते हैं - चारों तरफ से स्त्रियां झांक रही थी जंगले से. मैं चुप साधे था .तभी एक वृद्धा आई और उनकी पत्नी को खींच कर ले गई और जोर से चिल्लाती हुई बोली - छोड़ो - छोड़ो, चलो यहां से , यह भी किसी को छोड़कर भाग आया होगा केदारनाथ ने तो भगोड़ों की जमात कायम कर ली है. मैंने राहुल को ये प्रसंग सुनाया था . पर लेख में नागार्जुन जी ने यह नहीं लिखा कि, प्रसंग को सुनने के बाद विलक्षण राहुल की क्या प्रतिक्रिया थी ? इन तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद राहुल जी देश - दुनिया को अपने विचारों और साहित्य लेखन से बहुत कुछ दिया . जिस प्रकार राहुल जी के कदम नहीं रुके, उसी प्रकार उनकी कलम भी नहीं रुकी. कलम व कदम साथ - साथ कदमताल करते रहे . हर विषय पर कलम चलाई . इतिहास पर विश्व की रूपरेखा, पुरातत्व निबंधावली, मध्य एशिया का इतिहास, भारत में अंग्रेजी राज्य के संस्थापक , बौद्ध संस्कृति जैसी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी . साथ ही कथा साहित्य में कहानी संग्रह सतमी के बच्चे और वोल्गा से गंगा बेहद चर्चित रही . यहां हल्की सी चर्चा बेहद जरूरी है . सतमी के बच्चे कहानी मात्र कहानी नहीं है . राहुल जी का आंखों देखा जीवन है संस्मरण है . इस कहानी की पहली ही पंक्ति है - सतमी अहीरिन पन्दहा में सबसे गरीब थी. ध्यान देने वाली बात है, पन्दहा वही गांव है, जहां राहुल जी का बचपन बीता.पन्दहा उनका ननिहाल था . नाना रामशरण पाठक का गांव . राहुल जी ने सतमी के बच्चे में जीवन का यथार्थ रूप दिखाया है . बिना लाग लपेट के. कि कैसे गरीबी और अभाव के चलते सतमी अहीरिन के चारो पुत्र बुद्धू, सुद्धू, मुद्धू और संतू एक- एक कर चारों पुत्र जाड़े और अभाव की बलि चढ़ जाते हैं . रात और दिन जिस समय उसे अपने बच्चे याद आते वह विलाप कर रोने लगती थी. पंक्तियां देखिए - हाय बुद्धू ,क्या पिसाई करके तुम्हें इसीलिए पाला था ? तुम मुझे धोखा देकर चले गए. हाय मैं कितनी निर्लज्ज हूं .अपने चार बेटों को खाकर अब भी बैठी हूं. हाय देव मुझे काहें नहीं उठा लेते.
राहुल जी का दूसरा कहानी संग्रह वोल्गा से गंगा भी बेहद चर्चित रहा . वोल्गा से गंगा मात्र कहानी नहीं है . बल्कि ये कहानियां 8000 वर्षों तक फैले मानव जीवन के विकास का इतिहास प्रस्तुत करती हैं . भूमिका में राहुल जी लिखते हैं - मनुष्य आज जहां है, वहां प्रारंभ में ही नहीं पहुंच गया था. इसके लिए उसे बड़े – बड़े संघर्षों से गुजरना पड़ा . मनुष्य के दीर्घ संघर्ष और सृजन की कहानी है “वोल्गा से गंगा”
कार्ल मार्क्स की तरह राहुल जी इतिहास लिखने के बजाए इतिहास बदलने पर बल देते थे .राहुल जी ने सिंह सेनापति, जय यौधेय, मधुर स्वपन और विस्मृत यात्री जैसे ऐतिहासिक उपन्यास लिखे . उनकी चर्चित पुस्तकों में घुमक्कड़ शास्त्र, भागो नहीं दुनिया को बदलो , दर्शन- दिग्दर्शन, सतमी के बच्चे , वोल्गा से गंगा और बुद्ध चर्या प्रमुख हैं .राहुल जी ने भोजपुरी में भी कई नाटक लिखे जिनमें मेहरारून की दुर्दशा और नइकी दुनिया उल्लेखनीय है । वह मेहरारू की दुर्दशा में लिखते हैं बेहद तीखे व विद्रोह के स्वर में –
एके माई बपवा से एक ही उदारवा में
दूनों के जनमवां भइल रे पुरुखवा
पूत के जनमवा में नाच आ सोहर होला
बेटि के जनम परे सोग रे पुरूखुवा
धनवा धरतिया पे बेटवा के हक होला
बिटिया के किहुओ ना हक़ रे पुरुखवा .
राहुल जी नारी स्वतंत्रता व उसके अधिकार को लेकर भी मुखर रहे हैं . उनकी चर्चित पुस्तक भागो नहीं दुनिया को बदलो में औरत शीर्षक से एक पूरा अध्याय है .वह लिखते हैं - मरद औरत को गुलाम बनाकर अपने घर में लाता है और इसको कहते हैं ब्याह. राहुल जी के लेखन एवं व्यक्तित्व पर एक लेख या वार्ता में लिखना संभव नहीं है पर एक दृष्टि तो डाली ही जा सकती है एक आखरी बात यह कि राहुल जी हिंदी के पक्षधर होने के साथ-साथ हिंदी के अनन्य प्रेमी व लेखक हैं . वे तमाम भाषाएं समझते व बोलते थे , पर उन्होंने अपना महत्वपूर्ण लेखन हिंदी में किया . दूसरी भाषाओं के ज्ञान का उपयोग उन्होंने ज्ञानार्जन एवं अनुवाद में किया . अपनी जीवनी मेरी जीवन यात्रा में एक जगह लिखते हैं - 34 बरस पर लौटे राम शरण पाठक के नाती अथवा हिंदी के लेखक राहुल सांकृत्यायन की खबर पाकर आसपास के गांवों के लोग भी आते रहे . यहां ध्यान देने योग्य बात है कि राहुल जी स्वयं को हिंदी का लेखक कहलाने में गौरव अनुभव करते हैं . हिंदी और विकास लेख में राहुल जी लिखते हैं - यदि किसी समाज का निम्न वर्ग उन्नति करेगा, तभी पूरा समाज उन्नति करेगा और उनके उत्थान का यह कार्य किसी विदेशी भाषा के माध्यम से संभव नहीं . क्योंकि भाषा का सवाल सीधे रोटी का सवाल भी होता है . दूसरे लेख में जिसका शीर्षक हिंदी के विभीषण है में राहुल जी लिखते हैं - जो आजाद भारत में भी अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ पा रहे और पैसा खर्चा करके अंग्रेजी पढ़ते हैं वह हिंदी को क्यों पसंद करने लगे. ऊंची नौकरियों की प्रतियोगिता के लिए हिंदी या प्रादेशिक भाषाओं को माध्यम मान लेने पर “सब धान 22 पसेरी हो जाएगा” । कान्वेंट की घुट्टी पिलाने वाले या यूरोपियन स्कूल में पढ़ने वाले लड़कों के पास ही प्रतिभा की इजारेदारी है यह कोई नहीं मानेगा . हिंदी में प्रतियोगिता होने पर उनके लिए सफलता अत्यंत संदिग्ध है .इसीलिए उनके माता-पिता जिनमें देव - महादेव से लेकर बड़े-बड़े नौकरशाह तक शामिल हैं कभी पसंद नहीं करते कि अंग्रेजी हटे. एक जगह और वह लिखते हैं - चाहे दिल्ली के देवता कितने ही शाप देते रहें , अपनी मातृभाषा और मातृ संस्कृति के प्रति लोगों का प्रेम कम नहीं हो सकता तो ऐसा था राहुल जी का हिंदी व भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम
12 वर्ष की उम्र से कविता , कहानी आदि का लेखन, विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में भाषण गायन, अन्ताक्षरी, एकांकी आदि में प्रथम .लेखक ,पत्रकार, वक्ता, शोध कर्ता, कई पत्र ,पत्रिकाओं का सम्पादन, फिल्म लेखन, कई पुस्तकों का सम्पादन, अब तक चार उपन्यास ( अठन्नी वाली बाबूजी, त्यागमूर्ति हिडिम्बा, विद्रोही शुक्राचार्य, पतिव्रता वेश्या ) दो कहानी संग्रह (चवन्नी का मेला, पेड़ा बाबा की कृपा ) तीन कविता संग्रह ( काले अक्षर कविता और कवि, मैंने प्रेम बो दिया और बाल कविता संग्रह बचपन की प्रकृति) एवं एक अनुवाद प्रकाशित ! सीबीएसई बोर्ड के तीसरी और चौथी कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में बाल कवितायें शामिल! आकाशवाणी पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर विशेष वक्तव्य, देश के सबसे बड़े भजन संकलन भजन गंगा का अतिथि सम्पादन, इंडियन प्रेस कौन्सिल की पहली स्मारिका का सम्पादन आदि
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