यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

क्या कोई राहुल, कोई केजरी, कोई राजा, कोई त्यागी कोई मीडिया लवकेश की आत्महत्या पर लब खोलेगा

बिना किसी भूमिका के आज मैं लवकेश मिश्रा की बात करूंगा यह भी एक छात्र ही था . जिसनें पिछले दिनों  लखनऊ के BNCET महाविद्यालय के एचआर डिपार्टमेंट की प्रताड़ना के चलते आत्महत्या कर ली. उसने बाकायदा अपने सुसाइड नोट में लिखा कि क्यों वह आत्महत्या कर रहा है, फिर उसे इन्साफ क्यों नहीं ? 
क्या यह पीड़ित नहीं था ? क्या इसके प्रति समाज के नेताओं की, बुद्धिजीवियों की , समाज के कथित ठेकेदार मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती. इसकी जान की कोई कीमत नहीं है, सिर्फ इसलिए कि वो सवर्ण था. यह सवाल है क्या सवर्ण मनुष्य नहीं होते. उनमें जीवन नहीं होता . उनमें अभाव नहीं होता , उनके वोट की कीमत नहीं होती या फिर वे अपनी कीमत  नहीं समझा पा रहे,  क्या सवर्ण वोट बैंक नहीं बन पा रहे हैं या सवर्ण ही सवर्ण समाज के दुश्मन हैं इस बारे में सोचने की आवश्यकता है लवकेश मिश्रा की आत्महत्या का मामला राजनीतिक गलियारों, विधानसभाओं, लोकसभा के निचले और उच्च सदन में कहीं भी उस तरह से नहीं सुनाई दिया या यूं कहें कि सुनाई ही नहीं दिया, जिस तरह से रोहित वेमुला का मुद्दा चारों दिशाओं में दिग दिगंत हुआ .लोकेश की मृत्यु पर कोई शोक मनाने नहीं गया. कोई नेता, कोई अभिनेता, कोई विचारक, कोई मानवतावादी, कोई वामपंथी, कोई समाजवादी या फिर कोई भी वादी, किसी को भी लोकेश की मृत्यु में मनुष्यता की मृत्यु नहीं दिखाई दी.क्योंकि उसकी मृत्यु पर राजनीतिक, सामाजिक लाभ नहीं उठाया जा सकता था क्योंकि सवर्ण समाज उसकी मृत्यु पर कोई जाटों, गुर्जरों, दलितों की तरह विनाशक आन्दोनल नहीं कर सकता, शायद इसी लिएउसके मरने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि वह सवर्ण है.सवर्णों में एकजुटता नहीं है. इसीलिए उसकी मृत्यु का कोई मोल नहीं है. यह मामला लोगों ने जो अपने आप को बुद्धिजीवी, नेता, समाज सुधारक एवं मानवतावादी कहते हैं. उन्होंने लवकेश की आत्महत्या को जातिवादी चश्में से देखा . यह पूरी तरह जाति के दृष्टिकोण से देखा गया मामला है इसीलिए उसकी मृत्यु मूल्यहीन रही. नहीं तो वह भी रोहित वेमुला की तरह महीनों, 24 घंटे, दिन-रात मीडिया और नेताओं की जुबान पर त्राहि - त्राहि करता रहता, लखनऊ BNCET कालेज  के छात्र लोकेश के साथ दो अन्य छात्र भी पढ़ते थे. जिन्होंने कॉलेज की प्रताड़ना से तंग आकर कुछ ही दिनों में कॉलेज छोड़ दिया, किंतु लवकेश प्रताणना सहते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी क्योंकि उसे अपने किसान माता-पिता के दुख को दूर करने की जिम्मेदारी थी. उसने अपने माता-पिता से वादा किया था कि वह जल्द ही इंजीनियर बन कर अच्छा पैसा कमाएगा और अपने माता पिता के दुखो को दूर करेगा ,किंतु ऐसा हो सका. आखिरकार उसने कॉलेज की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली. लवकेश के भाई ऋषिकेश ने बताया कि कॉलेज प्रशासन ने कई बार उससे नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे मांगे .कुछ महीने पहले ही कॉलेज प्रशासन ने नौकरी दिलाने के नाम पर 5000  रूपये मांगे थे. कॉलेज प्रशासन ने कहा कि कॉलेज में नौकरी के लिए कंपनी रही है इसमें शामिल होने के लिए 5000  रूपये जमा करने होंगे. इस तरह किसी ना किसी बहाने कॉलेज प्रशासन ने कई बार पैसे मांगे. गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले लवकेश इस आर्थिक मांग से बेहद परेशान थे वह बार-बार अपनी किसान पिता को प्रताड़ित नहीं करना चाहता था अधिक आर्थिक दबाव न सह पाने के कारण ही लोकेश ने आत्महत्या कर ली. लवकेश के चचेरे भाई ऋषिकेश का कहना है कि लवकेश की मौत के बाद से उनकी माता सदमे में हैं और स्वास्थ्य इतना खराब हो गया है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. लोकेश की बहन अर्चना भी इस सदमें का शिकार हो गई और उन्हें भी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. लवकेश के  किसान पिता ओम प्रकाश मिश्र की हालत भी बेहद दयनीय है. कर्ज लेकर के बेटे को पढ़ा रहे थे कर्ज का पैसा भी नहीं चुका सके और बेटा भी खो दिए. एक पिता का दर्द सिर्फ एक पिता ही जान सकता है. वह भी ऐसा पिता जिसनें अपने  नौजवानपुत्र को खो दिया हो. इस घटना के मर्म को कोई भाषण देने वाला नेता या किसी विश्विद्यालय का प्राध्यापक किसी संकाय का अध्यक्ष जो मोटी तनख्वाह लेता है में मानवता पर बड़े बड़े भाषण देता है वह नहीं समझ सकता कि आखिर इस का जिम्मेदार कौन है ? क्या कोई केजरीवाल ,क्या कोई भी  डी. राजा, क्या कोई राहुल गांधी, क्या कोई के सी त्यागी, क्या कोई मायावती, क्या कोई अखिलेश, क्या कोई विचारक, क्या कोई मानवतावादी, इस पर अपने लब खोलेगा ? क्या कोई उस किसान पिता को दिलाशा दिलाएगा ,कि हम आपके साथ हैं आप के बेटे को भी न्याय मिलेगा, क्या किसी मीडिया का तंबू बंबू उसके घर के सामने टिकेगा ? क्या कोई मीडिया की वोबी वैन उसके दरवाजे पर खड़ी होगी ? क्या कोई पत्रकार उसकी इस दुखद परिस्थिति में कोई लेख लिखेगा ? क्या कोई संपादक लवकेश मिश्रा पर संपादकीय लिखेगा ?क्या कोई बुद्धिजीवी उस पर ब्लॉग या कालम लिखेगा ? आज एक बड़ा प्रश्न है  या यह सिर्फ इसलिए नहीं लिखा जाएगा लोकेश ब्राह्मण नाम जाति में उत्पन्न हुआ .उसके लिए उत्पन्न शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूं कि पैदा तो दलित होते हैं, पैदा तो पिछड़े होते हैं ,वह जाती से पिछड़े माने जाते हैं उनके लिए एक तीसरी आंख का मापदंड है ,उनके लिए चैनल हैं, उनके लिए संसद है, उनके लिए विधानसभा है, उनके लिए एक्टिविस्ट हैं, लेकिन जो समान शब्द का तगमा लेकर आया है, उत्पन्न हुआ है, उसे कोई संवेदना का , किसी की करुणा का कोई हक नहीं है .गम्भीरता से सोचना होगा अगर जातिगत बात ही है. सवर्णो को सोचना होगा. उन सवर्णो को धिक्कार है जो संसद में बैठे हैं, जो विधानसभा में बैठे हैं, जो बड़े-बड़े महाविद्यालयों ,विश्वविद्यालयों में बैठे हैं,प्रसाशन में बैठे हैं, मोटी तनख्वाह लेते हैं और लच्छेदार भाषण देते हैं .जिनका अपना शासन - प्रशासन के गलियारे में प्रभाव है .उनमें जरा भी लाज, शर्म मनुष्यता या जो कुछ भी कहते हैं उन्हें लोकेश के लिए भी उतनी ही सिद्दत, उतनी ही जिम्मेदारी से आवाज उठानी चाहिए. क्योंकि सबसे पहले वह मनुष्य है, पीड़ित है और फिर पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए .फिर वह किसी जाति ,धर्म, वर्ग ,कार्य क्षेत्र से हो यदि ऐसा नहीं होता है तो सारा कुछ ढोंग है  और इस ढ़ोंग को तोड़ना होगा .यह हर किसी की जिम्मेदारी है जो स्वयं को जाति पंथ से ऊपर उठकर मनुष्य कहलाता है ,तो आइएलवकेश के लिए आवाज़ उठाएं जो लोग  उसे महत्व नहीं देते, उसकी मृत्यु को महत्व नहीं देते, जिनके लिए लवकेश किसी दूसरी दुनिया का जीव है, उसके लिए जाति के नाम पर ही सही, जिनका जाति में विश्वास है, सवर्ण में विश्वास है जिन्हे गर्व है अपने सर्वण होने पर ,उन्हें तो  निश्चित ही शर्म आनी चाहिए,औरयदि शर्म है तो उठो ,आवाज उठाओ और  जो स्वयं को जाति धर्म पंथ से ऊपर मानते हैं .जिनका सिर्फ मनुष्यता में विश्वास है उन्हें तो सबसे पहले लवकेश के लिए पूरी शिद्दत, ताकत से आवाज उठानी चाहिए. आज ही उनके असली चरित्र और मनुष्यता की पहचान होगी. इससे अधिक कहना या लिखना मेरे लिए मूर्खता होगी .जिन्हें समझ है वह समझें, कुछ करें, नहीं तो फिर आगे आग लगेगी, जिसे किसी जाति का, कोई नेता, कोई विचाकर बुझा नहीं पाएगा.जो संसद में, विधान सभा में पिछड़े - पिछड़े चिल्ला रहें हैं.वे भला बतायेंगे कि वे कब अगड़े कहलायेगे. अरे भाई प्रधान मंत्री पिछड़ा, मुख्यमंत्री पिछड़ा कमिश्नर पिछड़ा ,अब और क्या लोगे या बना दिए जाओ या बन जाओ तो अगड़े मानोगे.सांसद, मंत्री होने के बाद भी पिछड़ा, दलित, शोषित चिल्लाने का मतलब वे मानसिक रूप से पिछड़े हैं.कुल मिलाकर आख़िरी सत्य भारत जातिवादी देश है.जाति के नाम पर सारा खेल और फिर जातिवाद का झूठा विरोध.ऐसा दोगलापन भारत में ही हो सकता है.

मंगलवार, 8 मार्च 2016

चित्रकला बनाना कैसे सीखें....? आइये जानें

आज के आधुनिक युग में तमाम कलाएं व शैलियाँ भारत में फल- फूल रही हैं. उन्ही  में एक तेजी से पल्लवित - पुष्पित होती कला का नाम है ''चित्र कला'' जिन्हें कुछ लोग पेंटिंग भी कहते हैं.आज मैं इसी विधा के बारे में बताऊंगा कि कैसे एक चित्र कला प्रेमी बिना किसी प्रशिक्षण के पेंटिंग बनाने की शुरुआत कुछ संसाधनों के माध्यम से कर सकता है. वैसे इस क्षेत्र में काफी युवा बाकायदा डिग्रियां लेकर आ रहे हैं तो कुछ नैसर्गिक प्रतिभा के धनी शौकिया या सीधे शुरू हो जाते हैं.यदि आप किसी प्रतिष्ठित कला महा विद्यालय से स्नातक या परास्नातक नहीं हैं और फिर भी आप चित्रकला बनाने में रूचि रखते हैं और बनाना चाहते हैं तो आइये हमारे संग हम आप को इस विधा की कुछ मूलभूत
बातें बताते हैं .ताकि आप पेंटिंग शुरू करने से पहले पूरी तैयारी कर लें. ताकि आप को  पेंटिंग बनाने में आसानी हो.
आइये तो तैयारी शुरू करते हैं.
सबसे पहले आप एक इजल [पेन्टिंग स्टैंड]लें. जो हिलता - डुलता न हो.जिस पर कैनवास  ठीक से रख सकें.कैनवास अच्छी  प्रतिष्ठित कंपनी का ही लें .इससे आप को पेंटिंग बनाने में आसानी होगी .कैनवास शुद्ध उच्च कोटि के कपास के धागे का बना होता है . अच्छे कैनवास के धागों में गांठ नहीं पड़ती .जब धागा एक -दूसरे के ऊपर से गुजरता है तो जो चौराहा बनता है , वहाँ हल्का सा गड्ढा बनता है यहीं रंग को  टिकने को मिलता है .इससे पेंटिंग खिलती है . कैनवास 500 से लेकर 2000 रूपये मीटर तक आमतौर पर मिलता है . अच्छे कैनवास की उम्र 100 से भी अधिक होती है . इस पर पपड़ी भी नहीं पड़ती . कैनवास की प्रतिष्ठित कम्पनियाँ हैं . बीपीओ , मोनालिसा , विन्सर न्यूटन ,कैमेल, लेफांट एवं रीब्स आदि .आप अपने बजट के हिसाब से कैनवास का चुनाव कर  सकते हैं . कैनवास पर पेंटिंग इसलिए बनाते हैं  क्योंकि इसे मोड़ कर रख सकते हैं और इसे कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है .कैनवास पर पेंटिंग बनाने में सहजता  महसूस होती है  क्योकि कैनवास के धागे में गांठ नहीं होती .
रंग अर्थात कलर का चुनाव
रंगों का प्रयोग सावधानी पूर्वक करें इसके रंग बेहद मंहगे मिलते हैं 100 मिलीमीटर का कलर ट्यूब औसतन 3500 रुपये का होता है .सबसे बढ़िया ''आर्टिस्ट कलर '' होता है . इसमें भी 1, 2, 3 ,4 सीरीज होती है .बच्चों के सीखने के लिए भी स्टूडेंट कलर आते हैं .जिसमें पेंस्टल,व चारकोल पेन्सल कलर शामिल हैं .रंग प्रतिष्ठित कम्पनी का ही लें ,जैसे बीपीओ ,  विन्सर न्यूटन ,पेलीकान  एवं रीब्स  आदि .
ब्रश का चुनाव

इसके बाद ब्रश का चुनाव करें .अगर टेक्सचर [ खुरदुरा ]  इफेक्ट करना है तो आप हॉग [बड़े बालों वाला ब्रश ] ब्रश का इस्तेमाल करें और कम फिनिस या फ़ाइन करना हो तो सेंम्बर [ मुलायम ब्रश ]  का इस्तेमाल करें .इन दो तरह के ब्रशों को धोने के लिए तारपीन खरीद कर रख लें .ब्रश को पोछने के लिए एक अच्छा तौलिया  रखें . रंग ,ब्रश  व अन्य सम्बंधित सामान रखने के लिए  एक अच्छा स्टैंड बनायें  ताकि उसे उचित जगह रख सकें . साथ में ज्यामेट्रिक इक्विपमेंट भी रखें .

 अब पेंटिंग करना शुरू करें

एक अच्छा कैनवास लें .उसे खोलकर ठीक से स्टेच करें . फिर आप अपने विषय के हिसाब से रनग का एक कोट  कैनवास पर मार दें .
अब आप को  सोंचिये  कि आप को उसपर स्केच करना है या पेंटिंग . आप रंग का भी चुनाव कर लें  कि आप ऑयल  करना चाहते हैं या एक्रेलिक . वाटर कलर  काफी देरी में सूखता है  उसके बाद एक्रेलिक . वाटर कलर कभी भी धोया या साफ़  किया  जा सकता है परन्तु ऑयल कलर  कभी नहीं छूटता. ज्यादातर चित्रकार ऑयल का इस्तेमाल करते हैं .इससे बनी चित्रकला  खूबसूरत  और चमकदार होती है . इसकी साफ -सफाई  [ धूल - मिट्टी ]भी की जा सकती है .पेंटिंग बनाते समय शोर नहीं होना चाहिए . शांत जगह होनी चाहिए .ताकि चित्रकला बनाते समय दिमाग स्थिर रहे और विषय  प्रभावित न हो . अगर आप संगीत के शौकीन हैं  तो आप चित्रकला बनाते समय मधुर संगीत सुनें . चित्रकला की  ,
सुन्दरता में  'फ्रेम' का भी विशेष महत्त्व होता है . इस लिए अपनी चित्रकला के अनुसार फ्रेम का चयन करें . इससे  चित्रकला की सुन्दरता पर असर पड़ता है .चित्रकला के पीछे अच्छे हुक  की व्यवस्था होनी चाहिए . ताकि आसानी से टांगा व उतारा जा सके .तो ये हुई कुछ चित्रकला बनाने की मुलभूत बातें . इसके अलावा  आप पेंटिंग्स की दुनिया के बारे में कुछ और जानने को उत्सुक है तो  थोडा और जानिए . आज भारत में दो तरह की विधा में ज्यादा काम हो रहा है .एक फ़ाईन आर्ट [ ललित कला ] दूसरा माँर्डन आर्ट[ आधुनिक कला . इसके आलावा आब्सट्रैक्ट [ आभासी कला ] में भी चित्रकला  बन रही है . आज भारत   में चित्रकला का बाज़ार प्रति वर्ष  अनुमानतः 1000 करोड़ रुपये का है . भारत के प्रसिद्द चित्रकारों में  तैयब मेहता , राम कुमार , अकबर पदमसी,स्व . मकबूल फ़िदा हुसैन , एन. एन. सूजा, एस. एच .रजा, के. एच. आरा, जेमिनी रॉय .पृथ्वी सोनी  तथा मुंबई के  युवा चित्रकारों में राम जी शर्मा, घनश्याम गुप्ता, नरेन्द्र बोरलेपवार आदि अनेक  प्रतिभाशाली चित्रकार हैं . इन कलाकारों की एक -एक चित्रकला के मूल्य लाख से लेकर करोड़ों तक हैं.
poetpawan50@gmail.com
7718080978
चित्रकला - राम जी शर्मा