यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

क्या कोई राहुल, कोई केजरी, कोई राजा, कोई त्यागी कोई मीडिया लवकेश की आत्महत्या पर लब खोलेगा

बिना किसी भूमिका के आज मैं लवकेश मिश्रा की बात करूंगा यह भी एक छात्र ही था . जिसनें पिछले दिनों  लखनऊ के BNCET महाविद्यालय के एचआर डिपार्टमेंट की प्रताड़ना के चलते आत्महत्या कर ली. उसने बाकायदा अपने सुसाइड नोट में लिखा कि क्यों वह आत्महत्या कर रहा है, फिर उसे इन्साफ क्यों नहीं ? 
क्या यह पीड़ित नहीं था ? क्या इसके प्रति समाज के नेताओं की, बुद्धिजीवियों की , समाज के कथित ठेकेदार मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती. इसकी जान की कोई कीमत नहीं है, सिर्फ इसलिए कि वो सवर्ण था. यह सवाल है क्या सवर्ण मनुष्य नहीं होते. उनमें जीवन नहीं होता . उनमें अभाव नहीं होता , उनके वोट की कीमत नहीं होती या फिर वे अपनी कीमत  नहीं समझा पा रहे,  क्या सवर्ण वोट बैंक नहीं बन पा रहे हैं या सवर्ण ही सवर्ण समाज के दुश्मन हैं इस बारे में सोचने की आवश्यकता है लवकेश मिश्रा की आत्महत्या का मामला राजनीतिक गलियारों, विधानसभाओं, लोकसभा के निचले और उच्च सदन में कहीं भी उस तरह से नहीं सुनाई दिया या यूं कहें कि सुनाई ही नहीं दिया, जिस तरह से रोहित वेमुला का मुद्दा चारों दिशाओं में दिग दिगंत हुआ .लोकेश की मृत्यु पर कोई शोक मनाने नहीं गया. कोई नेता, कोई अभिनेता, कोई विचारक, कोई मानवतावादी, कोई वामपंथी, कोई समाजवादी या फिर कोई भी वादी, किसी को भी लोकेश की मृत्यु में मनुष्यता की मृत्यु नहीं दिखाई दी.क्योंकि उसकी मृत्यु पर राजनीतिक, सामाजिक लाभ नहीं उठाया जा सकता था क्योंकि सवर्ण समाज उसकी मृत्यु पर कोई जाटों, गुर्जरों, दलितों की तरह विनाशक आन्दोनल नहीं कर सकता, शायद इसी लिएउसके मरने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि वह सवर्ण है.सवर्णों में एकजुटता नहीं है. इसीलिए उसकी मृत्यु का कोई मोल नहीं है. यह मामला लोगों ने जो अपने आप को बुद्धिजीवी, नेता, समाज सुधारक एवं मानवतावादी कहते हैं. उन्होंने लवकेश की आत्महत्या को जातिवादी चश्में से देखा . यह पूरी तरह जाति के दृष्टिकोण से देखा गया मामला है इसीलिए उसकी मृत्यु मूल्यहीन रही. नहीं तो वह भी रोहित वेमुला की तरह महीनों, 24 घंटे, दिन-रात मीडिया और नेताओं की जुबान पर त्राहि - त्राहि करता रहता, लखनऊ BNCET कालेज  के छात्र लोकेश के साथ दो अन्य छात्र भी पढ़ते थे. जिन्होंने कॉलेज की प्रताड़ना से तंग आकर कुछ ही दिनों में कॉलेज छोड़ दिया, किंतु लवकेश प्रताणना सहते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी क्योंकि उसे अपने किसान माता-पिता के दुख को दूर करने की जिम्मेदारी थी. उसने अपने माता-पिता से वादा किया था कि वह जल्द ही इंजीनियर बन कर अच्छा पैसा कमाएगा और अपने माता पिता के दुखो को दूर करेगा ,किंतु ऐसा हो सका. आखिरकार उसने कॉलेज की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली. लवकेश के भाई ऋषिकेश ने बताया कि कॉलेज प्रशासन ने कई बार उससे नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे मांगे .कुछ महीने पहले ही कॉलेज प्रशासन ने नौकरी दिलाने के नाम पर 5000  रूपये मांगे थे. कॉलेज प्रशासन ने कहा कि कॉलेज में नौकरी के लिए कंपनी रही है इसमें शामिल होने के लिए 5000  रूपये जमा करने होंगे. इस तरह किसी ना किसी बहाने कॉलेज प्रशासन ने कई बार पैसे मांगे. गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले लवकेश इस आर्थिक मांग से बेहद परेशान थे वह बार-बार अपनी किसान पिता को प्रताड़ित नहीं करना चाहता था अधिक आर्थिक दबाव न सह पाने के कारण ही लोकेश ने आत्महत्या कर ली. लवकेश के चचेरे भाई ऋषिकेश का कहना है कि लवकेश की मौत के बाद से उनकी माता सदमे में हैं और स्वास्थ्य इतना खराब हो गया है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. लोकेश की बहन अर्चना भी इस सदमें का शिकार हो गई और उन्हें भी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. लवकेश के  किसान पिता ओम प्रकाश मिश्र की हालत भी बेहद दयनीय है. कर्ज लेकर के बेटे को पढ़ा रहे थे कर्ज का पैसा भी नहीं चुका सके और बेटा भी खो दिए. एक पिता का दर्द सिर्फ एक पिता ही जान सकता है. वह भी ऐसा पिता जिसनें अपने  नौजवानपुत्र को खो दिया हो. इस घटना के मर्म को कोई भाषण देने वाला नेता या किसी विश्विद्यालय का प्राध्यापक किसी संकाय का अध्यक्ष जो मोटी तनख्वाह लेता है में मानवता पर बड़े बड़े भाषण देता है वह नहीं समझ सकता कि आखिर इस का जिम्मेदार कौन है ? क्या कोई केजरीवाल ,क्या कोई भी  डी. राजा, क्या कोई राहुल गांधी, क्या कोई के सी त्यागी, क्या कोई मायावती, क्या कोई अखिलेश, क्या कोई विचारक, क्या कोई मानवतावादी, इस पर अपने लब खोलेगा ? क्या कोई उस किसान पिता को दिलाशा दिलाएगा ,कि हम आपके साथ हैं आप के बेटे को भी न्याय मिलेगा, क्या किसी मीडिया का तंबू बंबू उसके घर के सामने टिकेगा ? क्या कोई मीडिया की वोबी वैन उसके दरवाजे पर खड़ी होगी ? क्या कोई पत्रकार उसकी इस दुखद परिस्थिति में कोई लेख लिखेगा ? क्या कोई संपादक लवकेश मिश्रा पर संपादकीय लिखेगा ?क्या कोई बुद्धिजीवी उस पर ब्लॉग या कालम लिखेगा ? आज एक बड़ा प्रश्न है  या यह सिर्फ इसलिए नहीं लिखा जाएगा लोकेश ब्राह्मण नाम जाति में उत्पन्न हुआ .उसके लिए उत्पन्न शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूं कि पैदा तो दलित होते हैं, पैदा तो पिछड़े होते हैं ,वह जाती से पिछड़े माने जाते हैं उनके लिए एक तीसरी आंख का मापदंड है ,उनके लिए चैनल हैं, उनके लिए संसद है, उनके लिए विधानसभा है, उनके लिए एक्टिविस्ट हैं, लेकिन जो समान शब्द का तगमा लेकर आया है, उत्पन्न हुआ है, उसे कोई संवेदना का , किसी की करुणा का कोई हक नहीं है .गम्भीरता से सोचना होगा अगर जातिगत बात ही है. सवर्णो को सोचना होगा. उन सवर्णो को धिक्कार है जो संसद में बैठे हैं, जो विधानसभा में बैठे हैं, जो बड़े-बड़े महाविद्यालयों ,विश्वविद्यालयों में बैठे हैं,प्रसाशन में बैठे हैं, मोटी तनख्वाह लेते हैं और लच्छेदार भाषण देते हैं .जिनका अपना शासन - प्रशासन के गलियारे में प्रभाव है .उनमें जरा भी लाज, शर्म मनुष्यता या जो कुछ भी कहते हैं उन्हें लोकेश के लिए भी उतनी ही सिद्दत, उतनी ही जिम्मेदारी से आवाज उठानी चाहिए. क्योंकि सबसे पहले वह मनुष्य है, पीड़ित है और फिर पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए .फिर वह किसी जाति ,धर्म, वर्ग ,कार्य क्षेत्र से हो यदि ऐसा नहीं होता है तो सारा कुछ ढोंग है  और इस ढ़ोंग को तोड़ना होगा .यह हर किसी की जिम्मेदारी है जो स्वयं को जाति पंथ से ऊपर उठकर मनुष्य कहलाता है ,तो आइएलवकेश के लिए आवाज़ उठाएं जो लोग  उसे महत्व नहीं देते, उसकी मृत्यु को महत्व नहीं देते, जिनके लिए लवकेश किसी दूसरी दुनिया का जीव है, उसके लिए जाति के नाम पर ही सही, जिनका जाति में विश्वास है, सवर्ण में विश्वास है जिन्हे गर्व है अपने सर्वण होने पर ,उन्हें तो  निश्चित ही शर्म आनी चाहिए,औरयदि शर्म है तो उठो ,आवाज उठाओ और  जो स्वयं को जाति धर्म पंथ से ऊपर मानते हैं .जिनका सिर्फ मनुष्यता में विश्वास है उन्हें तो सबसे पहले लवकेश के लिए पूरी शिद्दत, ताकत से आवाज उठानी चाहिए. आज ही उनके असली चरित्र और मनुष्यता की पहचान होगी. इससे अधिक कहना या लिखना मेरे लिए मूर्खता होगी .जिन्हें समझ है वह समझें, कुछ करें, नहीं तो फिर आगे आग लगेगी, जिसे किसी जाति का, कोई नेता, कोई विचाकर बुझा नहीं पाएगा.जो संसद में, विधान सभा में पिछड़े - पिछड़े चिल्ला रहें हैं.वे भला बतायेंगे कि वे कब अगड़े कहलायेगे. अरे भाई प्रधान मंत्री पिछड़ा, मुख्यमंत्री पिछड़ा कमिश्नर पिछड़ा ,अब और क्या लोगे या बना दिए जाओ या बन जाओ तो अगड़े मानोगे.सांसद, मंत्री होने के बाद भी पिछड़ा, दलित, शोषित चिल्लाने का मतलब वे मानसिक रूप से पिछड़े हैं.कुल मिलाकर आख़िरी सत्य भारत जातिवादी देश है.जाति के नाम पर सारा खेल और फिर जातिवाद का झूठा विरोध.ऐसा दोगलापन भारत में ही हो सकता है.

मंगलवार, 8 मार्च 2016

चित्रकला बनाना कैसे सीखें....? आइये जानें

आज के आधुनिक युग में तमाम कलाएं व शैलियाँ भारत में फल- फूल रही हैं. उन्ही  में एक तेजी से पल्लवित - पुष्पित होती कला का नाम है ''चित्र कला'' जिन्हें कुछ लोग पेंटिंग भी कहते हैं.आज मैं इसी विधा के बारे में बताऊंगा कि कैसे एक चित्र कला प्रेमी बिना किसी प्रशिक्षण के पेंटिंग बनाने की शुरुआत कुछ संसाधनों के माध्यम से कर सकता है. वैसे इस क्षेत्र में काफी युवा बाकायदा डिग्रियां लेकर आ रहे हैं तो कुछ नैसर्गिक प्रतिभा के धनी शौकिया या सीधे शुरू हो जाते हैं.यदि आप किसी प्रतिष्ठित कला महा विद्यालय से स्नातक या परास्नातक नहीं हैं और फिर भी आप चित्रकला बनाने में रूचि रखते हैं और बनाना चाहते हैं तो आइये हमारे संग हम आप को इस विधा की कुछ मूलभूत
बातें बताते हैं .ताकि आप पेंटिंग शुरू करने से पहले पूरी तैयारी कर लें. ताकि आप को  पेंटिंग बनाने में आसानी हो.
आइये तो तैयारी शुरू करते हैं.
सबसे पहले आप एक इजल [पेन्टिंग स्टैंड]लें. जो हिलता - डुलता न हो.जिस पर कैनवास  ठीक से रख सकें.कैनवास अच्छी  प्रतिष्ठित कंपनी का ही लें .इससे आप को पेंटिंग बनाने में आसानी होगी .कैनवास शुद्ध उच्च कोटि के कपास के धागे का बना होता है . अच्छे कैनवास के धागों में गांठ नहीं पड़ती .जब धागा एक -दूसरे के ऊपर से गुजरता है तो जो चौराहा बनता है , वहाँ हल्का सा गड्ढा बनता है यहीं रंग को  टिकने को मिलता है .इससे पेंटिंग खिलती है . कैनवास 500 से लेकर 2000 रूपये मीटर तक आमतौर पर मिलता है . अच्छे कैनवास की उम्र 100 से भी अधिक होती है . इस पर पपड़ी भी नहीं पड़ती . कैनवास की प्रतिष्ठित कम्पनियाँ हैं . बीपीओ , मोनालिसा , विन्सर न्यूटन ,कैमेल, लेफांट एवं रीब्स आदि .आप अपने बजट के हिसाब से कैनवास का चुनाव कर  सकते हैं . कैनवास पर पेंटिंग इसलिए बनाते हैं  क्योंकि इसे मोड़ कर रख सकते हैं और इसे कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है .कैनवास पर पेंटिंग बनाने में सहजता  महसूस होती है  क्योकि कैनवास के धागे में गांठ नहीं होती .
रंग अर्थात कलर का चुनाव
रंगों का प्रयोग सावधानी पूर्वक करें इसके रंग बेहद मंहगे मिलते हैं 100 मिलीमीटर का कलर ट्यूब औसतन 3500 रुपये का होता है .सबसे बढ़िया ''आर्टिस्ट कलर '' होता है . इसमें भी 1, 2, 3 ,4 सीरीज होती है .बच्चों के सीखने के लिए भी स्टूडेंट कलर आते हैं .जिसमें पेंस्टल,व चारकोल पेन्सल कलर शामिल हैं .रंग प्रतिष्ठित कम्पनी का ही लें ,जैसे बीपीओ ,  विन्सर न्यूटन ,पेलीकान  एवं रीब्स  आदि .
ब्रश का चुनाव

इसके बाद ब्रश का चुनाव करें .अगर टेक्सचर [ खुरदुरा ]  इफेक्ट करना है तो आप हॉग [बड़े बालों वाला ब्रश ] ब्रश का इस्तेमाल करें और कम फिनिस या फ़ाइन करना हो तो सेंम्बर [ मुलायम ब्रश ]  का इस्तेमाल करें .इन दो तरह के ब्रशों को धोने के लिए तारपीन खरीद कर रख लें .ब्रश को पोछने के लिए एक अच्छा तौलिया  रखें . रंग ,ब्रश  व अन्य सम्बंधित सामान रखने के लिए  एक अच्छा स्टैंड बनायें  ताकि उसे उचित जगह रख सकें . साथ में ज्यामेट्रिक इक्विपमेंट भी रखें .

 अब पेंटिंग करना शुरू करें

एक अच्छा कैनवास लें .उसे खोलकर ठीक से स्टेच करें . फिर आप अपने विषय के हिसाब से रनग का एक कोट  कैनवास पर मार दें .
अब आप को  सोंचिये  कि आप को उसपर स्केच करना है या पेंटिंग . आप रंग का भी चुनाव कर लें  कि आप ऑयल  करना चाहते हैं या एक्रेलिक . वाटर कलर  काफी देरी में सूखता है  उसके बाद एक्रेलिक . वाटर कलर कभी भी धोया या साफ़  किया  जा सकता है परन्तु ऑयल कलर  कभी नहीं छूटता. ज्यादातर चित्रकार ऑयल का इस्तेमाल करते हैं .इससे बनी चित्रकला  खूबसूरत  और चमकदार होती है . इसकी साफ -सफाई  [ धूल - मिट्टी ]भी की जा सकती है .पेंटिंग बनाते समय शोर नहीं होना चाहिए . शांत जगह होनी चाहिए .ताकि चित्रकला बनाते समय दिमाग स्थिर रहे और विषय  प्रभावित न हो . अगर आप संगीत के शौकीन हैं  तो आप चित्रकला बनाते समय मधुर संगीत सुनें . चित्रकला की  ,
सुन्दरता में  'फ्रेम' का भी विशेष महत्त्व होता है . इस लिए अपनी चित्रकला के अनुसार फ्रेम का चयन करें . इससे  चित्रकला की सुन्दरता पर असर पड़ता है .चित्रकला के पीछे अच्छे हुक  की व्यवस्था होनी चाहिए . ताकि आसानी से टांगा व उतारा जा सके .तो ये हुई कुछ चित्रकला बनाने की मुलभूत बातें . इसके अलावा  आप पेंटिंग्स की दुनिया के बारे में कुछ और जानने को उत्सुक है तो  थोडा और जानिए . आज भारत में दो तरह की विधा में ज्यादा काम हो रहा है .एक फ़ाईन आर्ट [ ललित कला ] दूसरा माँर्डन आर्ट[ आधुनिक कला . इसके आलावा आब्सट्रैक्ट [ आभासी कला ] में भी चित्रकला  बन रही है . आज भारत   में चित्रकला का बाज़ार प्रति वर्ष  अनुमानतः 1000 करोड़ रुपये का है . भारत के प्रसिद्द चित्रकारों में  तैयब मेहता , राम कुमार , अकबर पदमसी,स्व . मकबूल फ़िदा हुसैन , एन. एन. सूजा, एस. एच .रजा, के. एच. आरा, जेमिनी रॉय .पृथ्वी सोनी  तथा मुंबई के  युवा चित्रकारों में राम जी शर्मा, घनश्याम गुप्ता, नरेन्द्र बोरलेपवार आदि अनेक  प्रतिभाशाली चित्रकार हैं . इन कलाकारों की एक -एक चित्रकला के मूल्य लाख से लेकर करोड़ों तक हैं.
poetpawan50@gmail.com
7718080978
चित्रकला - राम जी शर्मा

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

जाटों नेंअपने ही घर की इज्जत लूट ली .क्या आप ने सीरिया को हरियाणा में नहीं देखा ?






हरियाणा के अलग - अलग स्थानों  की तसवीरें अलग - अलग संचार माध्यमों से प्रसारित होकर आम भ्रारतीय तक पहुँच रही हैं. उसे देखकर  संवेदनशील लोगों  का कलेजा मुंह को आ जा रहा है . कुछ लोग क्रोध , कुछ  क्षोभ, कुछ करुणा और कुछ बेबसी के भाव पीड़ित हो रहे हैं कईयों की आखें नम हो गई पीड़ितों की मर्मान्तक खबरें पढ़कर, देखकर , किसी के सामने उसके घर में आग लगा दी गयी. विरोध करने पर उसे उसी जलते घर में फेकं दिया गया. किसी की आखों के सामने उसकी बहन को घसीटा , गया, किसी के ढ़ाबे को उसकी आखों के सामने खंडहर बना दिया गया और वह अपना बर्बाद होते हुए ढ़ाबे को देखकर बेहोश हो गया. किसी के बेटे को जलती आग में झोंक दिया गया.कहीं बसों से महिलाओं को उतारकर ढ़ाबो और खेतों में लेजाकर बलात्कार किया गया. पुलिस तमाश बीन रही, किसी की मिठाई की दूकान उसकी आखों और एसपीके कोठी के सामने होते हुए भी फूंक दी गयी और एसपी का दरबान जलती दुकान देखकर अंदर चला गया. जिन्होंने सीरिया की अराजकता नहीं देखी वे हरियाणा की मनुष्यता को शर्मशार करने वाली अराजकता को देखकर महसूस कर सकते हैं.
 जाटों ने अपने ही घर की इज्जत लूट ली  .
पढ़िए कुछ मर्मान्तक हरियाणवी दास्तान
सोनीपत के मुरथल के पास नेशनल हाईवे-1 सोमवार को लगे जाम के दौरान महिलाओं के साथ गैंगरेप की घटना चर्चा में है। सोमवार तड़के कुछ गाड़ियों को रोका गया। उनमें सवार महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। चश्मदीदों के मुताबिक 10 महिलाओं का यौन शोषण कर उन्हें खेतों में छोड़ दिया गया। इससे भी खौफनाक यह कि जिला प्रशासन ने यहां भी पीड़ितों और उनके परिवारों को ‘अपने सम्मान की खातिर’ रिपोर्ट दर्ज न कराने को कहा।
  बीते सोमवार तड़के 30 से अधिक बदमाशों ने एनसीआर की तरफ जाने वालों को रोका, उनके वाहनों को आग लगाई। कई लोग जान बचाकर भागे, लेकिन कुछ महिलाएं नहीं भाग पाईं। उनके कपड़े फाड़ दिए गये और उनके साथ बलात्कार किया गया। इस खौफनाक वारदात की पीड़ित महिलाएं तब तक खेतों में पड़ी रहीं जब तक कि उनके पुरुष रिश्तेदार और गांव हसनपुर और कुराड के लोग कपड़े और कंबल लेकर नहीं आ गए।
नाम उजागर न करने की शर्त पर एक चश्मदीद ने बताया-’तीन महिलाओं को अमरीक सुखदेव ढाबे पर ले जाया गया, जहां वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में अपने परिजनों से मिलीं। जिला प्रशासन के अधिकारी भी आ वहां गए, लेकिन मामले की जांच या पीड़ितों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बजाय परिजनों पर महिलाओं को घर ले जाने का दबाव बनाया गया। कई को वाहन भी उपलब्ध कराए गए।’
9 दिन में 28 लोगों की मौत
वहीं हिसार में प्रेस कॉन्फ्रेंस में डीजीपी यशपाल सिंघल ने बताया कि जाट आरक्षण में भड़की हिंसा की आग में 9 दिनों में 28 लोगों की मौत हुई। उन्होंने बताया कि इस दौरान पुलिस ने 535 उपद्रवियों पर मामले दर्ज किए हैं। वहीं 127 को गिरफ्तार भी किया है। उल्लेखनीय है कि दो दिन पहले प्रशासन 19 मौतों की पुष्टि कर रहा था।

अब कैथल की कहानी सुनिए  वहां के एक दुकानदार की ज़ुबानी
 मेरी दुकान एसपी की कोठी के ठीक सामने है। हर वक्त यहां पीसीआर खड़ी रहती है। मैं रविवार सुबह दस बजे दुकान के काउंटर पर खड़ा था। दो बदमाश हाथों में कुल्हाड़ी लिए मोटरसाइकिल पर आए। चेताया-दुकान बंद नहीं की जला देंगे। धमकियां 18 फरवरी से ही मिल रही थी। तुरंत दुकान को बंद कर मालिक सभी कारिंदे घर भेज दिए गए। पुलिस को इसकी शिकायत कर दी। पूरे शहर को पता था कि सैनी समोसे वाले की दुकान टारगेट पर है।
रविवार रात को करीब सवा 11 बजे पीसीआर वहां से हट गई। साढ़े 11 बजे करीब 30 युवाओं की टोली पहुंच गई। शटर तोड़कर पहले मिठाई लूटी। जमकर तोड़फोड़ की और दुकान को आग के हवाले कर दिया। बदमाशों की आवाज सुनकर आसपास शहर के करीब 100 लोग एकत्रित हो गए थे। एसपी की कोठी के सामने जो संतरी था, उसने बाहर झांका तक नहीं। पुलिस कंट्रोल रूम पर फोन किया। लेकिन आधा घंटा तक कोई नहीं आया। ऐसा नंगा नाच जिंदगी में पहली बार देखा है। मेरा परिवार किसी राजनीति पार्टी से नहीं जुड़ा है। न ही किसी से हमारी दुश्मनी है। मेरे परिवार का कोई भी सदस्य किसी धरने प्रदर्शन में शामिल नहीं हुआ। इसके बावजूद भी हमें टारगेट बनाया गया। तीस साल की मेहनत से कारोबार जमाया था, पल में ही बर्बाद कर दिया।
  उपरोक्त दुखद कथा दुर्गामिष्ठान भंडार के संचालक बाबूराम सैनी की आत्मकथा
पुलिस ने एक सुनी, 10 मिनट बाद दुकान लुटी
 अब कोकरनाल रोड की कहानी

शनिवार कोकरनाल रोड पर बैठे आंदोलनकारियों ने मुझे दुकान जलाने की धमकी दी। मैं दोपहर को दुकान बंद कर सीधा पुलिस थाना पहुंचा। पुलिस कर्मचारियों ने कहा कुछ नहीं होगा घर जाओ। लेकिन मैं डरा हुआ था। रात होने तक मैं दुकान के आसपास ही रहा। रात को घर चला गया, लेकिन नींद नहीं आई। मेरा घर दुकान से थोड़ी दूरी पर नया बस अड्डा के पीछे है। रात को मैं चार बार दुकान को देखने के लिए आया। सबकुछ ठीक था। सुबह हुई मैं दुकान के सामने सड़क पार झाड़ियों में बैठ गया। पास में ही करनाल रोड पर कुछ दुकानों में आग लगा दी। मैंने तुरंत कंट्रोल रूम में फोन किया। फोन पर जबाव मिला-एसएचओ को फोन करो। हनुमान वाटिका के सामने फोर्स खड़ी थी। उनके सामने गिड़गिड़ाया। मेरी दुकान को बचाओ , इसे भी जलाएंगे। लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुनी।
मैं वापस जाकर झाड़ियों में छुप गया और ठीक दस मिनट बाद मेरी दुकान को तहस-नहस कर दिया गया। मेरी आंखों के सामने ही मेरी बीस साल की मेहनत पांच मिनट में बर्बाद हो गई। मैं पास जाता तो भीड़ मुझे भी निशाना बना सकती थी। इसीलिए मैं दुकान पर नहीं गया। अगले महीने लड़की की शादी है, शहर से सामान लाने के लिए तीन लाख रुपए भी आनन-फानन में दुकान में रह गए।
उपरोक्त दुखद कथा  कहानी झाड़ियों में छुपकर जान बचाने वाले मिष्ठान भंडार संचालक हरिकेश की जुबानी
 अब सोनीपत की कहानी
हरियाणा में मन्नत ग्रुप के चेयरमैन देवेंद्र कादियान ने आंदोलन के दौरान हुए उपद्रव को बयान किया। उन्होंने कहा कि तीन दिन में जो कुछ हमने यहां देखा, वह इंसानियत की हत्या के अलावा कुछ नहीं कही जा सकती। महिलाओं के साथ जो लूट हुई वह आंदोलन नहीं था। मैंने अपनी आंखों से सीरिया जैसा मंजर देखा है। अब कोई नहीं रुक रहा ढाबों पर...
- जिन लोगों के साथ यह घटना हुई, या जो लोग इस आंदोलन के दौरान फंसे रहे। जिनके वाहन जलाए गए, वे शायद ही अब दोबारा यहां आएं।
- इस विश्वास को बहाल करना आसान नहीं। आज ढाबों पर कोई नहीं रुक रहा है।
ट्रक चालक बोले-जम्मू में कर्फ्यू तो लगते हैं लेकिन पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान नहीं पहुंचाते

- पानीपत के टोल प्लाजा पर कई ट्रक खड़े थे। शीशे टूटे कई ट्रक दिल्ली से पानीपत की ओर आ रहे थे।
- जम्मू-कश्मीर निवासी तौसीब, इशफाक, खुर्शीद से पूछा तो जवाब मिला, साहब जी सेब से लोड 8 ट्रकों में से दो उपद्रवियों ने जला दिए।
- हम पानीपत लौट रहे हैं। सब्जी मंडी में पहुंचे तो बताया श्रीनगर में आए दिन ऐसे कर्फ्यू लगते हैं।
- पब्लिक प्रापर्टी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। सारा सेब बर्बाद हो गया है।
- अम्बाला से दिल्ली तक सेबों से भरा 1000 ट्रक फंसा है। 24 घंटे में पहुंचाना होता है, लेकिन 7 दिन बीत गए हैं। अब कुछ नहीं बचा।
 आइये अब पानी पत की दारुण कथापढ़ते हैं
हैपानीपत हरियाणा में चल रहे जाट आंदोलन के हिंसक रूप की वजह से लोग खौफ में जी रहे हैं।यहां ना महिलाएं सुरक्षित हैं और ना ही बच्चे। आरक्षण की आग में सैकड़ों लोगों के अरमान जल गए हैं। दुकानें लूट ली गईं, कई बेघर हो चुके हैं। जानिए क्या सुनाई लोगों ने आपबीती...
दुकान के साथ जल गए अरमान
- आरक्षण के नाम पर उपद्रवियों ने पहले दुकानों को लूटा और उसके बाद आग के हवाले कर दिया।
- पूर्व सीएम हुड्‌डा के आवास के पास डी-पार्क के सामने अरोड़ा फैशन शॉप में भी उपद्रवियों ने लूट के बाद आग लगा दी थी।
- शॉप संचालिका अनीता अरोड़ा सोमवार को जब वहां पहुंची तो हालात देखकर फूट-फूटकर रोने लगी।
- रोते हुए उन्होंने बताया कि पाई-पाई जमाकर दुकान को खड़ा किया था।
- लेकिन आरक्षण की आग ने सभी अरमानों को खाक कर दिया।
दो दिन तक रुकी रही बरात
- कालवा गांव के कमल ने बताया कि उसके घर तीन बेटियों का सामूहिक विवाह कराया गया।
- इसके लिए 19 फरवरी शुक्रवार को बरात गन्नौर से आई।
- दोपहर में बरात पहुंची और खान-पान के बाद शादी पूरी हो गई।
- शाम को पता चला कि जाट आंदोलनकारियों ने सभी रास्तों पर पेड़ काटकर उन्हें ब्लॉक कर दिया है।
- बरातियों की सुरक्षा को देखते हुए लड़की वालों ने बरातियों को भेजना खतरे से खाली नहीं समझा।
- 2 दिन तक बरात चौपाल में ही ठहरी रही और उनके खाने-पीने व सोने का सारा प्रबंध कर दिया।
- रविवार दोपहर को लड़की के परिजनों ने बरात को खाना खिलाकर विदा किया।
60 बाइकों का इंतजाम...
- कमल ने बताया कि बरात को तीसरे दिन रविवार को वापस पहुंचाने के लिए गांव से करीब 60 बाइकें बुलाई।
- प्रत्येक बाइक वाले को एक चक्कर छोड़ने पर दो सौ रुपए किराए के रूप में दिए।
- जबकि रात को दूल्हे- दुल्हनों को एक कार के जरिए गांवों व खेतों के रास्ते पहुंचाया गया।
- कमल ने बताया कि जब बरात पहुंच गई तब उन्होंने राहत की सांस ली है।
पथराव में घायल महिला और बच्चे...
- फरीदाबाद में तोड़फोड़, लाठीचार्ज और पथराव में महिला व बच्चों समेत 20 लोग जख्मी हो गए।
- जगह-जगह जाम और पथराव की घटनाएं दिनभर होती रहीं।
- आंदोलनकारियों ने नेशनल हाईवे-2 (दिल्ली-आगरा) और रेलवे ट्रैक पर कब्जा जमा लिया।
- आंदोलनकारियों ने 2 जगहों पर रेलवे ट्रैक पर कब्जा कर लिया।
दिल्ली-आगरा-मुंबई रूट टूटा...
- दिल्ली-आगरा रेलमार्ग सुबह से शाम तक पूरी तरह बाधित रहा।
- दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग पर चलने वाली करीब 400 ट्रेनें और मालगाड़ी यहां-वहां फंसी रहीं।
- जाम लगाने वाले उपद्रवियों ने प्राइवेट गाड़ियों में तोड़-फोड़ भी की और पुलिसबल पर पथराव किया।
- दोनों जगह पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।
- देर शाम विरोध करने वाले लोग रेलवे ट्रैक से हट तो गए, लेकिन रेलवे सुचारू नहीं हो पाया था।
दोलन के नाम पर लूट:कहीं घर पहुंचने की जल्दी तो कहीं भीड़ के आगे बेबस मां
राई गांव की रीतू बेटे का इलाज कराना चाहती थी पर आंदोलन के कारण दवा नहीं दिला पाई।
राई गांव की रीतू बेटे का इलाज कराना चाहती थी पर आंदोलन के कारण दवा नहीं दिला पाई।

अब हिसार कथा
लोगों को इलाज के लिए दवा तक लेने में परेशान होना पड़ा। मां की बेबसी, चाहकर भी  नहीं दिला सकी बेटे को दवा...
राई गांव की रीतू त्यागी, शनिवार को बेटे यशवंत का इलाज कराने को दिल्ली के लिए निकली।
जैसे-तैसे कर वह कुमाशपुर तो पहुंच गई। लेकिन जाम लगाकर प्रदर्शन कर रहे लोगों ने उसे आगे नहीं जाने दिया ।
 भीड़ के आगे बेबस मां अपने बच्चे का इलाज भी नहीं करा पाई।
आंदोलन के नाम पर लूटपाट
रोहतक के बाद झज्जर-बहादुरगढ़, सोनीपत, गोहाना में भी आंदोलन के नाम पर भीड़ द्वारा जमकर लूटपाट की खबरें हैं।
 सोनीपत में हल्दीराम रेस्टोरेंट को लूटा। सिरसा में उपद्रवी एटीएम उखाड़ ले गए, जिसमें साढ़े चार लाख रुपए की नकदी भरी थी।
रोहतक में नारायणा कॉम्पलेक्स में लैपटॉप की दो दुकानों से मोबाइल व लैपटॉप लूटे गए।
 झज्जर में तो वीटा का मिल्क बूथ भी नहीं छोड़ा।
 शुक्रवार रात को कर्फ्यू लगने के बाद लूटपाट की घटनाएं ज्यादा हुईं।
 लूटपाट करने वालों में युवाओं की टोलियां शामिल थीं। पहले शोरूमों के शटर तोड़कर लूटपाट की गई, फिर आग के हवाले कर दिया।

 अब सिवाह कथा
सिवाह में एनएच जाम के दौरान सभी वाहनों को टोल प्लाजा पर ही रोक दिया गया। हाईवे पर टोल से होकर 42 हजार के करीब वाहन हर दिन निकलते हैं। शहर के अंदर 80 हजार से अधिक वाहन सड़कों से गुजरते हैं। इन्हें वापस चंडीगढ़ या दिल्ली की तरफ ही लौटना पड़ा।
 अब झज्जर की कथा
रियाणा में जाटो को आरक्षण देने की घोषणा के बाद हालात सामान्य होने लगे हैं। लेकिन अब सामने आ रहा है बर्बादी का वो मंजर, जिसे आंदोलन ने अपने पीछे छोड़ दिया। मंगलवार को कोई सीएम से गुहार लगाता दिखा तो कोई करोड़ों के कारोबार को राख में मिला देख रोता नजर आया। बर्बादी की दास्तान बयां करते लोग...
 रमेश बिरला और ओमप्रकाश बिरला। दोनों भाई 35 साल पहले चाय की छोटी से दुकान बस स्टैंड के ठीक सामने चलाते थे।
एक भाई चाय बनाता था और दूसरा ग्राहकों को चाय परोसता।
 चाय बनाकर अपने परिवार का गुजारा करने की जिम्मेदारी में ये दोनों भाई मिडल स्कूल तक भी नहीं पढ़ सके।
 इनकी मेहनत रंग लाई और जिस जगह ये चाय की दुकान 300 रुपए किराए से चलाते थे वो 15 साल पहले एक-एक पाई जोड़कर ढाई लाख में खरीद ली।
दुकान खरीदने के बाद एक भाई गारमेंट्स तो एक ने शूज की दुकान खोली। कुछ ही वक्त में उनकी मेहनत रंग लाई और वे शहर के प्रमुख कारोबारियों में शुमार किए जाने लगे।
आरक्षण में सबकुछ बर्बाद
 जाट आरक्षण की आग में दोनों भाई करोड़पति से खाकपति हो गए हैं।
 रमेश की रेडीमेड गारमेंट्स का शोरूम और साथ ही ओमप्रकाश का शूज शॉप भी आग की भेंट चढ़ गया।
 पल भर में इनका शोरूम जलकर राख हो गए। रमेश का कहना है कि इतना आतंक उन्होंने कभी फिल्मों में नहीं देखा,जितना खुद महसूस किया है।
 अब दोनों भाइयों के परिवार में मातम जैसा माहौल है।

उपरोक्त कहानियाँ  भास्कर,पत्रिका जैसे अखबारों व अन्य जनसंचार माध्यमो की सुचना पर आधारित

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

आखिर आरक्षणासुर का वध ....?


 आज मैं  आरक्षण की बात करूँगा पर आंकड़ों और इतिहास की बात नहीं करूँगा.कुछ और बात करूँगा बतौर आम भारतीय. आरक्षण एक बेहद ख़तरनाक राष्ट्रनाशक हथियार बन चुका है . भारत के लिए हाईड्रोजन बम से भी खतरनाक शक्ल अख्तियार कर चुका है. अभी आरक्षण के छोटे - छोटे बम फूट रहे हैं,पर क्या कभी किसी भारतीय ने ध्यान दिया कि इन आरक्षणवादी आंदोलनों से देश का कितना  आर्थिक,  सामाजिक और जीवन की हानि हुई है. आतंकवादी हमलों से कई हजार गुना हानि इन आरक्षण के आंदोलनों से हुई है, खासकर भारतीय रेल जो ऐसे आंदोलनों में इस मुहावरे की तरह हो जाती है  '' गरीब की बीवी गाँव भर की भौजाई''.
 खैर क्या कभी इस पर कोई राष्ट्रव्यापी चर्चा हुई.नेताओं या मीडिया नामक सामाजिक विश्लेष्ण के ठेकेदारों  ने इस पर कोई सर्वे किये. कि इन आंदोलनों में विगत 10 या 15 वर्षों में कितने लोगों ने जान गंवाई. कितने लोगों नें इन आंदोलनों के कारण अपनी छत गंवाई, कितने लोग अपंग या घायल हुए, कितने लोगों का जीवन और व्यापर नष्ट हो गया और उनकी आने वाली पूरी एक पीढ़ी आर्थिक रूप से बर्बाद हो गई. जिनका घर, दुकान, शोरूम, गाड़ी बर्बाद हुई. उसका पूरा हर्जाना  उन्हें कभी मिला. अगर नहीं तो क्यों ? इन आरक्षण आंदोलनों में जिनके घर ,दुकान, संसाधन यहाँ तक कि संतानें भी जल जाती हैं. उन्हें इन्साफ कौन देगा. उसका अपराध किस पर तय होगा. इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा .आप आरक्षण के लिए  सामान्य आदमी का घर जला देंगे .आरक्षण महोदय आप  किसी आम आदमी का कर्ज लेकर लिया गया सेकेण्ड हैण्ड ट्रक जला देंगे. किसी की उधारी और मित्रों की जुगाड़ से 15 दिन पहले खोली गई दुकान  जला कर चले जायेंगे. पर क्या आरक्षण के प्यासे दैत्य आप ने सोचा ?  आप ने अपने आवेश को शांत करने के मद में मात्र एक दुकान नहीं जलाई. पूरा एक परिवार ,उसकी आशा और प्रगति की समस्त आकांक्षाओं को जला दिया. क्या इस पर कभी परिचर्चा या सेमीनार होगा. क्या ये देश में जातिगत द्वेश नहीं बढ़ा रही है. एक तरफ जातिभेद मिटाने की बात दूसरी तरफ जाति के आधार पर ही आरक्षण ये दोगलापन [कड़े शब्द के लिए क्षमाप्रार्थी] आखिर क्यों ? इसी का उत्तर चाहिए . इसी प्रश्न में संकट,स्वार्थ और समाधान छुपा हुआ है.
''खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग बदलता है '' वर्तमान आरक्षण की मांगों का यही हाल है. यदि यही हाल रहा तो हर वर्ष कुछ नई जातियां आरक्षण की मांग लेकर खड़ी हो जायेंगी.और फिर सरकारी और गैरसरकारी सम्पत्तियों को फूंका जाएगा.आरक्षण का दैत्य  इस तरह हर महीने, हर साल कुछ लोगों की बलि लेगा और इसका आंकड़ा बढ़ता ही रहेगा .
महाभारत में एक  कथा है...
कचक्रा नामक नगरी में एक बकासुर नामक राक्षस रहता था. जिसे हर महीने उस नगरी से एक मनुष्य की बलि चाहिए होती थी  और मजबूर होकर गाँव वालों को बलि देनी पड़ती थी. आखिरकार उस नगर के लोगों की समस्या का समाधान भीम ने किया. वे स्वयं एक दिन बकासुर का भोजन बनकर उसके समक्ष गये और एक योद्धा की तरह युद्ध कर उसका वध किया.इस तरह बकासुर का स्थाई समाधान हुआ. ये घटना द्वापर की थी .अब कलयुग है.और इस कलयुग  में बकासुर आर्क्षणासुर के रूप में फिर पैदा हुआ है वो भी वंचित, पिछड़ों का चोला ओढ़कर जो सिर्फ आम लोगों की जान ही नहीं ले रहा है  बल्की भारत में नफरत, घृणा, आर्थिक और सामाजिक नुकसान भी बड़े पैमाने पर कर रहा है. अब समय आ गया है इस आरक्षणासुर का वध हो . क्या किसी योद्धा [ नेता ] में हिम्मत है जो भारत रूपी नगर को इस आरक्षणासुर से मुक्ति दिला सके. यदि नहीं तो  इस नगर का दृश्य आने वाले दिनों में इतना भयानक होगा .जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल होगा . फिर एक दिन उनका  नम्बर भी आएगा जो सोंच रहे हैं हमारा घर तो नगर के आख़िरी हिस्से में है हमारा नम्बर ही नहीं आएगा या जब आएगा तब देखा जायेगा. पर उनका नम्बर भी आएगा और वे बच नहीं पाएंगे. क्योंकि आर्क्षणासुर की भूख कभी खत्म नहीं होगी.

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

हमारी दिल्ली यात्रा में शामिल लोग

पिछले दिनों  हमारा दिल्ली जाना हुआ . हमने दिल्ली को फिर से कई साल बाद देखा फिर वही ट्रैफिक सड़क से अधिक वाहन साथ ही साथ यातायात की चरम अनुशासन हीनता. दिल्ली  में प्रारम्भिक मीटर जहाँ 25 रुपये 2 किमी है वहीं मुम्बई में 18 रुपये 1.5 किमी.है  यहाँ ऑटो वालो की दादागिरी बेमिशाल हैं  मीटर से जल्दी जाना नहीं चाहते. मोलभाव हमेशा चलता है . इस मामले में मुम्बई सर्वोत्तम है . दिल्ली मैट्रों  को देखा भी और उससे सफ़र भी किया. मुम्बई लोकल जैसे मुम्बईकरों की यातायात की रीढ़ है कुछ ऐसी ही दिल्ली वालों के लिए मैट्रो बनती जा रही है उसमें भी व्यस्तता के समय में व्यस्त मैट्रो मार्गों पर धक्कमपेल हो गई है . राजीव चौक मैट्रो स्टेशन को देखकर मुझे मुम्बई के दादर जंक्शन की याद आ गयी  जो पश्चिम और मध्य रेल के स्टेशनों को जोड़ता है. इस यात्रा के दौरान हम[ श्री राकेश दुबे, श्री महेश शर्मा और मैं] संसदीय पुस्तकालय गये, वहां एक लम्बी सुरक्षा जाँच से गुजरे. संतुष्टि हुई देश की सुरक्षा की तत्परता देखकर.इन सारी जांचों से गुजरने का एक मात्र अभिप्राय सिर्फ और सिर्फ  वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुलदेव जी से मिलने का था . वर्तमान में वे  यहाँ एक वृहद आधिकारिक सरकारी  होने वाले आयोजन के संयोजक  हैं जैसा कि मुझे बातचीत से पता  चला . राहुलदेव जी से मिलना सुखद रहा. विशेष रूप से मेरे लिए... क्योंकि मेरी उनसे प्रथम भेंट थी. राकेशजी ने तो जनसत्ता में उनके सानिध्य में एक दशक तक कार्य किया और राकेश जी माध्यम से ही मिले. राहुल देव जी ने मुझे कई सीख भी दी. जो मेरे लिए बेहद हितकर हैं. ''आवेश'' और ''मैं'' से बचने की सलाह. मैंने शिरोधार्य किया. राहुलदेव जी का व्यक्तित्व सरल व महान है. हिन्दी के प्रति समर्पित हैं.
अब आगे बढ़ते है रामकृष्णपुरम की तरफ संकटमोचन विहिप कार्यालय भाई विनोद बंसल से मिलने 6 बजे मिलना था.  हम महेश शर्मा जी के रिश्तेदार  से मिलकर 5 बजे भजनपुरा से रामकृष्ण पुरम के लिए ऑटो से चल पड़े पहुँचे 7 बजकर 5 मिनट पर. हम तीन मित्र देरी के कारण थोड़ा शर्मिदा से थे पर पहुँचकर जब विनोद जी को फोन किया तो उन्होंने कहा वे गाड़ी पार्क करके आ रहे हैं.हमने राहत महसूस की.तो ऐसा है दिल्ली का ट्रैफिक. हम तीनों मित्रों ने अनेक सामाजिक , धार्मिक ,और पत्रकारिता पर करीब एक घंटे सहज माहौल तक बात किये . अंत में चाय के अंत के साथ विदा लिए तो अगले खुले कक्ष में कुर्ता और धोती लपेटे प्रवीण तोगड़िया जी दो अन्य सज्जनों के साथ बैठे थे  . दोनों ओर से  सस्नेह अभिवादन हुआ और हम आगे बढ़ चले हमें दक्षिण पुरी अपने गन्तव्य पहुंचना था.अब इस यात्रा का आख़िरी और महत्वपूर्ण अंश राहुलदेव जी से  मिलने से पहले हम तीनों मित्र 14 अशोक रोड स्थित श्रीमती मेनका गांधी जी के बंगले पर सुबह साढ़े 10 बजे पहुँचे. निर्धारित समय से आधे घंटे पहले.हमारी भेंट श्री दिनेश पचौरी जी के माध्मय से होनी थी वे बाद में आये पर उन्होंने स्वागतकक्ष में फोन करके हमारे बारे में सूचित कर दिया. इसलिए हमें द्वार के अंदर मोबाईल जमा कराने के साथ की प्रवेश मिला .स्वागतकक्ष में 15 मिनट की प्रतीक्षा के बाद श्री पचौरी जी आये और गर्मजोशी से मिले. तब तक वरुण जी की कोर कमेटी के नौजवान काफी संख्या में आ चुके थे. इनकी श्री वरुणगांधी जी के साथ नियमित तौर पर होनेवाली बैठक थी हमें 11 बजे का समय पचौरी जी ने दिया था पर अब 12 बज रहे थे .हम बेचैन हो रहे थे कि तभी महौल में हलचल हुई . भईया आये, भईया आये की आवाज के साथ.2 मिनट उन्होंने अपने परिचितों से औपचारिक बात की उसके बाद पचौरी जी द्वारा हमारी तरफ ध्यान आकर्षित कराया.मैंने ध्यान से देखा. वरुण जी के केश में सफेदी ने घोसला बना लिया था .सफेदी की इमानदारी पर मुझे एक पल के लिए गर्व हुआ. वो गरीब अमीर का भेदभाव या आरक्षण जैसी चीज नहीं है . हमारी तरफ से  सार्थक वार्ता हमारे अग्रज श्री राकेश दुबे जी ने प्रारम्भ की.  राकेश जी ने जब बताया कि वे एक दशक से अधिक समय तक जनसत्ता से जुड़े रहे तो जनसत्ता की पत्रकारिता वरुण जी तारीफ की. मैं पीछे सोफे पर बैठा था महेश भाई राकेश जी के पास ही बैठे थे.10 मिनट तक राकेश भाई व वरुण जी में संवाद हुआ. राकेश भाई ने बात राजनीति से प्रारम्भ की थी किन्तु वरुण जी ने बात खत्म की सामाजिक चेतना पर उन्होंने शोषित, वंचित गरीब और उनके उत्थान की बात की.जैसा कि उनके बारे में बाह्य धारणा है कि वरुण अख्खड़, क्रोधी व तुनकमिजाज हैं, जहाँ इन दिनों उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री कौन की घुडदौड की चर्चा जोरों पर है जिसमें एक नाम वरुण भी हैं. वरुण की शारीरिक और वाचिक भाषा में ये कहीं परिलक्षित नहीं हुआ. उन्हें दिल्ली में बैठकर भी मुम्बई और उत्तरप्रदेश की बारीक जानकारी है क्षेत्रवार,समुदाय और  पिछड़ेपन के आधार पर सभी क्षेत्रों की जमीनी जानकारी है. अंत में उन्होंने एक शेर कह कर अपनी बात खत्म की .मुझे ठीक से याद नहीं है पर कुछ इस तरह था
 ''मेरा तेरा शीशे का घर मैं भी सोचूं तू भी सोच ,
क्यूँ दोनों के हाथ में पत्थर मैं भी सोचूं तू भी सोच,
क्या तुमको मालूम नहीं था लहरें आती जाती हैं !
फिर क्यूँ लिखा नाम रेत पर मैं भी सोचु तू भी सोच।
ये राजनीति पर उनका व्यंग था. हाँ इतना तो है कि वरुण गांधी अपने फैसले खुद लेते हैं और लेंगे उन्हें कोई अखिलेश नहीं बना सकता और यही मुझे उनकी तत्कालीन कमजोरी नज़र आयी.इसके साथ ही उन्होंने हमारी मुलाक़ात का समय खत्म होने की अपने शैली में इशारा किया क्योंकि अधिसंख्य लोग प्रतीक्षा में थे .अंत में महेश जी  राकेशजी और दिनेश पचौरी जी का आभार जिनके कारण ये दिल्ली  यात्रा सहज हो सकी.

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

जे एन यू के राष्ट्र द्रोहियों को उनकी औकात बताना जरुरी

22 दिसम्बर 1966 को स्थापित  जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय आज राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है आज जो लोग जेएनयू के उन छात्रों की वकालत कर रहे हैं  जो भारत विरोधी आयोजन कर रहे थे  असल में ये भी पहले जेएनयूं  के छात्र रहे हैं और आज इनकी बोई हुई देश विरोधी फसल आज लहरा रही है  इनमें प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, डी. पी. त्रिपाठी, आनंद कुमार, चंद्रशेखर प्रसाद आदि प्रमुख हैं। जेएनयू छात्र राजनीति पर शुरू से ही वामपंथी छात्र संगठनों ऑल इंडिया स्‍टडेंट्स एसोसिएशन(आइसा), स्‍टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एस.एफ.आई.) आदि का वर्चस्व रहा है। वर्तमान में केद्रीय पैनल के चारों सदस्य उग्र वामपंथी छात्र संगठन ऑल इंडिया स्‍टडेंट्स एसोसिएशन से संबंधित हैं। आज इसीलिये येचुरी मीडिया में देशद्रोहियों के पक्ष में  बिना सत्य जाने बोले जा रहे थे.
नेहरूवादियों द्वारा कहा जाता रहा है कि जेएनयू की स्थापना  अध्ययन, अनुसंधान और अपने संगठित जीवन के उदाहरण और प्रभाव द्वारा ज्ञान का प्रसार - राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता, जीवन की लोकतांत्रिक पद्धति, अन्तरराष्‍ट्रीय समझ और सामाजिक समस्याओं के प्रति नेहरू के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार के लिए किया गया.
नेहरू के हिन्दू चीनी भाई - भाई के दूरदर्शिता का परिणाम 1962 में भारत ने कभी न भूलने वाली दर्दनाक कीमत चुकाई. नेहरू  की अन्तर्राष्ट्रीय समझ की ही देंन है  कि  जो कश्मीर भारत गले का हार बनना  चाह रहा था उसे नेहरु ने गले की फांस बना दिया. नेहरू के सामाजिक न्याय का ताज़ा उदाहरण उनके नेता जी के बारे लिखे पत्रों से पता चला कि आज़ाद हिन्द फ़ौज के खजाने को लूटने वाले को नेहरु ने  प्रचार अधिकारी बना कर सम्मानित किया था . ऐसे विचारों वाले व्यक्ति के नाम पर केन्द्रीय विश्वविद्यालय  देश के साथ क्रूर मजाक है . सुब्रमण्यम स्वामी ने सही ही कहा कि जे एन यू का नाम बदलकर सुभाषचंद्र बोस विश्वविद्यालय कर देना चाहिए .

 फिलहाल देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार JNU छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अदालत ने तीन दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है। कन्हैया को शुक्रवार को अदालत में पेश किया गया। अदालत  में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट लवलीन  ने कन्हैया से पूछा तुम्हें कौन सी आजादी चाहिए ?  तो उसकी बोलती बंद हो गई इस सवाल पर वह चुप रहा।
संसद पर हुए आतंकी हमले में शामिल जम्मू-कश्मीर के अफजल गुरु को फांसी दे दी गई थी। इस आतंकी की पैरोकारी जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी में 9 फरवरी के दिन की गई। 9 फरवरी को यह सारा मामला JNU में आतंकी अफजल गुरु के मृत्यु दिवस को शहादत दिवस के रूप में मनाने के बाद से ही शुरू हुआ. जब ये बात  भाजपा सांसद महेश गिरि  को पता चली तो भाजपा सांसद महेश गिरि ने वसंत कुंज थाने में कल भादंसं की धारा 124 ए (देशद्रोह) और 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत अज्ञात लोगों पर मामला दर्ज किया गया था। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, मामले के सिलसिले में कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया है पर और दर्जनों देश द्रोही जो कैमरे में भारत विरोधी नारे लगाते दिखाई दे रहे हैं वे क्यों गिरफ्तार नहीं किये गये .हर सच्चे भारतीय के मन में चुभ रहा है . ये अब छात्र कहलाने योग्य नहीं हैं. ये राष्ट्र द्रोही हैं . इन्हें बिना देर किये जेल में डाल देना चाहिए .इनकी अब तक हासिल की गई शैक्षणिक योग्यता  को अमान्य कर दिया जाना चाहिए और बिना देर किये इनके समर्थन में नारे लगानेवालों को तत्काल जेएनयू से निष्कासित कर देना चाहिए ताकि भविष्य में दुबारा कोई भारत विरोधी गतिविधि करने से पहले हजार बार सोंचे. बिना तथ्य को जाने  इनका समर्थन करने वाले नेताओं को भी हिरासत में लेकर पूछताछ करनी चाहिए.देशद्रोही को समर्थन करनेवाला भी अपराधी होता है .ऐसे मसलों पर छुद्र राजनीति करनेवाले नेताओं को भी सबक सिखाना जरूरी है .
विश्वविद्यालय प्रशासन  की भी जाँच होनी चाहिए.  जिसने राष्ट्र विरोधी आयोजन की अनुमति दी और यदि नहीं दी तो फिर आयोजन हुआ कैसे . इसमें विश्वविद्यालय के कुछ लोग भी शामिल हों तो भी ताज्जुब नहीं......
 हिन्दी तहलका में एक कोई  श्रीमान कृष्णकांत  हैं  उन्होंने इस विषय पर एक लेख लिखा है  उसका एक अंश देखिये ...       ''जेएनयू के कुलपति सुधीर कुमार सोपोरी से एक बार एक साक्षात्कार में पूछा गया कि जेएनयू में खास क्या है? उनका जवाब था, ‘यहां का माहौल और खुली सोच इस विश्वविद्यालय की ताकत है. आप को कहने और सुनने की क्षमता मिलती है. यहां के शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच एक संबंध है. कई छोटी जगहों और पिछड़े तबके के छात्रों से मिलना बहुत भावुकता भरा होता है. कई छात्र कहते हैं कि जेएनयू नहीं होता तो हम पढ़ नहीं पाते. अगर शांति भंग न हो तो यहां आपको जो विचार-विमर्श करना है कीजिए. हमें कोई समस्या नहीं. हमें विभिन्न अनुशासनों की दीवारें तोड़नी होंगी,  कुलपति महोदय अपने साक्षात्कार में ''अनुशासनों की दीवारें '' तोड़ने की बात करते हैं  .सोंचने वाली बात है जहाँ के कुलपति की सोंच ऐसी हो उस संस्थान का क्या हाल होगा . जे एन यू के पैरोकार कहते हैं  इसने दुनिया में भारतीय प्रतिभा का डंका बजाया है . जे एन यू  भारतीय शिक्षा का डंका दुनिया में बजाता है.  इन अंधे पैरोकारों को एक बार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की तरफ देखना चाहिए सारे भ्रम दूर हो जायेंगे .
जनवरी १९१६ ई. (वसंतपंचमी) काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. उसके  कई छात्र आगे चलकर जे एन यू में प्राध्यापक हुए. बी एच यू के कुछ महान छात्रों के नाम देखिये भारत रत्न से लेकर पद्म पुरस्कार व मैग्सेसे से सम्मानित हुए. उन्होंने कभी ऐसी राष्ट्र विरोधी कृत्य नहीं किया .
 शांति स्वरूप भटनागर,,बीरबल साहनी -- अंतरराष्ट्रीय ख्याति के पुरावनस्पति वैज्ञानिक,जयन्त विष्णु नार्लीकर,सी एन आर राव-वैज्ञानिक, भारत रत्न से सम्मानित,हरिवंश राय बच्चन,भूपेन हजारिका, गायक एवं संगीतकार,प्रोफ. टी आर अनंतरामन,अहमद हसन दानी, पुरातत्व विद्वान एवं इतिहासकार,लालमणि मिश्र संगीतकार,प्रकाश वीर शास्त्री, भूतपूर्व सांसद आर्य समाज आंदोलन के प्रणेताओं में से एक,आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,  आचार्य हजारी प्रसाद ,हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से एक एवं इतिहासकार,रामचन्द्र शुक्ल, चित्रकार,एम एन दस्तूरी, धातुकर्म के विद्वान,नरला टाटा राव,सुजीत कुमार - अभिनेता,समीर - गीतकार,मनोज तिवारी - भोजपुरी अभिनेता,मनोज सिन्हा-वर्तमान रेल राज्य मंत्री,माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरु जी) - आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक,बाबू जगजीवन राम - भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री,अशोक सिंघल - विश्व हिन्दू परिषद के भूतपूर्व अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष ,संदीप पाण्डेय,  मन्नू भंडारी, विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला, राम मनोहर लोहिया, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, जानकी वल्लभ पटनायक,वैज्ञानिक जयंत नार्लिकर,  भारत सरकार के वैज्ञानिक सलाहाकार पी. रामा राव,  ऑयल एंड. नेचुरल गैस कमीशन के चेयरमैन बी.सी. बोरा, एशिया ब्राउन बावेरी के सीएमडी के. एन. शिनॉय, पंजाब नेशनल बैंक के सीएमडी एस. एस. कोहली सरीखे लोग विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। कितने नाम गिनाऊँ ......... यूएसए, यूके, कनाडा, जर्मनी, आस्ट्रिया, आस्ट्रेलिया, इराक, इरान, चिलि, पोलेण्ड, गिरि, यूव्र ेन, रसियन, बंग्लादेश, नेपाल और इस्टोनिया इत्यादि सहित ६० देशों के विदेशी छात्रगण विश्वविद्यालय में अध्ययन प्राप्त कर रहे हैं। विदेशी छात्रों को उपयुक्त कार्यक्रम एवं तार्वि क मामलों के चयन में एक अन्तर्राष्ट्रीय छात्र केन्द्र सहायता प्रदान करता है। अफ़जल को शहीद बतानेवालों, इण्डिया में रहकर इण्डिया गो बैक कहने वालों, भारत के टुकड़े करने वालों, हजारों अफ़जल पैदा करने की मंशा रखने वालों को उनकी औकात  बिना देरी किये वर्तमान सरकार को बतानी होगी . हर सच्चे भारतीय की आज यही आवाज़ है . जय हिन्द

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

चवन्नी का मेला: स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता का योगदान पर एक ...

चवन्नी का मेला: स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता का योगदान पर एक ...: स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता का योगदान पर एक संक्षिप्त दृष्टि देश स्वतंत्र कराने में लेखनी का बहुत बड़ा योगदान रहा है. आज की तर...