यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता का योगदान पर एक संक्षिप्त दृष्टि

स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता का योगदान पर एक संक्षिप्त दृष्टि


देश स्वतंत्र कराने में लेखनी का बहुत बड़ा योगदान रहा है. आज की तरह
कलम का इतने बड़े पैमाने पर व्यवसायीकरण नहीं हुआ था, न ही इतने
संसाधन मौजूद थे. फिर भी गुलामी के उस वातावरण में जिस प्रकार पत्रकारिता
(कलम) मुखरित हुई, वह आज की पत्रकारिता के लिए एक आदर्श है,
प्रेरणादायक है. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हुई हार के बाद भारतीय
पत्रकारिता में राष्ट्रप्रेम की भावना अपने उफान पर आ गई. जिसका मुख्य
उद्देश्य था अंग्रेजों के हाथों से देश को मुक्त कराना. उस समय जन सभाओं
का आयोजन कर अपनी बात जनता तक पहुंचाने की प्रणाली का आरंभ नहीं
हुआ था. इसी कारण समाज सुधारक व अन्य राष्ट्रप्रेमी अपनी बात जनता तक
पत्रों के माध्यम से पहुंचाते थे. देशहित में आवाज बुलंद करने का मुख्य श्रेय
विभिन्न भारतीय भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं को जाता है.
सन 1857 में 'पयाम-ए-आजादी' नामक अखबार का प्रकाशन हिंदी और उर्दू
में एक साथ हुआ. यह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ तथा राष्ट्रीय भावना को
जागृत करने वाली खबरें प्रकाशित करता था. इस अखबार में नाना साहब,
मंगल पांडेय, तात्या टोपे और बहादुरशाह जफर (अंतिम मुगल सम्राट) जैसे
देशभक्तों की संघर्ष की कथाएं छपती थीं. बहादुर शाह जफर का निम्न संदेश
इस अखबार में छपा था.
'हिंदुस्तान के हिंदुओं और मुसलमानों उठो, भाईयों उठो, खुदा ने इंसान को
जितनी बरकते अता की है, उनमें सबसे कीमती बरकत 'आजादी' है.
'पयाम-ए-आजादी' की विचारधारा व भाषा ने पाठकों के दिलों को झकझोर के
रख दिया था. पाठकों का मन राष्ट्रप्रेम से लबालब हो गया था. इस अखबार के
कई संपादक, पत्रकार व पाठक फिरंगियों के क्रूर शासन द्वारा प्रताडि़त हुए.
1878 में जब अंग्रेज गवर्नर लार्ड लिटन ने देखा कि भारतीय भाषाओं के
अखबार अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खबरे छाप रहे हैं और उसका घातक असर
भी हो रहा है तो उसने 'वर्ना€यूलर प्रेस एक्ट' लागू किया. इस एक्ट का
दुरुपयोग भारतीय भाषाओं के पत्रकारों को तंग करने के लिए किया जाता था.
उन पर जुर्माना तथा जेल की सजा दी जाती थी. भूपेंद्रनाथ का 'युगांतर, लाला
लाजपतराय का 'वंदेमातरम' तथा तिलक जी का 'केसरी' राष्ट्रीय भावना को
ऊफान पर ला दिया था. 1879 में अंग्रेजी सरकार ने लोकमान्य तिलक पर
अंग्रेजी शासन विरोधी गतिविधियों के कारण मुकदमा चलाया. तिलक के
खिलाफ जज के निर्णय सुनाते हुए 6 वर्ष की जेल की सजा सुनाई. इस पर
बंगाली समाचार पत्र 'अमृत बाजार पत्रिका' के संपादक शिशिर कुमार ने लिखा
था'
''मूर्ख और बेघर पारसी जज (जस्टिस डावर) जिसे अपने जूते के फीते बांधने
की अक्ल नहीं है, तिलक जैसे विख्यात अभियुक्त का मनमाना निरादर कर रहा
है और ऐसे प्रतिष्ठित देशभक्त को कौमपरस्ती की बातें बताने का दुस्साहस कर
रहा है''.
लेनिन ने 1920 ई. में अमृत बाजार पत्रिका को सर्वोत्तम राष्ट्रीय अखबार का
पद दिया था. अंग्रेजी भाषा के अखबारों में कुछ अखबार अंग्रेजी सरकार के भी
विरोधी तथा आजादी के पक्ष में थे. चेन्नई से प्रकाशित 'दि हिंदू (1878) के
संपादक सुब्रह्मण्यम अय्यर अपने समय की विचारधारा से काफी आगे थे. वे
एक महान समाज सुधारक थे. पहले 1918 में इंग्लैंड में इस अखबार के प्रवेश
पर रोक लगा दी गई और जब इस अखबार ने 1919 में पंजाब में अंग्रेजों द्वारा
किए गए अत्याचार की कड़ी भर्त्सना की तो इसकी 2 हजार रुपए की जमानत
जब्त कर ली गई. 'दी स्टेट्समैन (1875) हमेशा यूरोपीय लोगों के पक्ष में
कलम चलाता था. परंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद सन 1885
में अखबार ने लिखा - आशा है कि अब हिंदुस्तान को उपनिवेशकों के जुल्म
से छुटकारा मिल जाएगा.
अंग्रेजी अखबार 'दि ट्रिब्यून' (1881) की राष्ट्रीय नीतियों व उच्च कोटि के
पत्रकारिता के गांधी जी बड़े प्रशंसक थे. ट्रिब्यून के संपादक कालीनाथ एक
सच्चे देशभक्त व निर्भीक संपादक थे. जलियांवाला बाग के महाखलनायक क्रूर
जनरल डायर की कारस्तानी की कड़ी निंदा करने के कारण कालीचरण जी को
जेल की हवा खानी पड़ी थी.
सन 1920 में जन्माष्टमी के दिन 'आज शुरू हुआ. इस अखबार के संपादक
उच्च कोटि के क्रांतिकारी पराडकर जी जरूरत पडऩे पर सरकार को चेतावनी
देने से भी नहीं डरते थे. गोरी सरकार की दमन नीति के कारण यह अखबार
1930 में 6 महीने तक बंद रहा. 1931 में पुनःजोरदार संपादकीय लिखने के
कारण उन्हें कारावास की सजा हुई. देश की आजादी का शंखनाद करनेवालों
की एक लंबी फेहरिस्त है. जिनमें 'महारथी' के संस्थापक पं. रामचंद्र शर्मा,
'अर्जुन' के इंद्र विद्यावाचस्पति' पं. सुंदरलाल, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, महामना
मदनमोहन मालवीय आदि अनेक महापुरुषों की एक लंबी कड़ी है. महात्मा
गांधी 'नवजीवन के लिए लगातार लिखते थे और उनके आश्रम से 'यंग
इंडिया निकलती थी. इन पत्रों के द्वारा वे समाज की कुरीतियों के खिलाफ
जेहाद करते.
हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू अखबार 'इमरोज' के संपादक शोयेब
उल्लाखान हैदराबाद के अंतिम निजाम मीर उस्मान अली की हुकूमत के दौरान
सन 1946-47 में जोरों पर चल रहे 'रजाकार' शोयेब उल्ला से नाराज थे.
अचानक एक दिन रजाकारों ने उनके कार्यालय में घुसकर उनका एक हाथ काट
डाला और अधिक खून बहने के कारण उनकी मृत्यु हो गई. शोयेब उल्ला अपने
आदर्श के लिए शहीद हो गए.
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए गणेश
शंकर विद्यार्थी पुरस्कार शुरू किया है.

'कलकत्ता गजट' था पहला अखबार

1. कलकत्ता गजट, 1784
2. ओरिएंटल मैगजीन, 1785 मि. गार्डेन और मि. हे
3. मद्रास कोरियर 1785 मि. गार्डेन और मि. हे
4. बंबई हैराल्ड, 1789 (1861 में इसका नाम टाइम्स ऑफ इंडिया
हो गया)
5. ओरिएंटल म्यूजियम (मासिक) 1771 मि. ह्वाइट
6. इंडिया गजट, 1792 (1780 दूसरे मत के अनुसार शुरू हुआ)
7. बंगला हरकारा (साप्ताहिक) 20.1.1795 डॉ. मैकलीन
8. इंडियन अपोलो, 4.10.1795
9. एशियाटिक मैगजिन 21.6.1798 बंगाल हरकारा कार्यालय से
10. कलकत्ता मंथली 1.11.1798 जे. ह्वाइट
11. रिलेटर (अर्ध साप्ताहिक 4.4.1799)
12. जाम-ए-जहानुमा 1822 फारसी
13. बंबई समाचार 1822 गुजराती (यह अखबार अभी भी चल रहा
है)
14. जाम-ए-जमशेद 1831 गुजराती
15. बंबई दर्पण 1832 मराठी और अंग्रेजी
16. बंबई अखबार 1840 मराठी
निम्नलिखित सभी हिंदी

17. उदंत मार्तंड मई 1826 कलकत्ता से [ प्रथम हिन्दी समाचार पत्र]
18. प्रजातंत्र 1836 कलकत्ता से
19. जगदीपक भास्कर 1849 कलकत्ता से
20. समाचार सुधा दर्शन 1854 कलकत्ता

अंग्रेजी अखबार

21. पायोनियर 1865 (यह ब्रिटिश हुकूमत का प्रवक्ता था)
22. अमृत बाजार पत्रिका, 1871
23. दि स्टेट्समैन, 1875 कलकत्ता
24. सिविल एंड मिलिट्री गजट 1876 (लाहौर से, यूरोपियों का हितैषी)
25. दि हिंदू, 1878 मद्रास
26. आनंद बाजार पत्रिका, 1878
27. दि ट्रिब्यून 1881
28. दि हिंदुस्तान टाइम्स 1923

हिंदी अखबार

29. श्री वेंकटेस्वर समाचार, कलकत्ता
20. विश्वमित्र, कलकत्ता
31. आज, 1920, बनारस (वाराणसी)
32. देश, 1920, पटना
33. स्वतंत्र, 1920
34. अर्जुन, 1920 कलकत्ता और दिल्ली
35. समाचार, 1920, कलकत्ता और दिल्ली
36. हिंदुस्तान, 1936, दिल्ली
37. अर्थवत, 1940, पटना

(यह सिर्फ मुख्य अखबारों की सूची है. संपूर्ण अखबारों की नहीं है)

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

घृणित राजनीति में मौत पर नेताओं के अलग - अलग सियासी पैमाने

घृणित राजनीति   में मौत पर नेताओं के अलग - अलग सियासी  पैमाने
नेताओं और नेतागिरी  से जितना देश को फायदा नहीं हुआ उससे ज्यादा नुकसान हुआ है  और आगे भी नुक्सान होता रहेगा. यदि भारतीय नहीं सुधारे. क्योंकि भारतीय ही वोट डालते हैं .  सच्चे नेता एक ही थे सुभाष चन्द्र जी , उनके साथ नेताओं ने क्या किया बताने की आवश्यकता नहीं है  ...उनकी मौत को गिरवी रखकर आज़ादी का अनुबंध बना. नेताओं ने ही देश के टुकड़े किये. क्रांतिकारियों ने देश के लिए लहू दिया और नेता देश का लहू पी रहे हैं .खैर आज - कल रोहित वेमुला के विषय पर राष्ट्रव्यापी कुचर्चा व राजनीतिक कुकृत्य हो रहा है . हमने आजतक जो थोड़ा - बहुत पढ़ा है वो ये कि आत्महत्या करना पाप है.आत्महत्या का प्रयास करना कानूनन जुर्म है , कई बार उपदेश स्वरुप सूना हूँ. आत्महत्या कायरता है.आत्महत्या बुजदिल या कायर करते हैं. और फिर कानपुर आई आई टी में, मुम्बई में और देश के कई संस्थानों में छात्रों ने आत्महत्या की  तब क्या ये राजनेता ससुराल गये थे .
दूसरी बात  याकूब मेनन जिसे देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने दोषी पाया. उसका विरोध इसी वेमुला ने किया. बाकायदा प्रदर्शन किया और  नारा दिया हर घर में याकूब होगा .अगस्त [2015] महीने  में याकूब मेमन की फांसी के खिलाफ अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन  के बैनर तले विरोध-प्रदर्शन किया था  रोहित वेमुला और उसके दोस्त याकूब मेमन के लिए नमाज़ पढ़ रहे थे. फांसी के खिलाफ अपनी बात रखना गलत नहीं है, इस तरह की बहस होना भी ठीक है लेकिन उनका 'हर घर में याकूब होगा' जैसे नारे लगाना क्या उचित थी.'  खैर राहुल वेमुला  को १२ मार्च, १९९३ को मुंबई में हुए सीरियल बम  ब्लास्ट क्या याद  था .उस समय तो इतना छोटा और नासमझ रहा होगा [लगभग 5 वर्ष] कि उसे पता ही नहीं आतंक क्या है? और मौत क्या  है? इस आतंकी घटना में एक दर्जन से अधिक जगहों पर धमाके हुए थे। इनमें 257 मासूम  लोग मारे गए थे और700 से अधिक बेगुनाह घायल हुए थे। इन मृतकों के परिजनों की संवेदना का अंदाज़ा उसे था  कि जिस याकूब की वो तरफदारी रहा है  उसके हाथ ही नहीं पूरा शरीर 257 लोगों के खून से सना है.एक नौजवान शोधार्थी इतना असंवेदनशील , निष्ठुर और  'मुजफ्फरनगर बाकी है' जैसी सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाली फिल्म का विरोध के बावजूद प्रदर्शन करवाने की जिद. क्या यही पढ़ने विश्वविद्यालय जाते हैं. ऐसी पढाई और ऐसा शोध..... उल्टा आसुंओं और संवेदनाओं का राजनीतिक ज्वार ..... बड़े नाम वाले पर तुच्छ नेता  और तुच्छ स्तर के राजनीतिक बयान  और बिचौलिये चैनल भी खूब चिल्लाये गला फाड़ कर. एक नेता ने राहुल वेमुला की आत्महत्या की तुलना गांधी जी की हत्या से कर दी. एक मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार को दलित विरोधी बता दिया  जबकि बाद में पता चला कि वेमुला ओबीसी है .
मेरी सम्वेदना ह्रदय से  राहुल वेमुला की माता जी के साथ है . क्योंकि जिसने आत्महत्या की वो तो मुक्त हो गया  पर उस माँ का क्या ? उसका पति भी नहीं है  जिसकी सारी उम्मीदे उस राहुल से थी जो अब नहीं है .जीवन की सारी पूंजी इस उम्मीद पर लगा दी कि एक दिन राहुल उसका सहारा बनेगा. पर दुखद ये हो न सका,पर नेताओं का भला जरुर हो गया .दलाल चैनलों और चरित्रहीन नेताओं को देखिये उन्होंने आत्महत्या को बाकायदा जाति का जामा पहना दिया.  दलित का जामा.....
 क्या यदि वो दलित नहीं होता  तो उसकी मौत का कोई मूल्य नहीं होता  ? इस तरह की चीजें आगे चलकर देश को गृहयुद्ध की  तरफ अग्रसर करेंगी. कल क्या पता जैन छात्र , मुस्लिम छात्र, इसाई छात्र, सिख छात्र, सवर्ण छात्र   का चलन शुरू हो जाय .खैर बाद में पता चला कि वो दलित ही नहीं था ओबीसी था. पूरी मीडिया सिर्फ दलित  पर केन्द्रित थी पत्रकारिता उसके मानदंड मर्यादा गई भाड़ में कुछ मीडिया के शीर्षक देखिये
खुदकुशी करने से पहले दलित छात्र रोहित वेमुला के अंतिम शब्‍द
दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या दरअसल 'हत्या' है?
दलित एक्टिविस्ट रोहित वेमुला की मौत, सामाजिक संगठनों में आक्रोश
रोहित वेमुला के दलित होने पर उठे सवाल
दलित नहीं था रोहित वेमुला!, मैरिट से हुआ था हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दाखिला
वेमुला आत्महत्या: छात्रों की भूख हड़ताल में शामिल हुए राहुल गांधी
पूर्व जज करेंगे रोहित वेमुला आत्महत्या मामले की जांच
-  नवभारत टाइम्स
रोहित वेमुला के बर्थडे को 'ज्वॉइंट एक्शन कमेटी' सामाजिक न्याय के दिन के तौर पर मना रही है
दलित छात्र रोहित वेमुला खुदकुशी मामले से जुड़ी 5 बातें
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की खुदकुशी के मामले को महात्मा गांधी की हत्या जैसा करार दिया
रोहित वेमुला खुदकुशी मामलाः छात्रों से मिले केजरीवाल, कहा केंद्र सरकार दलित विरोधी है.
 पिछ्ले दिनों रोहित वेमुला आत्महत्या मामले में मुंबई में  भी  विरोध प्रदर्शन  हुआ था  मुम्बई से प्रकाशित नवभारत टाइम्स ने प्रमुखता से प्रकाशित भी किया था अब मैं  'महाराष्ट्र के रायगढ़ के मुरुड़ बीच पर समंदर में डूबने से 14 बच्चों की हुई मौत  पर बात करना चाहूँगा  जो अभी की  घटना है पुणे के आबिदा इनामदार कॉलेज के 130 स्टूडेंट्स रायगढ़ के मुरुड जंजीरा बीच पर पिकनिक मनाने के लिए गए थे। इस ग्रुप में तकरीबन 70 लड़के और 60 लड़कियां थीं। इनमें से तकरीबन 20  छात्र -छात्राएं समुद्र किनारे तैर रहे थे और अचानक तेज लहरों की चपेट में आ गए।  जिसमें 14 ह्रदय विदारक मौत हो गयी.  ये भी छात्र थे  देश के भविष्य बनने से पहले भूत हो गए. इन परिवारों का क्या .... इनके दुःख कौन बांटेगा ?  नेता मीडिया अब क्यों गला नही फाड़ रहे हैं. क्या इन मौतों की कोई कीमत नहीं .इसका जिम्मेदार कौन ? इसी का जवाब मांगने जब पीड़ित परिवार वाले आबिदा इनामदार कॉलेज  के ट्रष्टी पी . ये. इनामदार गये तो उन्होंने बदतमीज़ी करके बहर निकलवा दिया. इन्हें कौन मुआवजा देगा. यहाँ कोई गांधी या केजरी क्यों नहीं पहुंचा. इनकी मौत को किस दिवस के रूप में मनाया जायेगा. ये कोई आन्दोंलन्करी वेमुला नहीं थे इनमें वेमुला की तरह राजनीतिक चेतना नहीं थे ये खालिस छात्र थे. ये दलित नहीं सिर्फ भारतीय थे क्या यही इनका गुनाह था या इनकी मौत राजनीतिक रोटियां पक नहीं सकती थी. क्या मुम्बई में इनकी मौत के विरोध में कोई प्रदर्शन होगा.... कोई नवभारत टाइम्स इन 14 मासूमों की मौत पर सवाल खड़ा करेगा.....
मुझे किसी से उम्मीद नही है उम्मीद है तो आम आदमी और  देश में बाघ जितने बचे हुए पत्रकारों से...... मीडिया से नहीं .... सिर्फ  पत्रकारों से ...

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर एक दृष्टि

हमारे देश में पत्रकारिता का प्रारंभ 18वीं सदी के
आखिरी दो दशकों में हुआ, परंतु यदि धार्मिक व
पौराणिक कथाओं अथवा युग की बात माने तो शायद
देवर्षि नारद जी भारतीय संस्कृति के प्रथम पत्रकार थे.
वे एक जगह से खबर लेकर कई जगहों पर पहुंचाते
थे. वह यह कार्य सम्पूर्णतया जनहित की भावनाओं
से करते थे. पहले राजाओं द्वारा गुप्त सूचनाओं व
अन्य जरूरी जानकारियों के लिए गुप्तचर रखे जाते
थे, कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र तथा 'मनुस्मृति में
पत्रकारिता का उल्लेख मिलता है. कौटिल्य
(चाणक्य) के समकालीन चीनी पर्यटक मेगास्थनीज
के सफरनामों में इस बात का प्रमाण मिलता है कि
चंद्रगुप्त के प्रधानमंत्री चाणक्य (कौटिल्य) ने कई श्रोतों से समाचार एकत्रित
कराने की व्यवस्था करवा रखी थी. पुराने जमाने में खबरें घुड़सवारों, प्रशिक्षित
कबूतरों व धावकों द्वारा राजाओं के दरबारों व अन्य महत्वपूर्ण लोगों तक
पहुंचाई जाती थी.
हमारे देश में पहला छापाखाना सन 1674 में मुंबई में शुरू हुआ (स्थापित
हुआ). इसके बाद चेन्नई (1772) और कलकत्ता (1779) में छपाई प्रेस
लगाए गए. प्रेस लग जाने के बाद भारत में पत्रकारिता पहले की अपेक्षा लंबे
तथा क्षिप्रतर कदम भरने लगी. इससे पहले इंग्लैंड से कुछ गिनती के भारतीयों
के पास अखबार आते थे.
भारतीय पत्रकारिता की जननी कलकत्ता है. हिंदुस्तान में सर्वप्रथम अखबार
प्रकाशन की योजना विलियम बोल्टस ने 1767 इ. में बनाई थी. परंतु यह खबर
जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी को चली वैसे ही कंपनी पहले जाने वाले जलयान से
यूरोप भेज दिया. पहला अखबार 'बंगाल गजट' 29 जनवरी 1780 के दिन
कलकत्ता से ही छपा था. इस अखबार के संस्थापक आगस्टस हिकी थे.
इसलिए इस अखबार को 'हिकीज गजट' भी कहते थे. यह साप्ताहिक था. इस
अखबार में कंपनी सरकार की आलोचना के कारण सरकार ने इस पर प्रतिबंध
लगा दिया. 1782 में इसी 'हिकी' को सजा हो गई. इसके बाद कई अखबार
प्रकाशित हुए.
'रिलेटर' के बाद 1816 तक कोई नया पत्र नहीं प्रकाशित हुआ, €क्योंकि कंपनी
सरकार की नीतियां पत्र-पत्रिकाओं के बेहद खिलाफ थी. 1818 ई. के बाद
प्रेस पर लगे प्रतिबंधों पर ढील दे दी गई क्योंकि तब तक अंग्रेजी हुकूमत की
स्थिति काफी मजबूत हो चुकी थी. 1823 में 'बंबई गजट' और 'बंबई
कोरियर' के संपादक सी. जे. फेअर पर अदालत की कार्यवाही छापने में
गलतबयानबाजी का इल्जाम लगाकर उसे हिंदुस्तान से उसकी इच्छा के विरुद्ध
इंग्लैंड वापस भेज दिया गया. इन दोनों पत्रिकाओं के मालिक गवर्नर जनरल की
कौंसिल के सदस्य फ्रांसिस वार्डन थे. परिणाम स्वरूप अंग्रेजी सरकार ने अपने
सभी कर्मचारियों को सभी पत्र-पत्रिकाओं से संबंध तोड़ लेने का आदेश दिया.
इस आदेश में एक छूट थी कि कर्मचारी सिर्फ साहित्यिक व वैज्ञानिक पत्रप
पत्रिकाओं से संबंध रख सकते हैं तथा अपने लेख भी छपवा सकते हैं. देश
आजादी के बाद भी वही नियम आज के सरकारी कर्मचारियों पर लागू है. इस
बीच कई अखबार निकले 1818 में 'दिग्दर्शन' व 'समाचार दर्पण' (बंगला
व अंग्रेजी में) अन्य बंगला अखबारों में 'समाचार पत्रिका, 'सुगंध कौमुदी,
'संवाद तिमिर नाशक' तथा 'बंगदूत. यह बंगला, फारसी व नागरी तीनों में
निकलता था. भारतीय भाषाओं में पहला अखबार छापने का श्रेय बांग्ला लिपियों
को है. भारतीय पत्रकारिता का श्रीगणेश बंगाल की भूमि से हुआ. 1839 तक
कलकत्ता से 6 दैनिकों सहित 26 यूरोपीय तथा 9 भारतीय अखबार प्रकाशित हो रहे थे , मुंबई से
10 यूरोपीय और 4 भारतीय तथा मद्रास से 9 यूरोपीय प्रकाशित हो रहे थे.
इसके अलावा श्री रामपुर, आगरा, लुधियाना और दिल्ली से एक-एक अखबार
प्रकाशित हो रहे थे.
1823 में अंग्रेजी सरकार ने अखबारों के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य बना
दिया . उस समय इसका बड़ा विरोध हुआ. परंतु हार ही नसीब हुई. 1826
ई. से लाइसेंस लेकर अखबार शुरू हुए.  30 मई 1826 में ही हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' जुगल किशोर शुक्ल के सम्पादन  में शुरू हुआ  और 19 दिसम्बर 1927 को अर्थाभाव के कारण बंद हो गया उच्चकोटि का राष्ट्रवादी अखबार था. 1835 में नए गवर्नर बने मेटकाल्फ
ने लाइसेंस प्रथा समाप्त कर दी. जिस कारण उसे अपना गवर्नर पद गंवाना पड़ा.
1821 में राजा राममोहन राय ने 'संवाद कौमुदी' तथा 1822 में फारसी में
'मिरूत-उल-अकबर' (साप्ताहिक) की स्थापना की. 1823 में मिरुत-उल-
अकबर को उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रेस कानून के विरोध में बंद कर दिया गया.
कंपनी सरकार को राजा राममोहन राय की पत्रकारिता संबंधी गतिविधियां पसंद
नहीं थी. फिर भी राजा पृष्ठभूमि में रहकर अन्य पत्र-पत्रिकाओं की मदद करते
रहे. 1860 के दशक के अंत में 11 उर्दू और 6 हिंदी अखबार प्रकाशित होते
थे. कई उर्दू अखबारों के संपादक हिंदू थे. सन 1875 को प्रथम संध्याकालीन
पत्र 'मद्रास मेल' प्रकाशित हुआ.
 7 अगस्त 1880 को पं. दुर्गाप्रसाद के सम्पादन में 'उचित वक्ता' अखबार निकाला. इसके
प्रथम संपादकीय का संदेश था कि ''स्वाधीनता गंवाकर विकास करने में कोई
गौरव नहीं''. 1890 में अमृत चक्रवर्ती द्वारा संपादित हिंदी बंगवासी 19वीं
शताब्दी का आखिरी अखबार था. अब तक के छपे अखबारों में सबसे ज्यादा
ग्राहक संख्या इसी अखबार की थी. यह संख्या 2 हजार थी. इस अखबार के
निकलते ही कई अखबार बंद हो गए. पं. अंबिका प्रसाद के अनुसार यह हिंदी
अखबार पत्रकारों का प्रथम विद्यालय था. इसने कई अन्य अखबारों को अच्छे
पत्रकार दिए. उन दिनों जहां कुछ समाचार पत्र अंग्रेजी हुकूमत के तरफदार थे,
वहीं कई समाचार पत्र राष्ट्र हितैषी व फिरंगियों के कट्टर आलोचक थे. जिससे
निपटने के लिए लार्ड लिट्टन ने 1878 में 'देशी भाषा समाचार पत्र' कानून
बनाया.
इस कानून के द्वारा देशी राष्ट्र हित में आवाज उठाने वाले अखबारों की सामग्री
जब्त कर ली जाती थी. उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट दिए जाते थे. कलकत्ता से
प्रकाशित 'भरत मित्र' के संपादक बाबू बाल मुकुंद ने लार्ड कर्जन की करतूतों
को नंगा कर बंग-विच्छेद का जबरदस्त विरोध किया.
बीसवीं सदी के पहले दशक में कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाएं भी
निकलना शुरू हुई, जिनका जिक्र करना बहुत जरूरी है. वे हैं भारतेंंदु हरिश्चंद्र
के संपादन में 'हरिश्चंद्र मैगजीन' (वाराणसी), पं. महावीर प्रसाद द्वीवेदी के
संपादन में 'सरस्वती' (प्रयाग) तथा आचार्य शिवपूजन सहाय एवं नलिन
विलोचन शर्मा के संपादन में 'साहित्य'. इन पत्रिकाओं में सरस्वती का विशेष
स्थान है. इस पत्रिका ने हिंदी साहित्य को एक नया मुकाम दिया. 1907 में
'नृसिंह पत्रिका' (मासिक, संपादक - अंबिका प्रसाद वाजपेयी) के चौथे अंक
में वाजपेई ने लिखा - स्वराज्य की आवश्यकता भारतवासियों को इसलिए है
कि विदेशी सरकार उनके अभावों व अभिलाषाओं को समझने में असमर्थ है.
यदि आज यहां स्वराज्य होता तो लाखों हिंदुस्तानी दुर्भिक्ष के कारण दाने-दाने
को तरस कर प्राण न गंवाते. स्वराज्य के अभाव से ही प्रतिवर्ष 45 करोड़ रु.
इस दरिद्र देश से इंग्लैंड चले जाते हैं.
1942 में 'मतवाला' का प्रकाशन शुरू हुआ. मतवाला पत्रकारिता के साथ
साहित्य में भी एक ऐतिहासिक घटना थी. इसमें हिंदी के जाने-माने लेखकों के
लेख छपते थे. 'मौजी' तथा 'आदर्श' भी इस समय के प्रसिद्ध पत्र थे. इन दोनों
के संपादक शिवपूजन सहाय थे. यह राष्ट्र हितैषी थी. 'विशाल भारत' गांधीयुग
की प्रसिद्ध पत्रिका (मासिक) थी. 1928 में यह कलकत्ता से शुरू हुई. इसके
संपादक बनारसी लाल चतुर्वेदी थे. सन 1942 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने शांति
निकेतन से 'विश्व भारती' का प्रकाशन प्रारंभ किया. इसके संपादक पं. हजारी
प्रसाद द्विवेदी थे. यह बहुत उच्च कोटि की सांस्कृतिक व साहित्यिक पत्रिका थी.
इसमें देश की मनीषी, कलाकार व साहित्यकार अपने लेख भेजते थे.
देश की आजादी 1947 के बाद कलकत्ता की भूमिका पत्रकारिता (हिन्दी) में
कम होने लगी और इसका क्षेत्र दिल्ली व उत्तर भारत बन गया. दिल्ली से
'हिंदुस्तान टाइम्स, 'नवभारत टाइम्स, राजस्थान से 'राजस्थान पत्रिका' और
'नवज्योति, मध्य प्रदेश से ' नईदुनिया, ' दैनिक भास्कर; और 'नवभारत' प्रकाशित हो
रहे थे. 1962 के करीब तक पत्रकारों में तीव्र आदर्शवादिता थी. 'मिलाप'
दैनिक के तत्कालीन संपादक खुशहाल चंद्र जो कि संन्यास लेने के बाद आनंद
स्वामी कहलाए, वह सब कुछ छोड़ देने (त्याग देने) के बावजूद 'मिलाप' को
नियमित रूप से अपना संपादकीय भेजते थे. कारण उनके हृदय में समाज के
प्रति कर्तव्य परायणता, समाजहित की भावना थी, जैसे देश स्वतंत्रता प्राप्ति के
पूर्व था.
1965 के बाद भारतीय पत्रकारिता का ह्रास होने लगा .(चीनी आक्रमण तथा
नेहरु के अवसान के बाद) और आज अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुंच गया है. आज
किराये का संपादक किराये का कर्मचारी बनकर रह गया है. आज सिर्फ स्वार्थ
सिद्धि मुख्य उद्देश्य रह गया है. अब कलम पूंजीपतियों की दासी है. पूंजी पति
कलम का दाम चुकता करते हैं. आदर्श पत्रकारिता बीते जमाने की बात हो गई
है. पहले 'घर फूंक तमाशा देखने वाले पत्रकार थे. साहस था. अब वह भाव
लुप्त हो गया है . इस सशक्त माध्यम का उपयोग अपने निजी स्वार्थों के लिए कर
रहे हैं. मर्यादा, आदर्श कूड़ेदान में कभी का फेंक चुके हैं. जैसे अविवाहित स्त्री
अपने बच्चे (नवजात शिशु) को चुपके से कूड़ेदान में फेंक देती है. इसी कारण
पहले की तरह पत्रकारों का अब आदर भी न रहा.




मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पत्रकारिता को मीडिया कहकर लज्जित न करें

मीडिया और पत्रकारिता के अंतर को जाने

मित्रों आज पत्रकारिता शब्द के पर्याय, विकल्प या पत्रकारिता के स्थान पर एक दोयम दर्जे के औपनिवेशिक शब्द मीडिया ने हथिया लिया है.पत्रकारिता देशज व पवित्र शब्द है.पत्रकारिता ने देश की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय व उत्थान में अप्रतिम भूमिका निभाई है किन्तु आज मीडिया के नाम पर पत्रकारिता को भी अपशब्द, अपमान व उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा हैं इसका मीडिया से सीधे कोई लेना देना नहीं है. 15 वर्ष पहले अधिकाँश लोगों से लिए मीडिया अप्रचलित शब्द था हाँ जब से टेलीविजन पत्रकारिता मुखर हुई . मीडिया शब्द उससे चस्पा हो गया या कर दिया गया. पत्रकारिता को औपनिवेशिक भाषा में जर्नलिज्म कहते हैं न कि मीडिया.
आइये मीडिया शब्द की स्पष्टतापूर्वक विवेचना करते हैं. मीडिया शब्द अंग्रेजी भाषा का शब्द है इससे मिलते -जुलते अनेक शब्द हैं आप इन शब्दों को इनके रिश्तेदार भी कह सकते हैं इन शब्दों को आपने अक्सर सुना भी होगा जैसे - हिन्दी मीडियम, मीडिएटर ,मिडिल मैंन या मिडिल ईस्ट ये सारे शब्द मीडया से ही निकले हैं या सुविधानुसार दूसरे शब्दों के साथ जोड़ दिए गए हैं या यूँ कहें उसी के रिश्तेदार हैं.
मीडिया का अर्थ 'माध्यम' होता है . हिन्दी मीडियम - हिन्दी माध्यम, मीडिएटर - मध्यस्थ या बिचौलिय, मिडिल मैन - बिचौलिया या बीच का आदमी, मिडिलईस्ट- मध्यपूर्व , कहीं से भी इस शब्द व इसके रिश्तेदारों का पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं हैं. उपरोक्त उदाहरणों से ये स्पष्ट हो जाता है इसका सम्बन्ध जोड़ने से , सहयोगी शब्द है .अकेले इसका अधिक महत्व नहीं है ,परन्तु जब ये किसी के साथ जुड़ जाता है तो महत्वपूर्ण हो जाता है. मध्यस्थ या बिचौलिये का महत्व तभी होता है जब वो दो लोगों के बीच होता है. अन्यथा शून्य है वो. उसे महत्व के लिए कम से कम दो लोगों का साथ चाहिए . वो बुराई , चुगली, सौदा, समझौता लड़ाई या और कुछ तभी करा सकता है जब कम से कम उसे दो लोग मिलें . इसके लिए अपने यहाँ प्रचलित देशज शब्द है ' ''दलाल'' . समय के साथ शब्द बदलते गये पर अर्थ नहीं बदला जैसे दल्ला से दलाल आगे ब्रोकर, आगे कंसल्टेंट्स, और बड़े स्तर पर ''लाबिस्ट'' जैसे नीरा राडिया. अर्थात मीडिया का मतलब बीचवाला अर्थात दलाल , सूचनाओं की दलाली करने वाले आधुनिक दलाल और आप इन बीचवालों को पत्रकार मान बैठे हैं पहले ये सूचना देने का कारोबार करते थे पर उसमें इन्हें ज्यादा फायदा नहीं था सो इन्होनें ख़बरों का कारोबार कुछ दिन किया .इन्हें और मुनाफ़ा चाहिये था तो ये दो कदम और बढ़कर ख़बरों की दलाली का काम शुरू किये अर्थात ख़बरें गढ़ने का धंधा और भयानक बदबू यहाँ से शुरू हुई . धंधे में मुनाफे के लिए धर्म , जाति, देश जो भी काम का हो बेच रहे हैं क्योंकि सच ये है कि देश इनका तो है नहीं .जीन्यूज़ और इण्डिया टीवी जैसे 2 एक चैनलों को छोड़कर अधिसंख्य के मालिक विदेशी हैं और फिर देशी हो या विदेशी सब बिचौलिये हैं. पत्रकारिता तो अब नीलकंठ पक्षी हो गया है जो बड़ी मुश्किल से दिखाई देता है.
पत्रकारिता दर्पण .है जो मूल पत्रकारिता से जुड़े है वे प्रेस में छपाई के समय प्लेट देखे होंगे वहां ''मिरर इमेज'' बोलते हैं शब्द उल्टे लगते हैं पर छपकर सीधे आते हैं. पत्रकारिता शुद्ध घी है उसमे मिलावट से अनर्थ हो जायेगा. पत्रकारिता मुस्लिम नहीं है,पत्रकारिता दलित नहीं है, पत्रकारिता सेकुलर नहीं है, पत्रकारिता हिन्दू नहीं है, पत्रकारिता धंधा नहीं है. इसे बचाइए... देश में बाघ जितने बचे हैंउससे कम पत्रकारिता बची है इसलिए इसके लिए भी आवाज़ उठाइए. पहले पत्रकारिता को बचाइए फिर बाघों को पत्रकारिता बचा लेगी . पवन तिवारी के ब्लॉग '' चवन्नी का मेला ''से साभार

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

कुछ साहित्यिक दुनिया वाले आज़ादी के दीवाने


आज की  राजनीतिक  ऊष्मा  में अचानक नेता जी सुभाष पर जारी गोपनीय पत्रों ने  क्रान्तकारियों के जीवन, उनकी पीड़ा , उपेक्षा और षडयंत्र आदि चीजों  ने  उनके स्वतंत्रता आन्दोलन  के साथ साहित्यिक अवदानों की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित किया . राजनीति पर तो अक्सर लिखता रहा हूँ ,सो आज अपने पाठकों, मित्रों से कुछ ऐसे  साहित्यकारों  के बारे में बात करूँगा  जो साहित्य के साथ- साथ  देश सेवा में भी पीछे नहीं रहे .
आज़ादी की लड़ाई में साहित्यकारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है या यूँ कहें कि गुलामी के दिनों में अधिसंख्य साहित्यकार क्रांतिकारी पहले थे ,बाद में लेखक ,पत्रकार  आदि थे ,कवियों की रचनाओं में देश प्रेम की भावनाएं उफान पर थी .कई कवियों और पत्रकारों को राष्ट्रवादी रचनाएँ  व लेख लिखने के कारण जेल जाना पड़ा.ऐसे अनेकोंनेक क्रांतिकारी साहित्यकार हैं .
जिनमें गणेश शंकर विद्यार्थी ,राम प्रसाद बिस्मिल ,माखनलाल चतुर्वेदी , दिनकर ,गया प्रसाद शुक्ल ' स्नेही ', श्रद्धा राम फिल्लौरी , भवानी प्रसाद मिश्र , ,यशपाल और शिवमंगल सिंह सुमन जी के कुछ प्रसंगों का मैं नीचे संक्षेप में जिक्र करने  जा रहा हूँ . वैसे उपरोक्त विभूतियों के आलावा भी अनेकानेक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी साहित्यकार हैं पर सबका वर्णन करना सम्भव नहीं है इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ .
गणेश शंकर विद्यर्थी   :  विद्यार्थी  जी आज़ादी की लड़ाई व साहित्य को जोड़कर एक दुसरे का पूरक बनाने वाले महापुरुष थे . विद्यार्थी जी का जन्म 26 अक्तूबर १८९० में अतरसुइया स्थित इलाहबाद में हुआ था एवं  १९३१ में बेहद कम उम्र में स्वर्गवास हो गया . इस अल्पायु में विद्य्ढ़ती जी ने जो किया वह अप्रतिम है .उन्होंने कानपुर से  “ प्रताप नामक प्रथम राष्ट्रीय अखबार निकाला  .यहाँ से राष्ट्रवादी पत्रकारों और साहित्यकारों की एक नयी पौध तैयार हुई ..यहीं पर चंद्रशेखर आजाद , भगत सिंह , राज गुरु , सुख देव  को एक नई दोष मिली .इसी प्रताप से प्रेम चन्द, माखनलाल चतुर्वेदी ,बालकृष्ण शर्मा नवीन , गया प्रसाद शुक्ल सनेही जैसे तमाम लोगो को साहित्य एवं पत्रकारिता का एक उम्दा समझ विकसित करने का मंच दिया . भगत सिंह के प्रेरणा श्रोत विद्यार्थी जी ही थे .विद्यार्थी जी एक उम्दा सम्पादक ,पत्रकार होने के आलावा वे उच्च कोटि के लेखक भी थे . वे 5 बार अंग्रेजों के खिलाफ लिखने के कारण  जेल भी गये . उन्होंने संस्मरण , जेल डायरी ,निबंध , पत्र  और कहानी  भी लिखी . गणेश शंकर विद्यार्थी रचनावलीमें उनकी रचनाएँ संकलित है .इनके नाम से भारत सरकार पत्रकारिता पुरस्कार भी प्रदान करती है .
राम प्रसाद  बिस्मिल  :  राम प्रासाद बिस्मिल एक सच्चे राष्ट्र भक्त के अलावा वे एक उम्दा शायर एवं लेखक भी थे .उनकी एक रचना स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा थी .उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में जन्में  बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा भी  जेल में रहते हुए लिखी , जो एक उम्दा आत्मकथा है , जिसका नाम निज जीवन की एक छटा है   सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है , देखना है जोर कितना बाजु कातिल  में है , बिस्मिल जी की ही रचना है .
माखनलाल   चतुर्वेदी  :    चतुर्वेदी का जन्म बावई गाँव  जनपद होशंगाबाद मध्यप्रदेश में हुआ था ,वे प्रखर राष्ट्रवादी थे , अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता में स्वदेश प्रेम की भावना जागृत करते रहते थे . वे कर्मवीर नाम से एक राष्ट्रीय अख़बार भी  चलते थे . माखन जी का एक उपनाम एक भारतीय आत्मा है  उनकी एक रचना देखिये .... सूली का पथ ही सीखा हूँ ,सुविधा सदा बचाता आया .मैं बलि पथ का अंगारा हूँ , जीवन ज्वाला जलाता आया [शीर्षक अमर राष्ट्र ] दूसरी रचना देखिये  - चाह नहीं सुर बाला के गहनों में गुथा जाऊं , चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ    ---------------------- मुझे तोड़ लेना वनमाली , उस पथ पर तुम देना फेंक . मातृभूमि पर शीश चढानें , जिस पथ जावें वीर अनेक .
भवानी प्रसाद मिश्र  :  मिश्र जी का जन्म भी होशंगाबाद जनपद में हुआ था ,.माखनलाल चतुर्वेदी जी और मिश्र जी का अच्छा साथ रहा . १९४२ से १९४५ तक स्वतंत्रता आन्दोलन में भागलेने के कारण जेल में बंद रहे . मिश्र जी ने कुछ दिनों तक  विदद्यालय खोलकर  पठन पठान किया ,जिसमें विद्द्यार्थियों को राष्ट्रवादी विचारों से अवगत कराया  जाता था .मिश्र जी की एक रचना देखिये  ---  बुरी बात है , उठो पांव रक्खो , रकाब पर , जंगल जंगल , नददी नाले , कूद्फांद्कर  धरती रौदों , जैसे भांडों की रातों में बिजली कौधे , ऐसे कौंधो [ शीर्षक उठो ]
गया प्रसाद शुक्ल सनेही ’ :  सनेही जी जन कवि थे . उनकी कविता पढ़ने की अनूठी शैली थी . जनता उनकी कविता सुनकर भाव विभोर हो उठाती. उन्हें हिन्दी काव्य सम्मेलनों का प्रतिष्ठापक  कहा जाता है .सनेही जी सच्चे राष्ट्रवादी थे . उनका जन्म हड्दागाँव जिला उन्नाव , उत्तरप्रदेश में हुआ  था .वे स्कूल अध्यापक थे परन्तु १९२१  में त्यागपत्र देकर आज़ादी के आन्दोलन में कूद पड़े उनकी एक राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत रचना देखिये ----
 जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
श्रद्धाराम फिल्लौरी :  पंडित श्रद्धाराम शर्मा फिल्लौरीएक वैदिक धर्म को मनाने वाले धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे ,पर उतने ही बड़े राष्ट्र भक्त  व लेखक भी थे , वे धार्मिक आयोजनों के बहाने लोगों को एकत्रित करते और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाते,  श्रद्धाराम  फिल्लौर के रहने वाले थे .अंग्रेज सरकार ने उनपर फिल्लौर आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था .उन्होंने ही हिन्दी का प्रथम उपन्यास भाग्यवती लिखा . ॐ जय जगदीश हरे .... आरती श्रद्धाराम जी की ही रचना है .
यशपाल :  यशपाल जी का स्वतंत्रता आन्दोलन और साहित्य दोनों में अतुलनीय योगदान है .प्रेमचन्द के बाद हिन्दी साहित्य में यशपाल जैसा कहानीकार शायद ही कोई हो . ३दिसम्बर १९०३ को पंजाब  के फिरोजपुर छावनी में पैदा हुए . यशपाल जी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया , जब वे लाहौर के नेशनल कालेज में पढने गये . वहीं इनका परिचय भगत सिंह , राजगुरु व सुखदेव से हुआ .इसके बाद इन्होने सशस्त्र क्रांति में भाग लिया . दिली और लाहौर षड्यंत्र मामले में अंग्रेज सरकार ने १९३२ में 14 साल की सजा सुनाई थी.१९७१ में इन्हें पद्मभूषण मिला.
शिवमंगल सिंह सुमन ‘ :  उन्नाव की ही वीरभूमि पर सुमन जी का जन्म 5 अगस्त १९१५  को हुआ .एक बार किसी कवि सम्मेलन से सुमन जी घर आ रहे थे ,कि कुछ लोगों ने इन्हें अगवा कर आखों पर पट्टी बांधकर एक जगह ले गये . वहां आखों से पट्टी हटाई गयी तो सामने क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद थे , आज़ाद ने सुमन जी से कहा  - क्या तुम मेरी रिवाल्वर दिल्ली पहुंचा सकते हो ? सुमन जी ने तुरंत हाँ कह दी,तो ऐसे थे सुमन जी . उनकी एक रचना देखिये माँ कब से खड़ी पुकार रही , पुत्रों निजकर में अस्त्र गहो , सेनापति की आवाज़ हुई , तैयार रहो , तैयार रहो .आओ तुम भी दो आज विदा , अब क्या अड़चन , क्या देरी , लो आज बज उठी रणभेरी , पैतीस कोटि लड़के बच्चे , जिसके बल पर ललकार रहे , वह पराधीन बिन निज गृह में , परदेशी की दुत्कार सहे . कह दो अब हमको सहन नहीं , मेरी माँ कहलाये चेरी , लो आज बज उठी रणभेरी .[शीर्षक रणभेरी ]
रामधारी सिंह  दिनकर ‘ :  दिनकर जी का जन्म बिहार के बेगूसराय में १९०८ में हुआ .दिनकर जी को राष्ट्रकवि  कहा जाता है . उनकी रचनाएँ राष्ट्रप्रेम की भावनाओं की उद्दात लहरें हैं .उन्होंने देश व भाषा दोनों को खूब प्रेम किया , उन्होंने राष्ट्रसेवा  के अलावा साहित्य की भी ख़ूब सेवा की . इन्होने हिन्दी पर राष्ट्रभाषा व राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रभाषा आन्दोलन और गांधी जी  जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी .संस्कृत के चार अध्याय’ , गंभीर विशद  व खोजपूर्ण ग्रन्थ है . उर्वशी के लिए दिनकर जी को १९७२ में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला . इनकी एक रचना देखिये --- दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को ज़िला दे, 
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे। 
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ, 
चढ़ती जवानियों का शृंगार मांगता हूँ।[शीर्षक आग की भीख ] एक अन्य रचना देखिये  --- 
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।




सोमवार, 25 जनवरी 2016

देख लीजिये 16 कारसेवकों की लाशों पर खड़े इस नेता को

आज कर्पूरी ठाकुर की 91 वीं  जयंती के अवसर पर जो मुलायम सिंह जी ने कहा  वह  एक भारतीय के रूप में असहज कर गया . क्या कोई वरिष्ठ नेता  इतनी ऊंचाई से एक झटके में जानबूझकर सिर्फ वोटों के लिए इतना नीचे गिर सकता है .वैसे मुलायम जी का यूँ गिरने का इतिहास रहा है पर  उम्र के इस पड़ाव पर आकर  लाशों की वैसाखी पर खड़ा होने की चाहत खतरनाक है.
 2 नवम्बर 1990 को  तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के आदेश पर  पुलिस  ने बेगुनाह हिन्दुओं पर गोलियां बरसाई थी. सरकार के अनुसार 16 मामूली जाने गयी और जाती तो भी कोई बात नहीं . हालांकि यह विवादित है. भाजपा का अनुमान है कि 168 मारे गए थे.  विहिप  के अनुसार अकेले विहिप ने  76 शरीर का अंतिम संस्कार किया. खैर अचानक 25 वर्ष बाद मुलायम को वे 16 लाशें क्यों याद आयी. क्योंकि उन्हें २०१७ के चुनाओं में अपनी राजनीतिक इमारत जर्जर सी लग रही है उसके ढहने का डर सताने लगा है  सो उन्हें सहारे के रूप में वे 16 लाशें याद आयी .जिनके सहारे वे २०१७ में अपनी जर्जर राजनीति को बचा सकें .  ये घृणित सच है कि सपा का आज तक जो अस्तित्व है वो उन 16 लाशों के कारण ही है . उन्होंने मुस्लिम वोटों के बिखरने के डर [ कहीं मायावती के पास कुछ  छिटककर न चले जाय] से दाव फिर खेला . उन्होंने खुद ही कहा कि  इसीलिए मुस्लिमों में उनके प्रति भरोसा जगा और पार्टी आज यहाँ तक पहुँची . उन्होंने ये भी कहा कि धर्मस्थल को बचाने के लिए और भी जाने जाती तो वे पीछे नहीं हटते. ये बयान मुस्लिमों को आश्वस्त  करने के लिए  था .  हाँ उन्होंने उन मौतों पर औपचारिक रूप से दुःख जताया जो सिर्फ राजनीतिक दिखावा था .वे चाहते तो उसके लिए हाथ जोड़कर माफी मांग सकते थे और अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती भी बता सकते थे .पर ऐसे में मुस्लिम भाइयों के इतने बड़े वोट बैंक को हथियाते कैसे . मुझे जलियांवालावाला बाग़ याद आ रहा है .जहाँ 13 अप्रैल1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, लोगों को मार डाला था और हज़ारों लोगों को घायल कर दिया था। यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। कहीं ये वही जनरल डायर तो नही है  खैर  आगे चलकर इस घटना के प्रतिघात स्वरूप सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ ड्वायर को गोली चला के मार डाला।
मुझे १९८५ की वो फिल्म भी याद आ रही है जिसमें अनिलकपूर अमरीश पुरी को ललकारते हुए भरी सभा में कहते हैं - देख लीजिये  75 लाशों पर खड़ा ये ठराकल कितना ऊँचा दिखाई दे रहा है ...आप कह सकते हैं 16 लाशों पर खड़ा ये .............................. हर एक आदमी के साथ कई लोग होते हैं वह अकेला नहीं मरता,  उसके साथ दम तोड़ता है उसकी बीबी का सुहाग ,उसके बच्चो का भविष्य ,उसके घर में बसने वाली एक एक खुसी ,उसके आंगन में उतरनेवाली एक -एक खुसी , सबकी एक साथ मौत हो जाती है . कुछ समझ में आया ....... जल्दी भूलने की आदत है भारतीयों को ....
इस पुराने लेख में एक नया अंश आज जोड़ रहा हूँ...... जरूरी भी है....
मुलायम सिंह  ने कल अर्थात 27 अगस्त 2016 को खुद पर लिखी पुस्तक के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए कहा कि  कारसेवकों पर गोली चलवाना आवश्यक था. नहीं तो मुस्लिमों का हिन्दुस्तान पर से भरोसा उठ जाता... इसके लिए  16 की जगह 30 जानें जाती तो भी मुझे अफ़सोस नहीं होता. ऐसा ही बयान मुलायम ने  आज से लगभग 7 महीने पहले कर्पूरी ठाकुर की जयन्ती पर 24 जनवरी 2016 को दिया था. फिर अचानक 7 माह बाद इस बयान की क्या जरूरत पड़ गयी. इस घटना को गुजरे 25 साल बीत गये , इससे पहले ये बयान क्यों नहीं आया . जो 16 कारसेवक मरे मुलायम के इस बयान से उनके परिवार पर क्या गुजरेगी . ये एकदम तलछट की राजनीति है . सम्वेदनहीन और मौकापरस्त बयान. आगामी चुनावों में मुस्लिम वोट सपा से छाटकें  न ,उसके लिए ये बयान है. कांग्रेस नई रणनीति के साथ चुनाव में आ रही है. इसलिए मुलायम को डर है कि कहीं कुछ वोट छिटक न जाएँ. 18% मुस्लिम वोट के लिए मुलायम ने सारी नैतिकता ताक पर रख दी.18% तो सिर्फ सवर्ण हैं उत्तर प्रदेश में . ऐसे में जनता का दायित्व बनता है कि ऐसे लोगो को राजनीति से बाहर का रास्ता दिखाए . 
पुनः मैं मेरीजंग फिल्म का वो संवाद को याद करता हूँ ......
याद करिए ''मेरी जंग का वो सम्वाद जिसमें अनिल कपूर अमरीश पुरी को ललकारते हुए भरी सभा में कहते हैं - देख लीजिये 75 लाशों पर खड़ा ये ठराकल कितना ऊँचा दिखाई दे रहा है ...आप कह सकते हैं देख लीजिये 16 लाशों पर खड़ा ये मुलायम सिंह कितना ऊँचा दिखाई दे रहा है ............................. हर एक आदमी के साथ कई लोग होते हैं वह अकेला नहीं मरता, उसके साथ दम तोड़ता है उसकी बीबी का सुहाग ,उसके बच्चो का भविष्य ,उसके घर में बसने वाली एक एक खुसी ,उसके आंगन में उतरनेवाली एक -एक खुसी , सबकी एक साथ मौत हो जाती है . कुछ समझ में आया .......