यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर एक दृष्टि

हमारे देश में पत्रकारिता का प्रारंभ 18वीं सदी के
आखिरी दो दशकों में हुआ, परंतु यदि धार्मिक व
पौराणिक कथाओं अथवा युग की बात माने तो शायद
देवर्षि नारद जी भारतीय संस्कृति के प्रथम पत्रकार थे.
वे एक जगह से खबर लेकर कई जगहों पर पहुंचाते
थे. वह यह कार्य सम्पूर्णतया जनहित की भावनाओं
से करते थे. पहले राजाओं द्वारा गुप्त सूचनाओं व
अन्य जरूरी जानकारियों के लिए गुप्तचर रखे जाते
थे, कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र तथा 'मनुस्मृति में
पत्रकारिता का उल्लेख मिलता है. कौटिल्य
(चाणक्य) के समकालीन चीनी पर्यटक मेगास्थनीज
के सफरनामों में इस बात का प्रमाण मिलता है कि
चंद्रगुप्त के प्रधानमंत्री चाणक्य (कौटिल्य) ने कई श्रोतों से समाचार एकत्रित
कराने की व्यवस्था करवा रखी थी. पुराने जमाने में खबरें घुड़सवारों, प्रशिक्षित
कबूतरों व धावकों द्वारा राजाओं के दरबारों व अन्य महत्वपूर्ण लोगों तक
पहुंचाई जाती थी.
हमारे देश में पहला छापाखाना सन 1674 में मुंबई में शुरू हुआ (स्थापित
हुआ). इसके बाद चेन्नई (1772) और कलकत्ता (1779) में छपाई प्रेस
लगाए गए. प्रेस लग जाने के बाद भारत में पत्रकारिता पहले की अपेक्षा लंबे
तथा क्षिप्रतर कदम भरने लगी. इससे पहले इंग्लैंड से कुछ गिनती के भारतीयों
के पास अखबार आते थे.
भारतीय पत्रकारिता की जननी कलकत्ता है. हिंदुस्तान में सर्वप्रथम अखबार
प्रकाशन की योजना विलियम बोल्टस ने 1767 इ. में बनाई थी. परंतु यह खबर
जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी को चली वैसे ही कंपनी पहले जाने वाले जलयान से
यूरोप भेज दिया. पहला अखबार 'बंगाल गजट' 29 जनवरी 1780 के दिन
कलकत्ता से ही छपा था. इस अखबार के संस्थापक आगस्टस हिकी थे.
इसलिए इस अखबार को 'हिकीज गजट' भी कहते थे. यह साप्ताहिक था. इस
अखबार में कंपनी सरकार की आलोचना के कारण सरकार ने इस पर प्रतिबंध
लगा दिया. 1782 में इसी 'हिकी' को सजा हो गई. इसके बाद कई अखबार
प्रकाशित हुए.
'रिलेटर' के बाद 1816 तक कोई नया पत्र नहीं प्रकाशित हुआ, €क्योंकि कंपनी
सरकार की नीतियां पत्र-पत्रिकाओं के बेहद खिलाफ थी. 1818 ई. के बाद
प्रेस पर लगे प्रतिबंधों पर ढील दे दी गई क्योंकि तब तक अंग्रेजी हुकूमत की
स्थिति काफी मजबूत हो चुकी थी. 1823 में 'बंबई गजट' और 'बंबई
कोरियर' के संपादक सी. जे. फेअर पर अदालत की कार्यवाही छापने में
गलतबयानबाजी का इल्जाम लगाकर उसे हिंदुस्तान से उसकी इच्छा के विरुद्ध
इंग्लैंड वापस भेज दिया गया. इन दोनों पत्रिकाओं के मालिक गवर्नर जनरल की
कौंसिल के सदस्य फ्रांसिस वार्डन थे. परिणाम स्वरूप अंग्रेजी सरकार ने अपने
सभी कर्मचारियों को सभी पत्र-पत्रिकाओं से संबंध तोड़ लेने का आदेश दिया.
इस आदेश में एक छूट थी कि कर्मचारी सिर्फ साहित्यिक व वैज्ञानिक पत्रप
पत्रिकाओं से संबंध रख सकते हैं तथा अपने लेख भी छपवा सकते हैं. देश
आजादी के बाद भी वही नियम आज के सरकारी कर्मचारियों पर लागू है. इस
बीच कई अखबार निकले 1818 में 'दिग्दर्शन' व 'समाचार दर्पण' (बंगला
व अंग्रेजी में) अन्य बंगला अखबारों में 'समाचार पत्रिका, 'सुगंध कौमुदी,
'संवाद तिमिर नाशक' तथा 'बंगदूत. यह बंगला, फारसी व नागरी तीनों में
निकलता था. भारतीय भाषाओं में पहला अखबार छापने का श्रेय बांग्ला लिपियों
को है. भारतीय पत्रकारिता का श्रीगणेश बंगाल की भूमि से हुआ. 1839 तक
कलकत्ता से 6 दैनिकों सहित 26 यूरोपीय तथा 9 भारतीय अखबार प्रकाशित हो रहे थे , मुंबई से
10 यूरोपीय और 4 भारतीय तथा मद्रास से 9 यूरोपीय प्रकाशित हो रहे थे.
इसके अलावा श्री रामपुर, आगरा, लुधियाना और दिल्ली से एक-एक अखबार
प्रकाशित हो रहे थे.
1823 में अंग्रेजी सरकार ने अखबारों के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य बना
दिया . उस समय इसका बड़ा विरोध हुआ. परंतु हार ही नसीब हुई. 1826
ई. से लाइसेंस लेकर अखबार शुरू हुए.  30 मई 1826 में ही हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' जुगल किशोर शुक्ल के सम्पादन  में शुरू हुआ  और 19 दिसम्बर 1927 को अर्थाभाव के कारण बंद हो गया उच्चकोटि का राष्ट्रवादी अखबार था. 1835 में नए गवर्नर बने मेटकाल्फ
ने लाइसेंस प्रथा समाप्त कर दी. जिस कारण उसे अपना गवर्नर पद गंवाना पड़ा.
1821 में राजा राममोहन राय ने 'संवाद कौमुदी' तथा 1822 में फारसी में
'मिरूत-उल-अकबर' (साप्ताहिक) की स्थापना की. 1823 में मिरुत-उल-
अकबर को उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रेस कानून के विरोध में बंद कर दिया गया.
कंपनी सरकार को राजा राममोहन राय की पत्रकारिता संबंधी गतिविधियां पसंद
नहीं थी. फिर भी राजा पृष्ठभूमि में रहकर अन्य पत्र-पत्रिकाओं की मदद करते
रहे. 1860 के दशक के अंत में 11 उर्दू और 6 हिंदी अखबार प्रकाशित होते
थे. कई उर्दू अखबारों के संपादक हिंदू थे. सन 1875 को प्रथम संध्याकालीन
पत्र 'मद्रास मेल' प्रकाशित हुआ.
 7 अगस्त 1880 को पं. दुर्गाप्रसाद के सम्पादन में 'उचित वक्ता' अखबार निकाला. इसके
प्रथम संपादकीय का संदेश था कि ''स्वाधीनता गंवाकर विकास करने में कोई
गौरव नहीं''. 1890 में अमृत चक्रवर्ती द्वारा संपादित हिंदी बंगवासी 19वीं
शताब्दी का आखिरी अखबार था. अब तक के छपे अखबारों में सबसे ज्यादा
ग्राहक संख्या इसी अखबार की थी. यह संख्या 2 हजार थी. इस अखबार के
निकलते ही कई अखबार बंद हो गए. पं. अंबिका प्रसाद के अनुसार यह हिंदी
अखबार पत्रकारों का प्रथम विद्यालय था. इसने कई अन्य अखबारों को अच्छे
पत्रकार दिए. उन दिनों जहां कुछ समाचार पत्र अंग्रेजी हुकूमत के तरफदार थे,
वहीं कई समाचार पत्र राष्ट्र हितैषी व फिरंगियों के कट्टर आलोचक थे. जिससे
निपटने के लिए लार्ड लिट्टन ने 1878 में 'देशी भाषा समाचार पत्र' कानून
बनाया.
इस कानून के द्वारा देशी राष्ट्र हित में आवाज उठाने वाले अखबारों की सामग्री
जब्त कर ली जाती थी. उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट दिए जाते थे. कलकत्ता से
प्रकाशित 'भरत मित्र' के संपादक बाबू बाल मुकुंद ने लार्ड कर्जन की करतूतों
को नंगा कर बंग-विच्छेद का जबरदस्त विरोध किया.
बीसवीं सदी के पहले दशक में कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाएं भी
निकलना शुरू हुई, जिनका जिक्र करना बहुत जरूरी है. वे हैं भारतेंंदु हरिश्चंद्र
के संपादन में 'हरिश्चंद्र मैगजीन' (वाराणसी), पं. महावीर प्रसाद द्वीवेदी के
संपादन में 'सरस्वती' (प्रयाग) तथा आचार्य शिवपूजन सहाय एवं नलिन
विलोचन शर्मा के संपादन में 'साहित्य'. इन पत्रिकाओं में सरस्वती का विशेष
स्थान है. इस पत्रिका ने हिंदी साहित्य को एक नया मुकाम दिया. 1907 में
'नृसिंह पत्रिका' (मासिक, संपादक - अंबिका प्रसाद वाजपेयी) के चौथे अंक
में वाजपेई ने लिखा - स्वराज्य की आवश्यकता भारतवासियों को इसलिए है
कि विदेशी सरकार उनके अभावों व अभिलाषाओं को समझने में असमर्थ है.
यदि आज यहां स्वराज्य होता तो लाखों हिंदुस्तानी दुर्भिक्ष के कारण दाने-दाने
को तरस कर प्राण न गंवाते. स्वराज्य के अभाव से ही प्रतिवर्ष 45 करोड़ रु.
इस दरिद्र देश से इंग्लैंड चले जाते हैं.
1942 में 'मतवाला' का प्रकाशन शुरू हुआ. मतवाला पत्रकारिता के साथ
साहित्य में भी एक ऐतिहासिक घटना थी. इसमें हिंदी के जाने-माने लेखकों के
लेख छपते थे. 'मौजी' तथा 'आदर्श' भी इस समय के प्रसिद्ध पत्र थे. इन दोनों
के संपादक शिवपूजन सहाय थे. यह राष्ट्र हितैषी थी. 'विशाल भारत' गांधीयुग
की प्रसिद्ध पत्रिका (मासिक) थी. 1928 में यह कलकत्ता से शुरू हुई. इसके
संपादक बनारसी लाल चतुर्वेदी थे. सन 1942 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने शांति
निकेतन से 'विश्व भारती' का प्रकाशन प्रारंभ किया. इसके संपादक पं. हजारी
प्रसाद द्विवेदी थे. यह बहुत उच्च कोटि की सांस्कृतिक व साहित्यिक पत्रिका थी.
इसमें देश की मनीषी, कलाकार व साहित्यकार अपने लेख भेजते थे.
देश की आजादी 1947 के बाद कलकत्ता की भूमिका पत्रकारिता (हिन्दी) में
कम होने लगी और इसका क्षेत्र दिल्ली व उत्तर भारत बन गया. दिल्ली से
'हिंदुस्तान टाइम्स, 'नवभारत टाइम्स, राजस्थान से 'राजस्थान पत्रिका' और
'नवज्योति, मध्य प्रदेश से ' नईदुनिया, ' दैनिक भास्कर; और 'नवभारत' प्रकाशित हो
रहे थे. 1962 के करीब तक पत्रकारों में तीव्र आदर्शवादिता थी. 'मिलाप'
दैनिक के तत्कालीन संपादक खुशहाल चंद्र जो कि संन्यास लेने के बाद आनंद
स्वामी कहलाए, वह सब कुछ छोड़ देने (त्याग देने) के बावजूद 'मिलाप' को
नियमित रूप से अपना संपादकीय भेजते थे. कारण उनके हृदय में समाज के
प्रति कर्तव्य परायणता, समाजहित की भावना थी, जैसे देश स्वतंत्रता प्राप्ति के
पूर्व था.
1965 के बाद भारतीय पत्रकारिता का ह्रास होने लगा .(चीनी आक्रमण तथा
नेहरु के अवसान के बाद) और आज अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुंच गया है. आज
किराये का संपादक किराये का कर्मचारी बनकर रह गया है. आज सिर्फ स्वार्थ
सिद्धि मुख्य उद्देश्य रह गया है. अब कलम पूंजीपतियों की दासी है. पूंजी पति
कलम का दाम चुकता करते हैं. आदर्श पत्रकारिता बीते जमाने की बात हो गई
है. पहले 'घर फूंक तमाशा देखने वाले पत्रकार थे. साहस था. अब वह भाव
लुप्त हो गया है . इस सशक्त माध्यम का उपयोग अपने निजी स्वार्थों के लिए कर
रहे हैं. मर्यादा, आदर्श कूड़ेदान में कभी का फेंक चुके हैं. जैसे अविवाहित स्त्री
अपने बच्चे (नवजात शिशु) को चुपके से कूड़ेदान में फेंक देती है. इसी कारण
पहले की तरह पत्रकारों का अब आदर भी न रहा.




मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पत्रकारिता को मीडिया कहकर लज्जित न करें

मीडिया और पत्रकारिता के अंतर को जाने

मित्रों आज पत्रकारिता शब्द के पर्याय, विकल्प या पत्रकारिता के स्थान पर एक दोयम दर्जे के औपनिवेशिक शब्द मीडिया ने हथिया लिया है.पत्रकारिता देशज व पवित्र शब्द है.पत्रकारिता ने देश की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय व उत्थान में अप्रतिम भूमिका निभाई है किन्तु आज मीडिया के नाम पर पत्रकारिता को भी अपशब्द, अपमान व उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा हैं इसका मीडिया से सीधे कोई लेना देना नहीं है. 15 वर्ष पहले अधिकाँश लोगों से लिए मीडिया अप्रचलित शब्द था हाँ जब से टेलीविजन पत्रकारिता मुखर हुई . मीडिया शब्द उससे चस्पा हो गया या कर दिया गया. पत्रकारिता को औपनिवेशिक भाषा में जर्नलिज्म कहते हैं न कि मीडिया.
आइये मीडिया शब्द की स्पष्टतापूर्वक विवेचना करते हैं. मीडिया शब्द अंग्रेजी भाषा का शब्द है इससे मिलते -जुलते अनेक शब्द हैं आप इन शब्दों को इनके रिश्तेदार भी कह सकते हैं इन शब्दों को आपने अक्सर सुना भी होगा जैसे - हिन्दी मीडियम, मीडिएटर ,मिडिल मैंन या मिडिल ईस्ट ये सारे शब्द मीडया से ही निकले हैं या सुविधानुसार दूसरे शब्दों के साथ जोड़ दिए गए हैं या यूँ कहें उसी के रिश्तेदार हैं.
मीडिया का अर्थ 'माध्यम' होता है . हिन्दी मीडियम - हिन्दी माध्यम, मीडिएटर - मध्यस्थ या बिचौलिय, मिडिल मैन - बिचौलिया या बीच का आदमी, मिडिलईस्ट- मध्यपूर्व , कहीं से भी इस शब्द व इसके रिश्तेदारों का पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं हैं. उपरोक्त उदाहरणों से ये स्पष्ट हो जाता है इसका सम्बन्ध जोड़ने से , सहयोगी शब्द है .अकेले इसका अधिक महत्व नहीं है ,परन्तु जब ये किसी के साथ जुड़ जाता है तो महत्वपूर्ण हो जाता है. मध्यस्थ या बिचौलिये का महत्व तभी होता है जब वो दो लोगों के बीच होता है. अन्यथा शून्य है वो. उसे महत्व के लिए कम से कम दो लोगों का साथ चाहिए . वो बुराई , चुगली, सौदा, समझौता लड़ाई या और कुछ तभी करा सकता है जब कम से कम उसे दो लोग मिलें . इसके लिए अपने यहाँ प्रचलित देशज शब्द है ' ''दलाल'' . समय के साथ शब्द बदलते गये पर अर्थ नहीं बदला जैसे दल्ला से दलाल आगे ब्रोकर, आगे कंसल्टेंट्स, और बड़े स्तर पर ''लाबिस्ट'' जैसे नीरा राडिया. अर्थात मीडिया का मतलब बीचवाला अर्थात दलाल , सूचनाओं की दलाली करने वाले आधुनिक दलाल और आप इन बीचवालों को पत्रकार मान बैठे हैं पहले ये सूचना देने का कारोबार करते थे पर उसमें इन्हें ज्यादा फायदा नहीं था सो इन्होनें ख़बरों का कारोबार कुछ दिन किया .इन्हें और मुनाफ़ा चाहिये था तो ये दो कदम और बढ़कर ख़बरों की दलाली का काम शुरू किये अर्थात ख़बरें गढ़ने का धंधा और भयानक बदबू यहाँ से शुरू हुई . धंधे में मुनाफे के लिए धर्म , जाति, देश जो भी काम का हो बेच रहे हैं क्योंकि सच ये है कि देश इनका तो है नहीं .जीन्यूज़ और इण्डिया टीवी जैसे 2 एक चैनलों को छोड़कर अधिसंख्य के मालिक विदेशी हैं और फिर देशी हो या विदेशी सब बिचौलिये हैं. पत्रकारिता तो अब नीलकंठ पक्षी हो गया है जो बड़ी मुश्किल से दिखाई देता है.
पत्रकारिता दर्पण .है जो मूल पत्रकारिता से जुड़े है वे प्रेस में छपाई के समय प्लेट देखे होंगे वहां ''मिरर इमेज'' बोलते हैं शब्द उल्टे लगते हैं पर छपकर सीधे आते हैं. पत्रकारिता शुद्ध घी है उसमे मिलावट से अनर्थ हो जायेगा. पत्रकारिता मुस्लिम नहीं है,पत्रकारिता दलित नहीं है, पत्रकारिता सेकुलर नहीं है, पत्रकारिता हिन्दू नहीं है, पत्रकारिता धंधा नहीं है. इसे बचाइए... देश में बाघ जितने बचे हैंउससे कम पत्रकारिता बची है इसलिए इसके लिए भी आवाज़ उठाइए. पहले पत्रकारिता को बचाइए फिर बाघों को पत्रकारिता बचा लेगी . पवन तिवारी के ब्लॉग '' चवन्नी का मेला ''से साभार

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

कुछ साहित्यिक दुनिया वाले आज़ादी के दीवाने


आज की  राजनीतिक  ऊष्मा  में अचानक नेता जी सुभाष पर जारी गोपनीय पत्रों ने  क्रान्तकारियों के जीवन, उनकी पीड़ा , उपेक्षा और षडयंत्र आदि चीजों  ने  उनके स्वतंत्रता आन्दोलन  के साथ साहित्यिक अवदानों की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित किया . राजनीति पर तो अक्सर लिखता रहा हूँ ,सो आज अपने पाठकों, मित्रों से कुछ ऐसे  साहित्यकारों  के बारे में बात करूँगा  जो साहित्य के साथ- साथ  देश सेवा में भी पीछे नहीं रहे .
आज़ादी की लड़ाई में साहित्यकारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है या यूँ कहें कि गुलामी के दिनों में अधिसंख्य साहित्यकार क्रांतिकारी पहले थे ,बाद में लेखक ,पत्रकार  आदि थे ,कवियों की रचनाओं में देश प्रेम की भावनाएं उफान पर थी .कई कवियों और पत्रकारों को राष्ट्रवादी रचनाएँ  व लेख लिखने के कारण जेल जाना पड़ा.ऐसे अनेकोंनेक क्रांतिकारी साहित्यकार हैं .
जिनमें गणेश शंकर विद्यार्थी ,राम प्रसाद बिस्मिल ,माखनलाल चतुर्वेदी , दिनकर ,गया प्रसाद शुक्ल ' स्नेही ', श्रद्धा राम फिल्लौरी , भवानी प्रसाद मिश्र , ,यशपाल और शिवमंगल सिंह सुमन जी के कुछ प्रसंगों का मैं नीचे संक्षेप में जिक्र करने  जा रहा हूँ . वैसे उपरोक्त विभूतियों के आलावा भी अनेकानेक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी साहित्यकार हैं पर सबका वर्णन करना सम्भव नहीं है इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ .
गणेश शंकर विद्यर्थी   :  विद्यार्थी  जी आज़ादी की लड़ाई व साहित्य को जोड़कर एक दुसरे का पूरक बनाने वाले महापुरुष थे . विद्यार्थी जी का जन्म 26 अक्तूबर १८९० में अतरसुइया स्थित इलाहबाद में हुआ था एवं  १९३१ में बेहद कम उम्र में स्वर्गवास हो गया . इस अल्पायु में विद्य्ढ़ती जी ने जो किया वह अप्रतिम है .उन्होंने कानपुर से  “ प्रताप नामक प्रथम राष्ट्रीय अखबार निकाला  .यहाँ से राष्ट्रवादी पत्रकारों और साहित्यकारों की एक नयी पौध तैयार हुई ..यहीं पर चंद्रशेखर आजाद , भगत सिंह , राज गुरु , सुख देव  को एक नई दोष मिली .इसी प्रताप से प्रेम चन्द, माखनलाल चतुर्वेदी ,बालकृष्ण शर्मा नवीन , गया प्रसाद शुक्ल सनेही जैसे तमाम लोगो को साहित्य एवं पत्रकारिता का एक उम्दा समझ विकसित करने का मंच दिया . भगत सिंह के प्रेरणा श्रोत विद्यार्थी जी ही थे .विद्यार्थी जी एक उम्दा सम्पादक ,पत्रकार होने के आलावा वे उच्च कोटि के लेखक भी थे . वे 5 बार अंग्रेजों के खिलाफ लिखने के कारण  जेल भी गये . उन्होंने संस्मरण , जेल डायरी ,निबंध , पत्र  और कहानी  भी लिखी . गणेश शंकर विद्यार्थी रचनावलीमें उनकी रचनाएँ संकलित है .इनके नाम से भारत सरकार पत्रकारिता पुरस्कार भी प्रदान करती है .
राम प्रसाद  बिस्मिल  :  राम प्रासाद बिस्मिल एक सच्चे राष्ट्र भक्त के अलावा वे एक उम्दा शायर एवं लेखक भी थे .उनकी एक रचना स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा थी .उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में जन्में  बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा भी  जेल में रहते हुए लिखी , जो एक उम्दा आत्मकथा है , जिसका नाम निज जीवन की एक छटा है   सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है , देखना है जोर कितना बाजु कातिल  में है , बिस्मिल जी की ही रचना है .
माखनलाल   चतुर्वेदी  :    चतुर्वेदी का जन्म बावई गाँव  जनपद होशंगाबाद मध्यप्रदेश में हुआ था ,वे प्रखर राष्ट्रवादी थे , अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता में स्वदेश प्रेम की भावना जागृत करते रहते थे . वे कर्मवीर नाम से एक राष्ट्रीय अख़बार भी  चलते थे . माखन जी का एक उपनाम एक भारतीय आत्मा है  उनकी एक रचना देखिये .... सूली का पथ ही सीखा हूँ ,सुविधा सदा बचाता आया .मैं बलि पथ का अंगारा हूँ , जीवन ज्वाला जलाता आया [शीर्षक अमर राष्ट्र ] दूसरी रचना देखिये  - चाह नहीं सुर बाला के गहनों में गुथा जाऊं , चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ    ---------------------- मुझे तोड़ लेना वनमाली , उस पथ पर तुम देना फेंक . मातृभूमि पर शीश चढानें , जिस पथ जावें वीर अनेक .
भवानी प्रसाद मिश्र  :  मिश्र जी का जन्म भी होशंगाबाद जनपद में हुआ था ,.माखनलाल चतुर्वेदी जी और मिश्र जी का अच्छा साथ रहा . १९४२ से १९४५ तक स्वतंत्रता आन्दोलन में भागलेने के कारण जेल में बंद रहे . मिश्र जी ने कुछ दिनों तक  विदद्यालय खोलकर  पठन पठान किया ,जिसमें विद्द्यार्थियों को राष्ट्रवादी विचारों से अवगत कराया  जाता था .मिश्र जी की एक रचना देखिये  ---  बुरी बात है , उठो पांव रक्खो , रकाब पर , जंगल जंगल , नददी नाले , कूद्फांद्कर  धरती रौदों , जैसे भांडों की रातों में बिजली कौधे , ऐसे कौंधो [ शीर्षक उठो ]
गया प्रसाद शुक्ल सनेही ’ :  सनेही जी जन कवि थे . उनकी कविता पढ़ने की अनूठी शैली थी . जनता उनकी कविता सुनकर भाव विभोर हो उठाती. उन्हें हिन्दी काव्य सम्मेलनों का प्रतिष्ठापक  कहा जाता है .सनेही जी सच्चे राष्ट्रवादी थे . उनका जन्म हड्दागाँव जिला उन्नाव , उत्तरप्रदेश में हुआ  था .वे स्कूल अध्यापक थे परन्तु १९२१  में त्यागपत्र देकर आज़ादी के आन्दोलन में कूद पड़े उनकी एक राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत रचना देखिये ----
 जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
श्रद्धाराम फिल्लौरी :  पंडित श्रद्धाराम शर्मा फिल्लौरीएक वैदिक धर्म को मनाने वाले धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे ,पर उतने ही बड़े राष्ट्र भक्त  व लेखक भी थे , वे धार्मिक आयोजनों के बहाने लोगों को एकत्रित करते और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाते,  श्रद्धाराम  फिल्लौर के रहने वाले थे .अंग्रेज सरकार ने उनपर फिल्लौर आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था .उन्होंने ही हिन्दी का प्रथम उपन्यास भाग्यवती लिखा . ॐ जय जगदीश हरे .... आरती श्रद्धाराम जी की ही रचना है .
यशपाल :  यशपाल जी का स्वतंत्रता आन्दोलन और साहित्य दोनों में अतुलनीय योगदान है .प्रेमचन्द के बाद हिन्दी साहित्य में यशपाल जैसा कहानीकार शायद ही कोई हो . ३दिसम्बर १९०३ को पंजाब  के फिरोजपुर छावनी में पैदा हुए . यशपाल जी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया , जब वे लाहौर के नेशनल कालेज में पढने गये . वहीं इनका परिचय भगत सिंह , राजगुरु व सुखदेव से हुआ .इसके बाद इन्होने सशस्त्र क्रांति में भाग लिया . दिली और लाहौर षड्यंत्र मामले में अंग्रेज सरकार ने १९३२ में 14 साल की सजा सुनाई थी.१९७१ में इन्हें पद्मभूषण मिला.
शिवमंगल सिंह सुमन ‘ :  उन्नाव की ही वीरभूमि पर सुमन जी का जन्म 5 अगस्त १९१५  को हुआ .एक बार किसी कवि सम्मेलन से सुमन जी घर आ रहे थे ,कि कुछ लोगों ने इन्हें अगवा कर आखों पर पट्टी बांधकर एक जगह ले गये . वहां आखों से पट्टी हटाई गयी तो सामने क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद थे , आज़ाद ने सुमन जी से कहा  - क्या तुम मेरी रिवाल्वर दिल्ली पहुंचा सकते हो ? सुमन जी ने तुरंत हाँ कह दी,तो ऐसे थे सुमन जी . उनकी एक रचना देखिये माँ कब से खड़ी पुकार रही , पुत्रों निजकर में अस्त्र गहो , सेनापति की आवाज़ हुई , तैयार रहो , तैयार रहो .आओ तुम भी दो आज विदा , अब क्या अड़चन , क्या देरी , लो आज बज उठी रणभेरी , पैतीस कोटि लड़के बच्चे , जिसके बल पर ललकार रहे , वह पराधीन बिन निज गृह में , परदेशी की दुत्कार सहे . कह दो अब हमको सहन नहीं , मेरी माँ कहलाये चेरी , लो आज बज उठी रणभेरी .[शीर्षक रणभेरी ]
रामधारी सिंह  दिनकर ‘ :  दिनकर जी का जन्म बिहार के बेगूसराय में १९०८ में हुआ .दिनकर जी को राष्ट्रकवि  कहा जाता है . उनकी रचनाएँ राष्ट्रप्रेम की भावनाओं की उद्दात लहरें हैं .उन्होंने देश व भाषा दोनों को खूब प्रेम किया , उन्होंने राष्ट्रसेवा  के अलावा साहित्य की भी ख़ूब सेवा की . इन्होने हिन्दी पर राष्ट्रभाषा व राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रभाषा आन्दोलन और गांधी जी  जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी .संस्कृत के चार अध्याय’ , गंभीर विशद  व खोजपूर्ण ग्रन्थ है . उर्वशी के लिए दिनकर जी को १९७२ में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला . इनकी एक रचना देखिये --- दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को ज़िला दे, 
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे। 
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ, 
चढ़ती जवानियों का शृंगार मांगता हूँ।[शीर्षक आग की भीख ] एक अन्य रचना देखिये  --- 
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।




सोमवार, 25 जनवरी 2016

देख लीजिये 16 कारसेवकों की लाशों पर खड़े इस नेता को

आज कर्पूरी ठाकुर की 91 वीं  जयंती के अवसर पर जो मुलायम सिंह जी ने कहा  वह  एक भारतीय के रूप में असहज कर गया . क्या कोई वरिष्ठ नेता  इतनी ऊंचाई से एक झटके में जानबूझकर सिर्फ वोटों के लिए इतना नीचे गिर सकता है .वैसे मुलायम जी का यूँ गिरने का इतिहास रहा है पर  उम्र के इस पड़ाव पर आकर  लाशों की वैसाखी पर खड़ा होने की चाहत खतरनाक है.
 2 नवम्बर 1990 को  तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के आदेश पर  पुलिस  ने बेगुनाह हिन्दुओं पर गोलियां बरसाई थी. सरकार के अनुसार 16 मामूली जाने गयी और जाती तो भी कोई बात नहीं . हालांकि यह विवादित है. भाजपा का अनुमान है कि 168 मारे गए थे.  विहिप  के अनुसार अकेले विहिप ने  76 शरीर का अंतिम संस्कार किया. खैर अचानक 25 वर्ष बाद मुलायम को वे 16 लाशें क्यों याद आयी. क्योंकि उन्हें २०१७ के चुनाओं में अपनी राजनीतिक इमारत जर्जर सी लग रही है उसके ढहने का डर सताने लगा है  सो उन्हें सहारे के रूप में वे 16 लाशें याद आयी .जिनके सहारे वे २०१७ में अपनी जर्जर राजनीति को बचा सकें .  ये घृणित सच है कि सपा का आज तक जो अस्तित्व है वो उन 16 लाशों के कारण ही है . उन्होंने मुस्लिम वोटों के बिखरने के डर [ कहीं मायावती के पास कुछ  छिटककर न चले जाय] से दाव फिर खेला . उन्होंने खुद ही कहा कि  इसीलिए मुस्लिमों में उनके प्रति भरोसा जगा और पार्टी आज यहाँ तक पहुँची . उन्होंने ये भी कहा कि धर्मस्थल को बचाने के लिए और भी जाने जाती तो वे पीछे नहीं हटते. ये बयान मुस्लिमों को आश्वस्त  करने के लिए  था .  हाँ उन्होंने उन मौतों पर औपचारिक रूप से दुःख जताया जो सिर्फ राजनीतिक दिखावा था .वे चाहते तो उसके लिए हाथ जोड़कर माफी मांग सकते थे और अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती भी बता सकते थे .पर ऐसे में मुस्लिम भाइयों के इतने बड़े वोट बैंक को हथियाते कैसे . मुझे जलियांवालावाला बाग़ याद आ रहा है .जहाँ 13 अप्रैल1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, लोगों को मार डाला था और हज़ारों लोगों को घायल कर दिया था। यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। कहीं ये वही जनरल डायर तो नही है  खैर  आगे चलकर इस घटना के प्रतिघात स्वरूप सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ ड्वायर को गोली चला के मार डाला।
मुझे १९८५ की वो फिल्म भी याद आ रही है जिसमें अनिलकपूर अमरीश पुरी को ललकारते हुए भरी सभा में कहते हैं - देख लीजिये  75 लाशों पर खड़ा ये ठराकल कितना ऊँचा दिखाई दे रहा है ...आप कह सकते हैं 16 लाशों पर खड़ा ये .............................. हर एक आदमी के साथ कई लोग होते हैं वह अकेला नहीं मरता,  उसके साथ दम तोड़ता है उसकी बीबी का सुहाग ,उसके बच्चो का भविष्य ,उसके घर में बसने वाली एक एक खुसी ,उसके आंगन में उतरनेवाली एक -एक खुसी , सबकी एक साथ मौत हो जाती है . कुछ समझ में आया ....... जल्दी भूलने की आदत है भारतीयों को ....
इस पुराने लेख में एक नया अंश आज जोड़ रहा हूँ...... जरूरी भी है....
मुलायम सिंह  ने कल अर्थात 27 अगस्त 2016 को खुद पर लिखी पुस्तक के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए कहा कि  कारसेवकों पर गोली चलवाना आवश्यक था. नहीं तो मुस्लिमों का हिन्दुस्तान पर से भरोसा उठ जाता... इसके लिए  16 की जगह 30 जानें जाती तो भी मुझे अफ़सोस नहीं होता. ऐसा ही बयान मुलायम ने  आज से लगभग 7 महीने पहले कर्पूरी ठाकुर की जयन्ती पर 24 जनवरी 2016 को दिया था. फिर अचानक 7 माह बाद इस बयान की क्या जरूरत पड़ गयी. इस घटना को गुजरे 25 साल बीत गये , इससे पहले ये बयान क्यों नहीं आया . जो 16 कारसेवक मरे मुलायम के इस बयान से उनके परिवार पर क्या गुजरेगी . ये एकदम तलछट की राजनीति है . सम्वेदनहीन और मौकापरस्त बयान. आगामी चुनावों में मुस्लिम वोट सपा से छाटकें  न ,उसके लिए ये बयान है. कांग्रेस नई रणनीति के साथ चुनाव में आ रही है. इसलिए मुलायम को डर है कि कहीं कुछ वोट छिटक न जाएँ. 18% मुस्लिम वोट के लिए मुलायम ने सारी नैतिकता ताक पर रख दी.18% तो सिर्फ सवर्ण हैं उत्तर प्रदेश में . ऐसे में जनता का दायित्व बनता है कि ऐसे लोगो को राजनीति से बाहर का रास्ता दिखाए . 
पुनः मैं मेरीजंग फिल्म का वो संवाद को याद करता हूँ ......
याद करिए ''मेरी जंग का वो सम्वाद जिसमें अनिल कपूर अमरीश पुरी को ललकारते हुए भरी सभा में कहते हैं - देख लीजिये 75 लाशों पर खड़ा ये ठराकल कितना ऊँचा दिखाई दे रहा है ...आप कह सकते हैं देख लीजिये 16 लाशों पर खड़ा ये मुलायम सिंह कितना ऊँचा दिखाई दे रहा है ............................. हर एक आदमी के साथ कई लोग होते हैं वह अकेला नहीं मरता, उसके साथ दम तोड़ता है उसकी बीबी का सुहाग ,उसके बच्चो का भविष्य ,उसके घर में बसने वाली एक एक खुसी ,उसके आंगन में उतरनेवाली एक -एक खुसी , सबकी एक साथ मौत हो जाती है . कुछ समझ में आया .......

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

भाजपा की एक मात्र सकारात्मक उम्मीद वरुण गांधी ...पर क्या भाजपा वरुण को मौका देगी

2016 - 17 में होने वाले विधानसभा चुनाव बीजेपी की बयार है या नहीं  और कांग्रेस में वापसी की ताकत है या नहीं  ये  पंजाब , असम, तमिलनाडु , प. बंगाल और उत्तर प्रदेश  चुनाव  से पता चलेगा . ऐसे  में सभी राजनीतिक दलों की नजर उत्तर प्रदेश चुनाव पर रहेगी .बीजेपी के लिए विशेष रूप से उत्तर प्रदेश का चुनाव असली अग्नि परीक्षा होगा . उत्तर प्रदेश का चुनाव बीजेपी  की आगामी राजनीतिक दिशा - दशा तय करेगा साथ  ही  मोदी जी और  अमित शाह के  राजनीतिक प्रभाव  व कद को भी . बिहार की हार के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की हार जहाँ बीजेपी को अन्दर तक हिला देगी  वहीं विरोधियों में बीजेपी से संघर्ष करने की  क्षमता व विश्वास कई गुना बढ़ा देगी .जिससे बीजेपी अपने लक्ष्य से डगमगा जायेगी और पार्टी में अंतर्कलह को भरपूर उफ़ान मिलेगा .
उत्तर प्रदेश ही वह राज्य है जहाँ 404 विधानसभा सीटें हैं और  100 विधान परिषद की . इसलिए यहीं से सबसे अधिक  31 राज्य सभा सांसद  भी हैं और बीजेपी  राज्य सभा में बहुमत न होने के कारण ही महत्वपूर्ण बिलों को पास नहीं करा पा रही है . लोकसभा में उत्तर प्रदेश की 73 सीटों के कारण ही भाजपा को केंद्र की सत्ता, वो भी पूर्ण बहुमत के साथ मिली है . ये बीजेपी भी भलीभांति जानती है  फिर भी उसके नेता लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अपने क्षेत्र में कम ही दिखे हैं .मेरी उत्तर प्रदेश की ताज़ा यात्रा के अनुभव  बीजेपी के बारे में सकारात्मक  नहीं हैं .  लोकसभा चुनाव के बाद नेता जी एक बार भी  आम जनता को नहीं दिखे .  खैर आइये उत्तर प्रदेश की राजनीति की पड़ताल शुरू करते हैं .
उत्तर प्रदेश में गत कुछ चुनाओं से 2 पार्टियों का बर्चस्व रहा है . सपा और बसपा ,  इससे पहले महत्व पूर्ण  पार्टियों में पहले कांग्रेस और फिर भाजपा  महत्वहीन हुई .पर 2014 के  लोसभा चुनाव ने भाजपा को फिर से मुक़ाबले में लाकर खड़ा कर दिया .सो अब 2017 में लड़ाई त्रिकोणीय होगी . सपा और बसपा के पास स्थाई नेता या यूँ कहें नेतृत्व हैं  फंसती है भाजपा,  एक तरफ मायावती दूसरे तरफ मुलायम [ अखिलेश ]  ऐसे  में  भाजपा से कौन....    क्या वरुण गांधी ....हो सकते हैं

 उत्तर प्रदेश में हमेशा स्पष्ट नेतृत्व का फायदा  हुआ है. चुनाव में ये सवाल भी उठेगा कि बीजेपी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन ... बसपा चुनाव में प्रबल दावेदार है ,सपा को सत्ता विरोधी लहर , मुजफ्फरपुर दंगे , कानून व्यवस्था , और नेपथ्य से 4 मुख्यमंत्री  वाली बात [ मुलायम सिंह , राम गोपाल , शिवपाल और बडबोले आज़मखान ] मुस्लिम यादव बेस पार्टी  का नुकसान हो सकता है फिर भी मुलायम सिंह जन नेता हैं  और मायावती भी दलित पिछड़े वर्ग की जनाधार वाली नेता हैं  वहीं बीजेपी  में कोई इनकी तुलना में जनाधार वाला नेता नहीं है  . एक सर्व विदित नाम राजनाथ सिंह  हैं   वे सभ्य   व सुशिक्षित हैं पर वे जनाधार वाले नेता नहीं हैं.  ऐसे में जो  बीजेपी  राज्य सत्ता से एक दशक से बाहर है को ऐसा चेहरा लाना  होगा, जो प्रभावशाली हो युवा भी हो ऐसे में बीजेपी में एक मात्र उम्मीद की किरण  वरुण गांधी  नज़र आते हैं जो अखिलेश  के मुक़ाबले में
और सपा और  बसपा नेतृत्व के सामने  तुलनात्मक रूप से ठहर भी सके .
 आइये  हल्का सा तुलनात्मक  अध्ययन कर लेते हैं.....
मुलायम सिंह - उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे पुराने खिलाड़ी हैं 22 नवम्बर 1939 को जन्म.  1967 में पहली बार विधायक बनें . आगरा विश्वविद्यालय से परास्नातक  और मैंनपुरी  से बीटी करने के बाद कुछ दिनों तक अध्यापन ,कुछ दिनों  तक पहलवानी की  , 5 दिसम्बर 1989 को पहली बार  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें .  3 बार मुख्यमंत्री  बने एक बार पुत्र को मौका दिए .कुल मिलाकर  अनुभवी , शिक्षित  पर अब उम्र हावी हो रही है और आय से अधिक सम्पत्ति के मामले , वर्ग विशेष के नेता  .
मायावती  -  नेतृत्व क्षमता और अनुभव , मायावती भी जमीनी नेता हैं .15 जनवरी 1956 को जन्म.. दिल्ली के कालिन्दी महाविद्यालय से स्नातक  साथ ही एल.एल बी . औए बी एड. भी हैं मुलायम की तरह कुछ दिनों तक अध्यापन . 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनी . कुल 4 बार मुख्यमंत्री रहीं . वर्ष 2007- 8  नेताओं में सर्वाधिक आयकर [26 करोंड़] अदा करने वाली. धन के दुरूपयोग  मूर्तियों और पार्क के मामले और फिर अर्थात 60 वर्ष की आयुसीमा के पास .फिर भी दलितों पिछड़ों की कद्दावर नेता .
राजनाथ सिंह -  अनुभवी व मृदुभाषी . 10 जुलाई 1951 को चंदौली में जन्म .गोरखपुर विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण . मिर्जापुर में कुछ दिनों तक भौतिक शास्त्र  में अध्यापन कार्य किया  और वर्ष 2000 में पहली बार भाजपा से मुख्यमंत्री बनें .  2 बार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे पर बीजेपी इनके नेतृत्व में लोकसभा चुनाव हार गयी .  साफ़ - सुथरे छवि के नेता,  पर जननेता नहीं उम्र  65  के आस -पास. इन उपरोक्त तीनों नेताओं में जो एक रोचक समानता दिखी वो यह कि तीनों ही अपने प्रारम्भिक काल में अध्यापक रहे और तीनों उस दौर में भी उच्च शिक्षित  जब उच्च शिक्षा आसान नहीं थी.
 अब आते हैं नई पीढी के  नये नेता जो 2012 के चुनाव में भारी बहुमत से जीत कर आये  उसका एक कारण उनका युवा व  उच्च शिक्षित  होना भी था .
 अखिलेश यादव -  सबसे बड़ी पहचान मुलायम सिंह के बेटे और निजी योग्यता मृदुभाषी और शिक्षित .
1 जुलाई 1973 को  जन्म .   मुलायम सिंह की पहली पत्नी माँ मालती देवी के पुत्र .  बचपन में ही माँ का निधन. 3 बच्चे , पत्नी डिम्पल  सांसद,
अखिलेश ने राजस्थान मिलिट्री स्कूल धौलपुर से शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने अभियान्त्रिकी में स्नातक की उपाधि मैसूर के एस०जे० कालेज ऑफ इंजीनियरिंग से ली, बाद में विदेश चले गये और सिडनी विश्वविद्यालय से पर्यावरण अभियान्त्रिकी में स्नातकोत्तर किया .मार्च 2012 के विधान सभा चुनाव में 224 सीटें जीतकर मात्र 38 वर्ष की आयु में ही वे उत्तर प्रदेश के 33वें मुख्यमन्त्री बन गये। जुलाई 2012 में जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उनके कार्य की आलोचना करते हुए व्यापक सुधार का सुझाव दिया तो जनता में यह सन्देश गया कि सरकार तो उनके पिता और दोनों चाचा चला रहे हैं, अखिलेश नहीं. दुर्गानागपाल और मुजफ्फरपुर के दंगे उनकी अनुभवहीनता और  सरकार पर उनका नियंत्रण न होना  उनके खिलाफ जाता है .  ऐसे में अखिलेश के प्रति उत्तर  क्या वरुण हो सकते हैं
वरुण गांधी - पहली पहचान मेनका गांधी के बेटे.  निजी योग्यता  1999 से प्रचार  और  बीजेपी के इतिहास में सबसे कम उम्र के बीजेपी महासचिव, स्पष्टवादी ,प्रखर वक्ता , 20 की उम्र में ''द आथ्नेस ऑफ़ सेल्फ '' नामक किताब लिखी , कविता व लेख भी लिखते रहते हैं . 13 मार्च 1980 को जन्म ,उनके पिता की मौत एक विमान दुर्घटना में जून 1980 में हुई। उनके पिता के निधन के समय वरुण गांधी की आयु मात्र ३ माह थी। वरुण गांधी ने  स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स लंदन विश्वविद्यालय से बीयसई की पढाई की है साथ ही  लन्दन के ओरियन्टल और अफ्रीकन स्टडीज से भी पढाई की है . 2009 में पीलीभीत से पहली बार सांसद बनें ,वर्तमान में सुल्तानपुर से सांसद हैं . वरुण गांधी परिवार की वजह से नहीं बल्की खुद की प्रतिभा के कारण अपनी पहचान बनाना चाहते हैं . ऐसे में यदि उन्हें भाजपा मौका देती है तो भाजपा के लिए  उत्तर प्रदेश में उम्मीद  जग  सकती है . अखिलेश और वरुण में भी कुछ समानता है  जैसे दोनों  उच्च शिक्षित हैं  विदेश में पढ़े हैं  पर जो दुखद है वो ये कि बचपन में अखिलेश की माँ गुजर गयी और वरुण के पिता . यदि वरुण को मौका मिलता है तो वे शायद अखिलेश के  सबसे कम उम्र  के मुख्यमंत्री का रिकार्ड भी तोड़ दें.... पर शायद .  अब पाठक निर्णय करें कौन उपयुक्त और योग्य  है .

रविवार, 27 दिसंबर 2015

भाजपा के लिए ये आपसी नादानियाँ मंहगी न पड़ जाये

मोदी की साख पर सवाल शुरू... आने वाले दिनों में भाजपा के लिए अच्छे नहीं .

बीजेपी  को कांग्रेस  वाली गलतियों से बचना होगा और  जो गलतियाँ हुईं हैं उन्हें सुधारना होगा या नहीं सुधार सकती तो आगे से पुनः गलती न हो वरना बंगाल ,पंजाब , उत्तर प्रदेश  में उसे ''का पछताए होत जब चिड़िया चुग गई खेत '' वाली स्थिति होगी . यदि ऐसा हुआ तो बीजेपी के लिए दुखद होगा पर देश के लिए घातक. पर होनी को सिर्फ अच्छे कर्म टाल सकते हैं और कोई नहीं .
शत्रुघ्न सिन्हा , आर. के. सिंह  और अब कीर्ति आज़ाद . ये बीजेपी के लिए अशुभ संकेत है . कीर्ति आज़ाद को हाशिए पर धकेलना  घातक होगा . ''न खाऊंगा  न खाने दूंगा'' मोदी के इस नारे को कीर्ति का निलंबन  ठेंगा दिखाता हैं साथ ही मोदी की चुप्पी और कीर्ति को मिलने का समय न देना मोदी की उज्ज्वल छवि को ठेस पहुंचा  रहा है . जिसका असर आगामी चुनाओं  में अवश्य दिखेगा . बीजेपी मोदी नामक व्यक्ति के कारण जीती है .बीजेपी के कारण नहीं. मोदी की छवि ध्वस्त अर्थात बीजेपी पराजित .
अब बात करते हैं कुछ करियर और कद की , कुछ आत्म सम्मान की , कुछ  उपेक्षा की , कुछ त्याग की ,  कुछ अपमान की ,
बात शुरू करते हैं शत्रुघ्न सिन्हा से ...... शत्रुघ्न बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं  बीजेपी जब दो सांसदों की पार्टी थी . जब चारो तरफ कांग्रेस का बोलबाला था .  ऐसे समय में कांग्रेस के तमाम प्रलोभनों के बावजूद  शत्रुघ्न ने  बीजेपी को चुना . उस समय शत्रुघ्न अमिताभ को कड़ी टक्कर दे रहे थे .डर कर अमिताभ ने  निर्माताओं  से शत्रु के साथ काम करने से मना कर दिया था . ये  सर्व विदित है . बीजेपी  ने ऐसे में शत्रुध्न सिन्हा के स्टारडम का खूब दोहन किया . ऐसे में 30 -32 वर्षों बाद पार्टी[ मोदी एंड कम्पनी]  के अच्छे दिन आये तो शत्रुघ्न सिन्हा के साथ ऐसा व्यवहार किया गया कि उनके बुरे दिन आने लगे . उन्हें अचानक मात्र अभिनेता कहकर किनारे कर दिया गया . टीवी स्टार स्मृति ईरानी जो एक टीवी स्टार रही केन्द्रीय मंत्री  बन गयी .कोई बात नहीं वे प्रतिभशाली भी है  पर गायक बाबुल सुप्रियों जो बहुत सफल भी नहीं रहे मंत्री बन गये .पर इसके राजनीतिक  मायने थे बंगाल के सन्दर्भ में . पर तमाम जूनियरों को सिंहासन और शत्रु को किसी ने बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं पूछी. ऐसे में शत्रु का दुखी , अपमानित महसूस करना  व क्रोधित होना  लाजमी है फिर बिहार में क्या हुआ कहने की जरुरत नहीं .ऐसा नहीं शत्रु ने गलती नहीं की  ,पर उसकाया किसने ...
अब बात कीर्ति आज़ाद की .... कीर्ति आज़ाद 1993 में बीजेपी से जुड़े  . वे 1983 की विश्वविजेता टीम के सदस्य थे .उन्होंने  प्रथम श्रेणी मैच में साढ़े 6 हजार से अधिक रन बनाये हैं और 240 से अधिक विकेट लिए हैं .
 अब तक 3 बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हैं .1993 में दिल्ली विधान सभा के भी सदस्य रहे . इनके पिता भागवत झा बिहार के कद्दावर नेता थे वे बिहार के मुख्यमंत्री भी रहे . कीर्ति दोनों क्षेत्र के माहिर हैं.ऐसे में क्रिकेट में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जेटली जी और भाजपा को  कीर्ति की बात सुननी चाहिए थी . कई बार बतौर दिल्ली जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष  के रूप में जेटली जी ने  कीर्ति की शिकायतों को अनसुना किया और कीर्ति की उपेक्षा की. जिससे कीर्ति शायद आहत थे .कीर्ति को कहीं न कहीं ये भी लगा कि मैं क्रिकेटर के साथ पार्टी का एक्टिव मेंबर   भी हूँ और एक व्यक्ति  जो क्रिकेटर भी नहीं है संस्था का अध्यक्ष बना बैठा है और मनमानी कर रहा है  और अपने ही पार्टी के सदस्य की उपेक्षा कर रहा है वो भी भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर . ऐसे में लोकसभा चुनाव मोदी लहर के बावजूद जो व्यक्ति चुनाव हार गया .उसे राज्यसभा में भेजकर  भारी भरकम मंत्रालय भी  दे  दिया गया.  जबकि उन्हें उनकी दक्षता के हिसाब से कानून मंत्रालय मिलना चाहिए था .  कीर्ति मोदी के शुरू से ही प्रशंसक और पैरोकार रहे ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि सरकार में उन्हें भी कुछ .... मिलेगा . उल्टा उन्हें  उनके गृह राज्य बिहार चुनाव में  ही किनारे कर दिया गया . ऐसे में आज़ाद का उबलना  स्वाभाविक था सो हुआ . आज़ाद हर तरह से सक्षम हैं इसलिए वे राजनीति से लेकर न्यायालय तक कड़ी टक्कर देंगे . जो भाजपा के लिए बड़े फलक पर नुकसानदायक होगा .
अब जेटली जी की बात करते हैं  जेटली प्रसिद्ध अधिवक्ता  महाराज  किसन जेटली के पुत्र हैं . 1991 में जेटली जी भाजपा के सदस्य बने .1999 में भाजपा के प्रवक्ता बने . और फिर राज्यसभा सांसद .जेटली भी नामचीन अधिवक्ता और चतुर प्रवक्ता हैं ,जेटली ने कई बार अपनी रणनीतिक चतुराई से पार्टी को संकट से बचाया है. पर वे जन नेता नहीं हैं एक भी लोकसभा चुनाव वे नहीं जीत सके . मोदी  जेटली  की तार्किक योग्यता के मुरीद हैं और आज यही चीज कीर्ति के खिलाफ और जेटली के फेवर में है .पर ये मोदी ,पार्टी,और जेटली के लिए भी नुक्सानदेह है. जेटली को ताल ठोक कर स्वेच्छा से पद छोड़ देना चाहिए .यही  पार्टी  व सबके हित में होगा .जाँच में बेदाग आने पर मोदी पुनः पद बहाल  कर सकतें हैं .
 जब मैं  मुम्बई से प्रकाशित  विश्व हिन्दू परिषद के पत्र विश्व हिन्दू सम्पर्क के सम्पादकीय मंडल में था . तब मैंने ही सबसे पहले मोदी के पक्ष  में लिखा था कि क्यों देश को मोदी के नेतृत्व की आवश्यकता है . तब मोदी

 कहीं भी प्रधानमंत्री हो दौड़ में नहीं थे .
आज देश को और देश से बाहर रहने वाले भारत वासियों  को यहाँ तक कि दुनियां को भी मोदी से बहुत उम्मीदें हैं . वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य भाजपा और देश के लिए घातक होगा .  जो कांग्रेस के लिए ''बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा ''   वाला होगा . ऐसा होना बेहद .......

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

chavanni ka mela : अटल का बदहाल बटेश्वर

chavanni ka mela : अटल का बदहाल बटेश्वर: अटल जी की वर्ष गांठ पर विशेष लेख अटल जी का बदहाल बटेश्वर मुम्बई, अटल जी वैश्विक शख्शियत हैं .उनके बारे में बहुत कुछ कहा व लिखा जा चुका...

सोमवार, 23 नवंबर 2015

हमारी सहिष्णुता का बेजा फायदा उठाया जा रहा है इतनी सहिष्णुता भी ठीक नही

आज आमिर खान के बयान ने मुझे  आवेश और ग्लानि से भर दिया , मुझे अपनी सहनशीलता या सहिष्णुता जो भी कहें ,पर शर्म आने लगी ,  कि हम इतने सहनशील क्यों हैं कि कोई  हमें ,इस देश को ,कितनी भी गाली दे ले  और हम अभिव्यक्ति की आजादी और सहिष्णुता के नाम पर चुप रहें  सिर्फ इसलिए कि कहीं वो हमें  फिर  से असहिष्णु न कह दे . आखिर वो तो  पूरी व्यवस्था हो ही असहिष्णु कह रहा है या पूरे सवा सौ करोड़ के देश को .वास्तव में हम उसकी असहिष्णुता के शिकार हो गये हैं . हम उसके अधिकारों की रक्षा की खातिर  अपने पूरे देश का अपमान क्यों करवा रहे हैं . ये बेहद गंभीर विषय है इस पर सरकार को नीतिगत तरीके से आगे कदम बढ़ाना होगा . अन्यथा जब देश की सहिष्णुता बर्दाश्त से बाहर हो जायेगी और सहिष्णु लोग सचमुच असहिष्णु होने को मजबूर हो जायेंगे तब आमिर खान और इन जैसे तमाम ढोंगी लोगों व इनके गुरुओं का क्या होगा .... शायद ही किसी को कल्पना हो .   असहिष्णुता वास्तव  में  क्या है  और कहाँ है यदि आमिर या इस सोंच के लोगों को पता करना है  '' डर का माहौल'' महसूस करना है  तो उन्हें ईराक , सीरिया ,अफगानिस्तान , सूडान, में जाकर देखना चाहिए . पड़ोस में भी जा सकते हैं पकिस्तान ,  हाँ मिश्र भी फिलहाल ट्राई कर सकते हैं . फिर सच पता चलेगा और डर क्या होता है मालूम होगा .
हमें सहिष्णुता को जानना है तो आमिर जैसे लोगों को भारत के इतिहास को देखना होगा . हम  सहिष्णु हैं तभी भारत में दुनिया की सबसे अधिक मस्जिदें भारत में हैं , हम सहिष्णु हैं तभी भारत में पीके जैसी फिल्म रिलीज हुई . हम सहिष्णु हैं तभी आज भारत में  मुस्लिमों की आबादी दुनिया में तीसरे नंबर पर है .हम सहिष्णु हैं इसीलिये भारत दुनिया का पहला देश है जो हज पर 50000/ प्रति यात्री सब्सिडी देता है और वहीं हमारे ही देश में हमारे ही ईष्ट का मंदिर तक नहीं बनने दिया जाता . हम सहिष्णु थे इसीलिये  भारत में 3 करोड़ से बढकर 19 करोड़ मुस्लिम हो गये .  पकिस्तान में कितनी हिन्दू आबादी बढ़ी जरा कथित सेकुलर पता करें . पाकिस्तान में 1947 में कुल आबादी का 25 प्रतिशत हिंदू थे। अभी इनकी जनसंख्या कुल आबादी का मात्र 1.6 प्रतिशत रह गई है.इसी तरह बांग्लादेश में भी हिंदुओं पर अत्याचार के मामले तेजी से बढ़े हैं। बांग्लादेश ने "वेस्टेड प्रापर्टीज रिटर्न (एमेंडमेंट) बिल 2011"को लागू किया है, जिसमें जब्त की गई या मुसलमानों द्वारा कब्जा की गई हिंदुओं की जमीन को वापस लेने के लिए क्लेम करने का अधिकार नहीं है। इस बिल के पारित होने के बाद हिंदुओं की जमीन कब्जा करने की प्रवृति बढ़ी है और इसे सरकारी संरक्षण भी मिल रहा है। इसका विरोध करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर भी जुल्म ढाए जाते हैं.
भारत में मस्जिद होना आम बात है पर पाक में मंदिर दिख जाना ख़ास बात है . जब तक भारत हिन्दू बहुल देश बना रहेगा तभी तक सहिष्णुता नामक शब्द भी जीवित रहेगा  ये आमिर व उन जैसों को याद रखना होगा .वरना जिस दिन आमिर बिरादरी हावी हुई  फिर ईराक बनने से कोई नहीं रोक पायेगा और देश छोड़ने की बात तो दूर  ऐसा सोंचने से पहले इनका काम तमाम  हो जायेगा . हमारी सहिष्णुता का ही फल है कि भारत के हिन्दू मुस्लिम आधार पर बंटवारे के बाद भी आमिर जैसे लोग हिन्दुओं के सुपरस्टार हैं , 19 करोड़ मुसलमान आज हिन्दुओं के हिस्से पर कब्जा जमाए बैठे हैं  क्योंकि उन्होंने अपना हिस्सा पाक के रूप में ले लिया .  पाक में कोई हिन्दू  सेना में कर्नल या उससे ऊपर का अधिकारी नहीं बन सकता , राष्ट्रपति नहीं बन सकता  बाकायदा कानून है  हिन्दू विवाह को मान्यता भी नहीं है . आमिर सहिष्णु हिन्दुओं को किसी के इशारे पर भड़काने का काम कर रहे हैं . आमिर पूरी तरह से झूठ बोल रहे हैं  कि किरण राव ने देश छोड़ने की बात कहीं क्योंकि देश में डर का माहौल है. दूसरी बात यदि कही तो मीडिया में कहने की क्या जरुरत है  घर की बात थी ... पर इसे हवा देनी थी  ..... तीसरी बात उन्होंने खुद कही कि उनकी पत्नी अखबार व समाचार चैनल इसीलिये देखने से डरती हैं .इसका अर्थ ये हुआ कि उनके अन्दर असहिष्णुता का डर और माहौल इन चैनलों और अख़बारों ने बनाया वरना  उन्हें इससे पहले बिलकुल भय नहीं था .  ये सारा माहौल सरकार विरोधी  कथित लेखकों ,कलाकारों ,विपक्षी पार्टियों ने देशद्रोही मीडिया के साथ बनाया . वरना १९४७ में 25 लाख लोगों की हत्या  से अब तक कितनी ही लाशें गिरी किसी ने उफ़ तक नहीं किया .
उपरोक्त बातें लिखने का मेरा बस इतना मतलब था कि  इस कृतिम लोगों की  कृतिम असहिष्णुता के खिलाफ आम भारतीय को और अब सरकार को भी उठानी चाहिए अन्यथा जब बर्दाश्त से बाहर हो जायेगा फिर असहिष्णुता बढ़ रही है कहने का मौका भी आम भारतीय ऐसे लोगों को नहीं देगा  फिर सनी देओल का ओ डायलोग गूंजेगा .... जज आर्डर -आर्डर कहता रह जायेगा और तू पिटता रहेगा .
मेरा मन मुस्लिम भाइयों के ह्रदय को चोट पहुचाने की नहीं है  पर आमिर जैसे लोग मजबूर कर देते हैं . आम मुसलमान भी सच्चाई जानता है कि भारत से सुन्दर और सुरक्षित देश मुसलमानों के लिए दुनियां में कोई और हो नहीं सकता .पर  कुछ लोगों को आम मुसलमान की शांति और खुसहाली बर्दाश्त नहीं हो रही है क्योंकि उनकी लाशों पर सन 1947 से ही अपनी रोटी जो सेंकते आये हैं . 
poetpawan50@gmail.com

रविवार, 15 नवंबर 2015

ये अहिंसा का देश कभी नहीं रहा हाँ उदार अवश्य रहा

मित्रों बिहार चुनाव जब से सम्पन्न हुए हैं भारतीय मीडिया और लेखकों, बुद्धिजीवियों में एक आत्मसंतोष दिखाई दे रहा है वे निढाल से हो गये हैं जैसे उनकी व्यूहर चना सफल रही उसी तरह जैसे अभिमन्यु को घेर मारने के बाद कौरव. सारी असहिष्णुता अचानक जैसे गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गयी. पर वे शायद भूल गये उसके बाद भी कौरवों का विनाश हुआ था . उनके पास अद्वितीय योद्धा थे कौरवों की ओर से दुर्योधन व उसके 99 भाइयों सहित भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा कलिंगराज श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण और बृहद्वल युद्ध में शामिल थे फिर भी हारे .सारा प्रपंच बस बीजेपी को पराजित करने के लिए था.पर बीजेपी मात्र एक व्यूह हारी है युद्ध नहीं, ये विरोधियोंयों को समझना होगा क्यूंकि उस व्यूह के बाद की लड़ाई की अगली कथा कौरवों के लिए बड़ी दुखदाई थी. पुरस्कार लौटाऊ कार्यक्रम अचानक बंद हो गया. सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री होते हुए जानबूझकर उसकाने के लिए गोमांस खाने की बात कही. क्या ये उचित था .फिर टीपू जयंती का विवादित आयोजन और उसमे '' तीन लोगों की हत्या '' इस पर किसी ने पुरस्कार नहीं लौटाया किसी मीडिया को असहिष्णुता नहीं दिखी उन्हें एक मामूली घटना लगी क्योंकि ऐसे ही जयचंदों के कारण भारत को१- ७११ मुहम्मद बिन कासिम .
२ -१०००, महमूद गजनवी
३- ११८२ मोहम्मद गोरी 17 आक्रमण
4- १२ वी शताब्दी में चंगेज खां
5- १३९९ तैमुर लंग
६ - 15 वीं बाबर
7- नादिर शाह
8- १७५७ अहमद शाह अब्दाली लुटा और बर्बाद किया और फिर अंग्रेजों ने.... हम अति सहिष्णु थे या कहें डरपोक थे कि मुट्ठीभर बाहरी आये और हमे लूटकर चले गये पर अब वैसा नहीं होगा .
हमें सच पढाया नहीं जाता....... ये अहिंसा का देश कभी नहीं रहा हाँ उदार अवश्य रहा पहला विश्व युद्ध हमारे ही देश में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में हुआ था जिसे दुनिया महाभारत के नाम से जानती है भारत वीरों की भूमि रही ...... पर आगे चलकर हमें पीढी दर पीढी जो पढ़ाया गया वहीं हमारा मानसिक चेतना बनकर हमारे खून में मिल गया और परिणाम हुआ हिन्दू सहनशील [डरपोक] हो गये .क्योंकि हमे डरपोक बनाया गया .हम डरपोक थे नहीं .अधूरे और अर्ध्य सत्य, उदाहरणों के जरिये , अपनी सुविधा और विचार धारा के अनुसार हमें पुरानी पीढी ने बरगलाये रखा इसी कारण हिन्दू सदैव आक्रमण का शिकार हुआ कभी आक्रमण किया नहीं . हम हमलावर नहीं रहे सदैव बचाव की मुद्रा में रहे इसका कारण हम और हमारी संस्कृति सदैव रौंदी गयी . अहिंसा के सबसे बड़े झूठे पैरोकार रहे गांधी जी .... वे उनका आचरण और उनकी कार्य शैली में जमी आसमा का अंतर था कुछ उदाहरण देखिये .... वे राम जी को अपना ईष्ट मानते थे आदर्श मानते थे और भगत सिंह आज़ाद को उग्रवादी कहते थे . राम अन्याय के विरुद्ध शस्त्र उठाया था.... अहिंसा एक सीमा तक ही ठीक है ..... भगवान राम ने स्वयं सुन्दर काण्ड के 57 वें दोहे में कहा है....
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति\
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति \\
भावार्थ:-
इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती| उसके बाद जो चोपाई है वो इस प्रकार है ...

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

दोहा- काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥५८॥
   सुन्दर काण्ड  में ही एक जगह हनुमान जी रावण से कहते हैं जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।  अर्थात जिसने मुझे मारा  मैंने उसे मारा .... गांधी जी ने कभी राम जी के हनुमान जी के कथनों से कुछ क्यों नहीं सीखा ..... कायर सिर्फ .....दैव -दैव आलसी पुकारा .... कीरट लगाते हैं....  जो कायर हैं   छोटे ह्रदय के हैं वे अहिंसा की आड़ लेकर महान बनने का ढोंग करते हैं और एक पुरी पीढी को कायर बना देते हैं ऐसे लोग ही अहिंसा परमों धर्मः ... का अधूरा श्लोक  रटते हैं अधूरा श्लोक गुमराह करता है  जैसे अधूरा ज्ञान  महाभारत के शांति पर्व में लिखा है  ....अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: l"
 अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है.. पर आज तक अधूरा श्लोक ही पढ़ाया जरा रहा है  क्यों ..क्या ये शोष का विषय नहीं है . हाँ हम शरण में आये की रक्षा जरुर करते थे  इसी लिए ----------------
, सदियों पुरानी भारतीय सभ्यता आज भी इसलिए जीवित है कि सहिष्णुता इसका स्वभाव ही नहीं, सांस भी है. हिंदू संस्कृति की छांव में बौद्ध, जैन, सिख के साथ-साथ अरब से आए इस्लाम जैसे धर्म ने भी अपने को खूब पोषित किया. यह अलग बात है कि इस सहिष्णुता की सांस की कीमत भी 1947 में भारत ने चुकाई है.
इस बात को याद रखने की जरूरत है कि भारत अगर सेक्युलर है, तो वह इसलिए नहीं है कि इंदिरा गांधी ने 1976 में सेक्युलर शब्द को संविधान का हिस्सा बनाया था. भारत इसलिए है कि हिंदू मूलत: और अंतत: सेक्युलर हैं. संसार के प्रमुख धर्मो में सिर्फ  हिंदू धर्म का कोई पैगंबर नहीं है यानी मोहम्मद, ईसा मसीह, बौद्ध, महावीर या गुरुनानक की तरह हिंदू धर्म का कोई संस्थापक नहीं है. हिंदू या सनातन धर्म संसार का सबसे प्राचीन धार्मिंक विचार है. उसके बाद यहुदी, जैन, बौद्ध वगैरह का स्थान आता है. इस्लाम और सिख तो नए धर्म माने जा सकते हैं. भारत के मालाबार समुद्र तट पर 542 ईसा पूर्व यहूदी पहुंचे. वे तब से यहां अमन-चैन से गुजर-बसर कर रहे हैं. ईसाइयों का भारत में आगमन चालू हुआ 52 ईस्वी में. वे भी सबसे पहले केरल में आए. अब बात पारसियों की. वे कट्टरपंथी मुसलमानों से जान बचाकर ईरान से साल 720 में गुजरात के नवासरी समुद्र तट पर पहुंचे. अब वे देश के अहम समुदायों में शुमार होते हैं.
इस्लाम भी केरल के रास्ते भारत आया. लेकिन, भारत में इस्लाम के मानने वाले बाद के दौर में यहूदियों या पारसियों की तरह से शरण लेने के इरादे से नहीं आए थे. उनका लक्ष्य भारत पर राज करना था. वे आक्रमणकारी थे. भारत में सबसे अंत में विदेशी हमलावर अंग्रेज थे. उन्होंने 1757 में पलासी के युद्ध में विजय पाई. लेकिन गोरे पहले के आक्रमणकारियों की तुलना में ज्यादा समझदार थे. समझ गए थे कि भारत में धर्मातरण करवाने से ब्रिटिश हुकूमत का विस्तार संभव नहीं. भारत से कच्चा माल ले जाकर वे अपने देश में औद्योगिक क्रांति की नींव रख सकेंगे. इसलिए ब्रिटेन, जो एक प्रोटेस्टेंट देश है, ने भारत में अपने 190 सालों के शासनकाल में धर्मातरण शायद ही कभी किया हो. इसलिए ही भारत में प्रोटेस्टेंट ईसाई बहुत कम हैं.
ज्यादातर ईसाई कैथोलिक हैं. इनका धर्मातरण करवाया आयरिश, पुर्तगाली और स्पेनिश ईसाई मिशनरियों ने. इन्होंने गोवा, पुडुचेरी और देश के अन्य भागों में अपना लक्ष्य साधा. दलित हिंदुओं का भी धर्मातरण करवाया. इसके बावजूद देश में कैथोलिक ईसाई कुल आबादी का डेढ़ फीसद हैं. प्रोटेस्टेंट तो और भी कम. भारत में अगर बात मुगलों की करें तो उन्होंने तीन तरह से धर्मातरण करवाया. पहला, वंचितों को धन इत्यादि का लालच देकर. दूसरा, मुगल कोर्ट में अहम पद देने का वादा करके; और तीसरा, इस्लाम स्वीकार करने के बाद जजिया टैक्स से मुक्ति. इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की रोशनी में देखने की जरूरत है कि यहां मुसलमानों और ईसाइयों के साथ कितना भेदभाव हो रहा है.
 कई हिन्दुओं   हिन्दुओं की दाल रोटी  पहचान और राजनीति हिन्दू  विरोध पर ही टिकी है  उन्हें और मीडिया को आजम खान के आज के बयान में दोमुंहापन  नजर नही आता  पेरिस हमले पर आजम खान ने कहा  ये क्रिया की प्रतिक्रिया है तो फिर इस तरह तो गोधरा के प्रतिक्रिया गुजरात दंगे थे   ये मान लेना चाहिए ....पर न मीडिया मानेगी न ये ...... असली भारत के गद्दार और बांटने वाले यही हैं ...इसीलिये ये मोदी को बर्दाश्त नहीं कर  पा रहे हैं  और मीडिया और छद्म लेखकों, बुद्धिजीवियों  को शिखंडी की तरह आगे करके लड़ रहे हैं ....पर इस बार ये हथकंडा  कामयाब होने नहीं देना हैं ..... हम अपने देश के मुसलमानों का भी उतना ही सम्मान करते हैं जितना हिन्दू का पर मामला समानता का हो भेदभाव वाली आखों को बर्दाश्त नहीं करना है उन्हें सदैव के लिए फोड़ना देश हित में जरुरी है  जय हिन्द 
पवन  तिवारी 


ये अहिंसा का देश कभी नहीं रहा हाँ उदार अवश्य रहा.........

मित्रों बिहार चुनाव जब से सम्पन्न हुए हैं भारतीय मीडिया और लेखकों, बुद्धिजीवियों में एक आत्मसंतोष दिखाई दे रहा है वे निढाल से हो गये हैं जैसे उनकी व्यूहर चना सफल रही उसी तरह जैसे अभिमन्यु को घेर मारने के बाद कौरव. सारी असहिष्णुता अचानक जैसे गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गयी. पर वे शायद भूल गये उसके बाद भी कौरवों का विनाश हुआ था . उनके पास अद्वितीय योद्धा थे कौरवों की ओर से दुर्योधन व उसके 99 भाइयों सहित भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा कलिंगराज श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण और बृहद्वल युद्ध में शामिल थे फिर भी हारे .सारा प्रपंच बस बीजेपी को पराजित करने के लिए था.पर बीजेपी मात्र एक व्यूह हारी है युद्ध नहीं, ये विरोधियोंयों को समझना होगा क्यूंकि उस व्यूह के बाद की लड़ाई की अगली कथा कौरवों के लिए बड़ी दुखदाई थी. पुरस्कार लौटाऊ कार्यक्रम अचानक बंद हो गया. सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री होते हुए जानबूझकर उसकाने के लिए गोमांस खाने की बात कही. क्या ये उचित था .फिर टीपू जयंती का विवादित आयोजन और उसमे '' तीन लोगों की हत्या '' इस पर किसी ने पुरस्कार नहीं लौटाया किसी मीडिया को असहिष्णुता नहीं दिखी उन्हें एक मामूली घटना लगी क्योंकि ऐसे ही जयचंदों के कारण भारत को१- ७११ मुहम्मद बिन कासिम .
२ -१०००, महमूद गजनवी
३- ११८२ मोहम्मद गोरी 17 आक्रमण
4- १२ वी शताब्दी में चंगेज खां
5- १३९९ तैमुर लंग
६ - 15 वीं बाबर
7- नादिर शाह
8- १७५७ अहमद शाह अब्दाली लुटा और बर्बाद किया और फिरअंग्रेजों ने हम अति सहिष्णु थे या कहें डरपोक थे कि मुट्ठीभर बाहरी आये और हमे लूटकर चले गये पर अब वैसा नहीं होगा .
हमें सच पढाया नहीं जाता....... येअहिंसा का देश कभी नहीं रहा हाँ उदार अवश्य रहा...... ये लेख अधूरा है मित्रों ..... .... पूरा करूँगा रात तक .... इंतजार कीजिये

रविवार, 8 नवंबर 2015

भाजपा की हार के कारण और उसके मायने

 भाजपा की हार के कारण  और उसके मायने
 आज 8 नवम्बर 2015 भाजपा के लिए  चिर स्मरणीय है.क्योंकि  भाजपा इस हार से  सदियों तक  सीख सकती  है.उसे भविष्य में यदि अजेय होना है या अधिकाधिक अपने [ जीत ] विचारों का प्रसार करना है तो . बीजेपी के हारने के अनेक कारण हैं जैसे महागठबंधन जीतने के अनेक  कारण हैं.सबसे पहले महागठबंधन को जीत की बधाई.
बड़े कारणों में गलत समय पर बयान, गलत समय पर बयानों पर प्रतिक्रिया और  कुछ  प्रभावशाली  नेताओं  की अनदेखी,या यूँ कहें की बीजेपी के थिंक टैंक में अहंकार का भाव इतना प्रबल हो गया था कि उन्हें मोदी के जी के सामने कोई अन्य कारक प्रभावी लग ही नहीं रहा था .सो काफी हद तक अपने अनुकूल लोगो को टिकट दिया गया जिसकी जितनी बड़ी पकड़ थी उसे टिकट उतनी जल्दी मिला.जिनकी जनता में पकड़ थी उन्हें टिकट  नहीं मिला .
बिहार चुनाव आधा बाहरी मुद्दे पर लड़ा गया आधा स्थानीय मुद्दे प ,स्थानीय मुद्दे पर महागठबंधन जीता और बाहरी मुद्दे ने भाजपा को हराया,बीजेपी के हार के मूल कारणों में एक कारण ये भी है कि जिन मुद्दों पर उसे त्वरित प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी उस पर उसने देर कर दी और जिन मुद्दों पर नहीं देनी चाहिए थी उस पर जल्दी और  विपरीत परिस्थियों में बिना समझे- बूझे प्रतिक्रिया दे दी.आरक्षण ने बड़ी भूमिका अदा की.भागवत जी के प्राथमिक बयान ने एक वर्ग को मोदी के विरोध में लाम बंद कर दिया.दूसरा आरक्षण के पक्ष में मोदी जी का देरी से आया बयान आरक्षण वालो कोअपने पक्ष में ला नहीं पाया उल्टा आरक्षण विरोधी  वर्ग काभी एक हिस्सा मोदी से रूठ गया.मैंने सोशल मीडिया पर इस पर तीखी प्रतिक्रिया उन लोगों की देखी जो रोज मोदी- मोदी के नारे लगाते थे.
 बीजेपी पर सुनियोजित तरीके से वैश्विक रूप से हमला बिहार चुनाव को देखते हुए किया गया.  जिसे बीजेपी  को समझने  में देर लगी और वो बिहार चुनाव के कारण दबाव में आ गयी और बीजेपी  के देशी- विदेशी विरोधी  इसी मौके की ताक में थे .बीजेपी चुनाव सम्पन्न होने तक  वेट एंड वाच की मुद्रा  में आ गयी . बस यहीं बीजेपी की हार निश्चित हो गयी.विरोधी अपने अभियान में सफल रहे .पुरस्कार वापसी उसी योजना का एक हिस्सा भर थी .यदि बीजेपी बिहार चुनाव जीत जाती आधे विरोधी अपने आप पस्त हो जाते और मोदी जी का वैश्विक कद काफी बढ़ जाता एक नये भारत का पुनर्निर्माण होता  जिसे आज ब्रेक लग गया . ये दुखद है इस देश के लिए . इसका प्रभाव बीजेपी को अब संसद में भी दिखेगा .उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव पर भी दिखेगा . बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति में मात्र 20 प्रतिशत का अंतर है  इसलिए कुछ ऐसा ही खेल यूपी में भी होगा . विकास  का मुद्दा गौण रहा ,जातीय और अन्य मुद्दे हावी रहे . इस चुनाव ने ये भी एक मिसाल पेश की है दूसरे प्रदेशों के लोगो के लिए कि बिहार की मानसिकता में ज्यादा बदलाव नहीं आया है उन्हें विकास से ज्यादा मतलब नहीं है  उन्हें जाति प्यारी है बिहार के नौजवानों को शायद अभी कुछ और सालों तक दूसरे राज्यों की चौखट  पर मत्था टेकना  होगा. वे जीते जिन्हें  कोर्ट से दोष  साबित होकर सजा हो गयी . जिन्होंने जिस जनता का पैसा लूटा उसी जनता ने उसे सर पर बिठाया इसे क्या कहेंगे.इससे साबित होता है  कि आज भी बिहार  सोंच के स्तर पर कहाँ है . खैर बीजेपी को सावधान रहना होगा .