कुछ
जो अच्छा मिले तो पढूँ मन लगा
जोड़
ख़ुद को सकूँ उस कथा भाव से
एक
दिन पुस्तकालय में संयोग से
मिल
गयी एक पढ़ने लगा चाव से
उसकी
प्रस्तावना मुझको रोचक लगी
प्रेम
के प्रति लगी जगने संभावना
एक
टेढ़ी नज़र थी बगल में मेरे
मेरे
प्रति आ गयी उसमें दुर्भावना
देखने
के बहाने लगा मांगने
मैंने
दे दी समझ करके सद्भावना
पाके
अवसर उठा ले गया वो उसे
रह
गयी मेरे हिस्से में प्रस्तावना
मुझसे
ग़लती न करना कभी दोस्तों
तुम
दिखाना नहीं मुझसी सद्भावना
भूल
कर अपनी पुस्तक दिखा दी अगर
पढ़
सकोगे फकत तुम भी प्रस्तावना
पवन
तिवारी
०४/१०/२०२६
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