यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

रविवार, 12 अप्रैल 2026

शुभ विवाह ऐसा न करना

 



जो विवाह की रस्में होंगी

उसमें हमको दुगुना देना

लड़के वाले बोल बोल के

कहते हक़ है गहने लेना

६ अंकों में वेतन चहिए

उस पर रहन सहन भी आला

काम नहीं करना है घर का

जपनी है आराम की माला

ऐसी बहू का क्या ही करना

शुभ विवाह ऐसा न करना

 

जो सुमंगला बन के आयी

आकर सारे घर पर छायी

उनकी वाली ही सब करना

केवन उनका बन के रहना

जिनने जन्म जिनने पाला

संस्कार में  जिनने  ढाला

है आदेश न उनका सुनना

इनकी तो हर बात है सुनना

उल्टा सीधा सब कुछ सहना  

शुभ विवाह ऐसा न करना

 

बहू रूप ससुराल में आयी

पर बेटी सा खुलकर रहना

बात बात में बहस करेंगी

सास ससुर की एक न सुनना

चमचों सी औकात है मेरी

मेरी तो तिल भर न सुनना

ऊपर से दहेज़ की धमकी

घर भर को है जेल में करना

ऐसा शुभ विवाह न करना

 

पढ़ा लिखा जो योग्य बनाये

उनके साथ  नहीं  है रहना

वेतन का हिसाब भी चाहिए

धीरे – धीरे  मायका भरना

घर गाड़ी सब नाम पे उनके

हमको केवल बैल सा खटना

बात - बात पे मैके फोन

देख  लूँगी  वाला  टोन

ऐसी स्त्री के संग रहना

ऐसा शुभ विवाह न करना

 

चले न मन मर्जी तलाक़ फिर

आधा वेतन हड़प  है  करना

खून पसीने की कमाई पर

डलहौजी सी नीति है रखना

बात नहीं यदि बन पाए तो

आत्महत्या को प्रेरित करना

ऐसा शुभ विवाह न करना

 

तुम्हरे लिए एटीएम होंगे

माँ के लिए  दुलारे बेटे

घर में बहू की इज्ज़त ख़ातिर

बाबू  बरामदे  में  लेटें

तुमको कुछ परवाह नहीं तो

हमें भी न  टंकी में सड़ना

न ही हमको फ्रिज में सड़ना

न ही है  मिटटी में गड़ना

हमको  ड्रम में भी न मरना

शुभ विवाह ऐसा न करना


पवन तिवारी

११/०४/२०२६

 

  

 

        


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