यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

मंगलवार, 21 जून 2016

जटायु के वंशज से एक दुर्लभ भेंट

जटायु के वंशज से एक दुर्लभ भेंट

पिछले महीने मैं  लम्बे समय के बाद गाँव गया .
घर , आस-पास, मुहल्ले का चक्कर लगा आया .
पर मन थोड़ा खिन्न सा था , कुछ जैसे छूट रहा था,
कुछ खालीपन या जैसे कुछ भूल रहा था ,
 कोशिश किया याद करने की , 
पर फेल रहा, पुरानी यादों में जाकर
पुरानी संस्कृतियों को खोजने में ,
कई बार सोंचा बाबू जी से पूंछू
कि घर और आस - पास कुछ ऐसा
क्या था जो अब नहीं है ,
अगले दिन मैं भतीजे के साथ
खेत देखने गया , दस साल का भतीजा अचानक
चिल्लाया , चाचा वो देखो, इधर नहीं , उधर टीले पर
 उसकी चिल्लाहट में एक आश्चर्य और खुसी थी
मैंने टीले की तरफ देखा - और सहजता से कहा - हाँ गिद्ध है
मेरे निरुत्साह उत्तर से वह दुखी था . 
खीझ कर वह बोला - आप ने इससे पहले गिद्ध देखा क्या ? 
मैंने कहा हाँ - अक्सर देखता था , 
अपने घर के सामने पीपल के पेड़ पर , उसने तपाक से कहा 
अपने घर के सामने और पीपल 
क्या चाचा मुझसे ही झूठ ,  
 हाँ मेरी किताब में है , पेड़ पर बैठा
पर वो तो फोटो में है पर
पता है ये एकदम असली गिद्ध है 
पर सुन्दर नहीं है , 
दादा जी के रामायण में ,
 रंगीन गिद्ध है, उसमें राम भी हैं
 मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला
 मुझे मेरे खालीपन, खिन्नता और
कुछ छूटने का उत्तर मिल गया था ,
मैं उसका हाथ पकड़,  घर की ओर बढ़ा .
मेरे अचानक चलने से वह चकित था
 क्या हुआ चाचा ? क्या हुआ चाचा ?
मैनें कुछ गलत कहा , उसने कहा,
मैंने  बोझिल मन से ''ना '' में सिर हिलाया
और घर आ गया, फिर कई दिन अकेले 
मैं उस टीले के पास गया , पर वह नहीं मिला
इस बीच मैं जटायु जो रामायण की तस्वीर में
 राम के साथ कई बार देख चुका था
मुंबई लौटने से पहले,
 मैं अपनी साझा संस्कृति के
 इस महान द्योतक से मिलना चाहता था , 
मैं उससे मिलना चाहता था,
 जिसने मेरे  बचपन को आश्चर्य, कौतूहल, 
कहानियों और ज्ञान से समृद्ध किया
सुबह - सुबह पीपल की सबसे ऊँची डाली पर
इन्हें शोर मचाते, पंख फड़फड़ाते देखना
और फिर आसमान में पंख फैलाये
 बादलों के पास उड़ते देखना 
अम्मा से जटायू की सीता जी के लिए
 रावण से आत्मघाती युद्ध और स्वबलिदान
 और  बाबू जी से सम्पाती की वीरता और साहस की कथा
और फिर इनकी ऊँची उड़ान और दूरदृष्टि
इन्होने ही हमें ''गिद्ध दृष्टि '' का सुन्दर मुहावरा दिया. 
मुंबई लौटने के दिन नजदीक आ रहे थे,
 और मैं  लौटने से पहले 
महान जटायू के वंशज से 
मिलना चाहता था  , इसी चाह में 
मैं उस जगह गया , जहाँ मेरे बचपन में
 वो  बूढा श्रद्धेय पीपल रहता था , 
जिस पर शिवरात्रि में पूरा गाँव 
नतमस्तक रहता था , उस दिन वो 
साक्षात् शिव का स्वरुप होता था
और उसकी सबसे ऊँची शाखा पर 
जटायु का अपना घर होता था
पर अब वहां दोनों नहीं थे 
मुंबई लौटने से एक दिन पहले
मैंने जटायु के वंशज से मिलने का
आख़िरी प्रयास किया और बढ़ चला
खेत के पास थोड़े से बचे बंजर टीले की ओर
आज वहां भीड़ थी , कौवे थे , कुत्ते थे ,
 एक दो सियार भी दूर मडराते दिखे
पर वे नहीं थे जिनसे मैं
मिलने की आस में गया था  
मैं  टीले से थोड़ी दूर  खड़ा   
लाश के पास कौवों और कुत्तों की
नूरा - कुश्ती देख रहा था कि
तभी मेरे सिर के ठीक ऊपर से
हरहराते हुए कुछ बड़े डैनें  गुजरे
 और टीले की सबसे ऊँची जगह पर 
चारों दिशाओं में गर्दन घुमाते हुए
चहलकदमी करने लगे,
उन्हें देख , मैं उनकी तरफ लपका , 
वे मुझे देख दो - चार कदम पीछे हुए
 मैं रुक गया , उनके कदम भी रुक गये
मैंने अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोड़ा
और धीरे से एक पग आगे बढ़ाया
उनके सबसे वरिष्ठ सदस्य ने
 गर्दन हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया
 मुझमें थोड़ी हिम्मत आयी,
मैं एक पग और बढ़ा , वे भी मेरी ओर बढ़े
 मैंने कहा मैं आप से मिलने आया हूँ .
जटायु के वंशज एक साथ हँस पड़े
 मुझे थोड़ी लज्जा महसूस हुई.
मेरा लज्जित चेहरा उन्होंने शायद पढ़ लिया , 
गिद्धराज आगे बढ़े और गर्दन ऊँची करते हुए बोले-
बोलिए क्यों मिलना चाहते है आप मुझसे - 
हमें भी उत्सुकता है कि पहली बार
 कोई मनुष्य हमसे मिलने आया है
मैंने तपाक से उत्साह बस बिना सोचे
प्रश्न के अंदाज में पूंछा -  आप ने हमारे गाँव को क्यों त्याग दिया ?
गिद्धराज ने गम्भीर होकर कहा - 
आप हमारा मजाक उड़ाने आये हैं या दर्द कुरेदने 
हमने गाँव का त्याग नहीं किया
 बल्कि हमें गाँव ने त्याग दिया
हमारी जीविका के हर साधन को नष्ट कर दिया
 मैं चुपचाप सुनता रहा , बीच में एकाध बार
 कौवे और  कुत्ते ध्यान भंग करते
मैंने अपना थोड़ा ज्ञान बघारा और कहा-
विज्ञान ने बड़ी तरक्की कर ली है
सरकार और विज्ञानी मिलकर गिद्धों को बचायेंगे
सरकार आप की कम होती जनसंख्या पर चिंतित है
आप हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर हैं
गिद्धराज पहली बार ठठाकर हँसे - 
बोले अब समझ में आया - तुम क्यों मिलने आये
या तो तुम बेवकूफ आदमी हो या कवि
 वरना ऐसी बात नहीं करते , हमें तुमसे सम्वेदना है .
हमारी ये दशा विज्ञान और सरकार की ही देन है
मैं थोड़ा झेंपते हुए बोला - वो कैसे ?  
विज्ञान ने ही लोगों को नास्तिक बनाया
 वरना बूढा पीपल क्यों कटता
पहले लोग कहते थे पीपल के पेड़ में
भगवान शिव रहते हैं , काटने से पाप लगेगा
वो भाव हटते ही बूढा पीपल मार दिया गया
अचानक एक शाम जब मैं घर लौटा
तो बूढा पीपल अंग - भंग पड़ा था
और हमारा घर तिनकों में इधर उधर बिखरा था
विज्ञान ने बैलों को बेरोजगार किया .
   बूढ़ी गाय अब कसाई तक जाने लगी . 
 हमारा भोजन  भी हड़प लिया . 
भैंसों और विदेशी वर्णशंकर गायों को खाकर
हमारे न जाने कितने साथी , बन्धु - बांधव
 असमय मृत्यु  को प्राप्त हो गये
मैंने साहस कर पूंछा ऐसा क्यों ?
गिद्धराज ने आंसू पोंछते हुए कहा-
उनके शरीर में जहर भरा था , 
क्योंकि उनके मरने से पूर्व
 ज्यादा दूध, ज्यादा गबरू, ज्यादा उम्र के लिए
उनके बदन में सुई से जहर भर दिया गया.
 ये सरकार और विज्ञान ने ही मिलकर किया
जिसे हमारे सीधे -सादे  पूर्वजों  ने खा लिया
अब गाय माँ, बैल नन्दी, 
पीपल शिव और बरगद विष्णु नहीं रहे
और हम जटायु नहीं रहे 
 अब विज्ञान और सरकार की दृष्टि में
 वो जानवर और पेड़ हैं और हम बदसूरत पक्षी
मैं निशब्द था, आखों में गर्म जल था,
जटायु के वंशज से मिलना एक नया मर्मान्तक अनुभव था










सोमवार, 20 जून 2016

पिछले दिनों मैंने सुना मेरे लिए विश्व युद्ध होगा

पिछले दिनों मैंने सुना

मेरे लिए विश्व युद्ध होगा

 दुनिया भर के मनुष्यों का आपस में

मुझ पर अधिकार के लिए जानलेवा झगड़ा

इतिहास में सबसे अधिक झगड़े सुन्दर स्त्री के लिए हुए

 भारत में आल्हा - रुदल , पृथ्वीराज का इतिहास

नहीं पढ़ाया जाता , पर वे मिथकों में, जन श्रुतियों में,

लोक जीवन की कथाओं में उम्दा पात्र हैं

सीता के  कारण लंका

और  द्रौपदी के कारण महाभारत का युद्ध हुआ

 पर मेरे कारण विश्व युद्ध होगा

सुनकर विश्वास नहीं होता

क्या मैं स्त्री से भी महत्वपूर्ण हूँ ?

क्योंकि हर महत्वपूर्ण  और महान कार्य में

 कहीं न कहीं एक कारक स्त्री होती है .

क्या मैं स्त्री हूँ ?

मैं कई दिनों से इसी सोच में डूबा हूँ .

शायद आदमी को लगता है  ,

अब मैं उसे प्यार नहीं करता .

पर मैंने तो उसे हर किसी से अधिक प्यार किया है

स्त्री से भी अधिक,

हाँ , स्त्रियों में माँ का प्यार सर्वोत्तम

पर मेरा प्यार उस माँ से भी कम नहीं

जहाँ माँ भी नहीं होती ,

वहां भी मैं होता हूँ.

मैं तो माँ में भी होता हूँ ,

उसके सुख - दुःख के आंसुओं में भी

आदमी के ग्रहण करने से लेकर, त्यागने तक

उसके दूध से लेकर , पेशाब तक

 उसके शौच से ,लेकर नहाने तक

उसके खाने से लेकर, पीने तक

उसकी मेहनत के पसीने तक

यहाँ तक किउसके रक्त 

और लार में भीउसके साथ रहता हूँ

 आदमी जानता है , मैं नहीं तो वो नहीं

फिर भी उसने कभी मेरे बारे में

गम्भीरता से  नहीं सोचा

 मैं जीवन से प्यार करता हूँ

और आदमी सिर्फ खुद से प्यार करता है.

 उसने सदा मेरा अपमान किया ,

मुझे दर - बदर किया . 

मेरे हर सुन्दर रूप की हत्या की

पेड़ों की , जंगल की , कुओं की ,

तालाबों  की , नदियों कीमिट्टी की ,

 खाड़ी और समुद्र को भी नहीं बख्शा ,

उसने मेरे जीवन  के  हर द्वार बंद कर दिए

यहाँ तक कि घर के नाभदान को भी कंक्रीट कर दिया

ताकि मैं  जरा भी छुपकर धरती की गोंद में भी न रह सकूँ

मैं तो चाहता हूँ धरती की गोंद में रहना ताकि

 आदमी  बुरे वक्त में मेरा इस्तेमाल कर सके

पर उस सम्भावना को भी उसने खत्म कर दिया है.

जब  आदमी लड़ेगा मेरे लिए युद्ध

 तब भी मुझे पाने की लालसा में

मेरा ही कत्ल कर रहा होगा ,

क्योंकि मेरे बिना उसका अस्तित्व ही नहीं है

मुझे बचाएगा ,तभी आदमी भी बचेगा

अभी भी वक्त है सँभल जा ऐ आदमी

तूने अभी तक मेरा प्यार देखा है

मेरी नफरत देखने की तुझमें हिम्मत नहीं है

तूं क्या युद्ध करेगा ? उसके लिए भी शरीर में मेरा होना जरुरी है

 आज मैं '' पानी '' ये ऐलान करता हूँ

अब मैं तुम्हारी सेवा  या तुम्हें ''सेव'' तब तक नहीं करूँगा

जब तक तुम  खुद मेरी ''सेवा'' या मुझे ''सेव'' नहीं करोगे

मैं ''पानी'' आज ऐलान करता हूँ

 

रविवार, 19 जून 2016

अब मैं गाँव नहीं हूँ





अब मैं गाँव नहीं हूँ
अब मुझ में मैं नहीं हूँ .
मुझमें सिर्फ मेरा नाम बचा है . 
 आप ने किताबों में  जैसा मेरे बारे में पढ़ा ,
 चित्रों में ,  फिल्मों में देखा , अपने  अध्यापकों से सुना  ,
 कल्पना की , मैं अब वैसा नहीं हूँ.
 मेरे नाम पर , मुझसे मिलने मत आइयेगा ,
  आप को दुःख होगा ,  आप को लगेगा
 मैंने आप को गाँव के नाम पर ठग लिया है. 
पर सच ये है कि मुझे लूटकर
मेरी पहचान को रौंद दिया गया . 
अब  मुझमें मिट्टी की दीवार , नरिया , 
खपरैले , बल्ली और सरकंडे से बने घर नहीं दिखेंगे
उनमें चमगादड़ , गौरैये और कबूतरों के घोसले नहीं मिलेंगे .
 मेरी पहचान का सच्चा प्रतीक  जुआठे में नधे बैल
 और उनके पीछे सिर में अंगोछा बांधे 
और कंधे पर रखे हल लेकर चलने वाला किसान नहीं मिलेगा .
 मेरी कुछ और निशानियाँ कोल्हू खींचते बैल ,
 जाँता पीसती औरतें नहीं दिखेंगी, 
मेरी  घरेलू सांस्कृतिक पहचान
 मसाला पीसने और जीभ की चटोरी दोस्त चटनी की मालकिन
 सिल बट्टा, दूध वाली कहतरी
 और आम के लकड़ी की मथनी को घरबदर कर दिया गया है .
अब पलटू काका की धनिया को छूने से उँगलियाँ नहीं महकती
बुधई भाई के घर में पकने वाली आलू -गोभी की तरकारी
 पूरब के टोले तक नहीं महकती , 
अब निमोने में पहले जैसी मिठास नहीं मिलती,
क्योंकि सब अब देसी गोबर से दूर हो गये हैं. 
आलू ,गोभी, मटर,  टमाटर,  धनिया और तो और
गेहूं और धान भी पक्के नसेड़ी हो गये हैं.
 अब सबको डाई , यूरिया और पोटाश चाहिए , 
इनके शरीर में  खुसबू की जगह अब जहर दौड़ता है ,
मेरी बाहरी पहचानों में कासि ,
 पुआल , गन्ने की सूखी पत्तियों से बनी मडई ,
कच्ची टेढ़ी- मेढ़ी गलियां और खेत के कोने में पड़े गोबर के घूर
अब नहीं दिखते , 
लौटू चाचा के घर के सामने वाले 
पीपल पर  अब गिद्धों के घर ,
सिर पर खंचोली रखकर 
तरकारी बेचने वाले रामाधार कोइरी,
बुढ़िया का बार बेंचने वाले लाला
 और गेहूं के बदले बर्फ देने वाले फिरतूलाल
अब नहीं दिखते 
अब लकड़ी के तराजू , मिट्टी के बर्तन, 
अनाज रखने को माटी की डेहरी 
दिवाली पर दियली ,  कोसे  और घंटी ,
 अब पीपल और पाकड़ के पेड़ के नीचे पंचायत नहीं होती , 
अब पंच नहीं पुलिस मामले सुलझाती है.
अब पीपल और पाकड़ के जगह पर
 आधुनिक पंचायत घर बन गया है
 जहाँ पंचायत के सिवा सब होता है , 
अब यहाँ बियाह नहीं होता
 अब कंहरवा , बिदेसिया , नौटंकी  नहीं होती
अब मैरिज होता है , आर्केस्ट्रा और डीजे होता है .
अब मैं भी बदसूरत कक्रीट सा हो गया हूँ.
मुझे शहर बनाने के नाम पर ,
 विकास के नाम पर लूटा गया,
 मुझे पिछड़ा, गंवार कहकर दुत्कारा गया , 
शहर बनने के सपने दिखाया गया,
 हमारे खेतों को उद्योगों के नाम पर हड़पा गया
विकास के नाम पर मेरे चरित्र
 और चेहरे को बिगाड़ा गया
 मैं भी उनके बहकावे में आकर
 बिना सोंचे समझे दौड़ पड़ा शहर बनने
बिना बिजली , बिना सड़क, बिना उद्योग, बिना तकनीक 
मैं कैसे बनता शहर, मैं शहर बनने के चक्कर में
 न गाँव रह सका न शहर बन पाया
बस मेरा नाम गाँव है,
मैं अब गाँव नहीं हूँ,
शहर का पिद्दी सा पिछलग्गू हूँ.




शनिवार, 18 जून 2016

कविता नहीं पढ़ते लोग

कविता नहीं पढ़ते लोग

कविता नहीं पढ़ते लोग

क्योंकि कविता पढ़ना मनुष्य बनने की प्रक्रिया है.
कविता में होता है जीवन , सम्वेदना , दया ,
मनुष्यता का गाढ़ा इतिहास , एक जीवंत चेतना
जीवन की एक पूरी प्रकृति , क्षमा और प्रेम

कविता नहीं पढ़ते लोग

क्योंकि कविता पढ़ते – पढ़ते मनुष्य बनने का डर होता है .
कविता गढ़ों, आडम्बरों ,पूर्वाग्रहों ,पाषाणों को ध्वस्त कर
पनपाती है  कोमल जीवन की सम्भावना , बताती है जीवन के मायने ,
कविता में होता है जीवन का भूगोल और विज्ञान


कविता नहीं पढ़ते लोग

क्योंकि बड़ी मुश्किल से प्रकृति के विनाश पर , पाषणों के नगर के नगर बने हैं
 बड़ी मुश्किल से मनुष्य जानवर बना है , स्वतंत्र से स्वच्छंद बना है ,
  सम्वेदना से पाषाण बना है , प्यार से छूटकर बाज़ार बना है .
  उसको और आगे बढ़ना है. उसे रोबोट बनना है.

कविता नहीं पढ़ते लोग

क्योंकि कविता पढ़ने से मनुष्य बनने की सम्भावना हमेशा बनी रहती है .
कविता रोबोट बनने के सपने को तोड़ सकती है .
 पीछे जाने और फिर से मनुष्य बनने का ख़तरा उठाने से डरते हैं.

कविता नहीं पढ़ते लोग

poetpawan@gmail.com

शुक्रवार, 17 जून 2016

चवन्नी का मेला: पिता

चवन्नी का मेला: पिता

पिता























पिता इतिहास है  भूत का , 
वर्तमान का और भविष्य का भी

जीवन का नागरिक शास्त्र है ,
 भूगोल है , प्राथमिक विज्ञान है

पिता  नीति है , संस्कार है , 

अपराजेय योद्धा है , मित्र है , 

मार्गदर्शक है ब्रम्हांड है, गुरु है, 
धर्म है , शास्त्र हैं, ब्रम्हास्त्र है ,

 पिता हमारी  अभिलाषा का अक्षय पात्र है ,

आकाश है , धरा है, कल्पवृक्ष है, 

अशोक है , अलादीन का चिराग है ,
पिता जीवन का ज्योतिष है

शरीर की आत्मा है ,
मूलांक है , भाग्यांक है, 

पिता जीवन का ज्योतिष है

निर्माता है , पालक है ,स्नेह है ,

 करुणा है ,  प्रेम है
पिता शिव का तीसरा नेत्र है

poetpawan50@gmail.com

सम्पर्क-7718080978

बुधवार, 15 जून 2016

बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी




सिर पर लकड़ी का गट्ठर था,  वह हौले - हौले चलती थी
 जैसे - जैसे वह चलती थी ,पग नूपुर छम -छम बजते थे
 उसका चलना नूपुर बजना सुर ताल के जैसा था
बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी 
 सिर पर चढ़  आया था दिनकर, धूप से अवनी तब रही थी
चेहरे पर अजीब सी चमक भी थी 
आंखों में स्वाभिमान की जलकर भी थी, 
मस्तक से नासा तक उसके , परिश्रम का नीर था टपक रहा 
पर थमने का नाम नहीं , पग-पग वह बढ़ती जाती थी 
 बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी
 वह नारी थी, श्रमकारी  थी ,नंगे पर चलती जाती थी
 मारुत के ग्रीष्म थपेड़ों ने , उस के तिरपन को था शुष्क किया
 उसके तिरपन को देख मुझे कुछ ऐसा प्रतीत  हुआ 
शायद रुक जाए , शीतल हो जाए 
शायद वे मुझसे कहते हों - पय की क्षुधा व्याप्त मुझ में
 अल्प ही सही ,पर दे तो दो 
नारी की सारी भीगी थी, धड़कनें थी उसकी बढ़ी हुई 
सब बिटप उसे थे निहार रहे , जिसे डगर से थी वह गुजर रही
 शायद रुक जाए, शीतल हो जाये , फिर चाहे चली जाए 
बदन पसीने में डूबा , देख यह  तरु द्रवित हुए 
तरु झूमे बह निकला समीर का झोंका
 मिली हो राहत शायद उसको, पर रुकने का नाम नहीं
 हर पल वह बढ़ती जाती थी ,
बलखाती थी नंगे पग चलती जाती थी .
श्रमकारी नारी भारती
 जय भारती
 जय भारती 
जय भारती

poetpawan50@gmail.com

सम्पर्क- 7718080978