यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

बुधवार, 13 जुलाई 2022

धुंधला - धुंधला थोड़ा

धुंधला - धुंधला  थोड़ा  मेरा  आज है

फेफड़ों   पर  क़फ़   का   गुंडाराज  है

कुछ  खराशों   ने  पकड़  रखा   गला

बिखरा - बिखरा धड़कनों का काज है

 

साँस  नथुनों  से  झगड़  कर  आ रही

कान  थोड़ा  भ्रमित  या कि जपाट है

रोग  जीवन  छीन  पाया  जब  नहीं

क्रोध  में  कर  दी  खड़ी मेरी  खाट है

 

इस  तरह  दुःख  को  हरा देता रहा

अपनों  से  बस  हार जाता ही रहा

लोग  भी  अपनों  से  हारे  हैं सुनो

इनसे ही  जग  मात खाता ही रहा

 

मोह  छोड़ो  यदि विजेता बनना है

कर्म  से  सम्बंध   केवल  रखना  है

भाव हो पर भावना पर रखो अंकुश

तेज  लेकिन  सजगता  से चलना है

 

पवन तिवारी

२२/१२/२०२१   

 

शाम सा लग रहा था

शाम सा लग रहा था मुझे

जैसे  आभा  मेरी खो गयी

आई जीवन में तुम जो मेरे

भोर  सी  जिंदगी हो गयी

 

प्रेम के नाम पर  पहले भी

मुझको पूरा था लूटा गया

प्रेम सच्चा  तुम्हारा  मिला

मेरी यादों  से  झूठा  गया

 

आये  थे   कुछ  उदासी  भरे

दौर   मुझको   सताते   हुए

है कहानी खतम तुम्हरी अब

हँस   रहे   थे   बताते   हुए

 

उनके हर  कथ्य  को  प्रेम के

अस्त्र  से  तुमने  झूठा किया

हर्ष  देखा  तुम्हें  साथ   जो

लौट  आया  जो रूठा किया

 

 प्रेम   ने   सिद्ध   फिर  से  किया

दुःख का ग्रह उससे टल सकता है

प्रेम     रूठे     किसी   का   नहीं

सर्वाधिक उर को  खल  सकता है

 

पवन तिवारी

२०/१२/२०२१

तुम मुझे प्रेम करने वाले थे

तुम  मुझे  प्रेम  करने  वाले थे

दर्द  में  साथ   रहने  वाले  थे

वक़्त  से  तेज  कैसे बदले तुम

साथ  में  जीने  मरने  वाले थे

 

जब भी मिलते  प्रशंसा करते थे

तुम   मेरे   रुठने   से  डरते  थे

मैं तुम्हारे लिए ही सब कुछ था

तुम  मेरी  हर  अदा पे मरते थे

 

सारे   वादे   बिखर   गए  कैसे

इतनी जल्दी   बदल  गये  कैसे

सदा का सच क्यों आज झूठ हुआ

प्रेम  में  धोखा  कर  गये  कैसे

 

अब तो बस टूटता  ही जाता हूँ

ख़ुद से ही  रूठता  ही जाता हूँ

प्रयास  जारी  सम्भलने  का है

ख़ुद से ख़ुद छूटता ही जाता हूँ

 

मुझको ज़िद है कि फिर से जीने की

युक्ति  सीखूँगा   दर्द  सीने  की

बहुत पछताओगे उभरुंगा फिर

अपनी संस्कृति है गरल पीने की

 

पवन तिवारी

१८/१२/२०२१

मैं तुम्हें रोज

मैं   तुम्हें   रोज   ही  दुलारुंगा

मैं   तुम्हें   रोज  और   चाहूँगा

रोज  ये  प्यार  बढ़ता जाता है

रोज  दर  पर  तुम्हारे आऊँगा

 

मैं  कहीं   अब   नहीं  समाऊँगा

तुम्हरे दिल में ही घर बसाऊँगा

तुमने रस्ता नहीं दिया दिल को

नया  राही  हूँ   भटक  जाऊँगा

 

सारे प्रश्नों के लगती हल तुम हो

कई जन्मों की पुण्य फल तुम हो

तरुंगा  तुमसे  ही  लगता  ऐसा

मेरे जीवन की गंगा जल तुम हो

 

देखो  मुझको  उबार  देना  तुम

साथ  देना  सम्भाल  देना  तुम

प्यार  पहला है आख़िरी भी हो

ज़िंदगी  को   सँवार  देना  तुम 

 

पवन तिवारी

१७/१२/२०२१

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

कुछ लोग मरेंगे और

कुछ लोग मरेंगे और

बिलकुल मर जायेंगे

कुछ     मरेंगे   और

सदा     के     लिए

ज़िंदा   हो   जायेंगे

अगर नहीं सोचा तो !

सोचना,  जीवन  में

सबसे     महत्त्वपूर्ण

यही       है       कि

हम              मरेंगे

तो      क्या  होगा ?

मर   ही  जायेंगे या

फिर   भी     रहेंगे

 

पवन तिवारी

१६/१२/२०२१

 

 

साथ होकर भी

साथ  होकर  भी  हम  अकेले  हैं

दर्द    के    इतने   सारे   रेले  हैं

प्यार का सुख तो झोंके जैसा था

साल  वर्षों  ही  छल  के  झेले हैं

 

कोई  देता  दुहाई  प्यार  की  है

कोई करता  बड़ाई  यार  की  है

हमको वो प्यार  यार लूट लिया

अपनी  पूरी  कहानी खार की है

 

जब भी कोई प्यार अपना खोता है

उसका  दिल  जार - जार  रोता है

मुझको   मालू  है    वो   तड़पेगा

हाल   कितना   ख़राब   होता  है

 

दुःख से ही तो सुखों का गीत लिया

धोखे  से  दिल  खरीद  मीत लिया

अब तो उसकी  ही  गुलामी करता

दर्द  देकर  भी  उसने  जीत  लिया

 

पवन तिवारी

१४/१२/२०२१ (मेहराबाद )

जितना खुद को समेटा

जितना खुद  को  समेटा बिखरा हूँ

अपनों को सबसे  ज्यादा अखरा हूँ

अब बिखरने पे  जो  आमादा हुआ

लोग  कहते  हैं  बहुत  निखरा  हूँ

 

टूटकर कितनी बार  फिर  से जुड़ा

कट  गये  पर,  था हौसले से उड़ा

लोग हर  बार  कहे  अबकी  गया

किन्त्तु हर बार  सही  पथ पे मुड़ा

 

रोते - रोते  भी  हँस  पड़ा  हूँ मैं

देख   अन्याय  लड़   पड़ा  हूँ  मैं

कितना नुकसान सहा हूँ ख़ुद का

किन्तु  सिद्धांत   पर  अड़ा  हूँ मैं

 

कहे  अख्खड़   तो  घमंडी   कोई

मुझको  समझे  थे  हूँ मंडी  कोई

एक अदने  ने  भरम  तोड़  दिया

ढोंग  की   खोला  है  कुंडी  कोई

 

पवन तिवारी

 

०५/१२/२०२१

(कल्याण  शाम ४ बजे नये मकान में प्रवेश के दिन )


तुम अकस्मात आये थे

तुम   अकस्मात  आये  थे   धीरे  से  हम

तुम थे खुशियाँ  बटोरे  मिले हमको गम

तुममें गति थी चपलता थी चालाकी भी

इसलिए ज़िन्दगी  हो गयी कुछ थी कम

 

यश तो  पाये  मगर  अल्पकालिक रहा

तुम्हरे मन ने भी अपमान कितना सहा

आज  पसरी  है  मुस्कान   फीकी  तभी

मुझको  संतोष  है  सत्य  को  जो  गहा

 

राह लम्बी  मगर सच्ची  अच्छी  चुनो

जो भी करना है  करने से  पहले गुनो

जल्दबाजी व लालच भ्रमित करती है

झूठ  बोले  बहुत   सच  की  पर सुनो

 

पवन तिवारी

२१/११/२०२१

 

मैंने प्रेम को बो दिया है

कोई मेरे जीवन से

प्रेम छीनकर भी

पूरा नहीं छीन सकता क्योंकि

जो प्रेम मैनें अपनी कविताओं में

बो दिया है , उन्हें कौन छीनेगा ?

मेरी कवितायें दुनिया को प्रेम देंगी

मैंने प्रेम को बो दिया है

 

पवन तिवारी

१८/११/२०२१

कौन अपना कब तलक है

कौन  अपना  कब  तलक  है  समय  ही  जाने 
लोग, लोगों को यहाँ  निज  स्वार्थ  तक  माने 
लोगों को बस अपनी कहनी अपनी ही सुननी
फटा स्वर है  फिर  भी गाते  ऊँचे स्वर  गाने

दूसरों की प्रशंसा पर मुँह बनाते हैं  
मात्र अपने चारणों  के द्ववार जाते हैं 
निज से कोई श्रेष्ठ मिल जाये तो कटते हैं 
धन मिले तो धूर्त के भी गीत गाते हैं 

ऐसे वातावरण से बचना बचाना है 
मनुजता के ध्वज को भी आगे ले जाना है 
वैरियों सा आचरण जब समय करता है 
तब समझ लो काल को तुम्हें आजमाना है 

आचरण के परीक्षा का समय तब ही सही होता 
जो कुपथ का संगी होता वही पहले धैर्य खोता 
सत्य का साथी उबरता ऐसे वातावरण में भी 
ऐसों को कंधे पे अपने सीना ताने धर्म ढोता 

पवन तिवारी 
१०/११/२०२१