यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

आज फिर हूक

आज  फिर  हूक  उठ  रही  है

जैसे  मेरी  रूह  जल  रही  है

उसने कुछ इस तरह छला था

धड्कन अब तक धधक रही है

जाने क्यों फिर से लग रहा है

किसी को फिर से छल रही है  

 

पवन तिवारी

०५/११/२०२१

प्यार ने जितनी ख़ुशी दी थी

प्यार ने जितनी ख़ुशी दी थी सारा छीन लिया

एक  धोखे  ने जैसे   सारा  जहाँ  छीन  लिया

दुखों में प्यार के दुःख  से ही अधिक खतरा है

ज़िन्दा रखा है मगर  ज़िन्दगी को छीन लिया 

 

प्यार का छल ज़हर है हाँ,  ये थोड़ा धीमा है

दर्द   है   अन्तहीन,  कोई    नहीं   सीमा  है

प्यार से बच सके तो थोड़ा ही सुख कम होगा

इसका दुःख क्या कहूँ कि बहुत लंबा बीमा है

 

प्यार कब,किसकी भला अपने आगे सुनता है

हुआ तो बस अपनी, धुन  की  ही,  सुनता है

प्यार सच्चा मिला  तो  भाग्य फला जन्मों का

ज़िन्दगी   भर  वरना  वेदना  ही  चुनता   है

 

पवन तिवारी

४/११/२०२१       

छल प्रपंच सच को

छल प्रपंच सच को मिलकर उलझायें हैं

लोग  झूठ  के  गीत  ख़ुशी  से  गाये  हैं

झूठ का नाटक  अच्छा लगता है सच से

लोग उसी पर  तन  मन धन बरसाये हैं

 

सबसे मोहक धूर्तों  की ही अदायें है

इस युग की ये कैसी अभिलाषायें हैं 

माया से  ही  सबने हैं अनुबंध किये

जिसकी  सारी  संतानें   पीड़ायें  हैं

 

सत्य सुपथ पर पग पग पर बाधायें हैं

इसीलिये  गिनती के कुछ पद आये हैं

झूठ पाप के द्वार क़तार लगी अतुलित

ऐसी   उसकी    आकर्षक   मुद्रायें  हैं

 

सत्य पे अत्याचार सभी  ने  ढाये  हैं

सत्य पे हर मौसम में बादल छाये हैं

फिर भी सत्य सत्य सा अडिग खड़ा रहता

अंत में सब उसके चरणों में धाये हैं

 

 पवन तिवारी

०२/११/२०२१

बिछड़े-बिछड़े से

बिछड़े-बिछड़े से मिले  लोग नज़र आते हैं

स्वप्न  में  इन  दिनों सूखे ही शज़र आते हैं

बिगड़ा परिवेश मनुजता का हाल ऐसा है

लोग  अपने  हैं  परायों  से  नज़र आते हैं

 

अपना चेहरा  ही  देखना यहाँ सभी चाहें

बड़ी मंज़िल  है  मगर  रास्ता छोटा चाहें

हर तरफ मैं का,मेरा शोर बढ़ता जाता है

लोग बस अपनी प्रशंसा को ही सुनना चाहें

 

हर कोई मध्य  में स्थान  को  पाना  चाहे

हर कोई हर जगह  सम्मान से आना चाहे

किन्तु इसके लिए क्या आचरण चाहिए कैसा

किये बिन भान इसका जैसे हो छला जाये

 

ऐसे  में  कैसे   भला  प्रेम   और  नेह  बचे

जिंदगी में सभी के सच की थोड़ी रह बचे

विचार  का  है समय और ये करना होगा

रूह भी ज़िन्दा रहे  और उसकी  देह  बचे

 

 

पवन तिवती

०१/११/२०२१

अच्छी चीज

अच्छी चीजों को हमेशा

खोजना पड़ता है

जैसे – शांति, संतोष, सुख

और ईश्वर, किन्तु !

जो अच्छी नहीं हैं ,

जहाँ - तहाँ पसरी हैं !

चाहे गंदगी हो या गंदापन.

हमें खोज में ही

जीवन खोजना

अच्छा जीवन दे सकता है .

 

पवन तिवारी

३१/१०/२०२१

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

मिलने की कसमसाहट

बिछड़ने की कसमसाहट तो होती है

किन्तु,मिलने पर कसमसाहट होना !

है, ज़रा-ज़रा अज़ीब, पर है !

इस शहर में कल ही आया हूँ

हम दोनों में एक दूसरे को लेकर

एक कसमसाहट है !

पहले ऐसा कभी नहीं हुआ !

इसकी सड़कों पर चलते हुए

लगता है, ये मुझे भूल गयी हैं .

ये मुझे देख रही है, परिचित की तरह,

मेरा मन सोच रहा था ,

बहुत बदल गया होगा, बीते सवा सालों में !

परन्तु, कुछ नहीं बदला . फिर भी

बहुत कुछ बदल गया .

इतना कि हमें लगा ही नहीं

कुछ बदल गया.

मुझे लगा, मैं बहुत कुछ,

 इस शहर के बारे में भूल गया हूँ.

इसलिए! यहाँ की सड़कों, गलियों

चौराहों, बस स्थानकों और

बाज़ारों से होकर

कई - कई बार गुज़रा तो,

पता चला मुझे सब याद है और

ये भी लगा कि वे भी मुझे लेकर

मेरी तरह ही कसमकस में थे .

वे भी यही सोचकर चुप थे कि

कहीं मैं तो उन्हें नहीं भुल गया.

परन्तु, मिलने से भ्रम दूर हो गया.

इस महामारी ने हमें तेईस वर्षों में

पहली बार, इतने लम्बे समय के लिए

एक दूसरे से किया दूर!

इस अट्ठारह महीने पन्द्रह दिन की

कसमसाहट तो होनी ही थी.

अपने नगर मुंबई की कसमसाहट !

 

पवन तिवारी

२९/१०/२०२१

(सुबह ६ बजे,मुंबई पहुंचते ही )

 

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

मिले हैं वर्षों बाद

मिले हैं वर्षों बाद  तो  कैसा लगता है

असमंजस तो है पर अच्छा  लगता है

ढेरों   प्रश्न  हैं ,  पीड़ाएं हैं ,  बातें  हैं

सब कुछ पाऊँगा  कि ऐसा लगता है

 

हाँ, कहने में वक़्त लगेगा लगता है

पीड़ा को कहना हो वक़्त तो लगता है

उसमें भी यदि बीच बीच में प्रश्न कठिन हों

सम्भल सम्भल कर कहना वक़्त तो लगता है

 

बिछड़ों से मिलना अपनापन लगता है

वही  पुराना  प्यार  पनपने  लगता है

वर्षों बाद मिले तो फिर से याद आया

बीते दिन भी  अच्छे  ही  थे लगता है

 

अपने थे  जो  अपने   होंगे   लगता  है

पेड़,  गली,  चौराहे,  वैसे   लगता  है

असहजता, अनजानापन  है  दूर हुआ

गये सभी  पहचान  हमें अब लगता है

 

पवन तिवारी

२९/१०/२०२१

(कोरोना काल के डेढ़ साल बाद मुंबई लौटने पर लिखी गयी कविता )

कितना कुछ एक साथ

कितना कुछ  एक  साथ घटता है

कोई  बस  एक   बात   रटता है

वो एक  बात  बड़ी  होगी बहुत

जिससे हिय  चाह के न हटता है

 

एक    आँधी    उजाड़   देती है

ज़िन्दगी  को   पछाड़   देती है

फिर भी मुस्काके बढ़ती है आगे

धूल  की   तरह  झाड़  देती है

 

फिर भी दुःख के निशाँ रहते हैं

यादों के दुःख सदा ही सहते हैं

बाहरी दुनिया से हँसते मिलते

खुद से तो रोज दुःख को कहते हैं

 

यही  जीवन  है  मान  लेते  हैं

जैसे हम सब ही जान  लेते  हैं

आदमी हाड़ माँस  के हैं मगर

पाते  हैं  सब  जो  ठान लेते हैं

 

पवन तिवारी

०८/०१/२०२२

तुम्हें चाहना है करम

तुम्हें   चाहना  है   करम

अपना    बनाया    धरम

कहने की कोशिश भी की

आड़े       आयी     शरम

 

मन   अब    आवारा   है

थोड़ा      बेचारा       है

लगता   मेरे    प्रेम   का 

गर्दिश      सितारा     है

 

सब     कुछ   गँवारा  है

ये   दिल     तुम्हारा  है

दिन   आयेगा    अपना

दिल  का     इशारा  है

 

प्यार   ही    सहारा  है

उलझा     किनारा   है

सुलझाएंगे     खुद   ही

मामला    हमारा    है

 

पवन तिवारी

०८/०२/२०२२     

अभिलषित मन कहे

अभिलषित  मन कहे  उनसे संवाद हो  

बो बता कर  मिलें  या अचानक मिलें

वर्षों से  लिखने  की  चाह लेकर फिरूँ

हिय है जो चाहता  वो कथानक मिलें

 

भीगना   चाहता   मेरा    अंतःकरण

गंगा  गोदावरी  सा  तो  पानी मिले

राजा रानी की किस्से बहुत सुन चुके

निर्धनों के भी  हिस्से  में रानी मिले

 

हर   कोई   आजमाना  मुझे  चाहता

मुझको विश्वास का एक स्वाक्षर मिले

उसको ही  खोजने  को  भटक हूँ रहा

प्रेम  का  कम से कम एक अक्षर मिले  

 

पवन तिवारी

०४/०२/२०२२