मैदानों
से चलकर पर्वत चढ़ते हैं
वर्षा
चाहें पर, पानी से डरते
हैं
उहापोह
जीवन में ऐसे चलती है
करना
चाहें और, और कुछ करते हैं.
झूठ
के मटके रोज़ रोज़ हम भरते हैं
सच
के खाली मटकों से भी चिढ़ते हैं
बढ़ने
की कोशिश तो मात्र दिखावा है.
सच
तो यह कि रोज़ ही थोड़ा ढहते हैं.
अवसरवादी
धारा के संग बहते हैं
कहने
वाले चाहे जो उन्हें कहते हैं
सच सोचे न लाभ हानि का गुणा गणित
सच
वाले बस सच सच कहते रहते हैं.
जो
सच्चे हैं जाने क्या क्या सहते हैं
तह
तक जाने तक वे महते रहते हैं
यह
जिद ही सच को सच सच कह पाती है
झूठे
तो सच को भी झूठा कहते हैं
पवन तिवारी
२/०३/२०२६