यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 22 मई 2026

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी


बचपन में दीदी संग कैसी थी बीती

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

पूरे गाँव गोद ले घुमाती थी दीदी

अपने फ़्राक से मेरी नाक पोछ देती

मेरे लिए औरों से लड़ जाती दीदी

भइया भइया कहके दुलराती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

आरती उतार के लगाती टीका दीदी

राखी बाँध अक्षत छिड़कती थी दीदी

दूध जला पेड़ा बनाती थी दीदी

राखी पर हमको खिलाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

खाना छोड़ रूठ जाऊं दौड़ी आती दीदी

अपनी टॉफी देकर मनाती थी दीदी

घाव लगे मुझको तो रोती थी दीदी

हल्दी - प्याज पीसकर लगाती थी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी


घट जाए खाना समझाती थी दीदी

अपना हिस्सा हमको खिलाती थी दीदी  

गरम गरम फूंक कर खिलाती थी दीदी

बाबू भइया कहके बहलाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

पाठशाला हमको पहुँचाती थी दीदी

बस्ता भी साथ में उठाती थी दीदी

सर पे तेल, काजल लगाती थी दीदी

कभी कभी अम्मा बन जाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

हाथ पकड़ मेला घुमाती थी दीदी

मूंगफली चाट खिलाती थी दीदी

तीखा लगे आँसू गिरे डर जाती दीदी

अँजुरी से पानी पिलाती थी दीदी

आओ बताऊं तुमको कैसी थी दीदी

 

झगड़ा होता मुझसे मार खा लेती दीदी

उल्टा आकर मुझको मनाती थी दीदी

अम्मा नहीं पर अम्मा जैसी थी दीदी

बाऊ अम्मा सबकी दुलारी थी दीदी

अब समझे बचपन में थी कैसी दीदी

 

पवन तिवारी

२२/०५/२०२६

( बड़की दीदी को समर्पित कविता )