रविवार, 6 नवंबर 2022

चिंता ने चिन्तन को मारा

चिंता ने चिन्तन को मारा

अंदर  साहस  थोड़ा  हारा

फिर क्रोध का पथ कुछ सुगम हुआ

चढ़ आया मस्तक तक पारा

 

सुख के दिन स्वप्न हुए जैसे

उलझन में मन कि हुआ कैसे

फिर आय घटी बढ़ गये खर्चे

जोड़ने   पड़े    पैसे   पैसे

 

संख्या अपनों की घटने लगी

किच-किच आपस में बढ़ने लगी  

संतोष  घटा   ईर्ष्या  जागी

छाया रिश्तों  पर पड़ने लगी

 

चिंता जीवन  को  नष्ट करे

तन मन को पूरा  भ्रष्ट करे

इससे बचने का  यत्न सदा

अन्यथा सभी में  कष्ट करे

 

संतोष करें  चिंतन  कर लें

मन के गुल्लक खुशियाँ भर लें

आवश्यकता  अभिलाषा नहीं

इस मन्तर की उंगली धर लें

 

पवन तिवारी

०१/११/२०२२  

 

   

 

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