यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

सोमवार, 29 जुलाई 2024

आज - कल दर्पण उपेक्षित से पड़े हैं



आज - कल दर्पण उपेक्षित से पड़े हैं

और  वे  इक  धूल  में  हँसते  खड़े हैं

खुरदुरे चेहरों को कन्धों पर उठाकर

ध्रुव सरीखे आचरण पर ज्यों खड़े हैं

 

विष  भरे  कितने  ही  सोने के घड़े हैं

कितने  के  गहनों में हीरे तक जड़े हैं

किंतु जब भी आचरण की बात आयी

दृष्टि   में   वे  हर  दिशा  से ही सड़े हैं

 

मान की ख़ातिर कहाँ कितने लड़ें हैं

कहने  को अपने लिए सब ही बड़े हैं

जब समय आकर  परीक्षा माँगता है

सब   बड़े  सर  रेत  में   जैसे  गड़े हैं

 

पवन तिवारी

२८ /०७/ २०२४ 

रविवार, 21 जुलाई 2024

प्रेम के जैसे बरस रही है बरसा



प्रेम के जैसे  बरस रही है बरसा

सावन से पहले अषाढ़ मन हरसा

 

जैसे झर - झर बरस रहा है

रह रह के कुछ गरज रहा है

टिप - टिप  बीच  में करता

कितने दिनों से था आकुल मन तरसा

सावन से पहले अषाढ़ मन हरसा

 

मिट्टी का रंग  पीला  हो  गया

जो सूखा  था  गीला हो  गया

कनक रंग के दादुर गायें

हँस - हँस  बरसो  बरसा

सावन से पहले अषाढ़ मन हरसा

 

उफ़ छुट्टी गरमी की हो गयी

हवा में भी नरमी सी हो गयी

यूँ अषाढ़ को देख के सावन हरसा

मेघों ने जो मन से जीवन परसा

सावन से पहले अषाढ़ मन हरसा

 

पवन तिवारी

२१/०७/२०२४    

 

 

 

  

शनिवार, 20 जुलाई 2024

भारत - भारत की ध्वनि है तो




भारत - भारत  की ध्वनि है तो

निकट से देखो अरुण ही होगा

नाग   कालिया  भय  खाता हो

फिर समझो वह गरुण ही होगा

 

धरने   वाला   गरल   कंठ  में

जग जाने   केवल  शिव होगा

असम्भव को संभव कर दिया

उसके   अंतर   में   इव  होगा

 

मैं  अगस्त्य   का   शेष  वंश हूँ

पर्वत को भी को झुकना होगा

जो   संकेत    समझ     पाए

वो   कहते   हैं   रुकना   होगा

 

बिन जननी के जनक हुआ हूँ

आदि  शक्ति को आना होगा

मुझसे   बैर   जगत   के   बैरी

को  इस  जग   से जाना होगा

 

पवन तिवारी

२०/०७/२०२४


नोट : रात में पौने एक बजे सोते समय यह कविता अवतरित हुई. उठकर बत्ती जलाया और लिखा. तब जाकर सो सका.   

 

शनिवार, 13 जुलाई 2024

ये बारिश !



ये बारिश !

बुझाती रहती है,

जगत की

न बुझने वाली

प्यास को सतत !

ये बारिश ! कितने ही

रोते हुए चेहरे की,

इज्ज़त बचा लेती है!

ये बारिश ! कितने ही

मटमैले चेहरों को

धो देती है,

फटी हुई धरती को

सी देती है,

मरी हुई नदियों,

तालाबों, पोखरों, तालों को

ज़िंदा कर देती है !

प्रकृति कि उदासी को,

धूल की तरह झाड़कर;

चमका देती है!

प्यास से मरते

नन्हें पौधों और

वनस्पतियों को,

बचा लेती है !

आसमान का

धूसरित मुँख

धो देती है !

किसानों को

देती है,

आशा की मुस्कान !

देती है सृष्टि को

नव उत्साह और

हम क्या करते हैं,

उसके लिए ?

हम पेड़ काटते हैं,

हम तालाब पाटते हैं,

हम कंक्रीट करते हैं,

हम ! पहाड़, नदी,

समुद्र, सब पर

कब्जा कर रहे हैं!

हम बारिश को घेर कर

उसी तरह मार रहे हैं,

जैसे- कौरवों ने

मारा था अभिमन्यु को !

और फिर

धूर्तों की तरह,

अट्टहास करते हुए

कोसते हैं बारिश को,

अकाल और गर्मी पर !

 

पवन तिवारी

११/०७/२०२४  

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 28 जून 2024

छूटना


 

 

गाँव छूटा

सपनों की ख़ातिर !

शहर बसा,

अपनों की ख़ातिर !

अपने छूटे,

पैसों की ख़ातिर !

फिर पैसा छूटा,

संबंधों ख़ातिर !

फिर सब छूटा,

जीवन के लिए !

फिर जीवन छूटा,

मृत्यु के लिए !

तो इस तरह

सब छूट गया !

अब सब खाली है ;

न सपने, न अपने

न पैसा, न संबंध

न जीवन, न मृत्यु !

 

पवन तिवारी

२८/०६/२०२४   

 

बुधवार, 26 जून 2024

अकेलेपन का ध्वंस


 

जैसे अकेली इमारत

धीरे-धीरे होती है उदास !

जमती है धूल,

उभरती हैं पपड़ियाँ,

उभर आती हैं दरारें!

 

कभी-कभी

दरकता सा है कुछ,

शरीर पर

जमने लगती है काई,;

 

और फिर

ढहने लगता है

रुक रुक कर

कोई हिस्सा!

 

और एक दिन

भरभराकर

ढह जाती है इमारत,

 

अकेलापन

कर ही देता है ध्वंस,

कोई भी जो

अकेलेपन के साथ

अकेला है, - इसी क्रम में

होता है ध्वंस !

 

पवन तिवारी

२६/०६/२०२४ 

रविवार, 23 जून 2024

दुलहा साले

गारी लोक गीत ( अवधी / विवाह गीत )


दुलहा साले बेना, कूलर, पंखा लेबा हो,

ऊसर, परती बोला- कै ठे मंडा लेबा हो,

अपने दीदी ख़ातिर बड़का वाला घंटा लेबा हो !

 

सोना लेबा, हीरा लेबा, लेबा हीरो हंडा,

कै ठे डंडा लेबा हो,

अपने बहिनी ख़ातिर लम्बा वाला झंडा लेबा हो !


खीर खाबा, पिज्जा खाबा,

खाबा बड़का बंडा, कै ठे ठंडा लेबा हो,

अपने फूआ खातिर केतना लवंडा लेबा हो !


कार लेबा, चेन लेबा,

लेबा बड़का हंडा, कै ठे कंडा लेबा हो,

अपने मामी खातिर गंगा जी के पंडा लेबा हो !

पवन तिवारी

२३/०६/२०२४

  

शनिवार, 22 जून 2024

लोग कहते हैं -


 

लोग कहते हैं-

प्रदूषण बढ़ गया है.

लोग कहते हैं-

गर्मी बहुत बढ़ गयी है.

लोग कहते है-

अकाल पड़ गया है.

लोग कहते हैं-

पानी का जलस्तर

नीचे चला गया है.

 

लोग कितने

अनजान बनाते हैं.

लोग आन्दोलन करते हैं.

मार्च निकलते हैं.

ये वही लोग करते हैं,

जो सबसे अधिक

प्रकृति को क्षतिग्रस्त

करते हैं.


यही हैं,जिन्होंने

अपने घरों में

सबसे बड़े प्रदूषण

लगाए बीते हैं.

यही मोटरकार वाले,

यही शीतयंत्र और

वातानुकूलन वाले !


इन्होंने ने ही

पेड़ काटे, बाग़ उजाड़े !

खाड़ी और तालाब पाटे !

मिटटी पर कंक्रीट किये,

बोर से जल का शोषण!


और फिर

भरमाने के लिए

नैतिक होने का

स्वांग रचते हुए

ये मार्च और आन्दोलन !

क्या कहें-

बेचारे मूर्ख या धूर्त !

 

पवन तिवारी

१९ /०६/ २०२४