यह ब्लॉग अठन्नी वाले बाबूजी उपन्यास के लिए महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी का बेहद कम उम्र में पुरस्कार पाने वाले युवा साहित्यकार,चिंतक,पत्रकार लेखक पवन तिवारी की पहली चर्चित पुस्तक "चवन्नी का मेला"के नाम से है.इसमें लिखे लेख,विचार,कहानी कविता, गीत ,गजल,नज्म व अन्य समस्त सामग्री लेखक की निजी सम्पत्ति है.लेखक की अनुमति के बिना इसका किसी भी प्रकार का उपयोग करना अपराध होगा...पवन तिवारी

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

मान लिया मैं मर जाऊँगा


मान लिया मैं मर  जाऊँगा
फिर भी ज़िंदा रह  जाऊँगा
तेरे अधरों  से ही  सही मैं
मेरे     गीत    सुनाऊँगा

मैं मर  कर भी  अमर रहूँगा
अपना किस्सा खुद ही कहूँगा
मेरे गीत  कहानी  जब  तक
तब तक  कैसे  भला  मरुंगा

गीतों पर मेरे  कितने ही झूमेंगे
जाने कितने  गोल-गोल ही घूमेंगे
मेरे गीतों को सुन करके मस्ती में
प्रिय के नाजुक हाथों को बस चूमेंगे

मेरे  दर्द  जमाने  को  खुशियाँ देंगे
ढल करके गीतों में  गलबहियाँ देंगे
गर हों मेरे दर्द खिलौनें जग भर के
इससे खुशी क्या जग भर को खुशियाँ देंगे


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८  

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

आओ गाय के उर को टटोलें


आओ गाय के उर को टटोलें
पौधे भी कुछ  दिल की बोलें
पानी का भी  हाल  जान लें
आओ  जंगल – जंगल  डोलें

हवा  बहुत  ही  परेशान  है
तभी   आदमी    हैरान  है
हो प्रकृति का समाधान यदि
तभी सुरक्षित सबकी जान है  

गुमशुम  पर्वत   बेचारा  है
अन्न  रसायन  का मारा है
देसी  को  ऐसे   धकियाया
गोबर  दर - दर का मारा है

सारे  बदन में  जहर  घुल गया
उन्नति का जी नक़ाब खुल गया
जिस  देसी   को  थे  गरियाते
वही जीवन का बन ही पुल गया

पश्चिम देख के  भोग लिया
बड़ा  पछताए  जोग  लिया
पूरब देखे  मस्त  हुए  तब
पूरब का जब  योग  लिया

सूरज  पूरब  में  उगता है
पश्चिम में चुपके भगता है
पूरब तुम खुद को पहचानों
तुमसे सुंदर  जग लगता है

पूरब का  सूरज  है भारत
युगों युगों से है ये कार्यरत
प्रेम सिखाता है सहिष्णु ये
यह गंगा सा सबको तारत

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८    

सारे जतन


सारा  जतन  मुझे  करना है
तड़प है बस तुमसे मिलना है
मैं ही  केवल  प्रेम में पागल
या तुम्हें  भी सूली  चढ़ना है

आग  यहाँ  पर लगी  हुई है
क्या तुम में भी  जगी हुई है
ऐसा  कभी विचार  न लाना
क्या दिल से कुछ ठगी हुई है

जब से दूर हुआ उर  से  उर
हिय में बहे हवा झुर झुर झुर
बिछुड़न का आनन्द अलग है
उखड़े मन तो  बोले चुर  चुर

इस दुःख में  आनन्द  बड़ा है
सच्चा प्रेम सो तन के खड़ा है
अबकी मिले तो  मिल जायेंगे
देख  रहे  सब  प्रेम  अड़ा है

तुम विश्वास  बनाए  रखना
प्रेम का दीप  जलाए  रखना
अधिंयारे  सब  जल  जायेंगे
हौंसला सर पे उठाये  रखना

साथ  साथ  हमको  जीना है
बैरी  जाने   क्या   मरना है
प्रेम तो प्रभु का प्रिय स्वरुप है
अपना  ध्येय  प्रेम  करना है


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८   

अपनी मर्जी से जीने के मोल चुकाने होंगे


अपनी  मर्जी  से  जीने  के मोल  चुकाने होंगे
अपनों  से  मिलने  वाले भी घाव  भुलाने होंगे
अपनी शर्तों पर जीना आसान कभी भी रहा नहीं
हँस – हँस  क र संघर्षों के हर  भार उठाने होंगे

अपने रिश्ते अपने को ही बढ़ के बचाने होंगे
पीड़ा में भी मुस्काकर हमें गीत सुनाने होंगे
कितनी परीक्षाएँ कब कैसे और किसे देनी पड़ जाय
ऐसे में अपमानों वाले सारे घूँट जलाने होंगे

कई बार इक तरफा ही रिश्ते  तुम्हें  निभाने होंगे
खुद को ही खुद नैतिकता के सारे पाठ पढ़ाने होंगे
भाई - बहन  और  भी  रिश्ते  तोड़  के  जायेंगे
ऐसे भी हालात बनेंगे तुमको  कदम  बढ़ाने  होंगे

जिद के साथ धैर्य व साहस वाले अस्त्र जुटाने होंगें
अपनी जरूरतों के गुल्लक  थोड़े बहुत घटाने  होंगे
ऐसे में मधुमास को चल के पास तुम्हारे आना होगा
गरिमा आ जाने पर निज से निज के शीश झुकाने होंगे

जाने  कितने  लोग  तुम्हारे  पैताने  सिरहाने होंगे
तुम पर मिटने वाले अनगिन हँसते हुए परवाने होंगे
दोनों हाथ  उठाकर  जग अभिवादन  करने आएगा
ऐसे क्षण में भी  बैरी के दुःख  तुमको सहलाने होंगे

पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८      

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

सोचना !


सोचना !
सोचकर करते जाना,
या करते जाना विचारते हुए;
जीवन है.
मात्र विचारना या
मात्र करते जाना,
विचार के बिना,
हो सकता है घातक;
सम्पूर्णता में,
कोमल जीवन के लिए.

कर्ता,क्रिया,कर्म के
समन्वय से भी,
कई बार नहीं मिलती
जीवन को गति;
बिना ध्येय !

व्यस्त जीवन
बड़ा जीवन
हो सकता है छुद्र
सार्थक जीवन के सम्मुख


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८ 

हैं गीत के राज कुमार- नकटा


हैं गीत के राज कुमार गवावैं मोरे सइयाँ
जी सुबह सुबह दरबार लगावैं मोरे सइयाँ

हम दुल्हिन नयी नवेली
यनकै  घर  भूत हवेली 
हम कइसे करी यन्हें प्यार
सतावैं   मोरे   सइयाँ
ई भूतन कै सरदार सतावैं मोरे सइयाँ

हम बार – बार  गोहराई
अइसन जिनि हमैं कराई
पर सुनै न  मोर  हजार
नचावैं    मोरे   सइयाँ
हैं नचनियों के यार नचावैं मोरे सइयाँ

दिनवों  में  खूबै   घूमैं
अउ राति में पी के झूमैं
ई कइसन  मर्द  हमार
गवावैं    मोरे   सइयाँ
अरे दारू पी के यार गवावैं मोरे सइयाँ

ई खुद त हवैं बताशा
औ हमसे राखैं आशा
ऊपर से करैं तकरार
फंसावैं  मोरे  सइयाँ
ई रोज मचावैं रार फंसावैं मोरे सइयाँ

सासू  कै  बड़ा  दुलारा
ननदी के आँख क तारा
झूठै  खायें  मोसे  खार
रिझावें   मोरे   सइयाँ
ई अभिनय से हर बार रिझावें मोरे सइयाँ

ई हचकि भचकि के नाचैं
सीसा में  खुदि  के जाँचैं
हम  काव  करी  सिंगार
चिढावें    मोरे    सइयाँ
ई नेटुवन के हैं यार चिढ़ावें मोरे सइयाँ

जी लम्बा लम्बा घूँघट
कइसे चली हम झटपट
वहपे  कहैं  चला झार
खिझावैं   मोरे  सइयाँ
ई मरद हैं लम्बरदार खिझावैं मोरे सइयाँ

ई मीठ-मीठ बतियावैं
यन्हैं सबही  गरियावैं
ई गाँव भरे कै  सार
कहावैं  मोरे  सइयाँ
ई मेहरा बरखुर्दार कहावैं  मोरे  सइयाँ

देवरू कै सकलि है बानर
देखैं  नै  जइसे  आन्हर
हम  कइसे  करी  दुलार
बतावैं    मोरे    सइयाँ
जी सगरो दोस हमार बतावैं मोरे सइयाँ

जब देखा मारा – मारी
औ बाति–बाति पे गारी
 लंठन  कै  सरदार
थुकावैं   मोरे   सइयाँ
ई देखै ना घर द्वार थुकावैं मोरे सइयाँ

ई नौकर  हैं  सरकारी
‘यस सर’ कै है बीमारी
घरहूँ  में इहै  ब्यवहार
करावैं   मोरे   सइयाँ
मनमानी ही सब कार  करावैं मोरे सइयाँ

जेही मिलै तेहि तारैं
बहिनियों पे रंग डारैं
जी बिगड़ा हुआ भतार
कहावैं  मोरे   सइयाँ
ई सोहदा दंतचियार कहावैं मोरे सइयाँ



पवन तिवारी

संवाद – ७७१८०८०९७८ 

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

हमरे दुअरा कै..... अवधी

हमरे दुअरा कै इनरा सुखाये लगल
तुलसी दुअरा कै भी मुरझाये लगल
बाग़ जंगल कटल  जात अइसै हवै
माटी माटी औ ढेलवा भुखाये लगल

बिन पनियों के गड़ही बुढ़ाए लगल
सगरो तलवा तलइया झुराए लगल
अपने स्वारथ में मनई है आन्हर भयल
बड़की नदियो यहर दुबराये लगल

भइया काटा न पेड़वा न पाटा कुआँ
नाहित सगरो जिनिगिया हो जाई धुआँ
पानी पेड़वा बचावा करा कुछ जतन
नाहित सब कुछ बिलाई इहाँ औ वहाँ


पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८

दिल जो टूटा मेरा..........

दिल जो टूटा मेरा तो बिखरने लगा
जो मिले आप कुछ को अखरने लगे
हम निखरने लगे थोड़ा - थोड़ा सही
प्रेम का जल मिला तो सँवरने लगा

प्रेम में दुःख  मिले प्रेम में सुख मिले
चाहता  हर  कोई  प्रेम तो कुछ मिले
उनका जीवन  अधूरा ही  रह जाता है
प्रेम यदि ना मिले शेष सब कुछ मिले

कुछ मिले ना  मिले  प्रेम थोड़ा मिले
चाहने वालों  का  हँसता  जोड़ा मिले
प्रेम जीवन को आसान  कर  देता है
प्रेम करना  भले कितना  रोड़ा मिले

ये जो मैंने  लिखी  जिंदगानी  लिखी
अपने अनुभव की सच्ची रवानी लिखी
आप भी प्रेम के स्वाद को चख सको
कविता में इसलिये निज कहानी लिखी



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

उसने हरकत की

उसने हरकत की मैंने जो देखा नहीं
उसने भी ऐसे में खुद को टोका नहीं

जिन्दगी देसी  वाली  जिलेबी सी है
ये अलग  बात है  हमने सोचा नहीं

देखते  ही हमें  वे गले  मिलते  हैं
और पीछे कहें क्यों ये मरता  नहीं

नाज़  नखरे  मैं उनके उठाता नहीं
मैं फ़क्त इसलिए उनको भाता नहीं

उनके भी दोस्त अपने हुए दोस्त जो
नाम  उनको ‘पवन’ का सुहाता नहीं



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८   

सामान जो लेना

सामान  जो  लेना  तो  दो चार  देखना
दुश्मन कसम भी खाए तो कई बार देखना

विश्वास जिनमें था वही फैला रहे हैं भ्रम
उल्लू भी बना  सकता  समाचार  देखना

दंगे फसाद घूस  औ व्यभिचार की खबरें
अच्छा नहीं  सबेरे  अब  अखबार देखना

इकरार  पर  ही ऐतबार  कर नहीं लेना
आखों में झाँक करके उसका प्यार देखना

उम्र  भर  दोस्ती  चलती है बहुत कम
यारी में  कभी  भी  न कारोबार देखना

इजहार से फक्त ही नहीं बनती बात है
अंदाज  देख पहले फिर इज़हार देखना

बनती हुई भी बात बिगड़ जाती है पवन
कहने  से  पहले उसका किरदार देखना



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८    


शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

नये युग में भारत


नये युग में भारत भइया मुश्किल बचाना है
नया  रंगरूट  पूरा  सहर  का  दीवाना  है


लड़के सब ब्वाय हो  गये प्रेमिकाएं गर्लफ्रैंड
बाबू जी डैड  हो गये भाई  ब्रो  एण्ड एण्ड
ऐसे में तो भारत की झलक भी खो जायेगी
ऐसों को क्या पता जी लोक  गीत गाना है


सहर का जादू टोना गाँव तक चला आया
गाँव के ही लौंडे बोले सहर हमको जाना है


भारत की जड़ है देसी  देसी गर लाना है
देसी आम देसी  गाय को भी  बचाना है
बचाना है देसी महुआ आम का अचार भी
तभी थोड़ा–थोड़ा भारत लौट करके आना है


संस्कृति  बचाते  हुए  गाते मुस्काते हुए
देसी ही ढंग से हमें दुनिया पर  छाना है


धोती बचाना होगा अंगोछा  भी लाना होगा
आँगन में गौरैया को दाना  चुगाना  होगा
चमकाना  दांत  होगा  नीम के दातुन से
गोबर से घर में फिर से लेपा लगाना होगा


देसी  उपायों  से ही  प्रकृति  बच  पायेगी
माटी की  दियली  से  दिवाली  मनाना है


दादी नानी वाले किस्से हँस के सुनाना होगा
मेला और सावन झूला निश्चित बचाना होगा
अपनी ही संस्कृति से  अपनी पहचान है जी
देसी पहचान अपनी  सबको समझाना  होगा


चाँद और मंगल पाया दुनिया में भारत छाया
अपने  ही  ढंग  से  हमें  बुद्ध शुक्र जाना है


खटिया के  साथ कुआँ तुलसी भी लानी होगी
पोखर तालाब  की  भी इज्ज़त  बचानी होगी
फिर से  सजाना  होगा  खेतों में  खाद गोबर
हमको यदि भारत वाली चाहिए जिंदगानी होगी


उनकी  स्टाइल  अपनी, है  अपना  तेवर  भी
हम क्या हैं अपने  ढंग  से जग को बताना है


हमको विज्ञान चाहिए पर देसी  मान  चाहिए
असली भारत को भारत वाला सम्मान चाहिए
हमको सामान चाहिए अपनी जरूरत भर  का
शिवरात्रि वाले हमको फक्कड़  भगवान चाहिए


उनके विज्ञान अपने और अनुसन्धान  अपने
अपने  आयु वेद से भी  उनको  मिलाना है


अंग्रेज  वाली  इसे   इंडिया   बनाओ   ना
उन्नति के नाम पर जी विकृति ले आओ ना
भ्रष्ट बनाओ  नहीं  भारत  की संस्कृति को
आओ जी भारत  वालों गाँव को  बचाओ ना


उनका  अनुसरण  करके कीमत  चुकाई है
स्वच्छन्दता वाली हमे संस्कृति न लाना है


शिक्षा का माध्यम  अपनी  भाषा   बनाना है
रोजगार भी भारत की  भाषा   में  पाना  है
भाषा  बचेगी    तो   ही   भारत    बचेगा
हर   देशवासी   को  ये   सच   बताना है


मुश्किल है फिर भी हमको  भारत बचाना है
असली  भारत  है  देसी, देसी  ने  ठाना है



पवन तिवारी
संवाद – ७७१८०८०९७८