शुक्रवार, 12 जून 2026

मुझको सुनती तो और कुछ लिखती



मुझको सुनती तो और कुछ लिखती

उम्र तुम्हारी कसम से बस हँसती

इससे अच्छा बनाती बातें तुम

जैसी दिखती हो और कुछ दिखती

 

तुमको कुछ याद कुछ तो भूला था

फिर से देखा तो याद फिर आयी

हँस के अपनी ही बात में फँसती

और फिर शर्म से खुदी गड़ती

 

थोड़ी वैसी थी, थोड़ी अच्छी थी

थी तो सुन्दर थोड़ी सी बुद्धू भी

मुझसे तुम दूर - दूर ही रहती

आँखें कहती थी तुम नहीं कहती

 

अब सुना जो कि तुम भी लिखती हो

मन हुआ सो तुम्हें पढ़ा थोड़ा

सच कहूँ मुझको पहले तुम मिलती

लिखती अच्छा अगर मुझे सुनती

 

वैसे कोई बुरा नहीं लिखती

हाँ मगर दिल को भी नहीं लगती

दिल लगाती तो समझती दिल की

ज़िंदगी और ज़िंदगी लगती

 

पवन तिवारी  ( आज सो.वि. को अचानक सुनकर )

१२/०६/२०२६

  


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